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Friday, August 24, 2018

बढ़ता (एंटी) सोशल नेटवर्किंग: खतरे में यकीन का अस्तित्व !

निहित स्वार्थों की वजह से  डिजिटल प्रौद्योगिकी  के  इस जटिल युग में  पढ़ा-लिखा इंसान, प्रौद्योगिकी का  इसकदर दुरुपयोग करने लगेगा  कि  मानव समाज में  'यकीन' शब्द की अहमियत को  ही खतरे में डाल दिया जाएगा, यह कम से कम मैंने तो शायद ही कभी सोचा हो।  सोशल मीडिया अथवा सोशल नेटवर्किंग साइट्स की सुगमता और  उपलब्धता ने  हमारे समाज में मौजूद तुच्छ प्रवृति के असंख्य लोगों के लिए समाज में अराजकता फैलाने के नए- नए घातक हथियार सरलता से उपलब्ध करा दिए है।  जोकि एक सभ्य समाज के लिए बहुत ही चिंता  का विषय होना चाहिए।       

अभी पिछले एक हफ्ते में घटित, ऐंसी  ही चार घटनाओं का सचित्र वर्णन यहाँ करना चाहूंगा।


१: केरल में हाल की  भीषण बाढ़ और तवाही से निपटने के लिए हमारे सेना, अर्द्ध सैनिक और पुलिस बलों के  वीर जवान जान पर खेलकर दिन रात जूझ रहे हैं। जहाँ एक ओर  वहां मौजूद बीएसएफ के जवान आदेश का इंतजार किये वगैर ही बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए दौड़ पड़े वहीँ दूसरी तरह ,  'तेरहवीं गढ़वाल राइफल्स' के जवानो ने जब एक कालोनी में लोगो को बाढ़ में बहते देखा तो अपने लंगर में मौजूद खाना बनाने के बड़े-बड़े पतीलों  को ही नाव बनाकर मदद के लिए न सिर्फ बाढ़ में कूद पड़े अपितु उस कालोनी के २३ लोगो की जान भी बचाई।  उनके ये हौंसले और सूझबूझ अनुकरणीय है हमारे लिए। किन्तु हमारे बीच मौजूद कुछ घटिया  प्रवृति के लोगो ने  हमारे सैनिको के बलिदान और त्याग को दरकिनार कर  अपने स्वार्थ के लिए उन्हें भी नहीं छोड़ा।  मजबूरन सेना के अफसरों को  इन तुच्छ लोगो की हरकतों का पर्दाफास करने के लिए खुद ही आगे आना पड़ा और कहना पड़ा कि कुछ ढोंगियों  ने सेना की वर्दी पहनकर वह वीडियों बनाया। लानत है ऐसे घटिया जंतुओं पर !


२: ये महाशय हमारे देश के एक जिम्मेदार आईपीएस ऑफिसर  रह चुके है किन्तु इनके स्वार्थ और राजनैतिक  द्वेष ने इन्हे भी शायद अँधा बना दिया है।  आप इनके  ट्वीट, जिसका चित्र नीचे संलग्न है , से सहज अंदाजा लगा सकते है।   


3: अब तीसरा प्रकरण देखिए,  स्वतन्त्रता  दिवस के दिन इस लड़के ने अपनी दुकान पर बैठकर  एक वीडियो बनाया। वीडिओ में यह लड़का हमारे राष्ट्रिय ध्वज को फाड् रहा है और कह रहा है कि मैं पक्का मुसलमान हूँ।  अगले दिन कुछ लोग इसके वायरल वीडियो को देख इसकी दूकान पर पहुंच गए  और जब इसकी धुनाई की तो दावा  किया  जा रहा है इसने बताया कि  वह हिन्दू है और  मुसलमानो को बदनाम करने के लिए इसने यह विडिओ बनाया  और सोशाल  साईट पर अपलोड किया।  अब ज़रा सोचिये , अगर यह दावा  सही है  और इसकी हरकतों की वजह से साम्प्रदायिक दंगे भड़क जाते तो नुकशान किसका होता ?


4: चोथा और अंतिम;  देश का उत्तराखंड राज्य जो कि  अमूमन एक शांतिप्रिय राज्य है, उस वक्त दहल गया जब उत्तरकाशी में एक १२  साल की मासूम के साथ एक दरिंदे ने  न सिर्फ  अपनी दरिंदगी का प्रदर्शन किया अपितु उसे मारकर उसकी लाश को पुल के नीचे डाल दिया। कुछ लोगो ने यहाँ इस घटना को भी  साम्प्रदाकि रंग यह कहकर देने की कोशिश की  कि  आरोपी दूसरे समुदाय के बिहार के मजदूर  हैं।   बाद में पुलिस ने बगल  में ही रहने वाले मनोज लाल नाम के आरोपी को गिरफ्तार किया, और कहा जा रहा है कि  उसने अपना गुनाह कबूल भी कर लिया है।     




सोचिये , तब क्या स्थिति होती जो अगर लोग उन चार बिहारी मजदूरों के साथ आवेश में  कुछ गलत कर जाते ? अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की दूसरे  समुदाय के लोगो पर ऊँगली उठाने से पहले हमें अपने गिरेवान में झाँकने की जरुरत है।   जब अपने ही समाज में मौजूद कुछ इस तरह के लोगो से  बहस करो और उन्हें गलत सूचना या तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश न करने की बात करो , तो उनका तर्क बस यही होता है कि  विरोधी भी तो यही तरीके अपनाते है।  अरे भाई , अपने को हिन्दू कहते हो , और हमारे हिन्दू ग्रंथों में कहीं यह नहीं बताया गया है कि अगर विरोधी मैला  खाता हो तो तुम भी खाने लगो।  

हकीकत यही है कि हमारी इन हरकतों की वजह से यकीन अथवा भरोसे  का अस्तित्व खतरे में पड  गया है। किस पर भरोसा किया जाए , दिनप्रतिदिन यह विषय एक जटिल रूप धारण किये जा रहा है , जिसे समय रहते  संजोने की सख्त जरुरत है।   













  

Saturday, December 9, 2017

दिल्ली/एनसीआर, क्या चिकित्सा मर्ज का मूल मेदांता सरीखे अस्पताल नहीं ?

 चूँकि दिल्ली के मैक्स और हरियाणा  के  फोर्टिस अस्पताल का मुद्दा गरम है, इसलिए इस प्रसंग को उठाना जायज समझता हूँ। पिछले कुछ दशकों से अधिक मुनाफे की लालसा में देश के हर कोने में  निजी चिकित्सकों और चिकित्सालयों का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार जग-जाहिर हो चुका है। हालांकि यह बात १००% सत्य भी नहीं है क्योंकि  मैं ऐसे बहुत से निजी चिकित्सकों को भी जानता हूँ, जो न्यूनतम लागत पर नि:स्वार्थ भाव से आज भी जनता की सेवा कर रहे है।   

जहां तक दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों की चिकित्सासंहिता की बात है, मुख्य बात पर आने से पहले आपको याद दिलाना चाहूंगा कि नब्बे के दशक मे  दिल्ली की, खासकर बाहरी दिल्ली, फरीदाबाद, गुडगांव, नोएडा और  गाजियाबाद में हर कस्बे में एक नर्सिंगहोम होता था।   जहां तब चिकित्सा व्यापार एक असंगठित क्षेत्र था, वहीँ  छोटे स्तर पर ही सही, किन्तु बाई-पास सर्जरी और अन्य बड़े ऑपरेशनों तक की सुविधा इन नर्सिंगहोमों में उपलब्ध होती थी। 

