Thursday, May 28, 2020

उम्मीद।


हौंसला बनाए रख, ऐ जिंदगी, 
'कोरोना' की अवश्य हार होगी,
सूखे दरिया, फिर बुलंदियां चूमेंगे 
और तू, फिर से गुलजार होगी।

कौन जानता था कि किसी रोज
रुग्णों की हरतरफ कतार होगी,
स्व:जनों के बीच मे रहकर भी,
मिल-जुल पाने से लाचार होगी।

कभी सोचा न था कि जीवन नैया,
डगमगाती यूं बंदी के मझधार होगी,
मगर हौंसला बना के रख,ऐ जिंदगी, 
दिन आएगा,जब कोरोना की हार होगी।।




Monday, May 25, 2020

ऐ कोविड जिंदगी !


कभी यह सोचा न था, ऐ जिंदगी,
तू इक रोज, इतनी भी 'Fine' होगी।
स्व:जनों संग, इक्ठ्ठठे रहकर भी,
एकही घर मे 'Quarantine' होगी।।

कोई शुभचिंतक घर मिलने आएगा
तो मेजबान उससे दूरी बनाएगा,
मंदिर प्रवेश बर्जिता 'Divine' होगी।
और कतारों मे बिकती 'Wine' होगी।।
कभी यह सोचा न था, ऐ जिंदगी,
तू इक रोज, इसकदर भी 'Fine' होगी....।।

Sunday, May 24, 2020

अयांश और अव्यांश तुम हो।




कलत्र अदभुत तुम हमारे ,
सार ऐह, श्रीयांश तुम हो ।
हम श्रमसाध्य वृहद निबंध,
निबंध का सारांश तुम हो।।

नव नर-नारायण चेतना के,
दिव्य जग, दिव्यांश तुम हो।
विशिष्टता के बाहुल्य भर्ता,
शब्द-शब्द, शब्दांश तुम हो।।

उपकृत सदा ही हम तुम्हारे,
कृतज्ञता के प्रियांश तुम हो।
दिप्तिमय क्षण जीवन सफर,
हर लम्हे के पूर्वांश तुम हो।।

कंचन अदब ऐह भव हमारा,
इस मुकाम के श्रेयांश तुम हो।
उम्मीद जिसपे जीवन बंधे है,
उस आस के अल्पांश तुम हो।।

तज अमृत जिसने बिष पिया,
वो हिय हमारे, हिमांश तुम हो।
जो ऋतु संग-संग तृप्त गुजरे,
वो पल,पलछिन रेयांश तुम हो।।

हुई रेखांकित तकदीर जिसमे,
वह सारगर्भित गद्यांश तुम हो।
पद्य,जिक्र जिसका जग करें,
उस काव्य के काव्यांश तुम हो।।










Monday, May 11, 2020

डियर कोरोना ! ये मेरा इंडिया...

चुपचाप निकल पडे अकेले ही डगर अपनी,
कलंकित न होने दी, देशभक्ति मगर अपनी।

सब सहा, न किसी पर पत्थर फेंका,न थूका,
न किसी की गाड़ी जलाई, ना ही घर फूका।

कर सकते थे वो, जिद पे आते अगर अपनी,
कलंकित होने न दी, देशभक्ति मगर अपनी।

मैं न तो कमिनस्ट हूँ और न ही देश की विद्यामान तुच्छ राजनीति, वो चाहे सत्ता पक्ष की हो दोयम विपक्ष की, का समर्थक हूँ। हां, कोई संजीदा मोदीभक्त अगर यहां ब्लॉग पर मौजूद हो और बुरा न माने  तो, सविनम्र 🙏 एक सवाल जो हफ्तों से मेरे जहन को उद्द्वेलित कर रहा है, पूछना था;  लॉकडाउन की शुरुआती घोषणा के वक्त जिन रेल गाडियों को सजा धजाकर चीन से भी बडा कोरोना हास्पिटल बनाये जाने की बात चल रही थी, उनमे इस वक्त कितने कोरोना मरीजों का ईलाज चल रहा है?
Corona is ugly dark and deep,
but we  have promises to keep.
And miles to go before we sleep,
and miles to go before we sleep.



Wednesday, April 29, 2020

लॉकडाउन को-रोना की घरेलू हिंसा।



गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे है,
तमाशाई बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे क्यों रूठे है। 

डरी सी सूरत बता रही,बिखरे महीन कांच के टुकडो की,
कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे है। 

ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन,
इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे है। 

पटकी जा रही हर चीज, जो पड़ जाए कर-कमल उनके,  
वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे है। 

तनिक शुश्रुषा की कमी 'परचेत',मनुहार मिलाना भूल गए,
फकत इतने भरसे बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे है। 


सुरा-पतझड!


