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Showing posts from November, 2009

ये दुनियां चलायमान है मूरख!

इस कदर करता किस बात पर अभिमान है , ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है। भाई-भतीजा, गांव-गदेरा, जाना तय है  और  अन्तकाल मा कोई न तेरा, फिर  किस बात का, तुझे इतना गुमान है। ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है। । अच्छा -बुरा  नीति-अनीति , इनमे से ही है तय करना, निष्पादन  जैसा , प्रतिफल भी वैसा ही भरना, कुछ ऐसा ही जगत का अपना एक  विधान है।   ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है। । चरित्र मुट्ठी में बंद बालू  है   फिसल न जाये, पकड के रख,  प्रतिष्ठा  गतिवान है   खिसक  न जाए ,जकड के रख, लोभ  की आंधियो में जो डगमगाये वो ईमान है।   ये दुनियां चलायमान है मूरख, ये दुनियां चलायमान है  । ।

सरकार द्वारा प्रायोजित दीखती है मंहगाई !

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इसमे कोई सन्देह नही कि आज दुनिया भर मे छाई इस मंदी और मंहगाई ने सारे ही अर्थशास्त्र की परिभाषाओं को उलट-फेर कर रख दिया है । अर्थशास्त्रीयों द्वारा दी गई परिभाषाओं के मुताविक आर्थिक मंदी के दौर मे लोगो की क्रय करने की क्षमता कमजोर पड्ती है , जिससे उचित ग्राहक न मिलने की वजह से वस्तुऒ और सेवाऒ के दामों मे गिरावट आती है। लेकिन आज हकीकत मे तो स्थित ठीक इसके विपरीत दीखती है, आर्थिक मंदी भी है और मह्गाई भी, यानि सब उलटा-पुल्टा। जहां एक ओर इसके लिये तेजी से बढती जनसंख्या और लोगो के जीवन स्तर मे सुधार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वही दूसरी ओर इसका एक प्रमुख कारण है, जमाखोरी और असंगत और अनुचित वितरण प्रणाली। मगर इन सबसे ऊपर है सरकारों का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार, और इसे रोकने के लिये इच्छा शक्ति का अभाव ! दिखावे के लिये भले ही हमारी सरकार, महंगाई के सम्बंध मे घडियाली आंसू बहा रही हो, लेकिन हकीकत यह है कि सरकार इस सम्बंध मे कतई गम्भीर नही ! इसे एक उदाहरण से इस तरह समझा जा सकता है कि अन्य सालों के मुकाबले इस साल भी टमाटर के उत्पादन मे कोई उल्लेख्नीय गिरावट नही आई, बावजूद इसके पिछले सालों के मुक...

सांख्यिकी और संभाव्यता !

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ठुमकते हुए चलते , तुम्हारे पैरो के तलवों की सरगम  और  नूपुरों की छम -छम से  मेरे दिल की गहराइयों में छुपे भावो को ऐंसी गूढ़ शब्दीय काव्यता  मिल जाती  है ! मानो, जैसे कभी  धूल पोंछते वक्त  शेल्फ में रखी   सांख्यिकी की  किताबों से,  नीचे गिरती शुष्क फूल की  पंखुड़ियों  की गणना करते  किसी के बेइंतिहा  प्यार  की प्रबल संभाव्यता मिल जाती  है !!

कुर्बानी लेना ही नहीं, देना "भी" सीखो !

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मैं, हूँ तो निहायत ही एक भोला-भाला, सीधा-साधा सा ग्रामीण, मगर उस दुश्मन की बड़ी इज्जत करता हूँ, जो मान लो कि मुझे ख़त्म करने की इच्छा रखता हो और आकर कहे कि मैं तुम्हे मारना चाहता हूँ ! खुले मैदान में आ जावो, एक तलवार या कोई भी हथियार मेरे पास है, एक तुम पकड़ लो और दो-दो हाथ कर लेते है ! तुम जीते तो तुम जियो, मैं जीता तो मैं जिऊंगा ! और नफरत करता हूँ मैं उस कायर से, जो छुपकर वार करता है, किसी बच्चे या स्त्री को ढाल बना के और अपने को वीर समझता है! कुछ तथा-कथित विद्वान लोग, जो यह तर्क देते फिरते है कि दुश्मन को टैक्टफुली मारना ही समझदारी है, उसे प्रतिघात का मौका ही मत दो! ऐसे विद्वान अगर ज़रा सी भी ईमानदारी से अपनी गिरेवान में झाँक के देखे, तो पायेंगे कि दूसरो को भले ही वे विद्वतापूर्ण सन्देश दे रहे हो, मगर खुद है, बुजदिल और कायर ! यदि हर छलपूर्ण कार्य समझदारी है, तो किसी बैंक की दीवार पर जब कोई चोर सेंध लगाता है और खजाना लूटता है तो उसे चोरी की संज्ञा क्यों दी जाती है, उसने भी तो विद्वता पूर्वक वह काम किया ? खैर, यह तो थी प्रस्तावना, अब असल बात पर आता हूँ! आप लोग तर्क देंगे कि वैसे भी तो हम...

आह्वान- उठ, जाग मुसाफिर जाग !

कद्र जहां शान्ति की  हो  , वहां शान्ति का इजहार कर, किंतु, वैरी  न माने प्यार से  तो, पलटकर  वार कर। हम तो  सदा से शान्ति के, पथ पर ही चलते आये है, किन्तु ऐवज मे अमूमन, जख्म ही  देह ऊपर पाये है, जिल्लत उठाई है बहुत,मुगल,फिरंगियो से हारकर, अब अगर वैरी  न माने प्यार से ,पलटकर वार कर।   आखिर इसतरह कब तक सहेंगे ,जुल्म सहना पाप है, है दुष्ट-दानव दर पे बैठा, जो मानवता पर  अभिशाप है, छद्म युद्ध थोंपा है हमपर ,निरपराधों का नरसंहार कर, अब अगर वैरी  न माने प्यार से ,पलटकर वार कर।   बेइंसाफी की आहटों पर, चुप  न बैठों  नजरें फेरकर ,  दुश्मन लगे लांघने हदें जब , तो मोरो उसे घेरकर, पहल खुद से ना हो अन्याय की, ऐंसा व्यवहार कर अब अगर वैरी  न माने प्यार से ,पलटकर वार कर।     दिन प्रतिदिन  दुश्मनो का हौंसला,हो रहा उन्मत्त है, उठ, जाग मुसाफ़िर जाग, अभी भी पास तेरे वक...