नब्बे के दशक में ही दिल्ली के मथुरा रोड पर निजी क्षेत्र का एक बड़ा पांचसितारा अस्पताल, अपोलो का उदय हुआ था।  और सन दो हजार आते-आते इसी अस्पताल से सम्बद्ध कुछ नामी-गिनामी डाक्टरों ने पलायन कर मेदांता की नीव रखी थी। जैसा की अमूमन होता है, शुरू के सालों में  मरीजों और उनके सगे-सम्बन्धियों को उत्कृष्ठ चिकित्सकीय सेवा प्रदान किये जाने के बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाए गए। किन्तु समय के साथ धीरे-धीरे सच्चाई सामने आती गई। 

इन पंचतारा अस्पतालों के अस्तित्व में आने का सबसे बड़ा खामियाजा मध्यम और गरीब वर्ग को उठाना पड़ा। दो हजार के दशक के शुरुआत से ही धीरे-धीरे  नर्सिंगहोम और छोटे अस्पताल, खासकर वो नर्सिंगहोम और अस्पताल जो हृदयरोग के उपचार से सम्बद्ध थे, एकदम से गायब ही हो गए।  संक्षेप में बताऊँ तो काफी हद तक   इसकी मुख्य वजह थी इन पंचतारा अस्पतालों का कदाचार। इन छोटे अस्पतालों के डाक्टरों को जब एक मोटी  रकम किसी मरीज को सिर्फ इन पंचतारा अस्पतालों में रेफर करने पर ही मिल जाया करती  हो तो भला वे मरीज का उपचार अपने यहाँ करने की जहमत क्यों उठाएंगे ?  

मेदांता अस्पताल मे इस कदाचारी वेदना का शिकार खुद मैं और मेरे सगे-सम्बन्धी भी हुए हैं।  और दोनों ही बार एक मोटी रकम खर्च करने के बावजूद हमें अपने परिजन खोने पड़े।  दो अक्टूबर दो हजार बारह, शाम के वक्त मेरे ४५ वर्षीय बहनोई, स्व० सतीश उनियाल को दिल का दौरा पड़ा।  मेरी छोटी बहन उन्हें तुरंत गुडगाँव मे ही नजदीक के एक छोटे अस्पताल ले गई जहाँ के डॉक्टर ने खुद ही मेदांता को एम्बुलेंस भेजने का फोन कर  और मेरे बहनोई को उसी वक्त मेदांता रेफर कर दिया।  वहाँ पर चार  दिन उनका इलाज हुआ। डाक्टर के अनुसार दो स्टेंट डाले गये थे और कुल बिल बना ३.६२ लाख रुपये।  चौथे दिन हम उन्हें घर ले आये थे और फिर डाक्टर के निर्देशानुसार उन्हें जांच के लिए ले जाते और फिर डाक्टर ने कहा कि ये अब बिलकुल ठीक है कुछ प्रिकॉशंस बरतते रहिये । 

१७ अप्रैल २०१३ की मध्य रात्रि को उन्हें फिर से दिल का दौरा पड़ा और इस बार मेरी बहन उन्हें सीधे ही मेदांता ले गई। करीब साढे  बारह बजे रात को वे मेदांता अस्पताल पहुंच गए थे किन्तु अस्पताल ने पहले एक लाख रूपये जमा कराने को कहा, जिसका इंतजाम मेरी बहन  उस समय नहीं कर पाई।  उसने तुरंत मुझे फोन किया, जैसे ही उसका फोन आया, मैं और मेरी पत्नी तुरंत गुडगाँव के लिए निकल गए। किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी।  सुबह के करीब  तीन बजे जब बहनोई  की हालत और बिगड़ी और मेरी बहन  एमरजेंसी वार्ड के डाक्टर के पास गिड़गिड़ाई, उसने कहा मेरा भाई पैसे लेकर आ रहा है,  तब जाकर उसने उन्हें विस्तर दिया  और एक इंजेक्शन लगाया। इंजेक्शन लगने के कुछ ही देर बाद बहनोई ने उल्टी की और बेहोश हो गए और थोड़ी देर में ही डाक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। जब हम वहाँ पहुंचे तो वे शव को शवगृह में स्थानांतरित भी कर चुके थे।  सुबह  के वक्त आसपास के हमारे सगे-सम्बन्धी पहुंचे तो मैंने शव को डिस्चार्ज कराने की दौड़भाग शुरू की। और इस अस्पताल ने मुझे शव को तीन से चार घंटे रखने का बिल थमाया, लगभग एक लाख सात हजार रूपये। खैर, मरता क्या नहीं करता, मैंने अपने क्रेडिटकार्ड से बिल  भुगतान कर शव को वहाँ से छुड़वाया। 

१८ जुलाई, २०१६, मेरे वृद्ध ससुरजी के  बाएं पैर के तलवे में खून जमा हो गया था, या यूं कहूँ कि रक्तसंचार रुक गया था।  मेरे जेठू ( पत्नी के बड़े भाई)  जो फरीदाबाद में रहते है, वो उस वक्त उनके साथ रह रहे थे। वहाँ भी वही कहानी दोहराई गई।  हालांकि जब उन्होंने मुझे मेदांता अस्पताल से फोन किया तो मेरा पहला सवाल उनसे  यही था  कि आप उन्हें वहां क्यों ले गए  क्योंकि ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ने सीधे ही  ससुरजी का पैर काटने की बात कही थी।   मुझे उस अस्पताल पर ज़रा भी भरोसा नहीं रह गया था।  खैर, उस लोगो की सहमति से डाक्टरों के अगले दिन घुटने के ऊपर से उनका पैर काट दिया। तकरीबन साढ़े छह लाख रुपये के बिल थमाने के बाद आठवे या नवे दिन उन्होंने कहा कि पैर  इनका धीरे-धीरे ही ठीक होगा बेहतर होगा कि आप घर पर ही इनकी देखभाल करें अन्यथा उन्हें यही एडमिट रखोगे तो अनावश्यक आपका बिल बढ़ता जाएगा। 

एम्बुलेंस कर उन्हें घर ले आये मग़र, घाव पर हल्का रक्तस्राव अभी भी जारी था।  फिर दो दिन बाद यकायक पीड़ा असहनीय हुई तो भाईसहाब और उनके छोटे भाई उन्हें अपोलो ले गए।  वहां एक परिचित के माध्यम से डाक्टर से मिले तो डा०  ने  अच्छे से पैर  का निरीक्षण करने के बाद कहा कि केस बिगड़ चुका है और अब उनके उपचार से परे है।  उन्होंने कहा की आप अनावश्य यहां पर भी ३-४ लाख रूपये खर्च करोगे मगर नतीजा बहुत पोजेटिव नहीं मिलने वाला, अत: बेहतर होगा कि आप एक बार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में दिखा दो।  अगले दिन हम लोग उन्हें एम्स ले गए।  दिनभर लाइन में लगने के बाद करीब दो बजे डाक्टर के पास नबर आया।  महिला डॉक्टर, जोकि काफी अनुभवी प्रतीत हो रही थी, ने घाव का निरीक्षण करने के बाद पहला सवाल हमसे ये किया कि ये ऑपरेशन किसने किया ? मैंने हॉस्पीटल और डाक्टर का नाम बताया तो महिला डॉक्टर साहिबा कुछ बड़बड़ाने लगी।  उस वक्त जितना मैं  समझ सका, वह उस ऑपरेशन करने वाले डाक्टर को कोस रही थी। उन्होंने कहा कि अगर आपको बिस्तर  मिल जाता है तो इनका पैर घाव के थोड़े ऊपर से फिर से काटना पडेगा।  शाम तक हम बेड पाने की जद्दोजहद में लगे रहे किन्तु सफलता हासिल न होने पर उन्हें वापस घर ले आये।  यहाँ से उनको भी जीने की उम्मीद ख़त्म हो चुकी थी और ९ अगस्त, २०१६ के तड़के उन्होंने प्राण त्याग दिए।  

