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Showing posts from 2011

सांझ ढले

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प्रस्तावना स्वरुप अपनी एक पुरानी पोस्ट की चंद लाईने यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ; दिन तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए, मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण, ज्यों कहीं फिसल गए। उदास पलों में धड़कन भी, दिल से बेजार लगी, खुश लम्हों में जिन्दगी, चंचल निर्झरिणी धार लगी। संग आनंद, उमंग, उल्लास कुछ आकुल,विकल गए। दिन तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए।। मगर, यह भी सच्चाई है कि वक्त किसी का साथ नहीं देता, उसे निकलना ही है ! और यही गुजरते साल की भी एक कटु सच्चाई है ! समय के इन ३६५ लम्हों में दो ही बातें होती है, या तो अच्छी या फिर बुरी ! किसी के लिए यह साल एक खुशनुमा सौगात लेकर आया होगा तो किसी के लिए कभी न भुला सकने वाली असफलता और विषाद ! लेकिन समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी होता है जो इनके बीच का रास्ता चुनता है, और इसे नाम देता है 'मिश्रित' का! वैसे इस गुजरते साल के बारे में ज्यादातर की  राय यही है कि साल अच्छा नहीं रहा ! मगर हमें इस सच्चाई को भी स्वीकारना होगा कि सुख और दुःख एक सिक्के के ही दो पहलू हैं, और हर पहलू को हमें समान ...

दो टूक !

दुःख के साथ लिखना पड  रहा है कि आशंका, उम्मीद और अंदेशा शब्द तो मैं भारतीय राजनीति के लिए इस्तेमाल करता ही नहीं, इसलिए यह कहूंगा कि जो पूर्व नियोजित था, वही हुआ ! लोक सभा के बिल से बिना जहर वाला जो लोकपाल रूपी नाग जबरन बाहर निकाला गया था, वह राज्यसभा के बिल में जाकर फंस गया! देश में शिक्षा के आंकड़े बहुत उत्साह-वर्धक न होते हुए भी समय के साथ यह एक सुखद बात है कि भारतीय जनता भी अब काफी हद तक शिक्षित हो गयी है, और इलेक्ट्रोनिक क्रान्ति के इस युग में लोकतंत्र की जो नौटंकी इस देश की जनता ने २७ और २९ दिसंबर को अपने टेलीविजन सेटों पर देखी, उससे उसे इतना तो अहसास हो ही गया है कि उनका प्रतिनिधित्व और देश की बागडोर किन हाथों में है, ये हाथ कितने मजबूत, साफ़-सुथरे और सुरक्षित है! हाँ, लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही देखने और अपने माननीय प्रतिनिधियों को सुनने के बाद एक और बात जो इस जनता ने महसूस की वह यह कि पढ़े-लिखे और अनपढ़-गंवार को सुनने का क्या फर्क अथवा आनंद होता है! साथ ही यह भी महसूस हुआ कि इस देश की जनता के कुछ तथाकथित प्रतिनिधि, अपनी जनता को ब्रिटिश काल के नजरिये से ख़ास अलग नहीं द...

अभिलाषा मेरी !

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अगर ऐसा होवे नए साल में, मिले न काला कहीं दाल में,  जंगलराज भी  ख़त्म हो जाए, कोई गधा  न घूमें शेरखाल में। अंधा चुने न ठग काने वाले ,  शठ बहेलिया न दाना डाले, पंछी फंसें न किसी जाल में, काश ! ऐसा होवे नए साल में। दीप प्रज्वलित हो बुद्धि-ज्ञान का, प्राबल्य विनाश हो अभिमान का, बैठा न अब उलूक डाल-ड़ाल में,  अगर ऐसा होवे नए साल में । हर जन की ये ही तमन्ना होए, भूखे पेट कोई जन ना सोए, जिये न कभी कोई बदहाल में , काश ! ऐसा होवे नए साल में। लूट-खसौट न कहीं रहे साधना, भारतीयता की बची रहे भावना, देश सलामत रहेगा हर हाल में,  अगर ऐसा होवे नए साल में।  

दीवानगी !