क्या आपका खून नही खौलता ?

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आप इस बच्ची को देख रहे हो न, इस मासूम का दोष सिर्फ इतना था कि इसने आप और हम जैसे कायरो के देश में जन्म लिया ! और पड़ोसी मुल्क के कुछ राक्षसों ने इसका स्वागत बमों और गोलियों से किया ! आप इस माँ को देख रहे हो न ? आप नहीं देख पायेंगे, क्योंकि आप तो जन्मान्ध हो ! अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड से जब अपने इकलौते बच्चे की लाश पर विलखते हुए इसकी छट्पटाती अंतरात्मा की वेदना दहाड़े मार- मार कर रो रही थी, तो अगल-बगल की दीवारों की रूह भी पसीज गई थी! मगर आप कहाँ से सुनते, आप तो जन्मजात बहरे हो ! इस जैसी पता नहीं कितनी मांये जिनका बेटा-बेटी भी आतंकवाद की भेंट चढ़ गये, वह कुछ दिनों तक फूट-फूट कर रोंयीं और अपने भाग्य को कोसती रही, और फिर आखिर दिल पर पत्थर रख कर खामोश हो गई ! मगर चाहते हुए भी आप जैसे वीर पुरुषो, जो कि हरवक्त अभेद सुरक्षा कवच और कालेवर्दी धारी कमांडो से घिरे रहते हो, का कुछ नहीं बिगाड़ सकी! और आपने सोच लिया कि चलो इस बला से भी पिंड छूटा, किसी को कोई जबाब नहीं देना पडा ! लेकिन आपको शायद मालूम न हो कि एक असहाय, कमजोर और निर्दोष की 'बद-दुआ' और दिल से निकली 'हाय' कितनी शक्तिशाली ...

और हमारे संचार माध्यम कब सुधरेंगे ?

आज एक खबर पढी, पढने के बाद अपने देश के संचार माध्यमों पर बड़ा गुस्सा आ रहा था ! करीब महीना भर पहले आपने भी यह खबर पढी होगी: लखनउ, 29 अक्टूबर :भाषा: गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद थाना क्षेत्र में आज पुलिस ने 50 हजार रूपये के इनामी बदमाश रवीन्द्र त्यागी को मुठभेड़ में मार गिराया।........... इसके बाद जवाबी फायरिंग में बदमाश मारा गया, जबकि उसकी गोली से उपनिरीक्षक अनिल कपरवान तथा तीन सिपाही परमजीत सिंह, आदित्य और तेजपाल घायल हो गये, जिनमें से कपरवान और परमजीत को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। खबर यह थी कि उचित चिकित्सकीय सहायता न मिल पाने के कारण घायल सिपाही परमजीत सिंह की अपने पैत्रिक गाँव में कल मृत्यु हो गई ! जिस दिन यह घटना घटी थी, मैं भी गा.बाद में करीब डेड घंटे तक जाम में फंसा रहा था, इसलिए इस घटना का वाकया मेरे दिमाग में था! यह जानकार बड़ा अफ़सोस हुआ कि जिस जाबांज ने एक अपराधी को दबोचने में अपनी जान की बजी लगा दी, उसे हम उचित चिकित्सकीय सहायता नहीं उपलब्ध करा पाए ! फिर यह देश किस आधार पर किसी जाबांज अफसर या जवान से यह उम्मीद रखे कि वह अपने कर्तव्य को अंजाम देने में जी-जान लगा दे ? और त...

फिर सनक गया दिमाग कार्टून बनाने को.....

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ट्वींकल-ट्वींकल औल दि नाईट ! रविवार की व्यस्तता की वजह से कल रात को कुछ खास नही लिख पाया ! लोग कहते हैं कि इंसान का कबाडी(साहित्यिक) दिमाग पैदाइशी होता है, एक हास्य (पैरोडी कहना पता नही कहां तक उचित होगा, मुझे नही मालूम) तब लिखी थी, जब नौवीं-दसवीं मे पढ्ता था ! और मेरा तो यह मानना है यह एक ऐसी पोएम थी, जिसे ज्यादातर लोगो ने समय-समय पर अपने तरीके से भिन्न-भिन्न रूपों मे प्रस्तुत किया, आइये आपको भी सुनाता हूं! कुछ व्याकरण की गलतियों को जो उस समय पर मेरे हिसाब से सही थी, मैने उनमे सुधार नही किया, शब्द अगर अशोभनीय लगे तो अग्रिम माफ़ी ! ट्वींकल-ट्वींकल औल द नाईट जीरो वाट की धुमली लाईट वन मिड नाईट वेन माई वाइफ़ वज डीपली सिलेप्ट ऐट माई लेफ़्ट साईड सपने मे सी सौ अ पिक्चर, ऐज वह ट्रैवलिंग इन अ ऐयर फ़्लाईट जिसमे सौ हर मोस्ट ब्युटी, भेरी डेंजरस अ ग्रीडी काईट हर ब्युटिफुल फ़ेस हैड डर के मारे, तुरन्त बिकेम फ़्रोम रेड टु वाईट ऐट लास्ट जब काइट रीच्ड नियर हर, बचाओ-बचाओ ! सी क्राईड मै जागा ऐन्ड वोक्ड हर अप बाय हर आर्म्स सी होल्ड मी वेरी टाईट सुन कर हर व्वाइस अवर पडोसी, सोचा दिस कि दे हैव अ फाईट पर जब दे पीप्...

लघु कथा- परवेज

आज मुझे छुट्टी से लौटकर अपनी यूनिट आये पूरे आठ महीने बारह दिन हो गए, लेकिन साले, तूने इस दौरान मुझे एक भी ख़त नहीं लिखा ! यहाँ हमारे पास इ-मेल भेजने का कोई साधन नहीं , इसका मतलब यह तो नहीं कि तू ख़त भी न लिखे ! तुझे याद हो न हो, लेकिन मुझे अच्छी तरह से याद हैं वो कॉलेज के दिनों की बाते, और वो पी. सी. की फुल फॉर्मस, सारी की सारी ....! अगर मैंने एक-एक कर कभी भाभी जी को सूना दी तो फिर रोयेगा, मैंने बता दिया ! अगर बचना चाहता है तो हर महीने कम से कम एक ख़त मुझे जरूर लिख दियाकर ! साले, एक तू और रेखा ही तो हैं मेरे इस दुनिया में, जिन्हें मैं दिल की हर बात बता पाता हूँ, और मन का बोझ हल्का कर पाता हूँ! आज फिर से इस पत्र के माध्यम से, तुझे मैं अपने दिल की एक और बात बताना चाहता हूँ ! सोचा था कि यह बात मैं अभी अपने ही दिल में दफ़न करके रखूगा, और जब काफी साल गुजर जायेंगे, तब तुम्हे बताऊंगा ! लेकिन अपने मुल्क से दूर, यहाँ इस विदेशी मुल्क में न जाने कभी-कभी ऐसा क्यों लगने लगता है कि इस साल की दो महीने की छुट्टियाँ अपने घर वालो और तुम जैसे लोगो के साथ बिता पाने का सुअवसर शायद फिर से मिले न मिले ! यूँ त...

