Wednesday, December 31, 2014

नूतन वर्ष की मंगलमय कामनाएं !



शुभकामनाये और मंगलमय नववर्ष की दुआ ! 

                                                 

Saturday, December 6, 2014

नृशंसता का यथार्थ !















नापाक  हरकते  कभी पाक नहीं होती ,
चालबाजी  कभी इत्तेफाक नहीं  होती ,
वास्ता दे-दे के जो अनुसरण करवाये ,
ऐसे मजहबों की कोई धाक नहीं होती।  

बलात् भगत जितना भी बद्ध दिखाए,
जहन किंतु श्याम वर्ण त्याग न पाए , 

क्रिया, मुख से जितना भी दम्भ  भरे,
त्रासित छाती  कभी  चाक नहीं होती।  

नियम,नियमावली ऐसे कामगार के, 

तामील होती है ज्यूँ ,बेड़ियां  डार के ,
एक आजाद शख़्सियत वहाँ  होती है, 
जहां बंदिशों की कोई ताक नहीं होती।

अपने लिए तो बटोरा उस पार तक, 

और दूसरों का छीना जीने का हक़ ,
नृशंसता की हर हद लांघी है फिर भी,
शर्म से नीची कोई नाक नहीं होती।

साये में जिंदगी कोई करामात ही है ,

मुकाम मिले तो वो भी खैरात ही है ,
अस्तित्व का सच तो ये  है 'परचेत ',
अवसानोपरांत कोई ख़ाक नहीं होती। 

Tuesday, December 2, 2014

हुनर ने जहां साथ छोड़ा, सलीका वहाँ काम आया।






इक ऐसा मुकाम आया,तोहमत छली का आम आया, 
वंश-नस्ल का नाम उछला, गाँव,गली का नाम आया।
   
हमी से सुरूरे-इश्क में , कही हो गई कोई भूल शायद,  
मुहब्बत तो खरी थी हमारी,नकली का इल्जाम आया।  

नजर से आके जब लगे वो, आशिकी का तीर बनकर,  
खुशी की सौगात लेकर, पर्व दीपावली का धाम आया।   

सत्कार काँटों  ने किया पर, थे हमारे ख्वाब कोमल,
सीने लगूंगी फूल बनके, इक कली  का पैगाम आया।  

राग-बद्ध करने चला जब, प्रीति के दो लब्ज 'परचेत' ,
हुनर ने जहां साथ छोड़ा, फिर वहाँ सलीका काम आया।

Friday, November 21, 2014

जोरू-दासत्व




हुई जबसे शादी, जीरो वाट के बल्ब की तरह जलता हूँ,   
यूं  तो पैरों पे अपने ही खड़ा हूँ मगर, रिमोट से चलता हूँ।

माँ-बाप तो पच्चीस साल तक भी नाकाम रहे ढालने में,
अब मोम की तरह बीवी के बनाये, हर साँचे में ढलता हूँ।  

न ही काला हूँ, कलूटा हूँ,  न ही गंजा हूँ और न लंगड़ा हूँ ,
फिर भी उससे दहशतज़दा हूँ, उसकी नजरों में खलता हूँ।
    
डोर से बँधी इक पतंग सी बन कर  रह गई है जिंदगी , 
सब ठीक हो जाएगा यही समझाकर दिल को छलता हूँ।  

हकीकत तो ये है कि खुद कमाकर पालता हूँ पेट अपना ,
किंतु एहसास ये मिलता है,किसी के टुकड़ों पर पलता हूँ।   

जोड़ी थी जिसने जन्मपत्री, बेड़ा-गरक हो उस पंडत का,   
उजला भी काला दिखे अब तो 'परचेत',  आँखें मलता हूँ।    


Saturday, November 15, 2014

'मनु' का इतिहास और दीमक की 'बाम्बी' !


'कुतरा',  टुकड़ा-टुकड़ा बीजकों का, कुछ भी न बचा,
दीमक 'अभिषेक ' खा गए, इतिहास 'मनु 'का रचा।  

दंग रह गए देशभर के, तमाम लगान महकमे वाले, 
बलाघात देने वालो को ही, धूर्त देना चाहते हैं गच्चा।  

तारीफे-काबिल लगती है इनकी, ये हाथ की सफाई,   
निन्यानबे के फेर में कमवख्तों ने,करोडो लिए पचा।

दफ्तर था चार्टर्ड अकाउंटेंट का, या दीमक की बांबी, 
देख दुर्गत वाउचरों की, न्यायतंत्र का भी माथा तचा। 

निगला देश सारा,सालों कोलगेट, टूजी-ब्रश करते रहे, 
सूबे का जब सुलतान बदला, कोहराम तब जाके मचा।  
  
भविष्य उज्जवल नजर आता है इनका तो 'परचेत',
     शठ-अपवंचक अगर दीमकों को, यूं ही देते रहे नचा।        
 


Friday, November 7, 2014

लघु-व्यंग्य:- गई भैंस एयरपोर्ट में !