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मनसूबे  अगर  हमारे तनिक  भी  नापाक होते,  प्यार की तपिश में न यूं जलकर खाक होते। गोकि उल्फत न दस्तक देती दिल के द्वार पर, दर्द के न हररोज अजीब ऐसे इत्तेफाक होते।   छवि  गूगल  से  साभार ! 

इस 'अपरस' रोग का क्या कोई इलाज है?

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यूं तो 'अपरस' शब्द अपने आप में बहुत व्यापक अर्थ समेटे हुए है, लेकिन इस आलेख की पृष्ठ-भूमि में इस शब्द के आम इस्तेमाल होने वाले और गौर करने लायक जो प्रमुख अर्थ मौजूद है, वे है ; अपने को सर्वोपरि समझने वाला, घमंडी, स्वार्थी, अपने बड़ों का आदर न करने वाला, अकारण भय पैदा करने वाला और नसीहत देने वाला इंसान। आज के परिपेक्ष में जबकि न सिर्फ हमारा देश अपितु पूरी दुनिया विभिन्न स्तरों पर एक वर्ग विशेष द्वारा स्थापित भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर सामाजिक उथल-पुथल, असहजता और वैचारिक समुद्रमंथन के दौर से गुजर रही है, तब ये शब्द हमारे समाज के किस ख़ास वर्ग अथवा चरित्र पर सटीक बैठते है, मैं समझता हूँ कि उसे यहाँ खुलकर बताने की आवश्यकता नहीं है। भिन्न अर्थों में, या यूँ कहें कि जीव विज्ञानं की भाषा में इस शब्द का अर्थ इस तरह से समझा जा सकता है कि इसका इस्तेमाल त्वचा से सम्बंधित एक ख़ास किस्म के चर्म रोग, जिसे अंगरेजी में सोरियासिस (PSORIASIS) के नाम से जाना जाता है, के लिए होता है। यह एक प्रकार का असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार (चर्मरोग) है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। इस रोग से ग्रस्...

घर का शौहर !

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फिर से देहरी पे  क्रिसमस और नवबर्ष  दस्तक  देने को है  और   मैं जानता हूँ कि मेरी आरजुओं की थमी झील में तुम फिर एक बार ख्वाइशों की तैरती कश्ती से अपनी फरमाइशों का लंबा जाल फेंकोगी।   तुम्हारी फरमाइशें भी क्या कहने,  मासा अल्लाह ! अभी, गुजरे साल की ही तो बात है, क्रिसमस पर तुम्हे ताजमहल दिखाने ले गया था, और तुम अड़ गई थी, खुद की  अकेली  एक   फोटो खिंचवाने की जिद पर, और मैंने भी बड़ी कुशलता से तारे जमीं पर उतारे बिना ही तुम्हारी वह ख्वाइश भी पूरी की थी। मगर तुम हो कि मेरी अक्लमंदी की दाद देने के बजाये, पड़ोसनो के शौहरों  का ही गुणगान करते नहीं थकती, खैर, तुम खुश रहो, इसी में समूचे जगत का सुख निहितार्थ है, मेरा क्या, पैदाइशी चार आँखे लेकर आया था, दो तुम्हें तकते फूटी, दो इंटरनेट  पर   !! छवि नेट से साभार !

सामूहिक रिश्वत की राजनीति !

