समाजपट
आजकल यदा-कदा छिटपुट दो चार लाइने शोसल मीडिया पर ही पोस्ट कर संतुष्ट हो जाते है। अपनी उन कुछ काव्यपंक्तियों , शेरो इत्यादि को यहाँ ब्लॉग पर बटोर रहा हूँ ; उपस्थित मित्रगण हमारी बेसब्री और झुँझलाहट का मजा लिए जा रहे थे, हमारी नजर उनके अंदाज पर थी और वो हमें नजरंदाज किये जा रहे थे। चिकनी चुपडी बातें कर, मैने भी बिठाया अपनी भोली सी बीवी को सर, 'इन्टरनेशनल वीमन डे' पर । अंतराष्टीय महिला दिवस पर समर्पित:- अगर आपके घर के अगले गेट के बाहर से बीवी चिल्ला रही हो और पिछले गेट के बाहर से आपका कुक्ता भौंक रहा हो तो ग्यानी लोग कह गये कि पिछला गेट खोलो, क्यौंकि कुत्ता अन्दर आ जाने के बाद चुप हो जायेगा । अग्रिम छमा :-) कलयुग मे यही हस्र होना था, काठ के उल्लुऔं का, कुछ हमारी ही मूर्खता थी, कुछ जमाना बना गया । पानी फ्री मे पी गये जमुना का, डालके दिल्ली के घडे मे कंकर, और जीने की कला भी सिखा गए, श्री-श्री रवि शंकर । कुछ लुच्चे, लफ्गौं की छीना-झपटी मे जब एक "पहाडी घोडा" अपनी टांग गंवा बैठा, तभी जा के ये अहस...