बड़े-बड़े दावे करने वाली मोदी सरकार की सुरक्षाखामियों की पोल आखिरकार खोली भी तो किसने,  भैंस ने।  यह सरकार खुद दिल्ली में बैठकर बड़े-बड़े वादे  कर  रही है, और यहां से करीब हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर भैंसे अतिसंवेदनशील इलाकों में अतिक्रमण पर आमादा हैं। भैस के दुस्साहस से खिंसियाई सरकार जहां अपनी सफाई में यह तर्क दे रही है कि चूँकि भैंस का रंग काला होता है, इसलिए एयरपोर्ट पर तैनात सुरक्षाकर्मी रात के अँधेरे में घुसपैठ रोकने में नाकामयाब रहे होंगे।  वहीं विपक्ष को भी बैठे-बिठाए एक गंभीर मुद्दा मिल गया है है और वह सरकार पर यह  तंज कसने से  बाज नहीं आ रही है कि जो सरकार एक काली भैस को न ट्रेस कर सके वह भला काले बुर्केधारी इसीस अथवा अलकायदा को क्या ख़ाक ट्रेस कर पाएगी।   

उधर नाम न बताने की शर्त पर गुजरात सरकार के एक आलानेता ने आरोप लगाया है कि यह सारी घटना साजिशन हुई है।  भैस आजमखान साहिब की रही होगी और चूँकि आदित्यनाथ जी के आजमखान साहिब पर  हालिया बयान से वह खासा नाराज थी, अत:  लखनऊ से चुपके से प्रधानमन्त्री जी के  गृहराज्य पहुंचकर उसने इस साजिश को अमलीजामा पहनाया। स्थानीय मीडिया सर्कल में यह अपवाह भी गरम है कि भैंस लालूप्रसाद जी के मुंबई में हुए हालिया ऑपरेशन के बाद से उनके स्वास्थ्य के प्रति काफी चिंतित थी और उनसे  मिलने पटना जाने के लिए एयर पोर्ट  पहुंची होगी।                 

उधर एयरपोर्ट अथॉरिटीज़ में भी इस बात को लेकर एकराय नहीं है  कि आखिर कौन सा पशु प्लेन से टकराया, और यदि वह भैस ही थी  तो विमान से टकराने  के बाद गई कहाँ ? लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह आवारा भैंस ही थी, जो कि भारी-भरकम थी। बोइंग एयरक्राफ्ट को इससे अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा है और अभी पार्किंग एरिया में है। एयरपोर्ट के  डायरेक्ट डॉक्टर .ने बताया कि यात्री चमत्कारी ढंग से बच गए। इंजन ब्रेकडाउन या किसी तरह की और गड़बड़ी से  ऊपर वाले की कृपा से बच गया। कुछ हवाई विद्वानो का यह भी कहना है कि यह घटना इस बात की तरफ इशारा करती है कि हमारी विमान कंपनिया कितना घटिया प्रोडक्ट हमें मुहैया करा रही है जो इतना भारी भरकम विमान  तो क्षतिग्रस्त  हो गया, किन्तु  भैंस, बिना किसी नुकशान  के अँधेरे का फायदा उठाकर सुरक्षित भाग निकलने में कामयाब रही।  

जो भी हो किन्तु आतंकियों की धमकियों को देखते हुए स्थिति गंभीर है और सरकार को इसपर शीघ्र ही एक श्वेत-पत्र जारी करना चाहिए। 

Wednesday, October 22, 2014

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये !

सभी मित्रों, शुभचिंतकों को मंगलमय दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं अपनी इन चार पंक्तियों के साथ ;

यूं ही खुशियाँ बिखेरे हर तीज-त्यौहार, 
यूं ही मनती रहे दिवाली तेरे घर में रोज ।    
निशा के तिमिर को नित डराता रहे, 
तेरे घर के जगमगाते चरागों का ओज ।।  


Saturday, September 20, 2014

तेरे इसरार पे मैं, हर हद पार करता हूँ।


















बयां यह बात दिल की मैं, सरेबाजार करता हूँ, 
ख़ब्त ऐसी ये कभी-कभी,ऐ मेरे यार करता हूँ। 
(खब्त =पागलपन )
जबसे हुआ हूँ दीवाना,तुम्हारी मय का,ऐ साकी,
उषा होते ही निशा का, मैं इन्तजार करता हूँ।

अच्छा नहीं अधिक पीना,कहती हो सदा मुझसे,  

तेरा इसरार कुछ ऐसा, मैं हर हद पार करता हूँ।
(इसरार=आग्रह )

जो परोसें जाम कर तेरे, ठुकराना नहीं मुमकिन, है अधम हाला बताओ तुम, मैं इन्कार करता हूँ। 

खुद पीने में कहाँ वो रस, जो है तेरे पिलाने में,
सरूरे-शब तेरी निगाहों में,ये इकरार करता हूँ।

करे स्तवन तेरा 'परचेत', लगे कमतर,ऐ साकी,
ये मद तेरी सुधा लागे, मधु से प्यार करता हूँ।

Thursday, September 18, 2014

बेवफ़ा


तरुण-युग, वो कालखण्ड,
जज्बातों के समंदर ने   
सुहाने सपने प्रचुर दिए थे, 
मन के आजाद परिंदे ने
दस्तूरों के खुरदुरेपन में कैद 
जिंदगी को कुछ सुर दिए थे।   

और फिर शुरू हुई थी 
अपने लिए इक अदद् सा 
आशियाना ढूढ़ने की जद्दोजहद, 
जमीं पर ज्यूँ कदम बढे 
कहीं कोई तिक्त मिला,
और कभी कोई शहद।

सफर-ऐ-सहरा आखिरकार, 
मुझे अपने लिए एक  
सपनो की मंजिल भाई थी,
पूरे किये कर्ज से फर्ज 
और गृह-प्रवेश पर
               संग-संग मेरे "ईएम आई" थी।            

