Wednesday, August 3, 2016

यत्र-तत्र बिखरे मोती

अमानत में खयानत की पगार पाकर खुश है जहां सिरफिरा, 
यूं कि बदस्तूर जिंदगी का बस यही मजा,बाकी सब किरकिरा, 
ज़रा पता तो करो यारों, ये बंदे कश्मीरी सब खैरियत से तो हैं,
बड़े दिनों से घर-आँगन हमारे, कोई पत्थर नहीं आकर गिरा।


कुछ उदास-उदास सा नजर आया इसबार, 
मेरे मोहल्ले की गली मे भरा बारिश का पानी,
यूं कि 
मां-बापों ने मोबाइल  थमा दिये हैं
कागज की नाव बनाने वाले नौनिहालों के हाथों मे


ये नींद भी कमबख्त, माशुका सी बन गई है ,
बुलाते रहो, मगर बेवफा रातभर नहीं आती।


जो 'AAPकी' नीयत साफ होती, तो
साथ आपके जनता, अपने आप होती,
न ही लुच्चे खुद को आमआदमी कहते,
और न ही लफंगौं की मनमानी खाप होती।


खूंटा कहीं कोई उखडा हुआ पाता हूं, अपने दिल के दरीचे मे जब कभी,
समझ जाता हूं, आजाद हो गया तेरा कोई ख्याल, जो मैने बांधे रखा था।


निमन्त्रण दे रहा हूं उनको, 
जिन्हें गुरूर है अपनी बेशुमार दौलत पर,
कभी वक्त निकाल, मेरे साथ चलना,
बादशाहौं का कब्रिस्तान दिखा लाऊगा ।


Friday, July 1, 2016

समाजपट

आजकल यदा-कदा  छिटपुट  दो चार लाइने शोसल मीडिया पर ही पोस्ट कर संतुष्ट हो जाते है।  अपनी उन कुछ काव्यपंक्तियों , शेरो इत्यादि  को यहाँ  ब्लॉग पर बटोर रहा हूँ ;
  
उपस्थित मित्रगण हमारी बेसब्री और
झुँझलाहट का मजा लिए जा रहे थे,
हमारी नजर उनके अंदाज पर थी
और वो हमें नजरंदाज किये जा रहे थे।






चिकनी चुपडी बातें कर,
मैने भी बिठाया
अपनी भोली सी बीवी को सर,
'इन्टरनेशनल वीमन डे' पर ।

अंतराष्टीय महिला दिवस पर समर्पित:-
अगर आपके घर के अगले गेट के बाहर से बीवी चिल्ला रही हो और पिछले गेट के बाहर से आपका कुक्ता भौंक रहा हो तो ग्यानी लोग कह गये कि पिछला गेट खोलो, क्यौंकि कुत्ता अन्दर आ जाने के बाद चुप हो जायेगा ।
अग्रिम छमा :-)

कलयुग मे यही हस्र होना था, काठ के उल्लुऔं का,
कुछ हमारी ही मूर्खता थी, कुछ जमाना बना गया ।

पानी फ्री मे पी गये जमुना का,
डालके दिल्ली के घडे मे कंकर,
और जीने की कला भी सिखा गए,
श्री-श्री रवि शंकर ।

कुछ लुच्चे, लफ्गौं की छीना-झपटी मे जब
एक "पहाडी घोडा" अपनी टांग गंवा बैठा,
तभी जा के ये अहसास हुआ 'परचेत' कि
इस बेदर्द जहां मे, हम 'मैदानी' गधे ही बेहतर ।

यहां की विरासतों ने हर तहजीब को इस खूबसूरती से उकेरा है,
कि अपने इस सनातनी मुल्क में, 'काण्ड' भी "सुन्दर" होते है।

कुछ यूं खो दिया खुदको हमने ऐ जिंदगी, तेरी तलाश में,
दिनभर बटवे में ढूढ़ते है तुझको और शाम को गिलास में।

