Friday, May 22, 2009

बंटवारे का सच !

वह घटना जहां सबके लिए तकलीफदेह थी और सभी उस घटना से जहां एक और भौचक्के से थे, वहीं दूसरी ओर मोहन को कहीं अन्दर ही अन्दर एक प्रकार की सुख की अनुभूति भी हो रही थी, एक अजीब से सुख की अनुभूति । और साथ ही उसका मन बाबा(दादाजी) के लिए श्रदा से भर आया था । कही दिल के किसी कोने पर उसे इस बात का भी पछतावा था कि नादानी बस उसने अपने बाबा के प्रति बचपन से ही कितने भ्रमित ख्याल दिलो-दिमाग में पाले रखे थे। सुबह से अब तक वह दो बार घर के अन्दर ही मौजूद पूजा-गृह में जाकर दीवार पर टंगी बाबा की आदमकद फोटो के पास खड़े होकर, उनके पैर छूं, बाबा से खुद को माफ़ करने की विनती कर चुका था ।

चौधरी करमचंद उस जमाने में अपने इलाके के एक दवंग किन्तु स्वच्छ छवि वाले इंसान थे । हर कोई उनकी इज्जत करता था । दिल्ली के समीप के एक गाँव में उनका एक बड़ा घर था । काफी बड़ी जमीन जायदाद के मालिक थे । उस जमाने में उनका एक बड़ा भरा-पूरा परिवार था, पति-पत्नी और आठ बच्चे । आठो लड़के थे, एक लडकी की इच्छा में चौधरी साहब ने परिवार को इतना बड़ा कर दिया था। बच्चे बड़े होने लगे, जैसा कि अक्सर कहा जाता है कि सभी उंगलिया बराबर नहीं होती, ठीक वैसा ही हिसाब चौधरी साहब के परिवार में भी था । पांच बच्चे जहां एक अलग स्वभाव के थे, वहीं तीन उग्र और उदंडी स्वभाव के । उनकी वजह से दिनभर घर में शोर-शराबा और कोहराम मचा रहता था ।

दिन बीते, सभी बच्चे अब जवान हो चुके थे, चौधरी साहब के अपने ही घर में बच्चो के दो गुट बन चुके थे, तीन एक तरफ और पांच एक तरफ । और कभी-कभी तो तब घर में एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो जाती थी, जब वे दोनों गुट आपस में भिड पड़ते थे । उन तीनो का काम दिन-भर में बस यह रहता कि वे दिल्ली और आस-पास में आवारा किस्म के लोगो के साथ मटरगस्ती करते रहते थे, और अपने हमउम्र लड़को से झगड़ते थे, बस । चौधरी साहब भी अब वृदावस्था की देहलीज पर पहुँच चुके थे, और बच्चो की हरकते देख-देख कर मन से क्षुब्द थे । अब तक वे अपने सिर्फ दो बेटो की ही शादी कर पाए थे कि एक दिन वेसब यह देखकर हैरान रह गए कि उनके उन तीनो लड़को ने अपना धर्म परिवर्तित कर दूसरा धर्म अपना लिया था, और उन तीनो में से, सब से बड़ा रमेश, जो अब रफीक बन चुका था, एक मुस्लिम लडकी आइसा से निकाह रचाकर, दुल्हन को घर भी ले आया था । पुराने खयालातो की वजह से इन सब हालातो के चलते, घर में कुछ महीनो तक एक तनाव की सी स्थिति बनी रही, लेकिन चौधरी साहब काफी समझदार और पढ़े लिखे इन्सान थे, अत उनकी दबंगता के आगे कोई जुबान नहीं खोल पाया था।