भई, अपनी तो जिन्दगी मस्त है !

सुबह उठकर, नहा -धोकर  चाय-नाश्ते  के बाद, झोला कांधे पे लटकाकर, मंझे पत्रकार की सी शैली में टा-टा करके घर को, निकल पड़ता हूँ दफ्तर को।   दफ्तर पहुँचकर आँखों को इक   अलोकिक सुख की अनुभूती होती है, क्योंकि अपने दफ्तर के रिसेप्शन की साज-सज्जा ही कुछ ऐसी जबरदस्त है, भई, अपनी तो जिन्दगी मस्त है। । दफ्तर की पहली चाय के साथ, कंप्यूटर खोला और लगे टिपियाने, कुछ जो रात का लिखा था, उसे अपने ब्लॉग पर डाला ! तभी कभी-कभार राउंड पे आ टपक पड़ता है लाला !! पहले से एक फाइल खोले रखता हूँ, और झट से लैटर बनाने लगता हूँ , भले ही पत्र का मैटर कोई याद नहीं, मगर उल्लू बनाने में मैं भी कम उस्ताद नहीं, उसके बाद तो समझो, बॉस ही काम के बोझ तले पस्त है ! भई, अपनी तो जिन्दगी मस्त है !! सांझ ढले घर पहुंचा, तो रोज एक सी ही रहती है दिनचर्या, क्योंकि है भी नहीं कोई और जरिया, बेटा अपना मस्त रहता है कुड़ियों में ! बेटी, ताना-बाना बुनती है गुड्डे-गुड़ियों में !! बीबी, किचन में झूमती है आई-पोड में, बूढी मम्मी मग्न रहती है अपने गौड़ में, मैं भला किसके संग मन बहलाऊ अपनी रें...

सब ओंछा ही ओंछा !

यों तो अक्सर यह शहर रेंगता ही रहता है, मगर कल तो देश की राजधानी का सेहरा सिर पर लिए यह शहर कुछ पलो के लिए ठहर सा गया था! अनुमान के हिसाब से करीब ६ लाख वाहन घंटो फसे रहे जाम में ! तेल खपत का अनुमान लगाया जाए तो इस जाम की वजह से अगर औसतन डेड लीटर तेल भी प्रति वाहन बेकार में जला है तो जिसका सीधा मतलब है कि करीब १० लाख लीटर पेट्रोल यूं ही धुआ हो गया ! यानी देश का करीब चार करोड़ रूपये स्वाह , इसके अलावा जो घंटो फंसे रहने से लोगो का आर्थिक और अन्य नुकशान हुए, वह अलग ! मगर चिंता किसे है ? ये तो इस देश में मामूली सी बात है ! महंगाई की वजह से लोगो के पास खाने के लाले पड़े हो, उससे सत्ता संभाले बैठे नेताओ पर क्या फर्क पड़ता है? अगर फर्क पड़ता है देश पर और उस गरीब मजदूर पर जो दिन भर मेहनत करके सौ -पचास रूपये जुटा पाता है, तो पड़े, इन्हें इससे क्या लेना ? जैसी कि किसानो ने धमकी दी कि अगर मांगे न मानी तो वे अपना गन्ना खेतो में भी जला लेंगे , तो जलाए, ये लोग चीनी आयात कर लेंगे , थोड़ा बहुत इन्कम वहा से भी हो जायेगी ! इनकी तो पांचो उंगलिया फिर भी घी में और सिर कड़ाई में ही रहने वाला है ! सब चोखा ही चोखा ...

कभी मेरे शहर आना !

क्योंकि तुम भी   इस खुशफहमी  में हो कि शहर इक खुशनुमा जिन्दगी जीने का आधार है, तभी तो तुम्हे शहरी जिन्दगी से इतना प्यार है।  मगर ये बात परम सत्य नही, तुम्हे कैसे समझाऊ ? यहाँ सांझ ढलने के बाद, लोग कैसे जीते है , तुम्हे क्या बताऊ ? अरे नासमझ, गांव एवं शहर की जिन्दगी मे, फर्क हैं नाना , शहरी जिन्दगी देखनी हो, तो कभी मेरे शहर आना।   तुम्हे दिखाऊंगा कि कथित विकास की आंधी मे, मेरा शहर कैसे जीता है, प्यास बुझाने को पानी के बदले , पेट्रोल-डीजल, मिनरल और ऐल्कोहल पीता है। क्या घर, क्या शहर, हर दिन-हर रात की मारा-मारी में, वो सिर्फ जीने के लिए जीते है, जीवन की इस जद्दोजहद में क्या शेर, क्या मेमना, सबके सब एक ही घाट का पीते है। ऊँचा उठने की चाहत में, मकान-दूकान, सड़क-रेल, यहाँ सबके सब टिके है स्तंभों पर, जिन्दगी भागती सरपट कहीं जमीं के नीचे  तो कहीं  खामोश लटकती खम्बों से खम्बों पर।   गगनचुम्बी इमारतों में मंजिल तक  पहुँचने को पैर,  लिफ्ट ढूंढते है ,खुद नहीं बढ़ते ! ऊँचे-ऊँचे शॉपिंग मॉल पर , सीडि...

अंकल सैम, ड्रैगन और हम !