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यूं तो भारतीय राजनीति में सत्ता की गद्दी का मोह १९३० के दशक से ही तभी प्रबल रूप धारण करने लगा था, जब १९३७ में राष्ट्रपति ( कौंग्रेस अध्यक्ष को तब राष्ट्रपति कहते थे) पद के चुनाव के लिए राजगोपालाचारी द्वारा चुनाव लड़ने से इनकार करने के बाद सरदार पटेल ने अपनी दावेदारी पेश की थी, मगर जवाहरलाल नेहरू ने गांधी जी से यह कहकर उनकी उम्मीदवारी वापस करवाई कि इस पद के लिए मेरा (नेहरु का ) १ वर्ष का कार्यकाल काफी नहीं है, अत: मैं दोबारा राष्ट्रपति बनना चाहता हूँ ! इसी तरह गद्दी के लालच में स्वतंत्रता के बाद चुनाव में वोटरों को खरीदने का जो दौर ६० के दशक से शुरू हुआ था, वह चंद मुट्ठी अनाज से शुरू होकर आज नकदी, कलर टीवी और लैपटॉप तक जा पहुंचा है ! पहले न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि कस्बों, शहरों में भी दलितों को दबंग लोग वोट नहीं डालने देते थे, उसके बाद जब थोड़ा बहुत ग्राम पंचायतें सुदृढ़ हुई और नामदेव दशल, राजा धाले,अरुण कमले और कांशीराम जैसे दलित नेताओं के नेतृत्व में अनेकों दलित नेता उभरकर आये तो उनके ही घरों में पसेरी चावल पहुंचाकर इन दबंगों ने उनके पूरे कुनवे ...

एक स्वतंत्र बलूचिस्तान में पूरी मानवता का हित छिपा है!

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आज १६ दिसम्बर है, यानि विजय दिवस! आज ही के दिन हमारी सेनाओ ने बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ एक निर्णायक विजय हासिल की थी, और बांग्लादेश (तब का पूर्वी पाकिस्तान) उससे अलग होकर एक स्वतंत्र सार्वभौम राष्ट्र के रूप अग्रसर हुआ था! इसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश ने क्या खोया, क्या पाया, उस विषय में न जाते हुए बस इतना कहुगा कि भारत को इससे जरूर तीन उपलब्धिया हासिल हुई थी; एक सामरिक उपलब्धि थी, दूसरी कूटनीतिक और तीसरी जो सबसे बड़ी उपलब्धि थी, वह थी आत्मसंतोष ! १९४७ में जो पंजाब का सेंधा नमक पाकिस्तान ने भारत के सीने पर छिडककर आग सुलगाई थी, उसे हमारे वीर जवानों ने १९७१ में बंगाल की खाड़ी का समुद्री नमक उसके सीने पर छिड़ककर बुझाया ! जहां तक भारत और पाकिस्तान के रिश्तों का सवाल है, आज जब ४० साल बाद हम पीछे मुड़कर देखते है तो १९७१ और २०११ में ख़ास फर्क नजर नहीं आता है, और यूं कहें कि पाकिस्तान की स्थित आज १९७१ से भी बदत्तर है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी! खैर, पाकिस्तान को तो अपनी करनी का फल  एक न एक दिन भुगतना ही था मगर अफ़सोस इस बात का है कि हम हिन्दुस्तानियों ने भी अतीत से ख...

काला कौन ?

कुछ भी ठीक नहीं, सब गड़बड़ है इस देश में ! सुबह एक आशावादी दृष्टिकोण बनाने की कोशिश करो भी तो शाम होते-होते वह एक घोर निराशावाद में तब्दील होता नजर आता है! क्या करे, जब नीव ही गलत पडी हो तो मकान कहाँ से सही बनेगा ! अब देखिये न काला अपना खुद का दिल है, चरित्र है, कारनामे हैं, और ये हैं कि काला लक्ष्मी को बता रहे है! ये तो वही बात हुई मवेशियों के रहने की जगहों पर इंसान ने अपने फायदे के लिए खुद ऊँची-ऊँची इमारतें खडी कर दी, शहर बसा दिए और अब फुटपाथ पर सो रहे उन बेचारे पशुओं को ही ये आवारा पशु की संज्ञा देता है! धन चाहे वो जेब में रखो या घर मे, देश में रखो या स्विट्जरलैंड में, धन तो धन ही है, वह काला-गोरा कहाँ से हुआ ? इस तरह के भ्रष्ट हरामखोरों के पास वाक्-चातुर्य और शठता तो होती है, मगर खोपड़ी नहीं होती. जिसे आम शब्दों में कपाल भी कहते है! वरना ये चोरी लूट के माल को लेजाकर स्विट्जरलैंड के गोरों के पास क्यों परोसते ? और सच मानिए तो तभी तो अपने अन्ना जी कह रहे है कि लो-कपाल ! मगर इन्हें इस्तेमाल करना आये तो तब ये उसे सहर्ष स्वीकार करे ! बस बेतुके तर्क दिए जा रहे है, ऊपर से जब इनके साथ ऐसे द...

