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Showing posts from 2008

दर्जी काका और पाकिस्तान का झंडा !

तब हम गुरुदासपुर के तिब्डी कैन्ट में रहते थे, मैं शायद तब सातवी कक्षा में पढता था । जिस मोहल्ले में हम रहते थे उसी के नुक्कड़ पर एक दूकान थी, हम लोग उसे दर्जी काका की दुकान कहकर पुकारा करते थे । दर्जी काका एक अधेड़ उम्र के मुस्लिम थे । परिवार में वो कुल तीन जने थे, वे, उनकी बेगम और एक बेटी । घर की माली हालात थे । साल के शायद १२ महीने ही वो अडोस-पड़ोस वालो से कुछ न कुछ मांगते रहते थे, खासकर मेरे पिताजी से तो दर्जी काका महीने में कम से कम दो बार अवस्य ही कुछ पैंसे मागने जरूर आते थे । क्योकि जो काम उनका था, उसमे शायद किसी खास वक्त पर ही कमाई हो पाती थी, अन्यथा साल के अन्य दिनों में वे छोटे-मोटे सिलाई-तुल्पायी के ही काम कर गुजारा करते थे । इस व्यवसाय में उनका जो मुख्य काम था, वह था झंडे बनाना । जब कभी चुनाव होते तो वे राजनीतिक पार्टियों के झंडे बनाते थे । २६ जनवरी और १५ अगस्त के आस-पास वे अकसर देश का झंडा बना रहे होते थे, और जब अप्रैल, मई जून का महिना होता था तो वे पास ही स्थित नाथ मन्दिर के चढावे के तथा सिख तीर्थ यात्रियों के झुंडों में आनंदपुर साहिब, हेमकुंट साहिब और पोंटा साहिब जाते ...

वो कौन थी ?

हर इंसान की जिंदगी से जुड़े कुछ वे ख़ास संस्मरण भी होते है जिन्हें इंसान दिल के किसी कोने में संजो कर तो रखता है, हर एक को खुलकर नहीं बता पाता। कुछ बाते ऐसी होती है जो इंसान सीधे वार्तालाप में अभिव्यक्त करता है और कुछ ऐसी, जो लिखकर व्यक्त की जाती है । अभी पिछले हफ्ते मेरा एक जिगरी दोस्त मेरे घर पर आया था, वह स्वभाव से बहुत बातुनी है, उस दिन हमारा सपरिवार डिनर का प्रोग्राम था, शाम को जब टेबल पर मनोरंजन करने बैठे तो वह लगा मेरा दिमाग चाटने। बातो को कैसे घुमाना है, कैसे तोड़मरोड़ कर पेश करना है, कोई उससे सीखे। उसने जल्दी-जल्दी दो पग लिए और बोला यार, मैं आज तेरे को अपनी एक सच्ची कहानी सुनाता हूँ, तुम चुपचाप सुनो, नाराज मत होना। मैंने कहा सुना भई, मैं भला क्यों तेरी कहानी से नाराज होऊंगा? बस फिर वह लगा अपनी राम कहानी सुनाने। १९८५ के आस-पास की बात है, वह तभी से मेरे साथ हो ली थी, जब से मैं अपने विद्यार्थी जीवन को त्याग रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से शहर को निकला था। उससे पहले भी वो कभी-कभार मेरे साथ हो लेती थी, मगर उस बेफिक्र जीवन में मुझ जैसे स्वार्थी इंसान को उसकी ख़ास जरुरत महसूस नहीं ह...

हद-ए-झूठ !

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रंगों की महफिल में सिर्फ़ हरा रंग तीखा, बाकी सब फीके। सच तो खैर, इस युग में कम ही लोग बोलते है , मगर, झूठ बोलना तो कोई इन पाकिस्तानियों से सीखे।। झूठ भी ऐंसा कि एक पल को, सच लगने लगे, 'मगजधोवन' धंधे में इन्होने न जाने कितने युवा ठगे, खुद के जुर्मों पर पर्दा डालने को खोजते नित नए तरीके। सच तो खैर, इस युग में चंद ही जन बोलते है, मगर, झूठ बोलना तो कोई इन पाकिस्तानियों से सीखे ।। दुष्कर्मों  का अपने ये रखते नही कोई हिसाब, भटक गए हैं राह से अपनी, पता नही कितने कसाब, चाह है पाने की वह जन्नत मर के, जिसे पा न सके जीके। सच तो खैर, इस युग में कम ही लोग बोलते है , मगर, झूठ बोलना तो कोई इन पाकिस्तानियों से सीखे ।। इस युग में सत्य का दामन, यूँ तो छोड़ दिया सभी ने, असत्य के बल पर उछल रहे आज लुच्चे और कमीने, देखे है हमने बड़े-बड़े झूठे, मगर देखे न इन सरीखे। सच तो खैर, इस युग में चंद ही जन बोलते है , मगर, झूठ बोलना तो कोई इन पाकिस्तानियों से सीखे।। दहशतगर्दी के खेल में उतर तो गए कई मिंया जरदारी...

