Wednesday, December 7, 2011

यही वो पाप है जिसपर,जुर्माना नहीं लगता !


घर घराना नहीं लगता, सफ़र वीराना नहीं लगता,
ठट्ठा खाते-खाते अब तो, ताना,ताना नहीं लगता !

घुसे हैं जबसे डोमिनो,इटैलियन,चाइनीज पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना, खाना नहीं लगता !

अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता !

अंक अल्पतर पड़े जबसे,अपने उम्रदराज ऐनक के,
बहुत जाना हुआ चेहरा भी,अब पहचाना नहीं लगता !

चतुर करार दिया मुझको,मेरे प्राण-बीमा कराने पर,
यही वो पाप है 'परचेत'जिसपर,जुर्माना नहीं लगता
!(*)




(*)उलटे मुआवजा मिलता है, घरवालों को  :)

22 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वाह बहुत खूबसूरत गज़ल

प्रवीण पाण्डेय said...

नज़र तेज होते ही दृष्टि धुँधली होने लगती है।

Rajey Sha राजे_शा said...

jab dil hi khaali khaali ho
sab paraaye lagte hain,
jab kabhi dil bhara bhara ho to
koi anjaana nahi lagta...
शादी करनी चाहिए या नहीं?

Pallavi said...

घुस गए जबसे डोमिनो,इटैलियन,चीन पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना,खाना नहीं लगता !

अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता
!
बहुत खूबसूरत गजल...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी दोनों पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/
http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html

दिगम्बर नासवा said...

अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता ! ...

वाह गौदियाल साहब ... मज़ा आ गया इन पंक्तियो में ...

डॉ टी एस दराल said...

घुस गए जबसे डोमिनो,इटैलियन,चीन पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना,खाना नहीं लगता !

सही कहा , अब तो खाना भी कूल होने लगा है ।

सुबीर रावत said...

आपका ग़ज़ल लिखने का अंदाज सबसे जुदा है और हम ग़ज़ल के मुरीद...... खूबसूरत ग़ज़ल के लिए शुक्रिया.
मेरे ब्लॉग में कुछ porblem आ गयी है, खुल ही नहीं पा रहा है, इसलिए लाचार हूँ. खैर !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

Rawatji, aapka blog theek-thaak khul raha hai, abhi ek tippani kar ke aaya hoon.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 08 -12 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज... अजब पागल सी लडकी है .

रश्मि प्रभा... said...

वाह...

नीरज जाट said...

बहुत बढिया।

सदा said...

घुस गए जबसे डोमिनो,इटैलियन,चीन पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना,खाना नहीं लगता !
बहुत खूब ।

निवेदिता said...

बहुत खूबसूरत गज़ल........

mere vichar said...

ख़ूबसूरत

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-722:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Mamta Bajpai said...

बहुत खूब बिलकुल अलग अंदाज की गजल

मन के - मनके said...

बहुत खूब,चतुर करार दिया मुझको,मेरे प्राण बीमा कराने पर,यही वो पाप है---जिस पर जुर्माना नहीं लगता

संजय भास्कर said...

खूबसूरत गज़ल

Sadhana Vaid said...

अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता !

बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! हर शेर अपने आप में सवा सेर है !

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

वाह! बुर्के में ज़नाना ज़नाना नहीं लगता :)

यादें....ashok saluja . said...

भाई जी ,नमस्कार !
बहुत खूब !
सब लगते हैं अपने बस,
पराया अपना नही लगता ||

शुभकामनाएँ!

Rohitas ghorela said...

अंक अल्पतर पड़े जबसे,अपने उम्रदराज ऐनक के,
बहुत जाना हुआ चेहरा भी,अब पहचाना नहीं लगता !

क्या खूब फ़रमाया हैं भाईजी आपने
आपका मेरे ब्लॉग पर हार्दिक अभिनन्दन