अब नामुराद बैंक की 
'कुछ देय नहीं ' की पावती ही, 
हाथ अपने रह गई, 
हिसाब क्या चुकता हुआ  
कि  वो नाशुक्र गत माह 
मुझे अलविदा कह गई।   

दरमियाँ उसके और मेरे 
रिश्ता अनुबंधित था,
वक्त का भी यही शोर रहा है, 
शिथिल,शाम की इस ऊहापोह में 
मन को किन्तु अब 
येही ख़्याल झकझोर रहा है।  

हुआ मेरा वो  'आशियाना ',
उसके रहते जिसपर  
हम कभी काबिज न थे,  
मगर, वह यूं चली गई, 
वही बेवफा रही होगी,
हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे।    

Thursday, September 4, 2014

आस्था और श्रद्धा


भावुक था विदाई पर 
वहाँ पीहर पक्ष  का हर बंदा,
किया  प्रस्थान ससुराल,
तज मायका निकली नंदा।

हुआ पराया  पीहर,
छूटे रिश्तों के सब ताने-बाने,
रूपकुण्ड से आगे पथ पर 
साथ चले सिर्फ 
"चौसींगा" वही जाने-माने।          


Heavy Snowfall at Manali in the month of September

रूठकर गई थी
ससुराल वालों से,  
और पीहर में थी 
वह चौदह सालों से,
बिन उसके शिव उदास, 
लगता था घर उनको  
सूना-सूना,खाली-खाली। 

अब जब वह  
वापस कैलाश लौटी, 
इन्द्रदेव भी खुश हुए,  
कुछ यूं मदद की शिव की, 
सितम्बर में बनाया  
दिसम्बर  का सा मौसम    
और खूब बर्फबारी हुई, कल 'मना'ली।।  


कैलास के लिए विदा हुई नंदा, छह खाडू गए साथ

Tuesday, August 26, 2014

जोग लिखी


मंजुल समर,शीतल बयार, सर्द जाड़े, 
वन,हिमनद,गाँव-गलियन,खेत,बाड़े।  

ख़ुद बालपन हुआ संबल जिनसे कभी, 
चीड़, देवदार, बुराँस वो सब वृक्ष छाड़े।
   
प्रकट उसमे भी था अग्रज  प्रेम होता, 
जब लिया करते वो हमको हाथ आड़े।   

तरेरकर नयन,रूबरू होते थे जो कभी,  
वो वैर-विद्वेष,गिले-शिकवे सब पछाड़े। 

उदर वास्ते सुरम्य हिमशिखर बिसरे,  
पड़े निन्यानवे के फेर में, गिन पहाड़े। 

कोहलू के से बैल बनकर रह गए अब ,   
हर रात बीते दारूण यहां, दिन दहाड़े। 

बन गए ज्यूँ कि श्वान धोबी का 'परचेत', 
हुए कुटुम्ब से महरूम,मुलाज़मत लताडे।   

Friday, August 8, 2014

नादाँ !

थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,
  रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।   
तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,
  हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए।

उलटबासी 
शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम,
क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी,
किस-किस से नहीं पूछा पता उसका,
क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी, 
 सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े, 
       लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,        
उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ,
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी। 

Friday, August 1, 2014

मानव निर्मित बढ़ती त्रासदियां !

पिछले  दो दिनों  में लगातार दो प्राकृतिक आपदाओं, एक  उत्तराखंड  और दूसरे  पुणे  ने  लगभग १६० जिन्दगियों  को पलभर में लील  लिया।  इसे प्राकृतिक आपदा कहने में  बड़ा आसान लगता है कि  जी बाढ़ आने , बादल फटने अथवा लैंडस्लाइड  की वजह से ऐसा हो गया ।  जबकि  कड़वी सच्चाई यह है  कि  ये मानव निर्मित आपदाए है।   बादल पहले भी फटते  थे, बाढ़ पहले भी आती थी  और लैंडस्लाइड पहले भी होती थी,  लेकिन सिर्फ कुछ ख़ास मौकों और  प्रकृति के अत्यधिक बिकराल होने पर ही  जन-धन की हानि होती थी।   आज की तरह हर कोस पर ज़रा सा  बारिश होने  या बाढ़ आने से ऐसा नुकशान नहीं हुआ करता था।  हम अगर इतिहास में  थोड़ा सा पीछे जाएँ तो सन १९७० में बिरही नदी पर  सन १८९३ में  बनी विशाल झील के टूटने ने  जो बिकराल रूप  उत्तराखंड  के चमोली से हरिद्वार तक धरा था,  और  भारी जन-धन की जो हानि उस जमाने  में हुई थी, कल्पना करके रूह काँप जाती है कि भगवन न करे, अगर वह घटना तब न होकर आज के इस युग में घटित हुई होती तो क्या हो जाता?  

यहां इसे  एक उदाहरण से समझाना चाहूँगा ; पहाड़ी मार्गों पर कभी अमूमन  इक्का-दुक्का वाहन घंटे भर के  अंतराल से  ही चलते दिखाई देते थे, अत : कहीं पर  कोई लैंडस्लाइड  हो भी  जाती थी तो  किसी राहगीर  के हताहत होने की  सम्भाव्यता ना के बराबर होती  थी।   कल्पना करो  कि अगर इन सड़कों पर  भी  दिल्ली की सड़कों जैसा जाम लगा हो  और ऊपर पहाड़ी से  एक पत्थर भी खिसककर नीचे आ जाए  तो होगा ? 