और फिर वही हुआ जिसका अंदेशा था, चौधरी साहब के उन तीन लड़को ने उनमे से सबसे बड़े रफीक के नेतृत्व में घर में विद्रोह का बिगुल बजा दिया। उन्हें चौधरी साहब की जायदाद में अलग हिस्सा चाहिए था, जबकि बाकी के पांचो भाई चौधरी साहब के जीते जी घर के हिस्से करने के एकदम खिलाफ थे । बहुत सोच-विचार कर, तनाव बढ़ता देख, चौधरी साहब ने आठो लड़को को बुलाकर और गाँव की पंचायत बिठाकर जायदाद के दो हिस्से करने का प्रस्ताव रखा । चौधरी साहब के पास उस गाँव के अलावा दिल्ली से ही सठे, नोएडा के यमुना किनारे और गाजियाबाद में तथा पहाडो में काशीपुर के समीप कृषि योग्य जमीन थी । उन्होंने जब हिस्से किये तो धर्म प्रवर्तित कर मुजविर नाम वाले को जमुना किनारे की जमीन तथा दो अन्य भाइयों रफीक और अली को गाजियाबाद एवं पहाड़ वाली जमीन दी । गाजियाबाद वाली कुछ जमीन उन्होंने अपने पास भी रखी थी, मगर उस पर भी उन दो भाइयों ने बाद में जबरन कब्जा कर लिया।

जमीन के तो हिस्से हो गए थे, लेकिन अब जो प्रमुख समस्या खड़ी हो गयी थी, वह यह थी कि उन तीनो भाइयों ने चौधरी साहब की नकदी में भी दो बराबर के हिस्से करने की मांग की । बाकी के पांच भाइयों ने इसका पुरजोर विरोध किया, किन्तु वे तीन भाई कहाँ मानने वाले थे । हालत यहाँ तक बिगड़ गए कि वे आपस में ही एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू हो गए थे। स्थिति बिगड़ती देख, चौधरी साहब ने उन पांचो भाइयों को समझा-बुझा कर नकदी के भी दो बराबर हिस्से कर डाले । वे चाहते थे कि किसी भी तरह उन तीन भाइयों को संतुष्ट कर वे उनको वहाँ से हमेशा-हमेशा के लिए विदा करे, लेकिन चौधरी साहब की उन तीन भाइयों के प्रति यह झुकाव की बात, पांच भाइयों में सबसे छोटे और युवा, नत्थू को नागवार गुजरी और उसने एक दिन शाम को जब चौधरी साहब लोगो के साथ चौपाल पर बैठे थे, आवेश में आकर उन्हें एक देशी कट्टे से गोली मार दी । चौधरी साहब ने घटना स्थल पर ही दम तोड़ दिया था । गाँव वालो ने नत्थू को धर दबोचा और पुलिस के हवाले कर दिया, बाद में अदालत ने उसे फांसी की सजा सुना दी ।

दिन गुजरे, इधर इस पुराने घर में अब चार भाई रह गए थे, और सबसे बड़े चौधरी भरतसिंह ने चौधरी करमचंद की गद्दी संभाल ली थी । बाद में दो अन्य भाइयों की शादी भी चौधरी भरतसिंह की देखरेख में ही संपन्न हुई थी । चौधरी करमचंद की मौत पर भी घर और गाँव दो धडो में बँट चुका था, एक धडा वह था, जो नत्थू को पिता की ह्त्या पर बुरा-भला कहता और कोसता था, और एक धडा वह था जो कहता था कि नत्थू ने जो किया सही किया। माँ-बाप के लिए उनके सभी बच्चे समान होते है और सबके साथ बराबर का न्याय उनको करना चाहिए। चौधरी साहब ने जिस तरह उन तीनो के प्रति हमदर्दी दिखाई, वह सरासर अनुचित बात थी, अतः नत्थू ने ठीक किया और हमें उसका महिमा-मंडन करना चाहिए........, जितने मुह उतनी बाते । जब नत्थू ने चौधरी साहब को गोली मारी थी तो चौधरी भरतसिंह का चार साल का मोहन भी वहीं पर खेल रहा था और उसने अपनी नन्ही आँखों से बाबा का खून होते देखा था । उसका मासूम मन नत्थू चाचा के लिए नफरत से भर गया था । लेकिन ज्यूँ-ज्यूँ वह बड़ा होता गया और जब उसने घर में उस दूसरे धडे के लोगो की बाते सूनी कि बाबा ने कैसे अपने बच्चो के साथ भेदभाव कर जायदाद का बटवारा कर दिया था, तो उसकी नफरत अब बाबा की ओर हो चली थी । वह जब भी घर में अकेला होता, स्कूल जाते वक्त भी यही सोचता रहता कि बाबा ने उनके साथ ऐंसा क्यों किया ?