हाल-ए-दिल !
जब पड़ोसन पूछ बैठी उनसे, हमारी खुशहाल जिंदगी का राज,
वह बोली, स्लिपर निशाने पे सही लगे तो हम खुश, वरना वो। 
और तंगदिल ज़माना, यकीं कर बैठा उनकी काबिले-उक्ति पर,
क्या करते, खुदा भी तो हमपर, कुछ इसतरह ही मेहरबान हुआ। 
न जाने क्यों अक्सर इस जहां ने, हमें कंटक ही दिये, 
हमने तो सदा ही सहृदय उनको, कुसुम निवेदित किये। 
ऐ दस्तूर-ए-ज़िंदगी, तुझे आजतक हम समझ न पाए,
झुकने को ये दुनियाँ, सज़दा समझ लेती है किसलिए।


" नित बदलता वक्त"
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कभी कर्मठ जहां वाले,
अपनी मनपसंद शक्ल को
स्वमानस पटल पर अंकित किया करते थे, 
अब तो इस कदर आलसी हो गए
कि अंतरजाल के सहारे,
जुकरवर्ग के 'दरखास्त' "मुख-दर्ज" पर
चस्पा करते भी हैं तो जम्हाई लेकर।
सुविधा हेतु मिलता -जुलता अंग्रेजी अनुवाद :
Those were the days,
when diligent people used to
colonized in their heart
their darling saize.
Now a days,
we sluggish use zuckerberg's
'app' " facebook" to record
ours any charming image .

तरस आता है कभी-कभी अपनी जिन्दगी जुझारू पे,
सुबह को दवा पे जीते हैं, और शाम को दारू पे।  

अपने विकास के एजेंडे को 
अपने ही पास रखो, मोदी जी , 
लाइट आ गई, लाइट आ गई...... 
दिन में १० बार यह दोहराने से 
जिस ख़ुशी का एहसास मिलता है , 
अरे, वो तुम का जानो। 
प्यार-मुहब्बत में शक-शुबहा की ये मदें क्यों हैं,
परस्पर दिलों में दूरी नहीं, फिर ये सरहदें क्यों है,
उम्र गुजर गई है सारी, इसी जुस्तजू में, ऐ दोस्त,
कि जिंदगी के हर मोड़ पर इतनी मयकदें क्यों है।

है दुआ रब से बस इतनी कि तुम्हारी हर इक मुराद पूरी हो,
हमने तो जिन्दगी मे ऐ यार, कभी कोई आरजू ही नही की ।

 यूं अब तक जिये तो किसी और के रहमोंकरम पर ही हम,
किंतु ऐ हुजूर, खुद के लिए मांगी हुई दुआ सदा बेअसर ही गई । 
फ़क़त नौकरी बदलने से फजीहत कम नहीं होती,
मगर फिर भी नौकरी की अजीयत कम नहीं होती।            अजीयत=परेशानी
जहां भी चले जाओ, सब के सब लाले एक जैसे है, 
जितना भी नफ़ा दे दो इनकी नीयत कम नहीं होती।

मैं दायरों में रहूँ या फिर दायरों से निकलू,
मेरे ख्यालात,मेरे जज्बात सिर्फ तुम से है ,
तुम साथ हो तो मुकद्दर पे हुकूमत अपनी,
मेरे हर रिश्ते की सौगात, सिर्फ तुम से है।

ख़ुशी हुई यह जानकार 
कि मोदी जी शीघ्र ही 
"स्मार्ट सिटी" लॉंच करेंगे, 
मगर मन में सवाल ये है 
कि वाशिंदे तो 
अपने ही देश के लोग होंगे न ??? 

इसबार ख़्वाबों ने 
मन की मुराद पूरी कर दी,
'कल्पना' हमसफ़र बनी 
तो पंखों ने भी 
उड़ान लम्बी भर दी। 
रोज सुबह, दुआ मांगता हूँ कि मैं, रास्ता भूल जाऊं मैखाने का ,
और शाम ढले, मौका-ए-लुत्फ़, हिसाब भूल जाता हूँ पैमाने का।
कितनी ही बार खुद को समझाया,
साक़ी को भी खूब धमकाया 
कि कल से हमारी-तुम्हारी दोस्ती ख़त्म,
मगर आजतक वो कमबख्त 'कल ' नहीं आया।

अब भला और किस नाम से ताबीर करे इस रुत को ,
बगिया बदहाल है और माली के सिर पर बहार आई है। :-)  जय केजू  की 