नकारात्मकता का महत्व !

जी, सही पढ़ा आपने ! सकारात्मकता की बातें तो बहुत होती है, हर पल हर घड़ी, हर नुक्कड़, गली-चौराहे पर ! जिसे देखिये वो सकारात्मकता के ही उपदेश देता फिरता है ! और कहने को तो हमारा मीडिया भी इन्ही उपदेशकों में से एक है, किन्तु व्यावहारिकता में कथनी और करनी में फर्क ज्यादा मुश्किल काम नहीं होता, ये भी वे लोग बखूबी जानते है! सकारात्मकता से वो तात्कालिक फायदे नहीं मिलते जो नकारात्मकता से प्राप्त होते है, और भला दीर्घकालिक फायदे की किसे पडी है यहाँ, जब प्रलय का ख़तरा ठीक सिर के ऊपर हो! अब देखिये न, बीना मलिक अगर बुर्के में पोज देना चाहती तो क्या कोई मैगजीन वाला तैयार होता? या फिर उसने हाइनेक वाली स्वेटर और ढीले-ढाले सलवार को पहनकर पोज दी होती तो क्या कोई उस मैगजीन को खरीदता या फिर उसकी इतनी पब्लिसिटी होती', आप उससे सम्बंधित कोई खबर उतने चाव से पढ़ते, जिस चाव से अब पढ़ा आपने ? कवर पेज पर नग्न मॉडल के चित्र के एक तरफ आई एस आई का टेटो चिपका दिया और दूसरी तरफ लिख दिया; पाकिस्तानी वीपन ऑफ मॉस डिसट्रकशन (WMD ) , और मेरे जैसे अनेकों बेवकूफ ढूढ़ते रह गए कवर पेज को इधर से उधर पलटकर, न कहीं आईएसआई ही नज...

गुलाम मानसिकता के मध्य स्वतंत्र अभिव्यक्ति की कल्पना !

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यह तो सभी जानते है कि घोर तकनीकी क्रांति के इस युग में आज अंतर्जाल विचारों के संप्रेषण का एक महत्वपूर्ण और स्वतंत्र द्रुतगामी माध्यम बन गया है! इंटरनेट की प्रसिद्धि से पहले यूँ तो प्रेस और मीडिया की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में इस देश में बड़ी-बड़ी बातें सुनने को मिल जाती थी, मगर पिछले कुछ सालों में मैंने खुद यह अनुभव किया कि अंतरजाल ही एक ऐंसा माध्यम है जो विचारों को खुलकर प्रेषित करने में एक महत्वपूर्ण रोल अदा करता है, क्योंकि भूमण्डलीय दौर में पत्रकारिता मुनाफा कमाने का व्यवसाय और व्यापारिक प्रक्रिया ज्यादा बन गया है ! लेकिन यह बात शायद कम ही लोगो को पता होगी कि अभिव्यक्ति की सवतंत्रता के सार्थक मायने वहां है, जहां अभिव्यंजना करने वाला व्यक्ति स्वतंत्र हो! अपने अधिकारों को न सिर्फ जानता हो बल्कि उनके खुलकर इस्तेमाल की भी बिना द्वेष-भाव उसे पूरी आजादी हो! गुलाम व्यक्ति से स्वतंत्र अभिव्यक्ति की कल्पना करना तो अँधेरे में तीर छोड़ने जैसा है! जहाँ इंसान की खुद की भावनाएं ही तरह-तरह के हथकंडों से दमित करके रख दी गई हों, वहाँ ऐसा कुंठित इन्सान भला स्वतंत्र अभिव्यक्ति क्या ख़ाक कर...