इसमें कोई  संदेह नहीं  कि  अनियोजित विकास और जंगलों का  बड़े पैमाने पर विनाश प्रकृति के रोष के पीछे मुख्य कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण  है किन्तु हमारे  कुछ बुद्धिजीवी और ज्ञानी  भले ही  सिर्फ इसे ही एक मूल कारण माने , किन्तु  अनेक  सत्यों में से एक बड़ा सत्य इसके पीछे का जो है वह है ,जनसंख्या  विस्फोट।  The truth is that the population explosion,  colossal greed of people, politicians and bureaucrats are mainly responsible for such frequent disasters .  

 मुझे ताज्जुब होता है  कि इस कमरतोड़ महंगाई और तथाकथित सभ्य  जमाने में  भी  बहुत से हिन्दुस्तानी  परिवारों में आठ से दस बच्चों की फ़ौज एक   सामान्य सी बात मानी जा रही है.   जब आज जरुरत थी कि  हम समझदारी  और सख्ती के साथ तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या  को नियंत्रित करते  तब हम सिर्फ अपने तुच्छ राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों में ही उलझे हुए नजर आते है।   अभी  ताइवान  एक ताजा उदाहरण है।  गैस,  ईंधन पूर्ति  के लिए  आज हमारी लाइफ लाइन बन चुकी है, मगर यदि ताइवान के पास बहुत सी जमीन बाकी होती तो उसे शहर के बीचों बीच सड़क के नीचे से न तो  गैस लाइन बिछानी पड़ती और न ही आज इतना बड़ा हादसा होता।     

पता नहीं,  हम इंसान  कब चेतेंगे !




Monday, July 28, 2014

भारतीय परम्पराएँ और मार्क्स, मैकॉले तथा इब्न रुश्द के छद्म भक्त !

देख रहा हूँ कि मार्क्स, मैकॉले  और  इब्न रुश्द के मुखौटों में छिपे कुछ पश्चमी  दलाल  श्री दीना नाथ बत्रा जी की  किताब पर काफी हायतौबा  मचाये हुए हैं।  वेंडी डोनिजर की तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह से गलत किताब का बचाव करने के लिए तो ये स्वार्थांध  दौड़ पड़े थे, वह सिर्फ इसलिए क्योंकि मामला  एक  पश्चमी लेखिका से सम्बद्ध था। और जो उन अनेक भारतीयों की यह मानसिकता भी  दर्शाता है कि स्वदेशी को  फेंक देना चाहिए और अगर  कोई चीज पश्चिम से आ रही है तो उसे तुरंत आत्मसात  कर लेना चाहिए। वाह !

जिस प्रखरता  से आज ये कुछ मौकापरस्त  दीनानाथ जी की किताब के खिलाफ बोल रहे है,  मैं समझता हूँ कि  इन  मानसिक तौर पर दिवालिये लोगों को अगर ज़रा भी  अपनी सांस्कृतिक विरासत के  प्रति  लगाव और सम्मान होता तो यही  प्रखर विरोधी स्वर तब सुनाई देने चाहिए थे, यह प्रचंड विरोध उनका तब सामने आनी चाहिए था जब  वेंडी डोनिजर ने अपनी उस बकवास किताब में लक्ष्मण और माता सीता के सम्बन्धो पर ऊँगली उठाई थी। और अगर  उसके तथ्य इतने ही सुदृढ़ थे तो तब  पेंगुइन और वेंडी को उस किताब का बचाव अदालत में करने की सलाह दी गई थी, वे क्यों नहीं आये ? क्योंकि उन्हें भी असलियत मालूम थी।   अगर इन तथाकथित क्षद्म-सेक्युलर मौकापरस्तों में ज़रा भी स्वाभिमान होता तो ये उस समय पश्चमी मीडिया,  जोकि  तब यह प्रचारित  कर रहा था कि हिन्दुत्ववादियों की  हिंसा और बदमाशी  की वजह से किताब प्रतिबंधित करनी पडी , उसे जाकर यह  सच्चाई बताते कि  किताब तथ्यात्मक रूप से गलत थी।  

अगर दीना नाथ जी अपनी किताब  में यह कह रहे है कि हिन्दू होने के नाते जन्मदिन पर कैंडिल जलाने की बजाये, घर में हवन करो, तो क्या गलत कह दिया भाई? हवन का वैज्ञानिक महत्व भी सभी जानते हैं।  अगर हमारे बच्चों को हमारी समृद्ध पौराणिक परम्पराओं से सही तरीके से अवगत कराया जाए तो उसमे बुराई क्या है?  ठीक  है, और मैं भी स्वीकारता हूँ कि बहुत सी पौराणिक कहानिया कपोल-काल्पनिक होंगी  एवं  विकास के लिए  आज एक अग्रणी सोच बच्चों  में अवश्य होनी चाहिए, मगर उसका मतलब सिर्फ यह नही कि  हम वह अग्रणी सोच सिर्फ पश्चिम से आत्मसात करें।   यदि  पश्चमी सोच  इतनी ही अग्रणी है तो अमेरिका और यूरोप के बच्चे आज एशियाई बच्चों से पिछड़ क्यों रहे है ? जब रामायण  अथवा महाभारत की बात आती है तो आप लोग उस आधार पर  हिन्दू धर्म की  बहुत सी खामिया गिनाने की कोशिश करते  हो, किन्तु अगर उसे सत्य मानते हो तो  इस तथ्य को सत्य मानने में क्यों  दिक्कत होती है  आपको कि रावण के पास उस वक्त भी विमान थे ? 