इन दो घटनाओं का जिक्र करने का मेरा उद्देश्य यही था कि आपको बता सकूँ कि डाक्टर के पंचतारा अस्पताल से इलाज करने से मरीज को उतनी सफलता नहीं मिलती जितनी कि छोटे से क्लिनिक से मिलती है।  साथ ही सरकार से भी अनुरोद करूंगा कि इस 'उच्च-स्तरीय चिकित्सा व्यापार' पर  उचित लगाम लगाने और इसके लिए एक प्रभावी  आचारसंहिता तैयार करने के तुरंत  जरुरत है ताकि हाल में हुई शर्मनाक घटनाओं, जिनमे से एक मेदांता अस्पताल की भी है किन्तु  शायद  प्रभावी लॉबी की वजह से वो इतना प्रचारित नहीं हो रही, को दोहराया न जा सके।  और हर कोई भगवान् से यही दुआ मांगे कि इन पंचतारा अस्पतालों का मुँह न देखना पड़े। वो तो ये कुछ घटनाएं मीडिया में उछाल गई अन्यथा कौन जानता है कि ऐसे कितनी घटनाएं रोज होती होंगी।      
                                                                   





  








                      

Friday, September 8, 2017

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना !

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना !
(New concept of 'seating arrangement' in Metro coaches ! )



जैसा कि आप सभी जानते हैं कि बड़े शहरों में आज जहां आवागमन समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है, वहीँ, मैट्रो इस समस्या के समाधान में एक अहम् भूमिका अदा कर रही है।  एक अध्ययन के मुताविक तकरीबन ३० लाख लोग प्रतिदिन देश की राजधानी दिल्ली और एनसीआर में अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए  मैट्रो का इस्तेमाल करते है।

यही वजह है कि आज देश का हर राज्य , हर बड़ा शहर इस 'व्यापक द्रुत परिवहन प्रणाली' Mass Rapid Transport System (MRTS) की ओर अग्रसर होता चला जा रहा है। मेरे लिए  यह एक संयोग ही है कि किन्ही अपरिहार्य कारणों से  मैं भी पिछले करीब ६ महीने से नियमित रूप से सुबह और शाम इस सुविधा का ही इस्तेमाल कर रहा हूँ।

इन पांच-छः महीनो में मैट्रो में सफर के अपने भी काफी खट्टे-मीठे अनुभव रहे है। मैं निसंकोच कह सकता हूँ कि अभी तक मैट्रो संस्था, उससे जुड़े कर्मचारी, और सीआरपीऍफ़ के जवान अपने कर्तव्य का निर्वहन बखूबी कर रहे हैं। हालांकि, डिब्बे की आतंरिक संरचना और उस पर काबिज पथिकों से थोड़ी बहुत शिकायत भी है। मसलन कुछ ही भाग्यशालियों के लिए बैठने का इंतजाम, स्त्रीलिंग के लिए अलग डिब्बा  और हर डिब्बे में चंद सीट आरक्षित होने के बावजूद भी  उनका उन सीटों पर बैठना जो  सामान्य किस्म के प्राणी इस्तेमाल कर सकते है, जबकि उनके लिए  आरक्षित सीट भी खाली पड़ी है।

खैर,  मैट्रो की उच्च गुणवत्ता  बनाये रखने हेतु यह भी जरूरी है कि उसके प्रवंधन के हाथ में  प्रयाप्त संसाधन उपलब्ध रहें।  वरना, आगे चलकर कहीं इस द्रुत प्रणाली का हश्र भी कहीं हमारी आज की रेलवे व्यवस्था की तरह ही न हो जाए।  एक वीडियों हाथ लगा तो ख़याल आया कि मैट्रों में भी कुछ ऐसी ही व्यवस्था हो  जाए तो क्या कहने।  

हर डिब्बे के आधे में सीट ही सीट हों और आधा डिब्बा खड़े पथिकों के लिए हो।  जिसे बैठना हो, यहां संलग्न वीडियों की तर्ज पर अतिरिक्त शुल्क दे  और सीट का मजा ले।  वरना...............  :-)                            

Wednesday, March 29, 2017

वाह रे दुनिया ; लड़के का 'उपनाम' अल्लाह हो सकता है मगर लड़की का नहीं !

 एक वक्त था जब अमेरिका को  दुनिया का  सबसे सभ्य और उन्नत देश माना जाता था।  शायद, वह भी इंसानी सोच और कृत्यों का ही परिणाम था, और आज वही अमेरिकी देश है जिसके जॉर्जिया प्रांत के  सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने एक अविवाहित दंपत्ति, एलिजावेथ हैण्डी और विलाल असीम वाक की बाइस महीने की पुत्री को जन्म प्रमाण पत्र जारी करने से इस बिनाह पर मना कर दिया कि आप बेटी  का  'उपनाम' (Surname) 'अल्लाह' नहीं रख सकते। 

                              Source:  BBC News 

मजेदार बात यह है कि इसी अविवाहित दम्पति का एक जवान बेटा भी है जिसका नाम है ; "मास्टरफुल  मोसीरह  अली  अल्लाह". जहां तक मैं समझ सकता हूँ , ऐसा तो हुआ नहीं होगा कि इनके इस बेटे को भी अथॉरिटी ने जन्म प्रमाण पत्र न दिया हो।  :-) 

वक्त के साथ तथाकथित सभ्य दुनियां में भी शायद निष्पक्षता और तटस्थता के मायने भी बदल गए , लगता है।   

Wednesday, November 9, 2016

लघु व्यंग्य : हर पति के दिन फिरते हैं।

८ नवम्बर, 2016 की देर शाम को जब थका हारा  दिल्ली के दमघोटू यातायात से जूझता हुआ दफ्तर से घर पंहुचा तो बैठक मे मेज पर तुडे-मुडे ५०० और १००० रुपये के नोटों का अम्बार देख  एक पल को चौंक सा गया। लगा कि दुनियां का सबसे ईमानदार कहा जाने वाला तबका यानि आयकर विभाग के हरीशचन्दों की मंडली आज मेरे घर मे भी आ धमकी है, कि तभी किचन से हाथ मे पानी का गिलास लेकर धर्मपत्नी कुछ बडबडाती हुई मेरी ओर बढी। मैने अंदर से अशान्त होते हुए भी शान्त स्वर मे पूछा, क्या माजरा है ये सब, भाग्यवान ?