बेखबर ये नहीं, बेखबर तुम हो !

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क्यों स्व:कृत्यों पर  तुम गुमसुम हो, चेहरा तो  तुम्हारा  कुदरती रोदन है, उस पर  नूर न सही, मगर  तबस्सुम हो।  प्रजाशाही की गर्दिश में, अब और न तसव्वुर ढूढो, फिर कोई ये न कहे कि  तुम्हारे हाथों में चूड़ी, माथे पर कुमकुम हो।   बदला न करों यूँ अचानक, कथा कथ्य और कथानक ! तर्कशास्त्र व अर्थशास्त्र परिलक्षित हो कृत्य में, न ही ये चमन अभद्र की जन्नत बने, और न ही  भद्र के लिए जहन्नुम हो।   कितने और युवाओं को बेकार संहारोगे, और कितने हर्मिन्दरों को, बेअक्ल करारोगे, स्मरण रहे, कोप की ज्वाला दहक रही है, किसी और का न फिर कभी, भरी महफ़िल में सबर गुम हो।   भ्रष्टाचार का ऐंसा मंच सजाया  क्यों, जनयुद्ध का ये बिगुल किसने बजा क्यों ? अब नसीहतों से कुछ भी हासिल न होगा , ये पब्लिक है, ये सब जानती है, बेखबर ये नहीं, बेखबर तुम हो।  

यदि होता किन्नर नरेश मैं !

नहीं मालूम कि महाकवि स्वर्गीय द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी, जिनकी आगामी १ दिसंबर को पुण्य-तिथि है, ने किन परिस्थितियों के मध्य नजर अपनी बाल-मन को ओत-प्रोत करने वाली यह जानदार कविता लिखी थी; यदि होता किन्नर नरेश, मै शाही वस्त्र पहनकर, हीरे पन्ने मोती माणिक, मणियों से सजधज कर.......! मेरे वन में सिंह घूमते, मोर नाचते आँगन में ............! .............राजमार्ग पर , धीरे-धीरे आती देख सवारी, रुक जाते पथ दर्शन करने, उमड़ती प्रजा सारी,.............!! क्या कल्पना की थी माहेश्वरी जी ने, बस मुह से एक ही शब्द निकलता है .. वाह ! लेकिन मैं ठहरा, खडी-बोली,लठमार भाषा और मोटी-बुद्धि से सोचने वाला इंसान, तो भला इधर-उधर की कैसे सोच पाऊँगा ? वैसे भी जब ठीक सामने सोचने और देखने के लिए इतना कुछ हो तो इधर-उधर जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता ! अभी कुछ दिन पहले जब किन्नरों के देश में कुछ किन्नर लाक्ष्या-गृह की भेंट चढ़ गए थे तो तभी से अनेकों तरह के प्रश्न इस कबाड़ी दिमाग में घूम रहे थे ! क्या आग लगना महज एक संयोग था ? कहीं आग लगने के पीछे कोई खुरापाती शकुनी और दुर्योधनी दिमाग तो नहीं काम क...

कार्टून कुछ बोलता है - दूध का जला...

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जय हिंद - भगत सिंह !

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 कौन कहता है कि हमारे देश में बहादुर नहीं रहे ? 

इन्होने निर्माण का सपना बुना और खूब लगाया चूना !