और भैया, अगर आपको  बहुत  ही ज्यादा  दर्द हो रहा है तो बजाय इधर उधर हो-हल्ला मचाने के  दीनानाथ जी की  किताब को अदालत में चुनौती दो, अगर  हिम्मत है तो।     

Thursday, July 10, 2014

दिनचर्या


जिंदगी के लम्हें, 
छलकते हुए बेबस बीते हैं, 
फिर भी अनुस्मरण भाण्डे, 
जस के तस रीते हैं।    
हमको भी नहीं मालूम, 
गुजरा है वक्त किस तरह,
मलाल दस्तूर बन गया , 
गश खाते है और कश पीते हैं।।    

Wednesday, May 14, 2014

चुनावी महाकुम्भ का आरती विसर्जन और …।

और आखिरकार खत्म हो ही गया, चुनाव का एक और महाकुम्भ। हमेशा की भांति इस बार भी  लोकतंत्र के इस वैतरणी संगम पर बहुत से संतों और पापियों ने मोक्ष प्राप्ति की आस और अपने तमाम पापों को धोने की मंशा से  डुबकी लगाईं। यह  बात और है कि वैभव की चकाचौंध मे अंधे हुए अनेकानेक श्रद्धालूओं  ने  प्रयास तो अपने तमाम पापों को धोने का किया था, मगर इस शुद्धिकरण क़ी हड़बड़ाहट मे मेला-मार्ग  से गुजरते वक्त वो कितने और पाप अपने खाते मे हस्तांतरित कर गये, खुद भी नहीं जानते।

आस्था ही जब अपने मूल से भटक जाये तो पथिक का राह भटकना तो स्वाभाविक ही है।   आजादी के बाद से ही  हालांकि समय-समय पर इस देवास्थल  के पुजारियों की करतुतों और कारगुजारियों से लोकतंत्र का यह पवित्र धाम कलुषित होता रहा है, किन्तु जितना पिछले एक दशक मे  देखने को मिला, मै समझता हूँ कि शायद ही इतना कभी पहले हुआ हो। गत दस वर्षों का यह कालखण्ड स्वतन्त्र भारत के इतिहास मे एक ऐसा दुरास्वप्न बनकर आया कि लोगो की लोकतंत्र  पर से ही आस्था खत्म होतीं सी नजर आई। निम्नस्तरीय व्यवहार, लूट-खसौट , चोरी-डकैती, दुराचार और व्यभिचार, आर्थिक विषमता और मुल्य-वृद्धि, ये कुछ इस दौर के  ऐसे कारक थे जिनकी वजह से लोगों का तमाम व्यवस्था से ही भरोसा उठने लगा था।      

यह एक ऐंसा दौर था जब न  सिर्फ़ इस देश के अन्दर मौजूद बहुत से पापियों ने अपनी कारगुजारियों से भारत माता  का शीश शर्म से झुकने पर मजबूर किया, अपितु, इनकी हरकतें देखकर और हमारी आन्तरिक कमजोरियों का फायदे उठाते हुए , हमारे पड़ौसी मुल्को ने भी समय-समय पर अपनी बदमाशी, झुंझलाहट और आँखे तरेरने मे कोईं कौताही नही बरती।  मगर एक किंवदंती है कि अँधेरी सुरंग मे  कल्पना के सहारे हताशा और नाउम्मीदी के  भयावह मार्ग पर आगे बढ़ते हुए दूर कहीं एक रोशनी का छोर नजर आ जाये तो भटकता मुसाफिर अपने पिछले सारे दुखों को भुलाकर, उस रोशनी तक पहूंचने का भरसक प्रयास एक नईं उर्जा शक्ति के साथ फ़िर से करने लगता है।

और ऐंसा ही  कुछ यहां भी हुआ।   इस महाकुम्भ  के तमाम मेला-क्षेत्र का एक सरसरी नजर से ही अवलोकन करने पर यह स्पष्ठ संकेत  मिल जाते थे  कि हताशा और नाउम्मीदी की  लम्बी, अँधेरी  सुरंग से गुजरते हुए  सबसे अधिक घुटन जो महसूस कर रहा था, वह था इस देश का युवा वर्ग।  यही वजह रही  कि  जहां भी उसे उम्मीद की एक धूमिल सी  किरण भी नजर आई,  वह उसकी तरफ़ सरपट भागा  चला गया।  सदा की ही भाँति  हालाँकि इस दरमियाँ भी बहुत से ऐसे परजीवी मौकापरस्त  नजर आये जिन्होने उनका निजी  लाभ के लिए इस्तेमाल करने मे  कोई  कसर बाक़ी नही छोडी।  स्वार्थी बहुरूपिये भेड़ियों, घोटालेबाजी के बल पर पेट भरने वालों  और रसीली , मनगढंत कहानियां गढ़कर उसे लुभावने अन्दाज़ मे जनता को बेचकर अपना किचन चलाने वालोँ   ने भी  उन्हें पथभृष्ट करने की हर मुमकिन कोशिश की, किन्तु आज के पढे-लिखे और समझदार  युवा ने उनकी हर कोशिश को नाकाम कर दिया।     

