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Showing posts from March, 2020

बडा सवाल, लक्ष्य क्या है ?

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दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके से खबर आ रही है कि वहां करीब 300 लोगों में कोरोना वायरस के लक्षण होने की आशंका है, जिससे से तमिलनाडु से आए 10 लोगों की मौत भी हो गई है। यहां एक धार्मिक कार्यक्रम मे शामिल होने कुल 1400 भारतीय मुस्लिम और 300 विदेशी मुस्लिम आए हुए थे। जानता हूँ, हमारे देश के बहुत से छद्म-धर्मनिर्पेक्ष ज्ञानी और समुदाय विशेष के बुद्धिजीवी, मजबूरी और जानबूझकर देश के कानूनों का उल्लंघन मे फर्क न कर पाएंगे और  मजदूर पलायन से इसे जोडकर देखने का भरसक प्रयास करेंगे। मगर बडा सवाल यह कि एक तरफ जहाँ दिल्ली की सरकार डेड-दो हफ्ते पहले यह घोषणा करती है कि सभी धार्मिक उत्सवों पर रोक लगा दी गई है फिर नाक के नीचे हो रहे इस आयोजन को नजरअंदाज क्यों किया गया? सिर्फ इसलिए कि वो इनका वोट-बैंक है? देखकर बडा अफसोस होता है कि समुदाय विशेष एक तरफ तो देश के कानूनों की जानबूझकर अनदेखी करता है, उसे नही मानता है और वहीं दूसरी तरफ सरकार फ्री राशन या खाते मे पैंसे डालने की घोषणा कर दे तो तमाम कस्बा ही अगली सुबह बैंक पर धावा बोल देता है। दिल्ली मे फोनकर के घर मे खाने के लिए कुछ न होने क...
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कल जब दिल्ली की सडकों का ये हाल था तो ये जनाब ट्विटर पर लोगों से घर पर बने रहने की अपील कर रहे थे। जब सोशल मीडिया पर खूब लताडे गये तो आज सडक पर उतरकर पटरी पर बैठे एक बेघर भिखारी को डांटते हुए बोले, "तुम्हे मालूम है, देश मे 21दिन का लॉकडाउन है, स्टे ऐट होम।"😂😂

वाहवाही बटोरने की मानसिकता पर ब्रेक की जरूरत ।

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हडवडी मे घोषित देशव्यापी सर्व लॉकडाउन  कुछ ही दिनों मे गरीब मजदूरों, रेडी-पटरी वालों के पलायन की ऐसी भयावह तस्वीर पेश करेगा कभी सोचा न था। 21वीं सदी का भारत कमोवेश देश विभाजन के समय की स्थिति से ज्यादा भिन्न नहीं नजर आ रहा। अतः मन मे कई सवाल उठना लाजिमी है। सबसे पहला और प्रमुख सवाल यह उठ खडा हुआ कि ऐसी अस्तव्यस्तता की स्थिति पैदा क्यों हुई, इसकी मुख्य वजह क्या है? पांच ट्रीलियन की अर्थव्यवस्था के सपने देखना, विश्व समुदाय के बीच अपने को चौथी और पांचवीं सबसे बडी अर्थ व्यवस्था के खिताब से नवाजा जाना मन को क्षणभंगुर सुख की अनुभूति अवश्य प्रदान करता है किन्तु अंदर की सच्चाई जानने लगो तो एक भयावह तस्वीर नजरों के सामने घूमने लगती है। राजनेताओं और सत्तातंत्र के मुह से यह सुनने मे तो काफी सुखद लगता है कि हम अगले तीन महिनें तक 80 करोड़ लोगों को फ्री का राशन खिलाएंगे। हम देश की राजधानी मे रोज चार लाख लोगों को मुफ्त़ मे भोजन देंगे। मगर वास्तविक सच्चाई ये है कि ये लोग इनके लिए सत्ता हासिल करने का एक माध्यम मात्र है। एक बार अगर ये सत्ता पर काबिज हो जाएंं तो इन महापुरुषों से ये सवाल कोई नह...