Dekha Kalyug ka ye kaisa asool, 
fool ke sar par bhi khil gaye phool 

Wednesday, June 15, 2016

परिणीत सफर, रजत मुकाम


सुभग, सौम्य  मेहरबाँ  रब था, 
 चरम पे अपने यौवन जब था।


 जब होता मन चपल-चलवित,
 पुलकित होता हर इक लब था,
 जब बह जाते कभी जज्बातों में,
 अश्रु  बूँदों से भर जाता टब  था।
 चरम पे अपने यौवन जब था।

     
प्रफुल्लित, उल्लसित आह्लादित,

गिला न शिकवा, सब प्रसन्नचित,
पथ,सेज न पुष्पित, कंटमय थे, 
किंतु विश्रंभ सरोवर लबालब था।
चरम पे अपने यौवन जब था।।


नित मंजुल पहल दिन की होती, 
निशा ताक तुम्हें, चैन से सोती,

हुनर समेट लाता छितरे को भी, 
अनुग्रह,उत्सर्ग,अनुराग सब था।
चरम पे अपने यौवन जब था।


                                                               
दाम्पत्य सफ़र स्वरोत्कर्ष सैर,
मुमकिन न होता तुम्हारे वगैर,
नियत निर्धारित लक्ष्य पाने का ,
ब्यूह-कौशल , विवेक गजब था।
चरम पे अपने यौवन जब था।।



Friday, April 29, 2016

धन्य-कलयुग

है अनुयुग समक्ष, सकल संतापी,
त्रस्त सदाशय, जीवन आपाधापी,  
बेदर्द जहां, है अस्तित्व नाकाफी,  
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।   

दिन आभामय बीते, रात अँधेरी,
लक्ष्य है जिनका, सिर्फ हेराफेरी, 
कर्म कलुषित, भुज माला जापी, 
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।  

कृत्य फरेब, कृत्रिम ही दमको,
पातक चरित्र, सिखाता हमको ,   
अपचार की राह है, उसने नापी,
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।      

धूर्त वसूले, हर बात पे अड़कर,
शरीफ़ न पाये, कुछ भी लड़कर ,
व्यतिरेक की आंच, उसने तापी,  
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।  

Thursday, April 28, 2016

मेरे लिए तुम....


मय-साकी-रिन्द-मयखाने में,
आधी भी तुम, पूरी भी हो,  
हो ऐसी तुम सुरा खुमारी,
'मधु' मुस्कान सुरूरी भी हो। 

मंथर गति से हलक उतरती,
नरम स्वभाव, गुरूरी भी हो.     
आब-ए-तल्ख़ होती है हाला,
तुम मद्य सरस अंगूरी भी हो। 
  
जोश नजर शबाब दमकता,  
देह-निखर, धतूरी भी हो,   
खान हो जैसे हीरे की तुम, 
सिर्फ नूर नहीं, कोहिनूरी भी हो। 
  
था जीवन नीरस तब तुम आई ,
 नहीं मांग निरा, जरूरी भी हो,     
अकेली केंद्र बिंदु ही नहीं हो,
तुम मेरे घर की धूरी भी हो।  


Friday, April 15, 2016

तजुर्बा

   

बेशक, तब जा के आया, यह ख़याल हमको,
जब दिल मायूस पूछ बैठा, ये सवाल हमको।


हैं कौन सी आखिर, 
हम वो काबिल चीज़ ऐसी,
करता ही गया ज़माना, जो इस्तेमाल हमको।


लाये तो हम थे किनारे,कश्ती को आँधियों से ,
किन्तु सेहरा सिर उनके चढ़ा, बबाल हमको।


ऐ जिंदगी, तूने हमें यूं सिखाया,जीने का हुनर,
'उदीयमान'* मिला उनको, और ढाल* हमको।


शिद्दत से निभाते रहे हम, किरदार जिंदगी का,
रंगमंच पर मुसन्न* चढ़ा गए, नक्काल हमको।



जाल में जालिम जमाने के, फंसते ही चले गए,
धोखे भी मिले 'परचेत', क्या बेमिसाल हमको।

उदीयमान = प्रगति 
ढाल - ढलान 
मुसंन = जबरदस्ती