मेरा इतना पूछना था कि यूं लगा मानों टिहरी डैम के कर्मचारियों ने डैम के सारे कपाट खोल दिये हों और डैम का सारा रूका पानी अपने पूरे बेग से देवप्रयाग की तरफ निकल पडा हो। बोली, अरे,  ये तो सचमुच का फेंकू निकला यार। कहता था, स्विस बैंक से ब्लैकमनी लाऊगा और १५-१५ ,लाख दूंगा सबको । कुछ देना लेना तो दूर, मैने तुम्हारी जेब से टपा-टपाके जो १०-१५ हजार रुपये  बटोर कर रखे थे, उन पर भी कम्वक्त ने आज सर्जिकल स्ट्राइक कर दी।


मैं अभी भी दुविधा मे था, अत: मैने अपने धैर्य के बचे खुचे भन्डार का इस्तेमाल करते हुए सहज भाव से पूछा, जानेमन, बहुत नाराज हो क्या ,क्यों इतना अत्याचार कर रही हो मुझपर ? मैने तो  परसों रविवार के दिन  सिर्फ एक पव्वे के पैसे मांगे थे तुमसे, और तुमने तो आज खजाना ही खोल दिया।  वो स्वभाव को नरम  करते हुए टीवी पर न्यूज चैनल  लगाते हुए बोली, वो देखो और सुन लो , अपने अजीज फेंकू  महाराज को, भक्तों को क्या भगवद्गीता का पाठ पढ़कर सुना रहे हैं।    खैर , चाय वाले को .......  बोलते, बोलते वह रुक सी गई , फिर बोली,  जाओ ,टेबल पर  से १००० का नोट ले जाओ और  पब्वे की जगह बोतल ही ले आना  तुम्हारा हफ्ते भर का गुजारा हो जायेगा। और हाँ, साथ मे तंदूरी चिकन भी ले आना अपने लिए। 

पतियों के इससे अच्छे भला क्या दिन आते, मै, हजार का एक नॉट मुट्ठी में दबा ,झटपट मोदी जी की जय बोलकर, नजदीकी मन्दिर के लिए निकल पडा।

Saturday, February 27, 2016

यह देश कब जागृत और परिपक्व होगा ?



अभी हाल ही में एक अखबार की आरटीआई के उत्तर में रिजर्वबैंक  के जबाब से यह  खुलासा हुआ था कि सरकारी क्षेत्र के  बैंकों ने पिछले ३ सालों में १.१४ लाख करोड़ की डुबन्तु ऋण ( Bad Debts) की रकम बट्टे खाते में डाली है। इसे लुप्त भार (Charge Off ) के नाम से भी जाना जाता है,  जिसका वार्षिक विवरण इस प्रकार है ;
लोकसभा को दी गई जानकारी के हिसाब से सन २०१३ में बैंकों ने कुल २७२३१ करोड़ की ऎसी  रकम बट्टे खाते में डाली थी। इसी तरह २०१४ में ३४४०९ करोड़ और २०१५ में ५२५४५ करोड़ बट्टे खाते में डाली गई। 


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यहां यह जानना अत्यावश्यक है किसी भी  रकम अथवा ऋण को बट्टे खाते में डालने के लिए बैंको के  लिए कुछ नियम, कुछ प्रकियाएं हैं। और इन नियमों तथा परिक्रियाओं  के तहत किसी भी रकम अथवा ऋण को  गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (non-performing asset ) घोषित करने और उसके बाद उसे  bad debts मानकर बट्टे खाते में डालने में लगभग ३ साल लग जाते है।  

यहां यह भी स्पष्ट  कर देना उचित रहेगा कि बैंकों द्वारा अपने इन अप्राप्य नुकसान ( unrecoverable loss) को अपने तुलनपत्र ( बैलेंस शीट ) और आयकर विवरणी  (रिटर्न) में दर्शाने का मतलब यह नहीं है कि बैंकों ने  उन ऋणों को वसूलने के अपने अधिकार का अधित्यजन(waiver ) कर दिया है, और अब वे उसे अपने ऋणी से नहीं वसूल सकते।  बट्टे खाते में डालने के बाद भी बैंको को पूरा अधिकार होता है कि वे अपने पास हर उपलव्ध साधन जैसे ऋण वसूलने वाली एजेंसियां, ऋणधारक के ऋणदाता बैंक में मौजूद कोई अन्य परिसंपत्ति/खाते  को जब्त करके, दृष्टिबंधित संपत्ति को बेचकर इत्यादि से इस ऋण को वसूल सकते है।   

अब आपका ध्यान एक मजेदार बात पर खींचने  की कोशिश करता हूँ।  जो ऋण की रकम बैंकों ने २०१५ में बट्टे खाते (write off ) में डाली, वह ऋण संदिग्ध  ( Doubtful Debts ) कब हो गया था ?  सन २०१२-१३ में,  यानि  सन २०१२-१३ में ही इन बैन के ऋणदाताओं ने ऋण लौटाने में बदमाशी अथवा अपने को असमर्थ (दिवालिया) घोषित कर दिया था।   इसी तरह जो रकम २०१४ में बट्टे खाते में गई वह २०११-१२ में संदिग्ध ऋण बन गई थी और २०१३ वाली रकम २०१०-११ में। साथ ही यह भी बात आप लोग जानते होंगे कि सार्वजनिक क्षेत्र  के  बैंको द्वारा जहां २००२-२००३ में सिर्फ ४% ही ऋण बट्टे खाते में डाले गए थे वहीं ये बट्टेखाते के ऋण सन २०१२-१३ में ६० % तक जा पहुंचे। 

अब सीधा सा सवाल, जब ये  ऋण रकमें, संदिग्ध ऋण  ( Doubtful Debts )  बनी तब देश में सरकार किसकी थी ?     बहुत पुरानी  बात नहीं है, अभी जब उस कथित आरटीआई से यह खुलासा हुआ तो आपने शायद नोट किया होगा, किस तरह कुछ निहित हित मीडिया घरानो, क्षद्म सेक्युलरों और वाम भक्तों ने इसे मोदी सरकार की  एक बड़ी नाकामी के रूप में पेश किया।  कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया कि  मोदी सरकार  ने उन औद्योगिक घरानो को ऋण माफी का तोहफा दे दिया जिन्होंने इनके लिए चुनाव खर्च का इंतजाम किया था। मगर किसी ने यह  परिभाषित करने की कोशिश नहीं की अथवा जानबूझकर इसे  दबाया कि यह डूबंतु रकम किस सरकार के दौरान की है। और ये सब वही लोग है जो आजकर देशद्रोहवाद, अराजकवाद, आतंकवाद और  last but not least ,  JNUवाद के समर्थक और शुभचिंतक बनकर घूम रहे हैं।    12717577_1694003777504719_25407693530748 

अवश्य ही यह एक चिंतनीय विषय है कि बैंक  इतनी बड़ी मात्रा में ऋण की रकमों को बट्टे खाते में डाल रहे है और इसके लिए जबाबदेही तय होनी चाहिए किन्तु क्या जो हम और हमारा मीडिया दर्शा रहा है , देश की अर्थव्यवस्था के प्रति क्या हमारा इतना ही उत्तरदाईत्व बनता है कि हम स्वार्थ पूर्ती के लिए किसी और का पाप किसी और के सर मढ़कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लें ?  बस, रह रहकर अफ़सोस के साथ यही कहना पड़ता है कि अपना यह देश कब जागृत और परिपक्व होगा ?

जागो सोने वालों जागो !    

