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Showing posts from February, 2021

तलब

  बयां हरबात दिल की मैं,सरे बाजार करता हूँ,  मेरी नादानियां कह लो,जो मैं हरबार करता हूँ। हुआ अनुरक्त जबसेे मैं,तेरी हाला का,ऐ साकी, तलब-ऐ-शाम ढलने का,मैं इन्त्तिजार करता हूँ। नहीं अच्छा हद से कुछ,कहते लोग हैं मुुुझसे, मगर तेरे इस़रार पर,मैंं हर हद पार करता हूँ। खुद पीने में नहीं वो दम,जो है तेरे पिलाने में, सरूरे-शब तेरी निगाहों में,मैं इक़रार करता हूँ। ईशाद तेेरा कुछ ऐसा,मुमकिन नहीं कि ठुकरा दूँ, जाम-ऐ-शराब-ऐ-मोहब्बत,मैं कब इंकार करता हूँ। कहे'परचेत',ऐ साकी,है कहने को न कुछ बाकी, कुछ तो बात है तुझमे,तेरी मधु से प्यार करता हूँ।

बुजदिलों,अपना कायरकृत्य 'पुलवामा' देखो...

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खुद  की हिंसावादी सोच का  कारनामा देखो, बुजदिलों,  कायराना  कृत्य 'पुलवामा' देखो। छल कर के जिन वीरों को, तुमने सीना ठोका, हमारे उन वीरों की शहादत का पंचनामा देखो। बुझा दिये तुमनें घर, देहलीज़ के चराग जिनके उम्रदराज़ उन मांं-बाप ने कैसे है दिल थामा देखो। पलभर मे खत्म हो गई खुशहाल दुनियां जिनकी, इंतजार मे गुमशुम बैठी शहीदों की वो वामा देखो। पाखंड तुम्हारे सब पराजित होगे, ऐ क्षद्म-वेशियो, अपना वह विद्वंशी,दुष्कुलीनजनक ओसामा देखो। है भूल तुम्हारी,कमजोर समझना सहिष्णुता 'परचेत', मित्रता सीखो द्वेष प्रेमियों, हमारे कृष्ण-सुदामा देखो।

असमंजस

प्रश्न विकट है, समय निकट है, देह-ईमान किधर दफना़ऊ?  चहूंओर, गिद्ध हैं, गीदड़ हैं।  डाल-डाल से, ताल-ताल से, हैं नज़र गढा़ए निष्ठा-भक्षी,  शठ,लुच्चे-लफंगे, लीचड़ हैं।  गजब येह भंवरधारा,'परचेत', कुटिल, कपटमय कीचड़ हैं, पतितता के आकंठ मे डूबे,  जहां भ्रष्टाचार के बीहड़ हैं।।

प्रकृति

तवाही का मंजर-ए-खौफ़, ऐ मानव,  तू अपने दिल मे पाले रखना, क्षंणभंगूर सी है यह जिंदगी,  कुदरत की ये तस्वीरे संभाले रखना।

एकाकीपन का सबब..

मत पूछ मुझसे, इस ढलती हुई उम्र के  मेरे  एकाकीपन का सबब, ऐ जिन्दगी ! बस, यूं समझ कि यह सब तेरे कर्ज की  अगली  किश्त अदाइगी़ की जद्दोजहद है।

एक सम्बोद्धन, मिया खलीफा के सगे भाइयों को...

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निर्लज़्ज़ता व दम्भ़ भरी फि़जा़ देख, कुछ यूं सा अहसास हुआ 'परचेत', गद्दारी,अपने ही लहू मे छिपी रही होगी वरना, किसी को  तीन-तीन गुलामियां  इत्थेफाक़न ही नसीब नहीं हुआ करती ।

सच का सामना।

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ये वह बांंध है, जो   गढ-हिमालय के टिहरी मे पवित्र  भागीरथी की लहरों पे लेटे है, यौवन के अपने इस  बुलंद शिखर पर, स्व:वदन, दिव्य छटा लपेटे है, ऐ जहां वाले,  भागीरथी के इस द्वारपाल  को कभी उम्रदराज न होने देना क्योंकि, वह अपने अंदर उ फनते  समन्दर की सी,  गहराइयां समेटे है।