तुझसे क्या कहू?

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खौफ भी संग अपने 'नाक' जोड़ता है, और  दर्द की भी अपनी इक 'नाक' होती है,  साथ ही  इक 'नाक'  शर्म से भी जुडी  रहती है।  अर्थात, हर किसी की किंचित  'हद' तय है।   मगर  अरे  वो  बेख़ौफ़,बेदर्दी और वेशर्म ! अब  उससे क्या कहें  जिसकी 'नाक' ही नहीं।  

सेठ की मंदबुद्दी संतान !

उत्तरांचल के गढ़वाल क्षेत्र में ( विशेषकर टेहरी गढ़वाल में ) स्थानीय पहाडी भाषा मे एक मुहावरा बहुत प्रचलित है “सेट्ठुगा लाटा-काला” जिसका अर्थ है सेठ लोगो के मंद बुद्धि बच्चे ! इस मुहावरे के पीछे की कहानी कुछ इस तरह है : हुआ यूँ कि एक गाँव में एक सेठ ( धनी साहूकार ) परिवार रहता था, सेठ उसकी पत्नी यानि सेठानी और उनके चार बच्चे ! फसल कट चुकी थी, और फसलों की कुठायी और सफाई का काम चल रहा था, सेठ के खलिहान में एक बहुत बड़ा ढेर भट्ट ( स्थानीय एक किस्म की दाल ) का लगा हुआ था। रात को सेठ-सेठानी आपस में बात कर रहे थे, सेठानी ने सेठ से कहा ” आजू सी भट्ट भी छन रयाँ फूकण थै ( अर्थात साधारण हिन्दी भाषा में जिसका मतलब है कि अभी फूकने के लिये यह भट्ट भी रहे हुए है, जबकि वास्तविक कहने का सेठानी का मतलब था कि बाकी फसल का अनाज तो हमने सम्भाल दिया है मगर कूठाई-सफ़ाई के लिये अभी भट्ट बाकी रहे हुए है ) सेठ जी के बच्चे उनका वार्तालाप सुन रहे थे। अगले दिन सेठ और सेठानी एक शादी में सरीक होने के लिये पड़ोस के गाँव गए और जब शाम को लौटे तो खलिहान में राख का एक बड़ा ढेर देख दंग रह गए , बच्चो से पूछा कि ये सब कैं...

लघु कथा- धना

देश के बहुत से ऐसे रणबांकुरे जो १९६५ और ७१ के भारत-पाक युद्ध में कहीं गुम हो गए थे, अफ़सोस कि उनमे से अधिकाँश को देश आज तक नही ढूंड पाया। इनमे से  ऐंसा ही एक बदनसीब था, धनसिंह। उत्तराखंड के सुदूर अल्मोड़ा के इर्द-गिर्द बसे पहाडी गांवो का एक निवासी, तीन बहनो का इकलोता भाई। गरीब परिवार की मजबूरियां और देश-प्रेम की भावना उसे १२वीं पास करने के बाद रानीखेत कैंट खींच लायी और वह सेना में भर्ती हो गया। अभी रंगरूटी पास ही की थी कि देश के पूर्वी और पश्चमी मोर्चे पर युद्ध के बादल मंडराने लगे थे। बाग्लादेश की आग पश्चमी मोर्चे तक भी पहुच चुकी थी। अत: एक दिन उसे भी जम्मू से लगी सीमा के एक मोर्चे पर तैनात होने के आदेश दे दिए गए।  जब उसे सेना की एक टुकडी के साथ दुश्मन की अग्रिम पोजिशन को पता लगाने भेजा गया तो दोनों पक्ष आपस में भीड़ गए , घमासान युद्ध हुआ, उसके सभी साथी मारे गए, जिनकी लाशें बाद मे सेना को मिल गई, मगर धनसिंह की न तो लाश मिली और न ही फिर वह लौटकर घर आया। युद्ध ...