Thursday, January 7, 2016

इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी - १

इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी  - १ 
यह एक सर्वविदित सत्य है कि  तीन लम्बी गुलामियत का दंश झेल चुका इस मुल्क का वह प्राणी जो सुबह से शाम तक का  अपना वक्त सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के जुगाड़ में ही व्यतीत कर देता है, उसके दिल में जाति, धर्म और सम्प्रदाय से परे, एक ख़ास किस्म का मक्कार वर्ग, अपने द्वारा पैदा की गई  एक ख़ास किस्म की दहशत की पैठ बनाने में  हमेशा सक्षम रहा है।  

इसी का नतीजा था कि पड़ोसी मुल्क  के कुछ दहशगर्द  बेख़ौफ़ एक नीली बत्ती लगी गाड़ी के माध्यम से पठानकोट के वायुसेना बेस में घुस गए और हमारे १०  वीर जवानो को अपने प्राणो की आहुति देनी पड़ी। अब सवाल यह उठता है कि आम जनता को बड़ी-बड़ी नसीहतें देने वाला यह वर्ग-ए-तहज़ीब-ए-वीआईपी, क्या खुद अपने लिए यह नियम बनाएगा कि आज  के बाद से हर वीआईपी वाहन को उसके मार्ग में पड़ने  वाले किसी भी सुरक्षा चेक-पोस्ट पर चेकिंग करवाना अनिवार्य होगा और  ऐसा न करने पर सुरक्षा चेक-पोस्ट पर तैनात सुरक्षा-कर्मी को उसके उल्लंघन कर्ता चालक को देखते ही गोली मारने का अधिकार होगा ?  शायद  कभी नहीं, ऐसे नियम  के बारे में  तो सोचना ही बेईमानी है। 



                     इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी  - २ 

inside delhi metro


 अब  ज़रा दूसरा पहलू देखिये।   अस्थमाग्रस्त यही विशिष्ठ वर्ग, इसको अगर  ज़रा सा  भी  खांसी -जुकाम  हो जाए तो  बढ़ते वायु प्रदूषण की दुहाई देकर उस आम प्राणी  के लिए कठोर नियम बनाने में ज़रा भी कोताही नहीं करता, जिसने इसे आम से ख़ास बनाया। अब चाहे आम  प्राणी  को  कितनी भी मुसीबतों का सामना क्यों न करना पड़े।  दिल्ली में -सम -विषम नंबर वाली गाड़ियों का ही उदाहरण देख लो।  यह सर्वविदित है  कि  इस विशिष्ठ वर्ग ने कभी भी , इस आम प्राणी के लिए सुविधाजनक  सार्वजनिक परिवहन की कभी कोई चिंता नहीं की।  क्या सार्वजनिक  परिवहन पर्याप्त मात्रा में  उपलब्ध है भी या नहीं, कभी नहीं सोचा । 

किन्तु इसे ज़रा सी खांसी  हुई और इसने  न सिर्फ उस आम प्राणी को  बल्कि उसके पूरे परिवार को  ही बीमारी के  मुह में धकेल दिया।  आप पूछेंगे वह कैसे  ? तो इसका जबाब भी सुन लीजिये।   पीक हावर्स  में आप किसी मैट्रो के डिब्बे  अथवा डीटीसी की  बस में  चढिये , सारे प्राणी एक दूसरे से चिपककर  खड़े होकर सफर कर रहे  है।  एक हाथ में  इन प्राणियों ने  मोबाइल फोन पकड़ा होता है  और  दूसरे  हाथ से  खम्बा  अथवा  कोच के अंदर उपलब्ध कोई  और सहारा।  ज्ञांत  रहे  कि  इस मौसम में यह आम प्राणी भी  सर्दी-जुकाम  से ग्रस्त हो सकता है, और जब इसे खांसी  अथवा छींक आती है  तो  सीधे सामने खड़े  दूसरे प्राणियों के चेहरे पर खांसता और छींकता  है  क्योंकि  अफ़सोसन  इसमें अभी  वह  तमीज पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई कि  मोबाइल  फोन को जेब में रख , छींकते और खासते वक्त के लिए अपना एक हाथ  अपने मुह को ढकने हेतु  फ्री रख सके।  नतीजन , अन्य प्राणियों को भी फ्री में सर्दी-जुकाम   मिलता है  और वह उसे घर जाकर अपने बच्चो में भी बाँट देता है।  विशिष्ट वर्ग  ने तो मीडिया में  चेहरा दिखाने के लिए एक दिन  साइकिल की सवारी कर ली ,बस।    ( विदित रहे कि  यह वही  लोग हैं जो खुद कभी  उस ख़ास वर्ग को निशाना बनाया करते थे )     

Friday, November 7, 2014

लघु-व्यंग्य:- गई भैंस एयरपोर्ट में !

बड़े-बड़े दावे करने वाली मोदी सरकार की सुरक्षाखामियों की पोल आखिरकार खोली भी तो किसने,  भैंस ने।  यह सरकार खुद दिल्ली में बैठकर बड़े-बड़े वादे  कर  रही है, और यहां से करीब हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर भैंसे अतिसंवेदनशील इलाकों में अतिक्रमण पर आमादा हैं। भैस के दुस्साहस से खिंसियाई सरकार जहां अपनी सफाई में यह तर्क दे रही है कि चूँकि भैंस का रंग काला होता है, इसलिए एयरपोर्ट पर तैनात सुरक्षाकर्मी रात के अँधेरे में घुसपैठ रोकने में नाकामयाब रहे होंगे।  वहीं विपक्ष को भी बैठे-बिठाए एक गंभीर मुद्दा मिल गया है है और वह सरकार पर यह  तंज कसने से  बाज नहीं आ रही है कि जो सरकार एक काली भैस को न ट्रेस कर सके वह भला काले बुर्केधारी इसीस अथवा अलकायदा को क्या ख़ाक ट्रेस कर पाएगी।   

उधर नाम न बताने की शर्त पर गुजरात सरकार के एक आलानेता ने आरोप लगाया है कि यह सारी घटना साजिशन हुई है।  भैस आजमखान साहिब की रही होगी और चूँकि आदित्यनाथ जी के आजमखान साहिब पर  हालिया बयान से वह खासा नाराज थी, अत:  लखनऊ से चुपके से प्रधानमन्त्री जी के  गृहराज्य पहुंचकर उसने इस साजिश को अमलीजामा पहनाया। स्थानीय मीडिया सर्कल में यह अपवाह भी गरम है कि भैंस लालूप्रसाद जी के मुंबई में हुए हालिया ऑपरेशन के बाद से उनके स्वास्थ्य के प्रति काफी चिंतित थी और उनसे  मिलने पटना जाने के लिए एयर पोर्ट  पहुंची होगी।                 

उधर एयरपोर्ट अथॉरिटीज़ में भी इस बात को लेकर एकराय नहीं है  कि आखिर कौन सा पशु प्लेन से टकराया, और यदि वह भैस ही थी  तो विमान से टकराने  के बाद गई कहाँ ? लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह आवारा भैंस ही थी, जो कि भारी-भरकम थी। बोइंग एयरक्राफ्ट को इससे अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा है और अभी पार्किंग एरिया में है। एयरपोर्ट के  डायरेक्ट डॉक्टर .ने बताया कि यात्री चमत्कारी ढंग से बच गए। इंजन ब्रेकडाउन या किसी तरह की और गड़बड़ी से  ऊपर वाले की कृपा से बच गया। कुछ हवाई विद्वानो का यह भी कहना है कि यह घटना इस बात की तरफ इशारा करती है कि हमारी विमान कंपनिया कितना घटिया प्रोडक्ट हमें मुहैया करा रही है जो इतना भारी भरकम विमान  तो क्षतिग्रस्त  हो गया, किन्तु  भैंस, बिना किसी नुकशान  के अँधेरे का फायदा उठाकर सुरक्षित भाग निकलने में कामयाब रही।  

जो भी हो किन्तु आतंकियों की धमकियों को देखते हुए स्थिति गंभीर है और सरकार को इसपर शीघ्र ही एक श्वेत-पत्र जारी करना चाहिए। 

Friday, August 1, 2014

मानव निर्मित बढ़ती त्रासदियां !