उनके उत्साह को देखकर तो यही प्रतीत होता था कि मानो मानव भेश मे उन्हें कोई  विघ्नहर्ता मिल गया हो।  इस साल हुए इस महाकुम्भ की एक खास बात यह भी रही  कि इसमें  66.38 फीसदी निर्णयकर्ताओं  ने अपने मताधिकार का उपयोग कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। इससे पहले यह रिकॉर्ड साल 1984-85 में हुए चुनावी कुम्भ के नाम था, जब 64.01 फीसदी वोटिंग हुई थी और तब सहानुभूति की एक बड़ी जलधारा संगम पर सवार थी। इस आधार पर अब सवाल यह खड़ा होता है कि मतदान का यह नया कीर्तिमान क्या  उस विघ्नहर्ता नजर आ रहे नायक की लहर का ही कमाल है? अनेक समझदार, जानकार तो इसी ओर इशारा करते है, कुछ ऐसे भी हैं जिन्हे इस गंदी कर दी गए राज्नीति से खास सरोकार नहीं है,  किन्तु  कुछ  ऐसे भ्रष्ट, स्वार्थी, संकीर्ण- बुद्धि,  दिग्भ्रमित और चाटुकार  भी है जो इसे उसकी लहर सिर्फ़ इसलिए नहीं कह पा रहे क्योंकि ये पातकी  सोचती हैं कि कहीं इनके सच स्वीकारने से इनके अहम को ठेस  न पहूंच जाये।   


दीमक की तरह देश को अन्दर से खोखला करने वालों को यह समझने का अब वक्त आ गया है कि पिछले ६० वर्षों में देश ने जो कुशासन और सार्वजनिक सम्पति की लूट देखी है, गुजरात मॉडल का अर्थ है उससे मुक्ति। पिछले कुछ दशकों का इतिहास गवाह है कि जो भी प्रदेश कुछ खास दोहरे चरित्र वाले इन खलनायकों से मुक्त हुआ वो तरक्की की राह पर है। वक्त आ गया है उन कुछ रसीली, चटपटी ख़बरों से अपने चूल्हे की आग को जलाये ऱखने वालों के यह समझने का कि जिस इन्सान को उन्होने पिछले एक दशक से भी अधिक समय तक एक दानव के रूप मे प्रदर्शित कर अपनी दुकाने चलाई, जिसकी छवि को एक साम्प्रदायिक, कातिल और खूंखार तानाशाह की तरह चित्रित कर उस पैंटिंग को करोडो मे बेचा, उनकी दुकाने अब इस घटिया किस्म के माल से  बहुत ज्यादा दिनो तक नहीं चलने वाली। 


हालांकि मैं समझता हूँ कि नई सरकार से बहुत ज्यादा की उम्मीद रखना शायद अपने आप से नाइंसाफ़ी होगी।   किन्तु हां, इतना मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, पिछले दस साल के मुक़ाबले आने वाले सालों मे हम कहीँ बेह्तर प्रशासन की उम्मीद अवश्य कर सकते हैं। और इस नई सरकार से न सिर्फ़ मैं अपितु देश के वे करोड़ों लोग जिन्होने एक नईं भोर की उम्मीद मे इन्हें इस वैतरणी मे अपने बहुमुल्य वोट से स्नान कराया, इतनी अपेक्षा इनसे  अवश्य रखते हैं कि अपने शासन के दौरान ये उन गिद्धों को नहीं बख्शेंगे जिन्होने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही तौर पर इस देश को लूटा, भारत माता को शर्मिँदा होने पर विवश किया। इस प्रक्रिया में  कुछ ज्यादतियां होनीं  भी स्वाभाविक हैं किन्तु उस पेंडुलम को भी सही किया जाना अत्यन्त आवश्यक है, जो वाम-चरम और यूरो-केंद्रित हो गया है। क्षद्म धर्म -निरपेक्षता का चोला एक सरासर बक़वास है जिसके मुखोटे के पीछे कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ के लिये देश के लोगो को आपस मे ही भिड़ाए हुए है । आज इन सब बातों को दरकिनार कर देश को एक सुनहरे भविष्य मे ले जाने हेतु हमें आधुनिकीकरण और विकास की सख्त जरुरत है। एक होज-पोज़ संस्कृति की वर्तमान अवधारणा देश की मज़बूती के हित मे कतई नही है, और हमे इसके आकार को एक यथार्थवादी भारतीय पहचान देनी होगी। 

अंत में चंद शब्द उन खिसियाये मौक़ापरस्तो के लिये भी कहना चाहूंगा जो कह्ते थे कि ऐसा कभी नहीं हो सकता और अब जो १६ मई के बाद गोल-गोल घूमते अपने छत के पंखें को शून्य मे निहार रहे होंगे। उन्हें यही कहूँगा कि अब जब इस देश के युवा वर्ग ने इनके भिगो के लगा हीं दिया है तो मैं अब उस वक्त उनकी हताशा की भी पराकाष्ठा को देखना चाहता हूँ, जब देश की गद्दी उस जुझारू इंसान के बैठ्ने से सुशोभित होगी। साथ ही भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि इन्हें सद्बुद्धि की प्राप्ति हो। 

आने वाली नई सरकार को मेरी अग्रिम हार्दिक शुभकामनाऐ ! 

जय हिन्द !



Saturday, April 19, 2014

ये मेरा शहर !





