आखिरकार अंकल सैम ने अपनी वह असलियत वर्तमान चीन यात्रा के दौरान प्रकट कर ही दी, जिसकी आशंका कुछ तबको मे तब जताई गई थी, जब पिछ्ले वर्ष वे अमरीकी राष्ट्रपति बनने के कगार पर खडे थे। यह जान क्षोभ हुआ कि अपने यह अंकल सैम भी बिना रीढ के ही निकले। हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और, वाला मुहावरा पूरी तरह इन पर चरित्रार्थ होता है। उस वक्त यह बात भी दबी जुबान से जोर-शोर से उठी थी कि एक अश्वेत पृष्ठ भूमि के अंकल सैम क्या वह निष्पक्षता अपने कार्यकाल के दौरान दिखा पायेंगे, जिसकी अपेक्षा लोगो को भारत और अमेरिका के बीच तथाकथित मजबूत होते रिश्तों से एक अमेरिकी राष्ट्रपति से थी, और जिस तरह का भारत प्रेम का नाटक अंकल ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान किया था ? अपनी चीन यात्रा के दौरान अंकल सैम ने हु जिन्ताओ के समक्ष जिस तरह गिरगिट की तरह रंग बद्ला और जो संयुक्त बयान जारी किया, उसकी भारत को आगे बढकर भरसक तरीके से कड़ी निन्दा करनी चाहिये। आपको याद होगा कि ये वही जनाव है जिन्होने २००८ मे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश को यहां तक सलाह दे डाली थी, कि अमेरिका को तिब्बत के मुद्दे पर बीजींग औलम्पिक का बहि...

नजरिया !

मेरे एक हमउम्र (दोस्त तो नहीं कहूंगा, जानकार कहना बेहतर रहेगा ) है ! जनाव को उनकी पिछली तीन पुस्तो से जानता हूँ जब हम पढ़ते थे तो मुझे याद है कि स्कूल की फीस, जिसमे भी उन्हें विकलांगता की वजह से छूट मिलती थी, और बस नाम मात्र की देनी भी पड़ती थी, समय पर नहीं जमा कर पाते थे ! मगर आज उनके धंधे की पूरी जानकारी तो यहाँ देना भी उचित नहीं होगा , बस यही समझ लीजिये कि बचपन से पोलियो की वजह से एक पैर से विकलांग है, और सरकारी नौकरी कर रहे है ! काफी चोखे विभाग में है अत: आज की तिथि में, मैं जब अपनी तुलना उनसे करने की कोशिश करता हूँ तो उनके समक्ष कहीं नहीं टिक पाता ! करीब पांच साल पहले एक पौश जगह पर मकान खरीदा, घर में एक लम्बी गाडी भी है, जिसे खुद तो विकलांग होने की वजह से नहीं चला पाते, मगर पत्नी और बेटी चलाती है ! और इन्ही सब वजह से स्वाभाविक तौर पर उठते-बैठते भी शायद हाई जैनेट्री में ही होंगे ! इन सब बातो को देखते हुए, इतना तो सहज अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि सिर्फ एक सरकारी नौकरी की तनख्वाह के भरोसे तो उन्होंने यह धन- दौलत कमाई नहीं होगी ! मेरी जानकारी के हिसाब से उनकी कोई लौटरी-वोट्री भी नहीं ...

सोच का दायरा !

आप लोगो ने भी अकसर यह सुना होगा कि फलां-फलां महत्वपूर्ण प्रोजक्ट मे तकनीकी जटिलताओ के कारण फलां फलां देश ने चीन, जापान, अमेरिका और युरोप के इन्जीनियरों की मदद ली। लेकिन यह बहुत ही कम सुना होगा कि उन्होने उस खास काम के लिये भारतीय इंजीनियरों की भी मदद ली । इसका मतलब यह कदापि नही निकाला जाना चाहिये कि हमारे देश मे इतने कुशल और गुणवान इंजीनियर नही है, जिनकी ये सेवायें ले सके। हमारे देश मे भी एक से बढकर एक कुशल इंजीनियरों की भरमार है, लेकिन उनमे कमी है तो बस उचित अवसरों की। यहां उचित अवसर से मेरा सिर्फ़ यह आशय नही है कि उनको रोजगार के साधनों की उपलब्धता, बल्कि उन्हे नये-नये तकनीकी शोध के पर्याप्त अवसर और साधन मुहैया कराना, ताकि वे अपनी प्रतिभा को निखार सके। अब फिर सवाल यह उठ्ता है कि उचित अवसर मुहैया कराना किसकी जिम्मेदारी है ? सीधी सी बात है कि यह जिम्मेदारी हमारी सरकारों की है, मगर फिर समस्या यह है कि सरकारें तो इसे लोग चला रहे है, जिनकी देश और जनहित में कोई दिलचस्पी नहीं। अभी हाल मे महाराष्ट्र सरकार का एक बयान खासी चर्चा का विषय बना रहा था , जिसमे सरकार ने यह घोषणा की थी कि वे अरबों रुपय...

और जब मै भी कार्टून बनाने बैठा तो.....

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आजकल हमारे ब्लॉगर मित्रो को कार्टून काफी पसंद आ रहे है, तो अपनी भी यह कबाड़ी खोपड़ी :) कभी कभी सटक ही जाती है इसलिए सोचा कि क्यों न मुझे भी अपनी इस नई प्रतिभा के साथ -दो -दो हाथ कर लेने चाहिये ! तो मैंने भी बना डाला एक कार्टून आपके मनोरंजनार्थ ! इसे देखिये और पसंद आये तो अल्लाह के नाम पर एक चटका दे देना बाबा, हा-हा ! हां, आप लोगो से यह निवेदन भी करूँगा कि कृपया इसे व्यक्तिगत तौर पर अन्यथा न ले ; कृपया तस्बीर बड़ी देखने के लिए उसके ऊपर किल्क करे

घरवालो को इन्फ्लेशन की मीनिंग समझाने का नायब तरीका !

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हमारी सरकार जो मुद्रास्फीति के आंकड़े पहले हर हफ्ते देती थी और अब महीने में एक बार देती है, उसने हम भारतीयों को बहुत समय से चक्कर में डाल रखा है! महंगाई आसमान छू रही है और यह इन्फ्लेसन है कि कभी नेगेटिव में जाकर डिफ्लेसन हो जाता है और आजकल पोजेटिव में एक और दो प्रतिशत के बीच झूल रहा है, जबकि वास्तविकता में इसे होना १००% से भी ऊपर चाहिए था! खैर, सब सरकार की और आंकड़े इकठ्ठा करने वालो की मेहरवानी समझिये, जो इसे आंकड़ो की पहली सीढी पर ही रोके खड़े है! दूसरी तरफ ये खबरिया चैनलों की मेहरवानी समझो कि घर में जिसे देखो, वही पूछे फिरता है कि अजी सुनते हो, ये इन्फ्लेसन क्या होता है? अब इन्हें कैसे समझाए इन्फेसन की परिभाषा ! मुझे अभी-अभी एक इ-मेल मिला है, मैं समझता हूँ कि यह समझाने का सबसे नायाब तरिका हो सकता है जो अपने सरदार जी ने अख्तियार किया है, अत: सोचा कि शायद आप भी मेरी ही तरह की परेशानी से जूझ रहे होंगे तो यह शायद आपकी भी कुछ मदद करे :) ;

कबाडी और साहित्यकार !