पिछले  दो दिनों  में लगातार दो प्राकृतिक आपदाओं, एक  उत्तराखंड  और दूसरे  पुणे  ने  लगभग १६० जिन्दगियों  को पलभर में लील  लिया।  इसे प्राकृतिक आपदा कहने में  बड़ा आसान लगता है कि  जी बाढ़ आने , बादल फटने अथवा लैंडस्लाइड  की वजह से ऐसा हो गया ।  जबकि  कड़वी सच्चाई यह है  कि  ये मानव निर्मित आपदाए है।   बादल पहले भी फटते  थे, बाढ़ पहले भी आती थी  और लैंडस्लाइड पहले भी होती थी,  लेकिन सिर्फ कुछ ख़ास मौकों और  प्रकृति के अत्यधिक बिकराल होने पर ही  जन-धन की हानि होती थी।   आज की तरह हर कोस पर ज़रा सा  बारिश होने  या बाढ़ आने से ऐसा नुकशान नहीं हुआ करता था।  हम अगर इतिहास में  थोड़ा सा पीछे जाएँ तो सन १९७० में बिरही नदी पर  सन १८९३ में  बनी विशाल झील के टूटने ने  जो बिकराल रूप  उत्तराखंड  के चमोली से हरिद्वार तक धरा था,  और  भारी जन-धन की जो हानि उस जमाने  में हुई थी, कल्पना करके रूह काँप जाती है कि भगवन न करे, अगर वह घटना तब न होकर आज के इस युग में घटित हुई होती तो क्या हो जाता?  

यहां इसे  एक उदाहरण से समझाना चाहूँगा ; पहाड़ी मार्गों पर कभी अमूमन  इक्का-दुक्का वाहन घंटे भर के  अंतराल से  ही चलते दिखाई देते थे, अत : कहीं पर  कोई लैंडस्लाइड  हो भी  जाती थी तो  किसी राहगीर  के हताहत होने की  सम्भाव्यता ना के बराबर होती  थी।   कल्पना करो  कि अगर इन सड़कों पर  भी  दिल्ली की सड़कों जैसा जाम लगा हो  और ऊपर पहाड़ी से  एक पत्थर भी खिसककर नीचे आ जाए  तो होगा ? 

इसमें कोई  संदेह नहीं  कि  अनियोजित विकास और जंगलों का  बड़े पैमाने पर विनाश प्रकृति के रोष के पीछे मुख्य कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण  है किन्तु हमारे  कुछ बुद्धिजीवी और ज्ञानी  भले ही  सिर्फ इसे ही एक मूल कारण माने , किन्तु  अनेक  सत्यों में से एक बड़ा सत्य इसके पीछे का जो है वह है ,जनसंख्या  विस्फोट।  The truth is that the population explosion,  colossal greed of people, politicians and bureaucrats are mainly responsible for such frequent disasters .  

 मुझे ताज्जुब होता है  कि इस कमरतोड़ महंगाई और तथाकथित सभ्य  जमाने में  भी  बहुत से हिन्दुस्तानी  परिवारों में आठ से दस बच्चों की फ़ौज एक   सामान्य सी बात मानी जा रही है.   जब आज जरुरत थी कि  हम समझदारी  और सख्ती के साथ तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या  को नियंत्रित करते  तब हम सिर्फ अपने तुच्छ राजनैतिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों में ही उलझे हुए नजर आते है।   अभी  ताइवान  एक ताजा उदाहरण है।  गैस,  ईंधन पूर्ति  के लिए  आज हमारी लाइफ लाइन बन चुकी है, मगर यदि ताइवान के पास बहुत सी जमीन बाकी होती तो उसे शहर के बीचों बीच सड़क के नीचे से न तो  गैस लाइन बिछानी पड़ती और न ही आज इतना बड़ा हादसा होता।     

पता नहीं,  हम इंसान  कब चेतेंगे !




Monday, July 28, 2014

भारतीय परम्पराएँ और मार्क्स, मैकॉले तथा इब्न रुश्द के छद्म भक्त !

देख रहा हूँ कि मार्क्स, मैकॉले  और  इब्न रुश्द के मुखौटों में छिपे कुछ पश्चमी  दलाल  श्री दीना नाथ बत्रा जी की  किताब पर काफी हायतौबा  मचाये हुए हैं।  वेंडी डोनिजर की तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह से गलत किताब का बचाव करने के लिए तो ये स्वार्थांध  दौड़ पड़े थे, वह सिर्फ इसलिए क्योंकि मामला  एक  पश्चमी लेखिका से सम्बद्ध था। और जो उन अनेक भारतीयों की यह मानसिकता भी  दर्शाता है कि स्वदेशी को  फेंक देना चाहिए और अगर  कोई चीज पश्चिम से आ रही है तो उसे तुरंत आत्मसात  कर लेना चाहिए। वाह !

जिस प्रखरता  से आज ये कुछ मौकापरस्त  दीनानाथ जी की किताब के खिलाफ बोल रहे है,  मैं समझता हूँ कि  इन  मानसिक तौर पर दिवालिये लोगों को अगर ज़रा भी  अपनी सांस्कृतिक विरासत के  प्रति  लगाव और सम्मान होता तो यही  प्रखर विरोधी स्वर तब सुनाई देने चाहिए थे, यह प्रचंड विरोध उनका तब सामने आनी चाहिए था जब  वेंडी डोनिजर ने अपनी उस बकवास किताब में लक्ष्मण और माता सीता के सम्बन्धो पर ऊँगली उठाई थी। और अगर  उसके तथ्य इतने ही सुदृढ़ थे तो तब  पेंगुइन और वेंडी को उस किताब का बचाव अदालत में करने की सलाह दी गई थी, वे क्यों नहीं आये ? क्योंकि उन्हें भी असलियत मालूम थी।   अगर इन तथाकथित क्षद्म-सेक्युलर मौकापरस्तों में ज़रा भी स्वाभिमान होता तो ये उस समय पश्चमी मीडिया,  जोकि  तब यह प्रचारित  कर रहा था कि हिन्दुत्ववादियों की  हिंसा और बदमाशी  की वजह से किताब प्रतिबंधित करनी पडी , उसे जाकर यह  सच्चाई बताते कि  किताब तथ्यात्मक रूप से गलत थी।  

अगर दीना नाथ जी अपनी किताब  में यह कह रहे है कि हिन्दू होने के नाते जन्मदिन पर कैंडिल जलाने की बजाये, घर में हवन करो, तो क्या गलत कह दिया भाई? हवन का वैज्ञानिक महत्व भी सभी जानते हैं।  अगर हमारे बच्चों को हमारी समृद्ध पौराणिक परम्पराओं से सही तरीके से अवगत कराया जाए तो उसमे बुराई क्या है?  ठीक  है, और मैं भी स्वीकारता हूँ कि बहुत सी पौराणिक कहानिया कपोल-काल्पनिक होंगी  एवं  विकास के लिए  आज एक अग्रणी सोच बच्चों  में अवश्य होनी चाहिए, मगर उसका मतलब सिर्फ यह नही कि  हम वह अग्रणी सोच सिर्फ पश्चिम से आत्मसात करें।   यदि  पश्चमी सोच  इतनी ही अग्रणी है तो अमेरिका और यूरोप के बच्चे आज एशियाई बच्चों से पिछड़ क्यों रहे है ? जब रामायण  अथवा महाभारत की बात आती है तो आप लोग उस आधार पर  हिन्दू धर्म की  बहुत सी खामिया गिनाने की कोशिश करते  हो, किन्तु अगर उसे सत्य मानते हो तो  इस तथ्य को सत्य मानने में क्यों  दिक्कत होती है  आपको कि रावण के पास उस वक्त भी विमान थे ? 


