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Showing posts from November, 2016

कार्टून कुछ बोलता है ; नाम बड़े और दर्शन छोटे !

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कशमकश !

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दिन-दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं, इस पार भी, उस पार भी, सब 'फेंकू' की सर्जिकळ स्ट्राइक के मारे हैं, इस पार भी, उस पार भी। तंग-ए-हाल, छटपटा रहे आज हर तरफ, जीव चोडे जबडों और मोटी चमडी वाले, क्रेडिटकार्ड से घर चलाना पड रहा, और   भरी तिजोरियों में लगे हैं मकड़ी के जाले।   खारे जल में घड़ियाली आंसू बहाने को  जहाँ -तहाँ ,मगरमच्छ भी बहुत सारे हैं, इस पार भी, उस पार भी, दिन-दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं, इस पार भी, उस पार भी।   थूक दिया करते थे जो कलतक इधर-उधर, पांच सौ - हजार रूपये का पान चबाकर, आज वो घंटों लाइन मे लगकर एटीएम  की,  खुश हो रहे हैं , पांच सौ- दो हजार पाकर।  इनकी घूल-धुलसित शक्ळें बता रही है    कि दुनिया में इनके जैसे भी वक्त के मारे हैं, इस पार भी, उस पार भी, दिन दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं, इस पार भी, उस पार भी। दुनिया तो दाल में काला ढूढ़ रही, मगर,  इनकी तो पूरी की पूरी दाल ही काली है, किसे पता था कि वक्त ऐ...

लघु व्यंग्य : हर पति के दिन फिरते हैं।

८ नवम्बर, 2016 की देर शाम को जब थका हारा  दिल्ली के दमघोटू यातायात से जूझता हुआ दफ्तर से घर पंहुचा तो बैठक मे मेज पर तुडे-मुडे ५०० और १००० रुपये के नोटों का अम्बार देख  एक पल को चौंक सा गया। लगा कि दुनियां का सबसे ईमानदार कहा जाने वाला तबका यानि आयकर विभाग के हरीशचन्दों की मंडली आज मेरे घर मे भी आ धमकी है, कि तभी किचन से हाथ मे पानी का गिलास लेकर धर्मपत्नी कुछ बडबडाती हुई मेरी ओर बढी। मैने अंदर से अशान्त होते हुए भी शान्त स्वर मे पूछा, क्या माजरा है ये सब, भाग् यवान ? मेरा इतना पूछना था कि यूं लगा मानों टिहरी डैम के कर्मचारियों ने डैम के सारे कपाट खोल दिये हों और डैम का सारा रूका पानी अपने पूरे बेग से देवप्रयाग की तरफ निकल पडा हो। बोली, अरे,  ये तो सचमुच का फेंकू निकला यार। कहता था, स्विस बैंक से ब्लैकमनी लाऊगा और १५-१५ ,लाख दूंगा सबको । कुछ देना लेना तो दूर, मैने तुम्हारी जेब से टपा-टपाके जो १०-१५ हजार रुपये  बटोर कर रखे थे, उन पर भी कम्वक्त ने आज सर्जिकल स्ट्राइक कर दी। मैं अभी भी दुविधा मे था, अत: मैने अपने धैर्य के बचे खुचे भन्डार...