अति सम्मोहित ख्वाब
कैफियत तलब करने
आज भी गए थे वहां,
उस जगह, जहां कलतक
रंगविरंगे कुसुम लेकर
वसंत आया करता था ।

कुछ ख़याल यह देखकर
अतिविस्मित थे कि 
उन्मत्त दरख्त की ख्वाईशें,
उम्मीद की टहनियों से
झर-झर उद्वत
हुए जा रही थी।

क्या पतझड़ फिर से 
दस्तक दे गया है?  
या फिर, वसंत के
पुलकित एहसास ही
क्षण-भंगूर थे? 
आशंकित मन के सवालों का
जबाब क्या होगा,
नहीं मालूम !!

Thursday, April 23, 2020

दिल का हाल सुने पैंसे वाला.....

सभी ब्लॉगर एंव मेरे ब्लॉग के पाठक मित्रों,
जिस दिन से जुकरु भाई और मुकरू भाई ने चवालीस हजार करोड़ की डील की, उसी दिन से सोच रहा था कि एक छोटी सी पोस्ट आप लोगों की जानकारी के लिए भी डालूं।

जब आप लोगों ने भी इतनी बडी डील के बारे मे सुना होगा तो एक बारी आपके मस्तिष्क मे भी ये सवाल जरूर उठा होगा कि मुकरू के प्रोडक्ट्स मे जुकरु भाई को ऐसा क्या दिखा होगा जो इतनी बडी डील कर डाली? कुछ ने तो यह भी सोचा होगा कि बडा भोला है, जुकरु तो।


मगर, नहीं,  दोनों ही मे से कोई भी इतना मासूम नहीं है।
मुकरू भाई ने पहले सस्ते-सस्ते मे लुभाकर जो बडी जिओ फौज बनाई उसका मकसद उस भाई ने अब हासिल कर लिया है। आप सोचते होंगे कि आप जो कुछ सोशल मीडिया पर डालते हैं, जुकरु भाई को सिर्फ उसी की थोडी बहुत भनक मिल पाती होगी। मगर हकीकत मे ऐसा है नही। उसे यह भी मालूम रहता है कि आपने दिन मे कितनी बार अपनी बीवी/प्रेमिका अथवा पति/ प्रेमी को आई लव यू कहा।😜😂 सो, आप लोग जो भी सोशल मीडिया के आदी बन चुके हैं,आगे से सजग रहेंं।
बस यही कहना था।

हां, एक बात और , यह सब पिछले साल जुलाई से चल रहा था, इस फरवरी से नहीं जैसा कि नीचे लगाई गई पोस्ट मे बताया जा रहा है। और आप भी नीचे बताये ढंग से अपने fbअकाउंट के सेटिंग्स मे जाकर कुछ जरूरी बदलाव जरूर करे।
धन्यवाद।

Friday, April 17, 2020

निकृष्ट चीनी माल !



क्या सितम ढाये तूने,
ऐ कमबख़्त कोरोना,
जग मे जिधर नजर जाए,
है बस, तेरा ही रोना।

कभी-कभी यूं लगता है,
जिन्दगी बौरा गई है,
जीवन की हार्ड-डिस्क मे
कहीं नमी आ गई है।

ख़्वाबों की प्रोग्रामिंग 
भृकुटियाँ तन रहीं हैं,
हसरतों की टेम्पररी फाइलें 
भी उसमे, बहुत बन रही है।

समझ नही पा रहा, रक्खूं,
या फिर डिलीट मार दूंं,
'हैंग' ऑप्शन भी बंद है, 
जो लॉकडाउन का गुस्सा उतार दूं।

है अपरिमित कशमकश, 
कमबख़्त,
'जीवन फ़ोर्मैटिंग' भी तो 
इत्ती आसां नही रही !!

Tuesday, April 14, 2020

कलम !

लॉकडाउन के मध्य बिस्तर पर लेटे-लेटे ख्यालों की उडान हिंदी ब्लॉग जगत के स्वर्णिम युग मे जा पहुंची और अचानक 'कलम' का हर वक्त जीवन्त एक सिपाही याद आ गया। नाम था 'चंद्रमौलेश्वर प्रसाद'।
सौम्य जीवन और कठिन समय मे भी हास्य-विनोद उनकी महानतम खूबियों मे से एक थी। उनके बारे मे मैं यहां कुछ ज्यादा लिखूं , शायद यह अतिप्रतिक्रिया कही जाएगी। बस, यही कहूँगा कि उनकी दिवंगत आत्मा से अनुमति लेकर आपके लिए उनकी कलम का एक अदना सा पैरा यहां आपके समक्ष उन्हें श्रद्धांंजली स्वरूप पेश कर रहा हूँ और भगवान से यही प्रार्थना कि वो इसवक्त जहाँ भी हों, उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे।🙏



एक खयाल


बड़ा

सदियों पहले कबीरदास का कहा दोहा आज सुबह से मेरे मस्तिष्क में घूम रहा था तो सोचा कि इसे ही लेखन का विषय क्यों न बनाया जाय।  कबीर का वह दोहा था-

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड खजूर
पथिक को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥

यह सही है कि बड़ा होने का मतलब होता है नम्र और विनय से भरा व्यक्ति जो उस पेड की तरह होता है जिस पर फल लदे हैं जिसके कारण वह झुक गया है।  बड़ा होना भी तीन प्रकार का होता है। एक बड़ा तो वह जो जन्म से होता है, दूसरा अपनी मेहनत से बड़ा बनता है और तीसरा वह जिस पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  

अपने परिवार में मैं तो सब से छोटा हूँ।  बडे भाई तो बडे होते ही हैं।  बडे होने के नाते उन पर परिवार की सारी ज़िम्मेदारियां भी थीं।  पैदाइशी बड़े होने के कुछ लाभ हैं तो कुछ हानियां भी हैं।  बड़े होने के नाते वे अपने छोटों पर अपना अधिकार जमा देते हैं और हुकुम चलाते हैं तो उनके नाज़-नखरे भी उठाने पड़ते हैं।  उनके किसी चीज़ की छोटे ने मांग की तो माँ फ़ौरन कहेगा- दे दे बेटा, तेरा छोटा भाई है।  छोटों को तो बड़ों की बात सुनना, मानना हमारे संस्कार का हिस्सा भी है और छोटे तो आज्ञा का पालन करने लिए होते ही हैं। परिवार में बडे होने के नुकसान भी हैं जैसे घर-परिवार की चिंता करो, खुद न खाकर भी प्ररिवार का पोषण करो आदि। अब जन्म से बडे हुए तो ये ज़िम्मेदारियां तो निभानी भी पड़ेंगी ही।

जन्म से बडे कुछ वो सौभाग्यशाली होते हैं जो बड़े घर में पैदा होते हैं।  वे ठाठ से जीते हैं और बडे होने के सारे लाभ उठाते हैं।  बडे घर में जन्मे छोटे भी बडे लोगों में ही गिने जाते हैं।  इसलिए ऐसे लोगों के लिए पहले या बाद में पैदा होना कोई मायने नहीं रखता।  उस परिवार के सभी लोग बडे होते हैं।

दूसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जो अपने प्ररिश्रम से बडे बन जाते हैं।  एक गरीब परिवार में पैदा होनेवाला अपने परिश्रम से सम्पन्न होने और बुद्धि-कौशल से समाज में ऊँचा स्थान पाने वाले लोगों के कई किस्से मशहूर हैं ही।  ऐसे लोगों को ईश्वर का विशेष आशीर्वाद होता है और उनके हाथ में ‘मिदास टच’ होता है।  वे मिट्टी को छू लें तो सोना बन जाय!  अपने बुद्धि और कौशल से ऐसे लोग समाज में अपना स्थान बनाते है और बड़े कहलाते हैं।  

ऐसे बडों में भी दो प्रकार की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।  कुछ बडे लोग अपने अतीत को नहीं भूलते और विनम्र होते है।  उनमें अभिमान नाममात्र को नहीं होता।  इसलिए समाज में उनका सच्चे मन से सभी सम्मान करते हैं।  दूसरी प्रवृत्ति के बडे लोग वे होते हैं जो शिखर पर चढ़ने के उसी सीड़ी को लात मार देते हैं जिस पर चढ़कर वे बडे बने रहना चाहते हैं।  वे अपने अतीत को भूलना चाहते हैं और यदि कोई उनके अतीत को याद दिलाए तो नाराज़ भी हो जाते हैं।  इन्हें लोग सच्चे मन से सम्मान नहीं देते;  भले ही सामने जी-हुज़ूरी कर लें पर पीठ-पीछे उन्हें ‘नया रईस’ कहेंगे।  ऐसे बड़े लोगों के इर्दगिर्द केवल चापलूस ही लिपटे रहते हैं।  कभी दुर्भाग्य से जीवन में वे गिर पडे तो उनको कोई साथी नहीं दिखाई देगा।  सभी उस पेड के परिंदों की तरह उड़ जाएंगे जो सूख गया है।

तीसरी श्रेणी के बड़े वो होते हैं जिन पर बड़प्पन लाद दिया जाता है।  इस श्रेणी में धनवान भी हो सकते हैं या गुणवान भी हो सकते हैं या फिर मेरी तरह के औसत मध्यवर्गीय भी हो सकते हैं जिन्हें कभी-कभी समय एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर देता है जब वे अपने पर बड़प्पन लदने का भार महसूस करते हैं।  हां, मैं अपने आप को उसी श्रेणी में पाता हूँ!