और भैया, अगर आपको  बहुत  ही ज्यादा  दर्द हो रहा है तो बजाय इधर उधर हो-हल्ला मचाने के  दीनानाथ जी की  किताब को अदालत में चुनौती दो, अगर  हिम्मत है तो।     

Wednesday, May 14, 2014

चुनावी महाकुम्भ का आरती विसर्जन और …।

और आखिरकार खत्म हो ही गया, चुनाव का एक और महाकुम्भ। हमेशा की भांति इस बार भी  लोकतंत्र के इस वैतरणी संगम पर बहुत से संतों और पापियों ने मोक्ष प्राप्ति की आस और अपने तमाम पापों को धोने की मंशा से  डुबकी लगाईं। यह  बात और है कि वैभव की चकाचौंध मे अंधे हुए अनेकानेक श्रद्धालूओं  ने  प्रयास तो अपने तमाम पापों को धोने का किया था, मगर इस शुद्धिकरण क़ी हड़बड़ाहट मे मेला-मार्ग  से गुजरते वक्त वो कितने और पाप अपने खाते मे हस्तांतरित कर गये, खुद भी नहीं जानते।

आस्था ही जब अपने मूल से भटक जाये तो पथिक का राह भटकना तो स्वाभाविक ही है।   आजादी के बाद से ही  हालांकि समय-समय पर इस देवास्थल  के पुजारियों की करतुतों और कारगुजारियों से लोकतंत्र का यह पवित्र धाम कलुषित होता रहा है, किन्तु जितना पिछले एक दशक मे  देखने को मिला, मै समझता हूँ कि शायद ही इतना कभी पहले हुआ हो। गत दस वर्षों का यह कालखण्ड स्वतन्त्र भारत के इतिहास मे एक ऐसा दुरास्वप्न बनकर आया कि लोगो की लोकतंत्र  पर से ही आस्था खत्म होतीं सी नजर आई। निम्नस्तरीय व्यवहार, लूट-खसौट , चोरी-डकैती, दुराचार और व्यभिचार, आर्थिक विषमता और मुल्य-वृद्धि, ये कुछ इस दौर के  ऐसे कारक थे जिनकी वजह से लोगों का तमाम व्यवस्था से ही भरोसा उठने लगा था।      

यह एक ऐंसा दौर था जब न  सिर्फ़ इस देश के अन्दर मौजूद बहुत से पापियों ने अपनी कारगुजारियों से भारत माता  का शीश शर्म से झुकने पर मजबूर किया, अपितु, इनकी हरकतें देखकर और हमारी आन्तरिक कमजोरियों का फायदे उठाते हुए , हमारे पड़ौसी मुल्को ने भी समय-समय पर अपनी बदमाशी, झुंझलाहट और आँखे तरेरने मे कोईं कौताही नही बरती।  मगर एक किंवदंती है कि अँधेरी सुरंग मे  कल्पना के सहारे हताशा और नाउम्मीदी के  भयावह मार्ग पर आगे बढ़ते हुए दूर कहीं एक रोशनी का छोर नजर आ जाये तो भटकता मुसाफिर अपने पिछले सारे दुखों को भुलाकर, उस रोशनी तक पहूंचने का भरसक प्रयास एक नईं उर्जा शक्ति के साथ फ़िर से करने लगता है।

और ऐंसा ही  कुछ यहां भी हुआ।   इस महाकुम्भ  के तमाम मेला-क्षेत्र का एक सरसरी नजर से ही अवलोकन करने पर यह स्पष्ठ संकेत  मिल जाते थे  कि हताशा और नाउम्मीदी की  लम्बी, अँधेरी  सुरंग से गुजरते हुए  सबसे अधिक घुटन जो महसूस कर रहा था, वह था इस देश का युवा वर्ग।  यही वजह रही  कि  जहां भी उसे उम्मीद की एक धूमिल सी  किरण भी नजर आई,  वह उसकी तरफ़ सरपट भागा  चला गया।  सदा की ही भाँति  हालाँकि इस दरमियाँ भी बहुत से ऐसे परजीवी मौकापरस्त  नजर आये जिन्होने उनका निजी  लाभ के लिए इस्तेमाल करने मे  कोई  कसर बाक़ी नही छोडी।  स्वार्थी बहुरूपिये भेड़ियों, घोटालेबाजी के बल पर पेट भरने वालों  और रसीली , मनगढंत कहानियां गढ़कर उसे लुभावने अन्दाज़ मे जनता को बेचकर अपना किचन चलाने वालोँ   ने भी  उन्हें पथभृष्ट करने की हर मुमकिन कोशिश की, किन्तु आज के पढे-लिखे और समझदार  युवा ने उनकी हर कोशिश को नाकाम कर दिया।     

उनके उत्साह को देखकर तो यही प्रतीत होता था कि मानो मानव भेश मे उन्हें कोई  विघ्नहर्ता मिल गया हो।  इस साल हुए इस महाकुम्भ की एक खास बात यह भी रही  कि इसमें  66.38 फीसदी निर्णयकर्ताओं  ने अपने मताधिकार का उपयोग कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। इससे पहले यह रिकॉर्ड साल 1984-85 में हुए चुनावी कुम्भ के नाम था, जब 64.01 फीसदी वोटिंग हुई थी और तब सहानुभूति की एक बड़ी जलधारा संगम पर सवार थी। इस आधार पर अब सवाल यह खड़ा होता है कि मतदान का यह नया कीर्तिमान क्या  उस विघ्नहर्ता नजर आ रहे नायक की लहर का ही कमाल है? अनेक समझदार, जानकार तो इसी ओर इशारा करते है, कुछ ऐसे भी हैं जिन्हे इस गंदी कर दी गए राज्नीति से खास सरोकार नहीं है,  किन्तु  कुछ  ऐसे भ्रष्ट, स्वार्थी, संकीर्ण- बुद्धि,  दिग्भ्रमित और चाटुकार  भी है जो इसे उसकी लहर सिर्फ़ इसलिए नहीं कह पा रहे क्योंकि ये पातकी  सोचती हैं कि कहीं इनके सच स्वीकारने से इनके अहम को ठेस  न पहूंच जाये।   


दीमक की तरह देश को अन्दर से खोखला करने वालों को यह समझने का अब वक्त आ गया है कि पिछले ६० वर्षों में देश ने जो कुशासन और सार्वजनिक सम्पति की लूट देखी है, गुजरात मॉडल का अर्थ है उससे मुक्ति। पिछले कुछ दशकों का इतिहास गवाह है कि जो भी प्रदेश कुछ खास दोहरे चरित्र वाले इन खलनायकों से मुक्त हुआ वो तरक्की की राह पर है। वक्त आ गया है उन कुछ रसीली, चटपटी ख़बरों से अपने चूल्हे की आग को जलाये ऱखने वालों के यह समझने का कि जिस इन्सान को उन्होने पिछले एक दशक से भी अधिक समय तक एक दानव के रूप मे प्रदर्शित कर अपनी दुकाने चलाई, जिसकी छवि को एक साम्प्रदायिक, कातिल और खूंखार तानाशाह की तरह चित्रित कर उस पैंटिंग को करोडो मे बेचा, उनकी दुकाने अब इस घटिया किस्म के माल से  बहुत ज्यादा दिनो तक नहीं चलने वाली। 