आपने देखा होगा कि अक्सर घरो, गलियों मे आने वाला हर फेरिया व्यापारी अपना कुछ न कुछ सामान, जोकि अमूमन एक ही तरह की वस्तु होती है, बेचने को लाता है, कही एक खास जगह से खरीद कर, जबकि कबाडी इसके ठीक विपरीत भिन्न-भिन्न जगहों, घरों, गलियों से भिन्न-भिन्न तरह का कूडा खरीद्कर व इक्कठ्ठा कर, एक जगह पर बेचने ले जाता है । साहित्य-जगत मे एक रचनाकार भी एक कबाडी की ही तरह होता है, उस कबाडी की तरह, जो घर-घर जाकर कूडा इकठ्ठा करता है। साहित्य-जगत से जुडा एक रचनाकार अथवा साहित्यकार भी भिन्न-भिन्न जगहो, मौसमो, वातावरण और परिस्थितियों से साहित्यिक और बौद्धिक कूडा-कच्ररा अपने दीमाग मे इक्कठाकर लाता है, और फिर एक जगह पर उसे संग्रहित कर देता है, या फिर बेच डालता है। सचमुच कितनी समानताये है न, एक रचनाकार और एक कबाडी मे ? हां, फर्क बस इतना है कि कबाडी का इक्कठा किया हुआ कूडा तो उसे कुछ न कुछ आर्थिक अर्जन देता ही है, मगर साहित्यकार का कूडा उसे मौद्रिक लाभ भी देगा, इसकी कोई गारन्टी नही होती। ऐ साहित्यकार ! तूम भी एक कबाडी हो, साहित्य की गलियों के । वन और उपवन की पौधे, फूल और कलियों के॥ इस कबाड़खाने के , मंजे एक ख...

भेडे प्रतिकार नही करती !

हमारे इस लोकतन्त्र मे भ्रष्ठाचारियों के हौंसले किस कदर बुलंद है, इसकी एक मिशाल निर्दलीय विधायक होने के वावजूद आंटी सोनिया, हेर-फेर के भीष्म पितामह लालू और गुरुऒं के गुरु, शोरेन गुरुजी के आशिर्वाद से एक जमाने मे झारखण्ड की सत्ता के प्रमुख बने, वहां के भूतपूर्व सम्मानित मुख्यमन्त्री श्री मधु कोडा के इस एक लाईन के बयान से मिलता है, जिसमे कल ही उन्होने कहा कि यदि उन पर आरोप साबित हो गये तो वे राजनीति से सन्यास ले लेंगे। बयान भले ही बहुत छोटा सा लगता हो, मगर खुद मे बहुत से गूढ अर्थ समेटे है। मसलन पहली बात तो यह कि हमारे प्रवर्तन निदेशालय और अन्य जांच अजेंसियों द्वारा उसके पास से जुटाये गये इतने बडे हेर-फ़ेर की सामग्री और अन्य बडे-बडे दावों के वावजूद, मधु कोडा को पूरा भरोशा है कि ये ऐजेंसियां और सरकार उन पर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध नही कर पायेंगी। दूसरी बात यह कि मधु कोडा इस बात से भी आस्वस्थ हैं कि जहां तक राजनीतिज्ञ विरादरी की भ्रष्ठता का मुद्दा है, हमारा न्यायतंत्र और कानून, खास कुछ नही कर पाते । तीसरी महत्वपूर्ण बात उनके बयान से यह निकलती है कि जैसा कि उन्होने कहा कि वे राजनीति से सन्यास ...

ब्लॉगर दोस्तों, आपके बिचार !

यह आपका ही प्यार है जो मैं अब इतनी हिम्मत करने लगा हूँ कि आप से पूछ सकू कि आप इस बारे में क्या बिचार रखते है ? मैं यह समझ सकता हूँ कि मेरा रुख उग्र भी हो सकता है, मगर मै यदि गलत हूँ तो सही राह दिखलाना आप लोगो का फर्ज बनता है, क्योंकि आप सब एक विवेकशील समाज से संबद्ध है ! मैं आप से पूछना चाहता हूँ कि मेरे एक ख़ास दोस्त के निम्नाकित विचार है, सवाल मेरा आपसे यह है कि बढ़ती असुरक्षा और लोकतंत्र की विफलता के चलते क्या मेरे इस दोस्त के विचार सही है, अथवा गलत, आप अपनी राय दीजिये ; "If carrying guns is made mendatory condition for citizenship, India's quality of life and level of decency in public life will soar while crime will plummet. Bus and bank robbery , train hold ups, purse snatching, eve teasing will become things of the past. Guns not only give you power, it changes your whole attitude. Gun represents power. Better guns better power. More guns more power. It is easy to control and rule powerless people. Knowledge is power and historically it had been restricted to a chosen ...

हमारा डिकोड तंत्र !

"मीट राहुल" यही तो वो कोड था जिसे हमारे मीडिया और खुफिया तंत्र ने तुंरत डिकोड कर दिया, इस अनुवादित रूप में कि हेडली और राणा किसी राहुल नाम के शख्स को मारना चाहते है! सबके कान खड़े हो गए, इस भय से कि कहीं उनका तात्पर्य या फिर निशाना अपने आज के युवा वर्ग के नेता कहे जाने वाले राहुल भैया तो नहीं है ? बस फिर सारा तंत्र, सारा मीडिया जुट गया, उस मेल की एक-एक कडिया जोड़ने में ! और नतीजा हमारे सामने है- फिल्म निर्माता महेश भट्ट का बेटा राहुल भट्ट ! काश कि इतनी तत्परता से हमने वो दिल्ली बम धमाको, जयपुर बम धमाको, अहमदाबाद बम धमाको, बैंगलोर बम धमाको की कडिया भी जोड़ी होती, तो शायद मुंबई के २६/११ की परिणिति ही देखने को न मिलती ! लेकिन उस वक्त 'मीट राहुल' कोड हमारे ये लोकतंत्र के रखवाले नहीं पकड़ पाए थे ! ऐसा लगता है कि हमारे खुफिया तंत्र ने भी इस देश की महान राजनीति की भाषा को बखूबी इस्तेमाल करना सीख लिया है, इसीलिये वे अपना पल्लू झाड़ने के लिए बीच-बीच में यह चेतावनी जारी कर कि फिर से आतंकवादी घटना हो सकती है, अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ बैठते है ! अगर ऐसा न होता तो २६/११ के बाद भी ...