मैं एक मामूली व्यक्ति हूँ जिसे अपनी औकात का पता है।  मैं अपनी क्षमता को अच्छी तरह से परक चुका हूँ और एक कार्यकर्ता की तरह कुछ संस्थाओं से जुड़ा हूँ।  जब मुझे किसी पद को स्वीकार करने के लिए कहा जाता है तो मैं नकार देता हूँ। फिर भी जब किसी संस्था में कोई पद या किसी मंच पर आसन ग्रहण करने के लिए कहा जाता है तो संकोच से भर जाता हूँ।  कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब मुझे स्वीकार करना पड़ता है तो मुझे लगता है कि मैं उस तीसरी श्रेणी का बड़ा हूँ जिस पर बडप्पन लाद दिया जाता है।  इसे मैं अपने प्रियजनों का प्रेम ही समझता हूँ, वर्ना मैं क्या और मेरी औकात क्या।  क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा! मुझे पता है कि बड़ा केवल पद से नहीं हो जाता बल्कि अपने कौशल से होता है।  ऐसे में मुझे डॉ. शैलेंद्रनाथ श्रीवास्तव की यह कविता [बहुत दिनों के बाद] बार बार याद आती है--

बड़ा को क्यों बड़ा कहते हैं, ठीक से समझा करो
चाहते खुद बड़ा बनना, उड़द-सा भीगा करो
और फिर सिल पर पिसो, खा चोट लोढे की
कड़ी देह उसकी तेल में है, खौलती चूल्हे चढ़ी।

ताप इसका जज़्ब कर, फिर बिन जले, पकना पड़ेगा
और तब ठंडे दही में देर तक गलना पड़ेगा
जो न इतना सह सको तो बड़े का मत नाम लो
है अगर पाना बड़प्पन, उचित उसका दाम दो!


Saturday, April 11, 2020

इस रात की सुबह... कब ?

       लॉकडाउन ऐक्सटेंशन !
चित्र गुगल से साभार।
अपनी एक पुरानी रचना की "तोड"मोड" प्रस्तुति:

 क्यों हो रहा है तू इसकदर, खफा़ जिन्दगी से, 
यार,करके तो देख थोड़ी सी, वफ़ा जिन्दगी से।


अंदर ही रह बाहर मत जा, कोरोना के दर पे,
थोडी सी मोहब्बत फरमा, इक दफा़ जिन्दगी से।  

 यूं बिगड़ने न दे दस्तूर, तू जमाने का जालिम,
अच्छा नहीं हर वक्त खोजना, नफ़ा जिन्दगी से।  

छुपा के रख हरेक राज, अपनी बेतकल्लुफी का,
करके मिलेगा भी क्या तुझको, जफा़ जिन्दगी से।   

ये ऐतबार तेरा बनने न पाये, बेऐतबारी का सबब,
जिंदा है,जोड़े रख 'परचेत',फलसफा़ जिन्दगी से।    

Friday, April 10, 2020

सच को सच न कह पाने की असमर्थता ।

दोस्तों,

जैसा कि आपने भी नोट किया होगा, सोशल मीडिया और खबरिया  चैनलों और ट्वीट्स पर यहां चस्पा तस्वीर तारीफों के पुलों के साथ सुबह से वायरल हो रही है। कोई संदेह नहीं कि महिला का दुस्साहस थोडी देर के लिए उसके प्रति दिल मे सम्मान उत्पन्न करता है।
किंतु, साथ ही बहुत से सवाल भी खडे करता है और जो शायद अब तक देश मे मौजूद बहुत सी सिकुलर जोंकें और प्रेश्या खडे कर भी चुके होते, अगर महिला एक समुदाय विशेष से ताल्लुक न रखती होती तो।

बच्चे अगर मुसीबत मे हों तो हर मां ऐसा ही साहस कह लो या फिर दुस्साहस, रखती है। सिर्फ़ देश, काल और परिस्थितियों को भी एक समझदार मां को ध्यान मे रखना पडता है। फिर ऐसा महिमामंडन क्यों?
और हर कोई इन सवालों को क्यों नजरअंदाज कर रहा है:-
1) महिला ने यह कहा, उसने पुलिस की अनुमति ली थी। बहुत बढिया, मगर , क्या इतने लम्बे सफर मे बिना हेलमेट की ड्राइव की हमारा कानून अनुमति देता है?
2) जैसा कि चित्र से पता चल रहा है , महिला के बेटे ने भी हेलमेट नहीं पहना हुआ था और ना ही मास्क।
3) आजकल कोरोना के चलते सोशल डिस्टेंसिंग की बडी चर्चा है, क्या यहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हुआ ?
4)क्या मां बेटे को क्वारनटाइन किया गया ?
5) क्या लॉकडाउन का उल्लंघन नहीं हुआ?
मेरा भारत महान!

Friday, April 3, 2020

जहां वाले !

जहां वाले,यहीं कुछ कमी रह गई,
यहीं हो गई शायद चूक.तुझसे,
न मैं कुछ कमाने लायक
और न ही मेरा कोई रस़ूख तुझसे।
जब पापी पेट दे ही दिया था
तो भरपेट तो देता,ऐ बेरहम
मिटाई क्यों न गई, ये भूख तुझसे।।
फोटो अक्षयपात्रा से साभार।

Monday, March 30, 2020

बडा सवाल, लक्ष्य क्या है ?

दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके से खबर आ रही है कि वहां करीब 300 लोगों में कोरोना वायरस के लक्षण होने की आशंका है, जिससे से तमिलनाडु से आए 10 लोगों की मौत भी हो गई है। यहां एक धार्मिक कार्यक्रम मे शामिल होने कुल 1400 भारतीय मुस्लिम और 300 विदेशी मुस्लिम आए हुए थे।


जानता हूँ, हमारे देश के बहुत से छद्म-धर्मनिर्पेक्ष ज्ञानी और समुदाय विशेष के बुद्धिजीवी, मजबूरी और जानबूझकर देश के कानूनों का उल्लंघन मे फर्क न कर पाएंगे और  मजदूर पलायन से इसे जोडकर देखने का भरसक प्रयास करेंगे। मगर बडा सवाल यह कि एक तरफ जहाँ दिल्ली की सरकार डेड-दो हफ्ते पहले यह घोषणा करती है कि सभी धार्मिक उत्सवों पर रोक लगा दी गई है फिर नाक के नीचे हो रहे इस आयोजन को नजरअंदाज क्यों किया गया? सिर्फ इसलिए कि वो इनका वोट-बैंक है?

देखकर बडा अफसोस होता है कि समुदाय विशेष एक तरफ तो देश के कानूनों की जानबूझकर अनदेखी करता है, उसे नही मानता है और वहीं दूसरी तरफ सरकार फ्री राशन या खाते मे पैंसे डालने की घोषणा कर दे तो तमाम कस्बा ही अगली सुबह बैंक पर धावा बोल देता है। दिल्ली मे फोनकर के घर मे खाने के लिए कुछ न होने का बहाना कर गरीबों के लिए आवंटित सामान की जमाखोरी और मेरठ के बैंक के आगे भीड का समाचार तो समाचार माध्यमों के जरिए देखा ही होगा। मतलब, जहां कुछ सरकार से मिल रहा हो, वो हमारा अधिकार, किंतु जहां दाइत्व की बात हो, वहां अपना पर्सनल लॉ ।

सीएए विरोध के दरमियान इनके तथाकथित बुद्धिजीवियों और मौलानाओं ने भी विभिन्न मंचों से देश को तवाह करने की पूरी भडास निकाली थी। तो चिंताजनक और मननशील आज एक सवाल यह खडा हो गया है कि आखिर इनकी मनसा क्या है ? धर्म की आड मे क्या किसी साजिश के तहत पूरे देश के हितों की अ़ंंदेखी की जा रही है। यदि हां, तो इसका अंतिम छोर कहांं है ?


Sunday, March 29, 2020

कल जब दिल्ली की सडकों का ये हाल था
तो ये जनाब ट्विटर पर लोगों से घर पर बने रहने की अपील कर रहे थे।

जब सोशल मीडिया पर खूब लताडे गये तो आज सडक पर उतरकर पटरी पर बैठे एक बेघर भिखारी को डांटते हुए बोले,
"तुम्हे मालूम है, देश मे 21दिन का लॉकडाउन है,
स्टे ऐट होम।"😂😂

Saturday, March 28, 2020

वाहवाही बटोरने की मानसिकता पर ब्रेक की जरूरत ।

हडवडी मे घोषित देशव्यापी सर्व लॉकडाउन कुछ ही दिनों मे गरीब मजदूरों, रेडी-पटरी वालों के पलायन की ऐसी भयावह तस्वीर पेश करेगा कभी सोचा न था। 21वीं सदी का भारत कमोवेश देश विभाजन के समय की स्थिति से ज्यादा भिन्न नहीं नजर आ रहा। अतः मन मे कई सवाल उठना लाजिमी है।

सबसे पहला और प्रमुख सवाल यह उठ खडा हुआ कि ऐसी अस्तव्यस्तता की स्थिति पैदा क्यों हुई, इसकी मुख्य वजह क्या है? पांच ट्रीलियन की अर्थव्यवस्था के सपने देखना, विश्व समुदाय के बीच अपने को चौथी और पांचवीं सबसे बडी अर्थ व्यवस्था के खिताब से नवाजा जाना मन को क्षणभंगुर सुख की अनुभूति अवश्य प्रदान करता है किन्तु अंदर की सच्चाई जानने लगो तो एक भयावह तस्वीर नजरों के सामने घूमने लगती है।

राजनेताओं और सत्तातंत्र के मुह से यह सुनने मे तो काफी सुखद लगता है कि हम अगले तीन महिनें तक 80 करोड़ लोगों को फ्री का राशन खिलाएंगे। हम देश की राजधानी मे रोज चार लाख लोगों को मुफ्त़ मे भोजन देंगे। मगर वास्तविक सच्चाई ये है कि ये लोग इनके लिए सत्ता हासिल करने का एक माध्यम मात्र है। एक बार अगर ये सत्ता पर काबिज हो जाएंं तो इन महापुरुषों से ये सवाल कोई नहीं कर सकता कि अरे, भले मानुसों, अगर हमें रोज मुफ्त़ का पेटभर भोजन उपलब्ध हो जाता, फ्री की राशन और पैसा मिल जाता तो हम पागल थे जो देश की राजधानी छोड, भूखे-नंगे अपने गाँव की ओर पैदल ही निकल पडते? हम सडकों पर पुलिस के डण्डे खाएं और जो अमीर इस महामारी को इस देश के अन्दर लाए उन्हें आप विमान भेजकर विदेशी धरती से खुशी-खुशी देश लेकर आओ।