खुद के दुःख में उतने नहीं डूबे नजर आते हैं लोग,
दूसरों के सुख से जितने, ऊबे नजर आते हैं लोग।

हर गली-मुहल्ले की यूं बदली  होती है आबहवा,
इक ही कूचे में कई-कई, सूबे नजर आते हैं लोग।

सब सूना-सूना सा लगे है इस भीड़ भरे शहर में,
कुदरत के बनाये हुए, अजूबे  नजर आते हैं लोग। 

कोई है दल-दल में दलता, कोई दलता मूंग छाती, 
कहीं पाक,कहीं नापाक, मंसूबे नजर आते है लोग।

बनने को तो यहां आते है सब,चौबे जी से छब्बे जी, 
किन्तु बने सभी 'परचेत', दूबे नजर आते है लोग।  

Sunday, January 26, 2014

एक और गणतंत्रदिवस और आशाओं-निराशाओं की आंखमिचोली !




65 वें गणतन्त्र की  सभी देश वासियों  को हार्दिक शुभकामनाएं ! 

इस नूतनवर्ष  के प्रारम्भिक मास के उत्तरार्द्ध में हर वर्ष  की भांति, आइये इस वर्ष के लिए भी हम सभी मिलकर पुनः एक सुखमय और समृद्ध भारत का सपना सजोए, उसकी कामना करें । आज महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से देश का जन - जन किस कदर त्रस्त  है इसका अहसास सिर्फ  इसी बात से हो जाता है कि जनता को जिधर भी  इससे मुक्ति के लिए एक आशा की किरण नजर आती है वह वहीं उसे लपकने पहुँच जाती है।   वो बात और है कि  उसे हर तरफ निराशा ही हाथ नजर आती है।  

तमाम देश और खासकर दिल्लीवासियों को भी एक ऐसी ही सुनहरी किरण नजर आई थी, किन्तु उसे लपकने के बाद दिल्लीवासियों को भी एक बड़ी निराशा के साथ शेक्सपियर याद आ गया।  उन्हें भी यही सबक मिला कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।  उम्मीदें सभी लगाए बैठे थे किन्तु  पिछले दिनों जो कुछ अपने आस-पास नजर आया उससे यही अहसास हुआ कि अगर चोरों के हाथ में सत्ता आ जाए तो वो  पहला मोर्चा पुलिस के खिलाफ ही खोलते है। और ऐसा इस उद्देश्य से नहीं किया जाता कि पुलिस सुधरे और आम-जन को न सताये, बल्कि इसलिए किया जाता है  कि उसे अपने ढंग से इस्तेमाल कर अपना उल्लू कैसे सीधा किया जाये।  

यह डायलॉग हालांकि काफी पुराना  हो चुका है, लेकिन प्रासांगिकता उसने आज भी नहीं खोई कि कोई इंसान जब किसी और पर ऊँगली करता है तो उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि तीन उंगलिया उसकी तरफ भी होती हैं।  सब्जबाग़ दिखाना और दूसरों को उपदेश देना शायद इस धरा पर सबसे आसान काम होता है, किन्तु उसे  वास्तविकता की जमीन पर मूर्त रूप देना एक कठिन काम है। हम जब पुलिस को  दोष देते है तो उससे पहले यह भूल जाते हैं कि ये पुलिस वाले  भी हमारे इसी समाज का हिस्सा हैं  और यदि वे अपना फर्ज ठीक से अदा नहीं कर रहे है तो उसके लिए जिम्मेदार कारक कौन-कौन से हैं।  क्या एक ईमानदार पुलिस वाला आज के  दूषित राजनैतिक और लालफीताशाही माहौल मे ईमानदारी से फर्ज अदा करके चैन की जिंदगी जी सकता है? हम यह क्यों भूल जाते है कि उसका भी परिवार है, और नेताजी अथवा  अफसर की किसी महत्वाकांक्षा ने अगर उसे ६ माह के लिए निलम्बित करवा दिया तो इस कमरतोड़ महंगाई मे वह अपने बच्चे के स्कूल की फीस कहाँ से भरेगा ? क्या एक ईमानदार पुलिस वाले को हमारे लोकतंत्र के चारों  स्तम्भ निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से काम करने देते हैं ? क्या अपराधियों  में पुलिस का भय एक सुनियोजित तरीके से ख़त्म नहीं कर दिया गया है ? ये कुछ सवाल है जिनका हमें ईमानदारी से सर्वप्रथम जबाब तलाशना होगा और उसके बाद ही हमें अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं  के बारे में सोचना चाहिए। 


आज हमें जरुरत है अपने खून के शुद्धिकरण की।  भ्रष्टाचार अगर शताब्दियों से हमारे खून में न होता तो हम तीन-तीन गुलामियाँ  ही क्यों झेलते ? किस चीज की कमी थी हमारे पास ? दूसरे को अनुशासन में रहने की दलील देते है, लेकिन यह तो देखो कि खुद कितने अनुशासित हो। दूसरों के लिए तो हमने पावंदियों का लम्बा-चौड़ा मकड़जाल बुन लिया किन्तु अपने लिए ?   

जय हिन्द !    


Wednesday, January 22, 2014

सदी का सबसे छोटा ठट्ठा - 'आम-आदमी' !



छवि गूगल से साभार !