ख़त उसके नाम !

बहा ले जाए जो सुप्त-थमे हुए दरिया में भी , यहाँ हर तरफ ऐसी  ही  मौजो के सफीने है, गाँव में ही रहो ,इस शहर मत आना पगली, क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है। माँ को माँ नहीं समझते, बहन को बहन नहीं, बेरहमी का मंजर ये है ,इनमें कोई जहन नहीं, अँगुली  की मुन्दरिया के खोटे सब नगीने है, तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली, और तो और, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है। प्यास बुझाने को भी तोल के मिलता पानी है, दीन-ईमान की बात , सबके सब बेईमानी है, बेचने को समेटते बूँद-बूद टपके हुए पसीने है, तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली, तुम क्या जानो, यहाँ के पत्थर भी कमीने है। बेशर्मी का आलम ऐसा,शर्म न इनकी नाक में है, किसे लगाए ठोकर रहते,हरवक्त इसी ताक में है, मार्बल के चेहरे इनके, किंतु तारकोल के सीने है, गाँव में ही रहना , इस शहर मत आना पगली, तुम्हे नहीं मालूम, यहाँ के पत्थर भी कमीने है !

मायूसी ही मायूसी !

आपने शायद यह सुना होगा कि हमारे देश में, हिंदू धर्म में लाश के क्रिया-कर्म में कुर्सी का भी पिण्ड-दान किया जाता है! और इसीलिये हमारे देश में लाशों की राजनीति भी एक चोखा धंधा मानी जाती है! यह देश पिछले काफी समय से रातो को ठीक से सो नही पा रहा, कारण, जिसे देखो बस शिकायत लिए ही घूम रहा है ! एक तरफ़ पत्थर अपना रोना रोते दिखाई पड़ते है कि इस देश के भाई-भतीजे उल्टे सीधे काम तो ख़ुद करते है और प्रतिपक्ष पर प्रहार करने की प्रक्रिया में घर से बेघर उन्हें कर देते है ! दूसरी तरफ़ लकड़ी अपना ही रोना रोये जा रही है कि जनम-जले मरते अपने कर्मो और करतूतों से है और चिता में साथ में जलने को उन्हें भी झोंक दिया जाता है ! जमीन का वह वीरान टुकडा भी किसी नए जनाजे को अपनी तरफ आता देख मायूस हो जाता है की अब इस नए मेहमान को कहाँ पर दो गज जगह मुहैया कराऊ ? भागीरथ को इसी बात का अफसोस है कि उसने नगर निगम में छ: महीने पहले कनेक्शन की अर्जी वाकायदा शुल्क सहित जमा की थी लेकिन अभी तक उसका नल नही लगा ! अब भला वह अपने पुरखो को श्रर्दांजलि दे भी तो कैसे ? बिना किसी मेहनत के कुर्सी पाया मौन सिंह मौन है ! सफेद चटकीले किस्...

गलत समझने का आनंद !

भतीजे और उसके साथी गुंडों ने एक बार फिर अपनी अशोभनीय और गिरी हुई हरकतों से जिस तरह देश दुनिया का मनोरंजन किया उसकी जितनी भी घोर निंदा की जाए, मैं समझता हूँ, कम ही है! ये अगर अपनी हर उचित और अनुचित मांग को मनवाने के लिए लोगो को डराए धमकाए, तो इस देश में आजादी के मायने क्या है ? जहां चाचा ने भी अपने वक्त में तरह तरह के ढोंग रचकर अपना उल्लू साधा वही भतीजा आज जिस लक्ष्मण रेखा को लाँघ रहा है, उसे उस रेखा को लाघने की विद्या भी चाचा से ही मिली थी! आप को याद होगा कि कुछ सालो पहले एक बार चाचा ने जब मुस्लिम आतंकवाद की तर्ज पर हिन्दुओ के भी आत्मघाती दस्ते बनाने की बात कही थी तो चाचा के इस घिनौने प्रयास पर टिप्पणी करते हुए एक वरिष्ठ स्तम्भकार ने लिखा था कि यदि चाचा को आत्मघाती दस्ते बनाने ही हैं तो वह इसकी शुरुआत सर्वप्रथम अपने बेटे और भतीजे के रूप में पहला आत्मघाती मानव बम के रूप में क्यों नहीं करता? लेकिन चाचा तो किसी और के बेटे को आत्मघाती बनाने की ताक में था ! खैर ये तो चाचा भतीजे के कारनामो की छोटी सी लिस्ट थी, लेकिन जो मैं कहना और बताना चाह रहा था, वह यह कि देश में हाल ही में संविधान और राष...

आज बस इतना ही .....

फिर से लुटती देखी सरे-आम अस्मिता,  विधान भवन के कुंजो ने ! जब राष्ट्र-भाषा को ही बेइज्जत किया,  कुछ सियासी टटपुंजो ने !! अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु राष्ट्र-गीत, राष्ट्र-भाषा की आबरू लूटने वालो ! तुमसे किस तहजीव में पेश आये,  बस यही कहूंगा, डूब मरो सालो !!

दो टके की बात !

जी, मेरी बात सौ टके की नहीं हो सकती, क्योंकि ऐंसी बाते हमारे लिए ज्यादा मूल्य नहीं रखती ! पहली बात तो यह कहना चाहूंगा कि आज का जो युवा मुस्लिम शिक्षित वर्ग ( अच्छी जगह से तालीम लिया हुआ ) है, उसमे से अगर आप एक-एक की राय ले , वोटिंग करवाए, तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ज्यादतर युवा वर्ग इस फतवे के खिलाफ है! और इसे उलेमाओं की बचकानी हरकत कहकर नकार रहा है! उसे आज विकास चाहिए इस तरह के फतवे नहीं ! ! फतवे का क्या मतलव है ? फतवे का मतलब है किसी को व्यक्तिगत अथवा पूरे समाज के तौर पर किसी ख़ास काम/बात को करने से रोकना, अब किसी को राष्ट्र गीत गाने के लिए बाध्य करने के सम्बन्ध में हमारे देश का सुप्रीम कोर्ट जो कहता है और जिस बात की मुस्लिमबुद्दीजीवी वर्ग बार-बार दुहाई दे रहा है, उसका सार यहाँ प्रस्तुत है: क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता है अथवा नहीं? यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोए एम्मानुएल विरुद्ध केरल राज्य आईऱ 1987 शC 748 [२] वाद में उठाया गया। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था क्योंकि इन्होने राष्ट्रगान जन गण मन को गाने से म...