कुछ राजनीतिज्ञो और उनकी सरकारों के प्रयास ईमानदार होंगे, इसमे कोई संदेह नहीं कि यह कौन देखेगा कि क्या उनके प्रयासों का प्रतिफल उचित जरूरतमंदो को मिल भी रहा अथवा नहीं? 'एक देश एक राशन कार्ड' के चक्कर मे उत्तराखंड समेत कई राज्यों मे लम्बे समय से राशनकार्ड बनने ही बंद हो रखे हैं। फिर कोई जरूरतमंद आर्थिक पैकेज का लाभ कैसे उठाएगा ? और अंदर झांक कर दखोगे तो पाओगे कि सरकार के ईमानदार प्रयासों के बावजूद भी एक मोटी जमात ऐसी है जो आर्थिक रुप से सुदृढ़ होते हुए भी बीपीएल के 2 रुपये कीलो चावल का लुत्फ़ उठा रही है।



महामारी का संक्रमण न हो इसके लिए सडक पर चार लोग एकत्रित तो नहीं हो रहे, यह तो आपने तत्परता से देखा लेकिन जो हजारों लोग बस अड्डों के समीप पिछले कई दिनों से एकत्रित होकर धक्के खा रहे हैं, वहां भी तो संक्रमण का अंदेशा है, यह कौन देखेगा? सेकडों की संख्या मे रेलगाड़ियां कुछ दिनों से खडी हैं। हमारे रेल मंत्री जी रेल सुधारों के बारे मे रोज अच्छे-अच्छे ट्वीट करते हैं। मगर यह देखने की किसी को फिक्र नहीं कि हजारों गरीब सेकडों किलोमीटर की यात्रा पैदल कर रहा है।

क्या ही अच्छा होता कि जनता के बीच '8PM वाले PMJi' का टाईटल अर्जित कर चुके माननीय प्रधानमंत्री जी विश्व समुदाय की वाहवाही के ख्याल को नजरअंदाज कर दक्षिण अफ्रीका की तर्ज पर तीन चार दिन पहले से देश की जनता को सरकारी तंत्र के माध्यम से यह सूचित करते कि अमूक तिथि से देश मे सम्पूर्ण लॉकडाउन होने जा रहा है। और अंतिम वक्त पर मारामारी और Chaos पैदा न होता। देश को महामारी से बचाने की जिम्मेदारी हर नागरिक की है और सरकार उस जिम्मेदारी को निभाने का एक माध्यम। यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि उसका हर निर्णय परिपक्व हो।

Friday, March 27, 2020

कोरोना वायरस पर मोदी सरकार का हवाई फायर ।

सिर्फ हमारा देश ही नही अपितु पूरा विश्व समुदाय इस वक्त चीन के वूहान प्रान्त से शुरू हुए एक जानलेवा वायरस जिसे कोविड-19 नाम दिया गया है, से बुरी तरह जूझ रहा है। इस खतरनाक वायरस से प्रभावित हर देश की सरकारें अपने-अपने ढंग से नियंत्रण पाने की जी तोड कोशिशों मे जुटी हैं।

विश्व के कुछ चुनिन्दा शक्तिशाली देशों की क्रोना वायरस के आगे विवशता को देखते हुए तथा यहां मौजूद सीमित साधनों के मध्यनजर हमारी सरकार ने बडी चतुराईपूर्वक समय रहते इसपर नियंत्रण के लिए जो कदम उठाए उसकी मैं तारीफ करता हूं।

इसमे शायद ही किसी को संदेह हो कि हमारी मौजूदा सरकार न सिर्फ निपुण है बल्कि चुनौतियों का सामना करने मे भी सक्षम है। बस, कभी-कभार इनकी ये चातुर्यता थोड़ी ज्यादा (over) सी महसूस होने लगती है। जो सरकार की मुद्दे पर गम्भीरता के प्रति मन मे संदेह सा पैदा करने लगती है।

अभी कल ही सरकार की वित्तमंत्री, श्रीमती निर्मला सीतारमण ने क्रोना की वजह से पूरे देश मे तीन सफ्ताह की तालीगिरी (Lockdown)  से उत्पन्न मौजूदा संकट से निपटने के लिए सरकार की तरफ से एक लाख सत्तर हजार करोड़ के विशाल आर्थिक पैकेज की घोषणा की। इस आर्थिक पैकेज मे जहां कुछ पहलुओं पर सरकार का नजरिया बहुत ही सार्थक है वहीं इसमें किये गये प्रावधानों और घोषणाऔं की यथार्थता के प्रति संदेह भी पैदा होता है और यूँ लगने लगता है कि सरकारी तंत्र अपने चातुर्य से कहीं जनमानस की आंखों मे धूल तो नहीं झोंक रहा?