अभी दो दिन पहले सुबह दफ्तर जाते हुए जाम में डूबी सड़क पर झख मार रहा था कि तभी कुछ दूर तक तेलगाडी को हांकने के बाद देखा कि बड़ी तादात में यूपीए की कामयावियों ( कारगुजारियों कहना ज्यादा उचित होगा ) और श्रीमती सोनिया गांधी और श्री मनमोहन सिंह के मनमोहक चित्रों से सजे ट्रक सड़क की अन्दुरूनी लेन में खड़े थे ! उन पर एक आकर्षक शैली में नारा लिखा था 'भारत निर्माण का सपना बुना, प्रगति हुई कई गुना" ! मैंने एक नजर उधर डाली, मुस्कुराया और चल दिया ! ये बात और थी कि दिल की गहराइयों में कहीं कुछ अस्पष्ट भद्दे से तारीफ़ के शब्द भी अंकुरित हो रहे  थे कि ये भ्रष्ट शायद अपनी प्रगति की बात कर रहे है ! सड़क पर चलते हुए बस यही सोचने लग गया कि नेता और लालफीताशाह आम इंसानों को कितना बेवकूफ समझता है, जो हरवक्त उन्हें भ्रमित करने के हथकंडे खोजता रहता है! साथ ही मैं यह सोचकर खुद की पीट थपथपाने में भी तनिक देरी नहीं करता कि आज के इस युग में जबकि इस भ्रष्ट प्रजाति के प्राणि पर कुछ लिखना दिन-प्रतिदिन इतना कष्ठ्दायक होता जा रहा है, मैं तब भी अपनी स्याह त...

कार्टून कुछ बोलता है- बकरीद मुबारक हो !

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पैसे पेड़ पर नहीं उगते !

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खबर : "पेट्रोल की कीमतों में इजाफे से परेशान आम आदमी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राहत देने की बजाय और अधिक जख्म दे दिया है। फ्रांस में मीडिया से बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पेट्रोल की कीमतों में कमी नहीं होगी। हमें समझना होगा कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता। हम अपने संसाधनों से परे नहीं जा सकते। हमें कीमतों पर नियंत्रण हटाने की तरफ आगे बढऩा है। मुझे कहते हुए कोई झिझक नहीं है कि इस मामले (कीमतों के संदर्भ में) पर बाजार खुद फैसला करेगा।" प्रतिक्रियास्वरूप मैं बस इतना ही कहूंगा कि यह एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य है, इन माननीय का ! काश कि ये अर्थशास्त्री महोदय अपने इस उपदेश का ख़याल उस वक्त भी रखते, जब इनके अधीनस्थों द्वारा चारों दिशाओं में दोनों हाथों से इस देश का खजाना लूटा जा रहा था !  आज तक इन्होने जो झूठे आश्वाशनो से देशवासियों को बरगलाया कि फलां-फलां वक्त के अन्दर महंगाई ख़त्म हो जायेगी, उसका क्या ? खैर, कुछ लोग होते है जो न तो हद-ए-मुश्किल से गुजर पाते है, और न ही कश्ती से उतर...

निर्विग्न !

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में लोगो के बीच अनुशासन की भावना पैदा की जानी चाहिए, और खासकर हम हिन्दुस्तानियों को तो आज इसकी शख्त जरुरत है! मगर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हमने जो आजादी की लम्बी लड़ाई लड़ी उसकी एक मुख्य वजह थी, भेदभाव ! मगर क्या आजादी के बाद हमने इसे मिटाने की ईमानदारी से कोशिश की ? ऐसा नहीं कि आजादी से पहले अंग्रेज यहाँ की सड़कों पर पेशाब न करते हों, मगर जिन सड़कों पर पर वे कुत्तों और हिन्दुस्तानियों को ऐसा करने से वर्जित कर देते थे, वे खुद भी नहीं करते थे! लेकिन आजादी के उपरान्त क्या यह डिस्क्रिमिनेशन हमने ख़त्म किया? नहीं बल्कि चंद रसूकदार और स्वार्थी लोगो ने उसका भरपूर दुरुपयोग ही किया! अब यहाँ देखिये कि इन रसूकदारों को न सिर्फ बचाया जाता है बल्कि कैसे फायदा पहुंचाया जाता है! इसे भेदभाव न कहें तो और क्या है? एक वाकया उदाहरण के तौर पर पेश है; एक साथी की दिल्ली से चेन्नई होते हुए कोयम्बटूर की फ्लाईट थी, कुछ समय से एक नया नियम एयर पोर्टों पर यात्रियों के लिए लागू किया गया है कि फ्लाईट के प्रस्थान के समय से ४५ मिनट पहले यदि कोई यात्री काउंटर पर नहीं पहुंचता है तो काउंटर ...