शराफत और प्रेम !

१; मोहल्ले के कूड़ेदान के बाहर  वो जो आज तुमने देखा था , वह मेरी शराफत का चोला था, जिसे मैने कल ही उतार फेंका  था।  , २; प्रेम भी अब नही बचा आडम्बर के परिवेश से ! कभी प्रेम सच्चा होता था, चाहे वह इन्सान से हो, या फिर देश से !! मगर आज हर चीज को ’स्युडोइज्म’ (छद्मता) का ऐसा बुखार चडा है ! इंसानी वजूद  कठपुतली बन गया  है  और सियासी धर्म, राष्ट्र-धर्म से बडा है !!

तांक-झांक, एस एम एस की निराली दुनियां मे!

आप और हम, आज के इस तकनीकी युग मे कमप्युटर और ट्वीटर की दुनियां मे कुछ ज्यादा ही मस्त हो गये है। लेकिन हमारे पीछे साहित्यिक मनोरंजन की एक और दुनिया भी है, सेल फोन पर एस एम एस की दुनियां। आज जैसा कि विदित है, साप्ताहिक छुट्टी का दिन है, अत: फुरसत के इन्ही पलो में मैंने यहाँ झाँकने की कोशिश की! आइये चले, और देखें कि इस दुनियां मे क्या चल रहा है (सुविधा हेतु, कुछ सन्देशो का हिन्दी रूपान्तर भी प्रस्तुत किया है) ; पहला एस एम एस: कर दिया इजहारे इश्क हमने मोबाईल पर, लाख टके की बात, एक रुपये मे हो गई ! दूसरा एस एम एस: आई लब यू… आई लब यू … आई लब यू…. आई लब यू… यार, गलत मत समझना, डाक्टर लोग कहते है कि पागलों को प्यार से ही हैन्डल करना चाहिये । ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़ सरदार जी: अर्ज किया है ……. यशोमती मैया से बोले नन्द लाला… वाह-वाह… यशोमती मैया से बोले नन्द लाला… मां, टाटा स्काई लगा डाला तो लाईफ़ झिंगालाला… ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़ इन्सानी सम्बन्ध एक पेड की तरह होते है, जो शुरुआत मे देख भाल मांगते है , लेकिन अगर एक बार सम्रद्ध हो गये तो फिर जिन्दगी भर आपको छांव देते है , हर सुख-दुख में ! ़...

मातृ -भूमि वन्दना -गलत क्या है ?

वन्देमातरम  जगत-जननी के नमन का गीत है, जो दर्शाता धरती माँ के प्रति हमारी प्रीत है ! जिसमे  हमने  जन्म लिया, खेले , पले -बढे , और अंतत :फिर उसकी ही माटी की भेंट चढ़े , उसी पावन धरा को यह समर्पण दल नीत है, जो दर्शाता धरती -माँ के प्रति हमारी प्रीत है ! जो मातृ -भूमि की वन्दना नकारते है आज, यही कहूंगा कि वो हैं उबसे हुए बन्दे नवाज ! श्रदेय को सत्कार देना उपकृत की ये रीत है ! जो दर्शाता धरती माँ के प्रति  हमारी प्रीत है ! 

बेच खाया देश को........

बाग-डोर पकड़ डाली , लुच्चे ,लफंगों ने !  तिजोरी कर दी खाली , ऐयाश, नंगो ने !! कभी सोने की चिडिया,  देश सर्वनाम था ! बेकस,लाचार  के लिए आश्रय -धाम था !! वंदेमातरम भी उलझाया , फिजूल के पंगो ने ! वतन को ही बेच खाया , ऐयाश, नंगो ने !! लुप्त प्राय हो चुके है अब , धर्म और ईमान ! तुष्टिकरण में लूटा दिया , देश का सम्मान !! जनतंत्र  छल-पेशा  किया , बाहुबली-भुजंगों ने ! बेच खाया समग्र देश को, ऐयाश, नंगो ने !! भारत शान्ति के पक्षधर था , 'अतिथि देवो भव:' नारा था ! जहां पहुँच अनजान क्षितिज को , मिलता एक सहारा था !! आज कटुता फैला दी है , धर्मांध व्यक्रित दंगो ने ! वतन को ही बेच खाया , ऐयाश, नंगो ने !!

अमेरिका कहता है कि अब हम सब हिन्दू है ;

इस ब्लॉग जगत पर कल दुबे जी का आलेख कि क्या आप हिन्दू है, एवं चिपलूनकर जी का आलेख कश्मीर का रजनीश पढा तो मन व्यथित था! आज यह खबर का टुकडा हाथ लगा तो सोचा कि क्यों न आपके साथ शेयर करू और ब्लॉग पर ठेल दूं ! अपने इन हिन्दुस्तानी भाइयों को जो इस धर्म की बखिया उदेड़ने से ज़रा भी नहीं चूकते, कुछ तो ज्ञान प्राप्त होगा ! एक कहावत है कि हीरे की परख जौहरी ही कर पाता है, और हीरा हीरा ही होता और रहता है, चाहे देर सबेर ही लोग उसकी महता को समझे ! मैं लोगो की भांति यह तो दावा नहीं करूँगा कि हमारा धर्म तीब्रगामी और सबसे तेज है मगर यह जरूर कहूंगा कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमा हमारा ! आपने मथुरा और अन्य धार्मिक स्थानों पर गोरी चमड़ी के श्रधालुओ को तो बड़ी मात्र में देखा ही होगा लेकिन यह जानकर आपको भी खुशी होगी कि अमेरिका में लोग तेजी से हिन्दू धर्म की और इसके प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद की महता को समझने लगे है और वहाँ की आवादी के २४ प्रतिशत लोग हिन्दू रीति के हिसाब से अपने दाह- संस्कार के पक्ष में है ! पन्द्रह अगस्त को अमेरिका की मशहूर पत्रिका न्यूज़ वीक में छपा आलेख आप ...