मसलन, कल के आर्थिक पैकेज की घोषणा मे सरकार कहती है कि वह उन प्राईवेट संस्थानों जिनके यहां 100 तक कर्मचारी/मजदूर काम करते हैं और 100 मे से अगर 90 या उससे अधिक कर्मचारियों का वेतन(जिसपर प्रोविडेंट फण्ड कटता है) 15000 रुपये से कम है,  अगले तीन माह तक कर्मचारी/मजदूर और नियोक्ता दोनों के हिस्से का फण्ड सरकार अपनी जेब से जमा करेगी। इससे अस्सी लाख कर्मचारियों/मजदूरों को फायदा होगा।
अब यहां व्यवहारिक तौर पर देखने वाली बात यह है कि मान लो एक प्राईवेट फर्म है जिसमे कुल 100 लोग नौकरी करते हैं और जिसमे से नवासी(89) मजदूर जिनकी सेलरी 15000 रुपये से कम है और 11 कर्मचारी विभिन्न पदों पर काम करते हैं, जो हर महीने 15000 से अधिक कमाते हैं और हमारे देश मे यह एक बहुत स्वाभाविक बात है कि आठ मजदूरों के ऊपर दो कर्मचारी काम करते ही करते हैं। तो सरकार की उपरोक्त शर्त के अनुसार तो कोई भी प्राईवेट संस्थान इस पैकेज का लाभ नहीं उठा सकता? 

इसी तरह कुछ अपवादों को छोड गोर से देखें तो अन्य घोषणाओं मे भी बहुत से लोचे नजर आते हैं जो इस बाबत सरकार की मनसाहत पर संदेह पैदा करते हैं। यहां, एक और बात यह भी गौर करने वाली है जैसे कि मान लो, दिल्ली की एक फर्म है जिसमे 20 मजदूर काम करते हैं। दिल्ली सरकार ने एक अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी 15000 रुपये मासिक के करीब निर्धारित की हुई है तो उस सस्थान को तो कोई लाभ ही नहीं मिलेगा। क्या ही अच्छा होता कि पीएफ का झुनझुना पकडाने की बजाए सरकार आर्थिक तंगी से जूझ रहे सस्थानों से कहती कि वेतन देने के लिए वे बैंकों से तीन या छह माह का कर्ज ले सकते हैं जिसका ब्याज सरकार चुकाएगी।

-पीसी गोदियाल 'परचेत'

Wednesday, March 25, 2020

21वीं सदी की सबसे छोटी कहानींं।


'रेल' और 'रेली', दोनों पति-पत्नी रेलवे मे नौकरी करते थे। स्वछंद घूमना और मौज मस्ती ही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी। अचानक एक दिन पढोसी मुल्क से एक चीनी वायरस आया और आते ही उसने देशभर मे अफरातफरी का माहौल खडा कर दिया। सरकार ने भी आव देखा न ताव, पूरा देश ही बंद कर डाला, वो भी तीन हफ्ते के लिए।

रेल और रेली ने सपने मे भी न सोचा होगा कि कभी ऐसा वक्त भी आ सकता है। उनके पास घर भी नहीं था।  प्लेटफार्म पर ही आराम फरमाने वाले जो ठहरे। अब जाएंं तो जांए कहांं? मजबूरन महानगर के एक गंदे नाले के किनारे छप्पर डालने की जगह मिली क्योंकि प्लेटफार्म तो उनसे भी होशियार बंधुओं ने पहले ही हथिया लिया था।

सारे होटल बंद, कुछ किराना दुकाने खुली भी थींं तो  खुद के पास न पकाने का साधन और न बनाने का तजुर्बा। अब, भूखे-प्यासे ही दिन गुजारकर लाँँकडाउन खत्म होने का इंतजार, कब खत्म होगा, इसी अधेड़बुन मे रेल की बगल मे बैठी भूखी-प्यासी रेली को अभी हल्की सी झपकी आई ही थी कि कालेज के दिनों की पापा की वो दुलारभरी आवाज उसके कानों मे गू़ंज उठी, "रेली बेटा, आजकल तुम्हारी विन्टर वैकेशन हैं, थोडा-बहुत मां के साथ किचन मे हाथ बंटा लिया करो, बेटा। किचन का काम कुछ सीखा रहेगा तो भविष्य मे पता नहीं कब काम आ जाए।"

रेल की पीठ से सिर के पिछले हिस्से को टिकाते हुए भरी आंखों  और डबडबाई आवाज मे रेली बडबडाई, "वो पापा, सोने दो ना....प्लीज"।

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सबक: अगर शादी की सोच रहे हो तो पहले एक अदद घर का इ़तजाम कर लेना चाहिए।😀 कौन जाने, क्या पता कब कुत्ते-बिल्ली, चमगादड़ खाने वाले जीव कौनसा वायरस उपजाकर दूसरों के यहां भेज दें? साथ ही यह भी पक्का 
मानकर चलेंं कि मां-बाप बेवजह सलाह नहीं देते।

Monday, March 16, 2020

लुटियंस का तिलिस्म।


मासुमियत भरी आवाज मे, आज
बिटिया यूं ही मुझसे पूछ बैठी,
पापा, राजधानी के एक खास इलाके को
लुटियंस जौन क्यों कहते हैं?