कोरोना वायरस पर मोदी सरकार का हवाई फायर ।

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सिर्फ हमारा देश ही नही अपितु पूरा विश्व समुदाय इस वक्त चीन के वूहान प्रान्त से शुरू हुए एक जानलेवा वायरस जिसे कोविड-19 नाम दिया गया है, से बुरी तरह जूझ रहा है। इस खतरनाक वायरस से प्रभावित हर देश की सरकारें अपने-अपने ढंग से नियंत्रण पाने की जी तोड कोशिशों मे जुटी हैं। विश्व के कुछ चुनिन्दा शक्तिशाली देशों की क्रोना वायरस के आगे विवशता को देखते हुए तथा यहां मौजूद सीमित साधनों के मध्यनजर हमारी सरकार ने बडी चतुराईपूर्वक समय रहते इसपर नियंत्रण के लिए जो कदम उठाए उसकी मैं तारीफ करता हूं। इसमे शायद ही किसी को संदेह हो कि हमारी मौजूदा सरकार न सिर्फ निपुण है बल्कि चुनौतियों का सामना करने मे भी सक्षम है। बस, कभी-कभार इनकी ये चातुर्यता थोड़ी ज्यादा (over) सी महसूस होने लगती है। जो सरकार की मुद्दे पर गम्भीरता के प्रति मन मे संदेह सा पैदा करने लगती है। अभी कल ही सरकार की वित्तमंत्री, श्रीमती निर्मला सीतारमण ने क्रोना की वजह से पूरे देश मे तीन सफ्ताह की तालीगिरी (Lockdown)  से उत्पन्न मौजूदा संकट से निपटने के लिए सरकार की तरफ से एक लाख सत्तर हजार करोड़ के विशाल आर्थिक पैकेज की घोषणा की। इस ...

21वीं सदी की सबसे छोटी कहानींं।

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'रेल' और 'रेली', दोनों पति-पत्नी रेलवे मे नौकरी करते थे। स्वछंद घूमना और मौज मस्ती ही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी। अचानक एक दिन पढोसी मुल्क से एक चीनी वायरस आया और आते ही उसने देशभर मे अफरातफरी का माहौल खडा कर दिया। सरकार ने भी आव देखा न ताव, पूरा देश ही बंद कर डाला, वो भी तीन हफ्ते के लिए। रेल और रेली ने सपने मे भी न सोचा होगा कि कभी ऐसा वक्त भी आ सकता है। उनके पास घर भी नहीं था।  प्लेटफार्म पर ही आराम फरमाने वाले जो ठहरे। अब जाएंं तो जांए कहांं? मजबूरन महानगर के एक गंदे नाले के किनारे छप्पर डालने की जगह मिली क्योंकि प्लेटफार्म तो उनसे भी होशियार बंधुओं ने पहले ही हथिया लिया था। सारे होटल बंद, कुछ किराना दुकाने खुली भी थींं तो  खुद के पास न पकाने का साधन और न बनाने का तजुर्बा। अब, भूखे-प्यासे ही दिन गुजारकर लाँँकडाउन खत्म होने का इंतजार, कब खत्म होगा, इसी अधेड़बुन मे रेल की बगल मे बैठी भूखी-प्यासी रेली को अभी हल्की सी झपकी आई ही थी कि कालेज के दिनों की पापा की वो दुलारभरी आवाज उसके कानों मे गू़ंज उठी, "रेली बेटा, आजकल तुम्हारी विन्टर वैकेशन हैं, थोडा...

वक्त के झरोखों से सुप्रभात।

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लुटियंस का तिलिस्म।

मासुमियत भरी आवाज मे, आज बिटिया यूं ही मुझसे पूछ बैठी, पापा, राजधानी के एक खास इलाके को लुटियंस जौन क्यों कहते हैं? मैंने भी सहजता भरे अन्दाज मे सरल शब्दों मे उसे बताया, बेटा, बामपंथी झूकाव वाला वो खास एक अभिजात्य वर्ग, स्वहित मे जिसने हमेशा औरों का किया उत्सर्ग, आजादी उपरांत, यह देश जौन-जौन तस्सली से लूटे हैं, वो वहां रहते हैं, इसीलिए, उसे लुटियंस जौन कहते हैं।😀
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आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। रंगों का यह त्योहार आपके जीवन को भी रंगीन बनाए, एवं हर ख़ुशी, सुख, समृद्धि,स्वास्थ्य, वैभव एवं ऐश्वर्य प्रदान करें, यही कामना।

एक पुरानी रचना।

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