अमूमन जब किसी चीज को उपहास, परिहास अथवा मजाक के नजरिये से देखा जाता है तो अक्सर कहा जाता है कि अमूक चीज उस ख़ास वक्त, साल अथवा सदी का सबसे बड़ा जोक  बन गया है।  लेकिन यहाँ बात इसके उलट है और मुझे ऐसा लगता है कि शायद ही इस सदी में कोई इससे भी छोटा जोक बन पाये और वह जोक है 'आम-आदमी'। वर्णमाला के मात्र पांच अक्षरों अथवा सिर्फ दो शब्दों का ठट्ठा (जोक )।

आम के साथ इसे वक्त का क्रूर उपहास कहिये अथवा आम का दुर्भाग्य समझिये कि जिस आम का नाम आते ही मुंह में रस आ जाता था, आज निचले दर्जे के आदमी की महत्वाकांक्षा की वजह से उसी आम का नाम सुनते ही लोगो के मुंह में गाली आ जाती है।  उस वक्त दिमाग में एक ही ख्याल दौड़ता है कि अगर कमवख्त कच्चा मिले तो अचार ड़ाल दें और अगर पका मिले तो चूसकर फेंक दे। आदमी भी बखूबी जानता है कि ये आम महाशय भी कोई हलके में लेने वाली चीज नही है।  बड़े किस्म का आम तो फिर भी थोड़ा परिपक्व और गम्भीर होता है किन्तु ये जो छोटे कद का आम है, ये है बड़ी ही कुxx  चीज।   ठीक से नहीं सम्हाला तो कब कमवख्त फिसलकर रस और गुठली समेत सड़क पर लेट जाये, कोई नही जानता और यदि आदमी ने जल्दी चूसने की हड़बड़ाहट दिखाई तो यह भी सम्भव है कि जनाब अपनी गुठली को चूसने वाले के हलक  में अटकाकर उसका 'राम नाम सत्य' भी करवा दें।  

कुल मिलाकर देखा जाए तो आम से दूरी बनाकर उसे बरतने में ही समझदारी थी, किन्तु क्या करें, बागानी जमीन पर ऐसा हरगिज सम्भव नहीं लगता।  क्योंकि  इसका और आदमी का, खासकर आर्थिक रूप से निचले दर्जे के आदमी का आपस में यूं कहिये कि हमेशा के लिए ही चोली-दमन का साथ है। आम न तो आदमी को छोड़ सकता है  और न ही आदमी आम को।   लेकिन हाल में जो कुछ देश-दुनिया में घटित हुआ और हो रहा है, उसके आधार पर मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूँ कि आदमी भले ही निर्लज्जता की सभी सीमाएं लांघ रहा हो, किन्तु आम  जरूर आदमी से अपनी नजदीकियों पर शर्मिंदगी महसूस कर रहा होगा।  और मुझे तो यह भी आशंका लग रही है कि इसी शर्मिंदिगी की वजह से क्या पता कहीं भविष्य में पेड़ों पर बौंर आने ही बंद हो जाये ।  

आदमी के आम से ख़ास बनने के पिछले ६६ सालों के सफ़र पर अगर नजर दौड़ाएं तो एक बात यहाँ साफ़ होती है कि ख़ास आदमी मौके पर आम आदमी बनने  का नाटक भी बखूबी कर लेता है, किन्तु आम आदमी अभी ख़ास बनने के  ड्रामे  में ख़ास आदमी से बहुत पीछे है।  अपने को आम से ख़ास दिखाने की प्रतिस्पर्धा में यह आंख का अंधा और नाम का प्रपंची अपनी अपरिपक्वता को छिपा नहीं पाता, वजह साफ है कि  उसकी हर बात पर झूठ बोलने की आदत, उसका बड़बोलापन और मोड़ मुड़ने (यूं-टर्न) की उसकी अद्भुत बचकानी क्षमता , उसकी हर क्रिया, चाहे वह निष्कपट हो अथवा छलावपूर्ण,  एक नौटंकी नजर आने लगती है। एक अदनी सी सफलता भी उसके सिर चढ़कर बोलने लगती है। कामयाबी के इस घमंड में वह अपनी सदियों पुराने तमीज और तहजीब भी भूल गया।  अपनी औकात से बाहर जाकर हाथ-पांव मारने को उतावला हो जाता है, नतीजन, चेहरे की शठता छुपाकर उसे जबरन अपनी और आम-आदमी की जीत बताने को सौंदर्य-प्रसाधनो  के उपयोग की नौबत आ जाती है।  उधर दूसरी तरफ ख़ास आदमी  के दोगलेपन और भ्रष्टाचार तथा महंगाई से त्रस्त आ चुके लोग अपने को ठगा सा महसूस करते हुए जीत शब्द की नए सिरे से परिभाषा ढूढ़ने लगते हैं।  

अब ऊपर वाला जाने  कि  आम और खास की यह आँख मिचोली का खेल उसे किस मुकाम पर ले जाकर छोड़ता है।      

Friday, January 17, 2014

'रहें ना रहें हम महका करेंगे' ........... … श्रद्धांजली ।



नैन-पलकों से उतरकर, गालों पे लुडकता नीर रोया,
वो जब जुदा हमसे हुए तो, यह ह्रदय तज धीर रोया।

मालूम होता तो पूछ लेते, यूं रूठकर जाने का सबब,
बेरुखी पर उस बेवफा की,दिल से टपकता पीर रोया।

तिमिर संग घनों की सेज पर,ओढ़ ली चादर चाँद ने,
चित पुलकितमय मनोहारी, मंद बहता समीर रोया।

देखकर खामोश थे सब, कुसुम , तिनके, पात, डाली, 
खग वृक्ष मुंडेर, ढोर चौखट, चिखुर तोरण तीर रोया।

अनुराग बुनते ही हो क्यों, 'परचेत' अपने  इर्द-गिर्द,
विप्रलंभ अन्त्य साँझ पर वो,  देह लिपटा चीर रोया।