हालांकि मैं समझता हूँ कि नई सरकार से बहुत ज्यादा की उम्मीद रखना शायद अपने आप से नाइंसाफ़ी होगी।   किन्तु हां, इतना मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, पिछले दस साल के मुक़ाबले आने वाले सालों मे हम कहीँ बेह्तर प्रशासन की उम्मीद अवश्य कर सकते हैं। और इस नई सरकार से न सिर्फ़ मैं अपितु देश के वे करोड़ों लोग जिन्होने एक नईं भोर की उम्मीद मे इन्हें इस वैतरणी मे अपने बहुमुल्य वोट से स्नान कराया, इतनी अपेक्षा इनसे  अवश्य रखते हैं कि अपने शासन के दौरान ये उन गिद्धों को नहीं बख्शेंगे जिन्होने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही तौर पर इस देश को लूटा, भारत माता को शर्मिँदा होने पर विवश किया। इस प्रक्रिया में  कुछ ज्यादतियां होनीं  भी स्वाभाविक हैं किन्तु उस पेंडुलम को भी सही किया जाना अत्यन्त आवश्यक है, जो वाम-चरम और यूरो-केंद्रित हो गया है। क्षद्म धर्म -निरपेक्षता का चोला एक सरासर बक़वास है जिसके मुखोटे के पीछे कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ के लिये देश के लोगो को आपस मे ही भिड़ाए हुए है । आज इन सब बातों को दरकिनार कर देश को एक सुनहरे भविष्य मे ले जाने हेतु हमें आधुनिकीकरण और विकास की सख्त जरुरत है। एक होज-पोज़ संस्कृति की वर्तमान अवधारणा देश की मज़बूती के हित मे कतई नही है, और हमे इसके आकार को एक यथार्थवादी भारतीय पहचान देनी होगी। 

अंत में चंद शब्द उन खिसियाये मौक़ापरस्तो के लिये भी कहना चाहूंगा जो कह्ते थे कि ऐसा कभी नहीं हो सकता और अब जो १६ मई के बाद गोल-गोल घूमते अपने छत के पंखें को शून्य मे निहार रहे होंगे। उन्हें यही कहूँगा कि अब जब इस देश के युवा वर्ग ने इनके भिगो के लगा हीं दिया है तो मैं अब उस वक्त उनकी हताशा की भी पराकाष्ठा को देखना चाहता हूँ, जब देश की गद्दी उस जुझारू इंसान के बैठ्ने से सुशोभित होगी। साथ ही भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि इन्हें सद्बुद्धि की प्राप्ति हो। 

आने वाली नई सरकार को मेरी अग्रिम हार्दिक शुभकामनाऐ ! 

जय हिन्द !



Sunday, January 26, 2014

एक और गणतंत्रदिवस और आशाओं-निराशाओं की आंखमिचोली !




65 वें गणतन्त्र की  सभी देश वासियों  को हार्दिक शुभकामनाएं ! 

इस नूतनवर्ष  के प्रारम्भिक मास के उत्तरार्द्ध में हर वर्ष  की भांति, आइये इस वर्ष के लिए भी हम सभी मिलकर पुनः एक सुखमय और समृद्ध भारत का सपना सजोए, उसकी कामना करें । आज महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से देश का जन - जन किस कदर त्रस्त  है इसका अहसास सिर्फ  इसी बात से हो जाता है कि जनता को जिधर भी  इससे मुक्ति के लिए एक आशा की किरण नजर आती है वह वहीं उसे लपकने पहुँच जाती है।   वो बात और है कि  उसे हर तरफ निराशा ही हाथ नजर आती है।  

तमाम देश और खासकर दिल्लीवासियों को भी एक ऐसी ही सुनहरी किरण नजर आई थी, किन्तु उसे लपकने के बाद दिल्लीवासियों को भी एक बड़ी निराशा के साथ शेक्सपियर याद आ गया।  उन्हें भी यही सबक मिला कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।  उम्मीदें सभी लगाए बैठे थे किन्तु  पिछले दिनों जो कुछ अपने आस-पास नजर आया उससे यही अहसास हुआ कि अगर चोरों के हाथ में सत्ता आ जाए तो वो  पहला मोर्चा पुलिस के खिलाफ ही खोलते है। और ऐसा इस उद्देश्य से नहीं किया जाता कि पुलिस सुधरे और आम-जन को न सताये, बल्कि इसलिए किया जाता है  कि उसे अपने ढंग से इस्तेमाल कर अपना उल्लू कैसे सीधा किया जाये।  

यह डायलॉग हालांकि काफी पुराना  हो चुका है, लेकिन प्रासांगिकता उसने आज भी नहीं खोई कि कोई इंसान जब किसी और पर ऊँगली करता है तो उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि तीन उंगलिया उसकी तरफ भी होती हैं।  सब्जबाग़ दिखाना और दूसरों को उपदेश देना शायद इस धरा पर सबसे आसान काम होता है, किन्तु उसे  वास्तविकता की जमीन पर मूर्त रूप देना एक कठिन काम है। हम जब पुलिस को  दोष देते है तो उससे पहले यह भूल जाते हैं कि ये पुलिस वाले  भी हमारे इसी समाज का हिस्सा हैं  और यदि वे अपना फर्ज ठीक से अदा नहीं कर रहे है तो उसके लिए जिम्मेदार कारक कौन-कौन से हैं।  क्या एक ईमानदार पुलिस वाला आज के  दूषित राजनैतिक और लालफीताशाही माहौल मे ईमानदारी से फर्ज अदा करके चैन की जिंदगी जी सकता है? हम यह क्यों भूल जाते है कि उसका भी परिवार है, और नेताजी अथवा  अफसर की किसी महत्वाकांक्षा ने अगर उसे ६ माह के लिए निलम्बित करवा दिया तो इस कमरतोड़ महंगाई मे वह अपने बच्चे के स्कूल की फीस कहाँ से भरेगा ? क्या एक ईमानदार पुलिस वाले को हमारे लोकतंत्र के चारों  स्तम्भ निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से काम करने देते हैं ? क्या अपराधियों  में पुलिस का भय एक सुनियोजित तरीके से ख़त्म नहीं कर दिया गया है ? ये कुछ सवाल है जिनका हमें ईमानदारी से सर्वप्रथम जबाब तलाशना होगा और उसके बाद ही हमें अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं  के बारे में सोचना चाहिए। 


आज हमें जरुरत है अपने खून के शुद्धिकरण की।  भ्रष्टाचार अगर शताब्दियों से हमारे खून में न होता तो हम तीन-तीन गुलामियाँ  ही क्यों झेलते ? किस चीज की कमी थी हमारे पास ? दूसरे को अनुशासन में रहने की दलील देते है, लेकिन यह तो देखो कि खुद कितने अनुशासित हो। दूसरों के लिए तो हमने पावंदियों का लम्बा-चौड़ा मकड़जाल बुन लिया किन्तु अपने लिए ?   

जय हिन्द !    


चुनोती

हो सकता है कि थोडा ज्यादा रहे या कम रहे, किंतु, इतना तो पक्का है कि यह गम रहेगा, अरे वो, हर बात पे पैमाने पर नापने वालों, हम, हर बात पे तुम्...