मैंने भी सहजता भरे अन्दाज मे
सरल शब्दों मे उसे बताया, बेटा,
बामपंथी झूकाव वाला वो खास एक
अभिजात्य वर्ग, स्वहित मे जिसने
हमेशा औरों का किया उत्सर्ग,
आजादी उपरांत, यह देश जौन-जौन
तस्सली से लूटे हैं, वो वहां रहते हैं,
इसीलिए, उसे लुटियंस जौन कहते हैं।😀

Tuesday, March 10, 2020

आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। रंगों का यह त्योहार आपके जीवन को भी रंगीन बनाए, एवं हर ख़ुशी, सुख, समृद्धि,स्वास्थ्य, वैभव एवं ऐश्वर्य प्रदान करें, यही कामना।

Wednesday, February 19, 2020

ऐ नींद मेरी !


ऐ प्रिय, नींद मेरी !
बस, यूं ही मगर, पता नहीं क्यों,
कुछ अनिश्चित ही लग रही है मुझे,
आज भी मुलाकात तेरी।


मस्तिष्क का मेरा सुक्ष्म 'उम्मीद रनवे'
और उसपर एहसासों की गहरी धुंध,
विचलित हो रहा है मन,
वैसे ही वीजिब्लिटी बहुत कम है,
ऊपर से पोर्ट पर ट्रैफिक कंजेशन।

जिस फ्लाइट से तुम आ रही हो,
उसे निष्ठुर ट्रैफिक कंट्रोलर
डाइवर्ट न कर दे कहीं,
इसी पशोपेश मे हूँ कि
वो आज भी सहीसलामत
लैंड कर पायेगी, अथवा नहीं।

ऐ प्रिय, नींद मेरी !
तेरे आने के इंतजार मे,
मैं पलकें बिछाए बैठा हूँ,
तु आ न आ, मर्जी तेरी।।
              -'परचेत'

Monday, February 10, 2020

An Hinglish poem created just now by 8pm:😊



Everywhere,
don't try to poke your nose,
Let it go, the way it goes.
Pain takes its time to move
so, avoid there to reach earlier.

During the process of
motivating people,
sometimes, you have crossed
all your limits,
and it doesn't happen
for the first time ,
you tried this to breach earlier.

All your optimum ideas and
opinions seem like frozen now,.
Remembering, the way you
used to be fiery in speech earlier.   

You were not such a
horrible preacher,  dear 'Parchet',
to heal the wounded hearts,
you had intentionally loved
the soothe preach earlier.
                                     - 'परचेत'

Saturday, February 8, 2020

टीस एग्जिटकरण की...'शाप'



व्यथा असह्य अंत:करण की,
की जाती अब बयां नहीं है,
जैंसा है, सब वैसा ही रहे,
करने कोई उद्दार न जाए,
कोई भवसागर तरके पार न जाए।

मैं शफरी, मन मेरा भवसागर,
छलकत जाए, अधजल गागर,
अव्यवस्थ नगरी, तरस्त नागर,
चित रोए और चित्कार न जाए,

वहां जैंसा है, सब वैसा ही रहे,
कोई भवसागर तरके पार न जाए।

विध्यमान और अतीत खरोंचा,
सर नोचा, सरबालों को नोचा,
बदल जायेगे ये, कई बार सोचा,
चित लोभी का आधार न जाए,

वहां जैंसा है, सब वैसा ही रहे,
कोई भवसागर तरके पार न जाए।

विनती बस, यही अब जमुनाजी से,
जल अमृत बनकर अब और न रीसे,
कोई पाप का भागी, पुण्य न पीसे,
पापी का बहकर कदाचार न जाए,

इंद्रप्रस्थ मे जैंसा है, सब वैसा ही रहे,
कोई भवसागर तरके पार न जाए।

                ....          . -'परचेत'

Wednesday, February 5, 2020

कुछ अंश मेरी काव्यपुस्तक "तहकी़कात जारी रहेगी" से... 4

शीत-ऋतू, मुफ्त़ भेडों को कंबल देगा,
कुछ ऐसे ही वादों से गिरगिट लुभाए,
लालच के अंधे कोई यह भी न पूछे,
कंबल बनाने को ऊन कहांं से आए।

कुर्सी पाने को किसहद मुफ्त़मारी रहेगी,
तहक़ीकात अभी जारी रहेगी।।

कुछ तो उपचार की कमियां रही होगीं
विध्वंसता मे दुश्मन के मांद की,
वरना आज दीवार यूं न डगमगाती
मानव सब्र के बांध की।

लुचपने की टीस कबतक कष्टकारी रहेगी,
तहक़ीकात अभी जारी रहेगी।।

उम्मीद।

हौंसला बनाए रख, ऐ जिंदगी,  'कोरोना' की अवश्य हार होगी, सूखे दरिया, फिर बुलंदियां चूमेंगे  और तू, फिर से गुलजार होगी। कौन ज...