बस एक टिकाऊपन का ही भय है वरना तो..... !

यह एक आम धारणा रही है कि अपने आस-पास के माहौल और घटित होती घटनाओं से इंसान रूपी प्राणि न सिर्फ सबक लेता है अपितु अपनी जीवनचर्या में यथार्थ के धरातल पर उतारने की कोशिश भी करता है! लेकिन जहां तक मैं समझ पाया हूँ, मुझे नहीं लगता कि हम हिन्दुस्तानियों में ऐसा कोई गुण भी विद्यमान है! पिछले एक दशक से लगातार यह नोट करता आ रहा हूँ कि हर क्षेत्र, खासकर उत्पादों के मामले में हमारा देश निरंतर चीन-आश्रित होता जा रहा है! और हो भी क्यों न जब उसे इतने कम दामों में फिलहाल अपना काम चलता नजर आ रहा हो? अक्सर हमारे सूचना माध्यम इस बात की शिकायत करते आपने सुने होंगे कि चीन हमारी सरहदों का उल्लंघन कर रहा है, जोकि निश्चित तौर पर एक चिंता का विषय है! किन्तु उससे भी गंभीर चिंता का विषय यह है कि जहां एक ओर चीन आज न सिर्फ हमारे देश की सरहदें बल्कि हमारी व्यक्तिगत सरहदों को तोड़ने में सक्षम हो रहा है, वहीं हम जाने-अनजाने अपनी उत्पाद जरूरतों के मामले में निरंतर चीन निर्मित माल पर आश्रित होकर अपनी हदों का उल्लघन करने के दोषी खुद भी है! कल समूचे देश ने पूरे जस्नोजोश में दीपावली का त्यौहार मनाया ! घरों एवं बाजार...

दिग-भ्रमित शुभ-दीपावली !

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२० दिन पूर्व इस माह की ६ तारीख को टीवी पर ख़बरों में सुन रहा था कि रावण मर गया है ! वैसे तो मरते-मरते भी कम्वख्त दिल्ली के रामलीला मैदान में एक ११ साल की बच्ची को भी लील गया था, मगर एक तरफ जहां इस बात का दुःख था कि एक निरपराध मासूम को इस कम्वख्त प्राणि की वजह से अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, वहीं इस बात की संतुष्ठी भी थी कि चलो एक राक्षश का बोझ तो कम हुआ इस धरती पर से ! लेकिन ये क्या, बाद में पता चला कि वह तो महज एक नाटक था रावण के खात्मे का, असली रावण तो अभी भी जीवित है, अपने पूरे राक्षशी दल-बल के साथ ! यह मूर्ख और भोली-भाली प्रजा झूठमूठ में अपने को खुश करने के लिए सदियों से इसी तरह के नाटक रच अपने को मुगालते में रखती चली आ रही है, जबकि रावण महाशय और उनके नाते-रिश्तेदार , चमचे इत्यादि फुल ऐश कर रहे है! अभी कुछ दिनों पहले उसके भाई कुम्भकरण की ससुराल के दूर के रिश्ते का एक भाईबंद लम्बे रक्तपात के बाद लीबिया में एक सीवर लाइन के अन्दर से पकड़ा गया तो नाली के उस कीड़े राक्षश को सीवर पाइप से बाहर खीचने के बाद गुस्से में उसे पकड़ने वालों ने उसका वहीं पर मार-मार कर कचूमर निकाल ...