समय बीतने पर और चौधरी भरतसिंह तथा अन्य भाइयों की जी तोड़ मेहनत के चलते, घर में खुशहाली आ गयी थी । उनका घर अब पूर्णतया सर्वसंपन्न हो चला था । वहीं दूसरी ओर अलग हुए तीनो भाई अब छोटी-छोटी बातो पर आपस में ही लड़ने लगे थे, बाद में इसी झगडे के चलते जमुना के किनारे रहने वाला मुजविर भी अन्य दो भाइयो से नाता तोड़ अलग रहने लगा था । वे लोग चौधरी भरतसिंह के परिवार की सम्पन्नता को देख अन्दर-ही- अन्दर फुके जाते थे, और बस इसी ताक़ में हर समय रहते कि हम कैसे इनको नुकशान पहुंचाए । उन्होंने कई बार कोशिश भी की, लेकिन चौधरी भरतसिंह से उनको मुह की ही खानी पडी थी । वो कहावत है कि शैतान कभी भी शांती से चुप नहीं बैठता और जब कुछ नहीं मिलता तो अपने ही औजारों से खुद ही खेलने लगता है । यही कुछ हाल गाजियाबाद में रहने वाले उन दो भाइयो रफीक और अली और उनकी संतानों का था, वे अब बात-बात पर आपस में ही उलझने लगे थे, जिन बेटो को आइसा ने पाला-पोषा था, वे ही अब आइसा को और अपनी बहनों को परदे में रहने को कहते थे । अली और रफीक के परिवारों के बीच दुश्मनी इस कदर बढ़ चुकी थी कि उनके बेटे आपस में ही एक दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे । रोज कोई न कोई लफडा चलता ही रहता और स्थानीय अखबारों में भी इसकी खबर छपती रहती थी। चौधरी भरतसिंह और उनका परिवार उन खबरों को पढ़कर आपस में उनके विषय में बतियाते रहते थे ।

हद तो तब हो गयी जब एक दिन सुबह का अखबार पढ़ते-पढ़ते मोहन ने घर के हर सदस्य को आवाज लगाकर अपने पास बुलाया और अखबार के बीच वाले पृष्ट पर छपी फोटो और खबर की तरफ परिवार का ध्यान आकर्षित किया । फोटो में चार लाशें दिखाई गयी थी और खबर यह थी कि रफीक और अली के परिवारों के बीच पिछली शाम को हुए संघर्ष में दोनों रफीक और अली को दो-दो बेटो से हाथ धोना पड़ा था । इस आपसी गोलीबारी में दो बहुए और बच्चे भी घायल हुए थे । खबर पढ़कर मोहन की माँ ने रोते हुए चौधरी भरतसिंह और परिवार के अन्य सदस्यो से रफीक के घर चलकर उनके हालचाल पूछने का आग्रह किया कि पता नहीं बेचारी आइसा पर क्या गुजर रही होगी ? लेकिन चौधरी भरतसिंह ने घर के सदस्यो को कड़ी हिदायत दी कि कोई भी वहां नहीं जाएगा । घर के किसी सदस्य की यह हिम्मत भी नहीं हुई कि चौधरी भरतसिंह का विरोध कर सके ।

इस घटना की खबर पढने के बाद मोहन अपनी पत्नी से जब घटना के बारे में बाते कर रहा था तो उसे यकायक वह गुजरा ज़माना याद आ गया था । और आज उसकी समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गई थी कि हम आज दुराग्रह और अपने निहित स्वार्थो की वजह से बाबा को जितना मर्जी बुरा-भला कहें, मगर सच्चाई यही है कि बाबा ने कितनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए दिल पर पत्थर रख, अपने अरमानो की कुर्बानी देकर, हम लोगो के सुखद भविष्य को ध्यान में रखते हुए, बटवारे का कितना महत्वपूर्ण निर्णय लिया था। यह सच है कि जायदाद का बटवारा हुआ लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि अगर बाबा वह निर्णय नहीं लेते और वो तीनो भाई उस वक्त अलग नहीं होते तो क्या वे आज हमें सुख-चैन से जीने देते ? बाबा ने भी जरूर इन सभी बातो को उस समय ध्यान में रखा होगा । नासमझ नत्थू चाचा ने बाबा के साथ जो किया, वह सरासर गलत था ।

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