सांझ ढले
प्रस्तावना स्वरुप अपनी एक पुरानी पोस्ट की चंद लाईने यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ; दिन तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए, मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण, ज्यों कहीं फिसल गए। उदास पलों में धड़कन भी, दिल से बेजार लगी, खुश लम्हों में जिन्दगी, चंचल निर्झरिणी धार लगी। संग आनंद, उमंग, उल्लास कुछ आकुल,विकल गए। दिन तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए।। मगर, यह भी सच्चाई है कि वक्त किसी का साथ नहीं देता, उसे निकलना ही है ! और यही गुजरते साल की भी एक कटु सच्चाई है ! समय के इन ३६५ लम्हों में दो ही बातें होती है, या तो अच्छी या फिर बुरी ! किसी के लिए यह साल एक खुशनुमा सौगात लेकर आया होगा तो किसी के लिए कभी न भुला सकने वाली असफलता और विषाद ! लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी होता है जो इनके बीच का रास्ता चुनता है, और इसे नाम देता है 'मिश्रित' का! वैसे इस गुजरते साल के बारे में ज्यादातर की राय यही है कि साल अच्छा नहीं रहा ! मगर हमें इस सच्चाई को भी स्वीकारना होगा कि सुख और दुःख एक सिक्के के ही दो पहलू हैं, और हर पहलू को हमें समान ...