घर घराना नहीं लगता, सफ़र वीराना नहीं लगता,
ठट्ठा खाते-खाते अब तो, ताना,ताना नहीं लगता !
घुसे हैं जबसे डोमिनो,इटैलियन,चाइनीज पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना, खाना नहीं लगता !
अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता !
अंक अल्पतर पड़े जबसे,अपने उम्रदराज ऐनक के,
बहुत जाना हुआ चेहरा भी,अब पहचाना नहीं लगता !
चतुर करार दिया मुझको,मेरे प्राण-बीमा कराने पर,
यही वो पाप है 'परचेत'जिसपर,जुर्माना नहीं लगता !(*)


22 comments:
वाह बहुत खूबसूरत गज़ल
नज़र तेज होते ही दृष्टि धुँधली होने लगती है।
jab dil hi khaali khaali ho
sab paraaye lagte hain,
jab kabhi dil bhara bhara ho to
koi anjaana nahi lagta...
शादी करनी चाहिए या नहीं?
घुस गए जबसे डोमिनो,इटैलियन,चीन पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना,खाना नहीं लगता !
अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता
!
बहुत खूबसूरत गजल...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी दोनों पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/
http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html
अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता ! ...
वाह गौदियाल साहब ... मज़ा आ गया इन पंक्तियो में ...
घुस गए जबसे डोमिनो,इटैलियन,चीन पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना,खाना नहीं लगता !
सही कहा , अब तो खाना भी कूल होने लगा है ।
आपका ग़ज़ल लिखने का अंदाज सबसे जुदा है और हम ग़ज़ल के मुरीद...... खूबसूरत ग़ज़ल के लिए शुक्रिया.
मेरे ब्लॉग में कुछ porblem आ गयी है, खुल ही नहीं पा रहा है, इसलिए लाचार हूँ. खैर !
Rawatji, aapka blog theek-thaak khul raha hai, abhi ek tippani kar ke aaya hoon.
आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 08 -12 - 2011 को यहाँ भी है
...नयी पुरानी हलचल में आज... अजब पागल सी लडकी है .
वाह...
बहुत बढिया।
घुस गए जबसे डोमिनो,इटैलियन,चीन पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना,खाना नहीं लगता !
बहुत खूब ।
बहुत खूबसूरत गज़ल........
ख़ूबसूरत
आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-722:चर्चाकार-दिलबाग विर्क
बहुत खूब बिलकुल अलग अंदाज की गजल
बहुत खूब,चतुर करार दिया मुझको,मेरे प्राण बीमा कराने पर,यही वो पाप है---जिस पर जुर्माना नहीं लगता
खूबसूरत गज़ल
अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता !
बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! हर शेर अपने आप में सवा सेर है !
वाह! बुर्के में ज़नाना ज़नाना नहीं लगता :)
भाई जी ,नमस्कार !
बहुत खूब !
सब लगते हैं अपने बस,
पराया अपना नही लगता ||
शुभकामनाएँ!
अंक अल्पतर पड़े जबसे,अपने उम्रदराज ऐनक के,
बहुत जाना हुआ चेहरा भी,अब पहचाना नहीं लगता !
क्या खूब फ़रमाया हैं भाईजी आपने
आपका मेरे ब्लॉग पर हार्दिक अभिनन्दन
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