भारतीय राजनीति पर भ्रष्टता का 'कोढ़' कह लो या 'कोडा' !

इन कोडा महाशय ने क्या महान कार्य किया इसके बारे में कुछ नहीं कहूंगा, क्योंकि कुछ बहुत ही संवेदनशील किस्म के खबरिया माध्यम, जो इसी चिंता में पतले हुए जा रहे थे कि यहाँ बहुत दिनों से कोई धमाकेदार वारदात नहीं हो रही है, और उन्हें टीआरपी की चिंता खाए जा रही थी कि अचानक बैठे-बिठाए दो मुद्दे मिल गए, एक जयपुर तेल हादसा और दूसरा कोडा ! उन्होंने पिछले कुछ दिनों में इनके पूरे बंश का की काला चिठ्ठा खोल डाला है ! अतः इनके बारे में मेरे ज्यादा कुछ कहने की जरुरत नहीं ! झारखंड राज्य बनने पर इनकी किस्मत के सितारे बुलंद हुए और यह एक आम आदिवासी से महापुरुष बन गया ! कोडा ने जो भी महान कार्य किये, उनका चिट्ठा तो अब खुलता ही जा रहा है, मगर इन्हें पाप करने के लिए मौका किसने दिया? सवाल यह है! तथाकथित साम्प्रदायिकता  और राष्ट्रवाद  का विरोध   करने वाले हमारे ये सेकुलर दल जिन्होंने सिर्फ बीजेपी से सत्ता छीनने के लिए झारखंड में एक नया ही इतिहास रच डाला, एक निर्दलीय को मुख्यमंत्री बनाकर, क्या वे इस बात की जिम्मेदारी लेंगे कि यह सब करके उन्होंने देश का कितना घोर नुकशान करवाया ? नहीं, इन्हें देश स...

एक इमोशनल अत्याचार ऐसा भी

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सुनो , तुम सुन रहे हो न ? पता नही क्यों, यह मोबाइल फोन, आजकल इस पर सिगनल ठीक से नही आते ! जब से तुम गये हो, पूरे चार साल हो गये, तुम्हारा यह फोन ही  साथ है लगता है अब यह भी थक गया, साथ निभाते- निभाते !! तुम सुन रहे हो न ? कल रात को  तुम्हारे इस  लाड्ले  को सुलाते ,  लेटे-लेटे अचानक पूछ बैठा,  ममा, ये ’पापा’ कैसे होते है ? उसके इस अबोध सवाल का भला मैं क्या जबाब देती उसका मन रखने को बोली कि बेटा, जो तुम्हारी ममा को जगा खुद कहीं चैन की नींद सोते है !  पापा ऐसे होते है !! तुम सुन रहे हो न ? उतनी देर से सिर्फ़ हूं-हूं किये जा रहे हो, तुम कुछ कहो न ! मै तो उसे समझाते-समझाते थक जाती हूं, मगर उसे कोई यकीं नही दिला पाती हूं ! हरदम तुम्हे 'मिस' करता है, तुम्हारी तस्वीर देख हंसने लगता है, तुम्हे देखेगा तो उसका तो रोम -रोम खिलेगा ! कब लौट रहे हो ? तुम्हे तुम्हारा वो 'ग्रीन कार्ड' कब तक मिलेगा ?  

इन्क्रेडिबल इन्डिया, सचमुच !

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गत दिवस  एक विदेशी मेहमान,  जो अपनी प्रेमिका(गर्ल फ्रेन्ड) संग भारत भ्रमण पर आये हुए है, को  वहाँ विदेश में मेरे संपर्क सूत्र द्वारा मुझे फोन पर किये गये अनुरोध के अनुरूप आगरा घुमाने ले गया था। तडके मथुरा रोड पर पलवल तक तो सडको पर थोडा- बहुत यातायात था, और दिल्ली से चलते हुए सडक के अगल-बगल हो रहे निर्माण कार्यो को देख (सरिता विहार के आसपास बन रहे मैट्रो लाईन और बदरपुर पर बन रहे फ्लाइ-ओबर को देख कर ) विदेशी मेहमान काफ़ी प्रभावित हुए और वे जब अपने को यह कहते हुए नही रोक सके कि “वोऊवो...... इन्डिया इज प्रोग्रेसिंग” तो मैने भी अपने देश की तारीफ़ो के सिलसिले मे काफ़ी लम्बी-लम्बी छोड दी । चीन को भी अपने देश के मुकाबले गया-गुजरा बताने से नही चूका। सुबह-सबेरे का वक्त होने की वजह से पलवल से आगे सड्क सुनशान थी, अत: मैने ऐक्सीलेटर पर थोडा और दबाब बना दिया था। गाडी के अन्दर कुछ देर से खामोशी छाई हुई थी, अत: उसे तोड्ते हुए मैने स्टीव ( उस मेहमान का नाम स्टीव जौन्सन था और उसकी प्रेमिका का नाम ऐन्डी) से पूछा, यू स्टे विद यौर पैरेन्ट्स ? नो, आइ एम् विद ऐन्डी फॉर पास्ट फाइव ...

तेरा ही लिखा कोई अफ़साना लगा !

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सुन्दर  तेरा  वो  आशियाना लगा, जग सारा ही अपना घराना लगा। कुछ लम्हा जो ठहरे थे दर पे तेरे , जाना -पहचाना सा ठिकाना लगा।। समझ न पाये गफ़लत मे  क्यों थे,  होता नही कोई किसी का यहां पर । पलभर जो शकूं  तेरे आंचल मे  पाया , अपना हमे   फिर  सारा जमाना लगा।।   वो जो पल्लू से ढककर चेहरा हमारा , गुनगुनाया था हौले से इक गीत तुमने।  जुबाँ  पे यूं रम गया हर शब्द उसका ,    ज्यूँ अपना ही गाया कोई तराना लगा।। घडीभर के लिये जब मुस्कुरा दिये तुम , मुझसे नजरें चुराकर मेरी शोखियों पर। मिला  फिर मेरे दिल को आह्लाद इतना , जैसे हाथ कोई अनमोल खजाना लगा।। रुखसत हुआ जब महफिल से तुम्हारी , ये दिल अपना, तुम्हारा दीवाना  लगा। छलके  थे वो जो  आँसू पलकों से तेरी , तुम्हारा ही लिखा कोई अफ़साना  लगा।।