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Showing posts from August, 2010

भ्रष्टों और निक्कमों का प्रिय खेल बनकर रह गया है क्रिकेट !

कविता बनाने बैठा था, मगर वक्त और आत्मउत्साह की कमी के कारण सिर्फ चार ही लाईने बन पाई ; किसने कब यह सोचा था, वक्त का ऐसा एक तकाजा होगा, अन्धेर लिये सारी नगरी होगी, अन्धों मे काना राजा होगा । महंगाई से त्रस्त होंगी प्रजा सारी, चांदी काटेंगे मंत्री, दरवारी, राग अलापेंगे सब अपना-अपना, पर सिंहासन साझा होगा॥ अन्धेर लिये सारी नगरी होगी, अन्धों मे काना राजा होगा ।...........................॥ हाँ , इस लेख के शीर्षक के मुताविक चंद बातें कहना चाहूँगा कि आज क्रिकेट का खेल एक भ्रष्टाचार की जननी बन चुका है। इस बात से अधिक उत्साहित होने की जरुरत नहीं कि आज इस खेल के गंदे हिस्से में कुछ पाकिस्तान के खिलाड़ियों के फंसने की ख़बरें है। सिर्फ इतनी सी बात नहीं है कि केवल पाकिस्तानी खिलाड़ी ही ऐसा काम कर रहे है। याद करे कि अभी आई पी एल पर यह खुले आरोप लगे है कि उसके भी सारे मैच पहले से फिक्स थे। तो क्या जो खेल फिक्स करके खेले गए तो क्या उसमे खेलने वाले खिलाड़ी पाक साफ़ थे ? इस खेल ने देश के सारे खेलों को निगल लिया है। दूसरे खेलों के खिलाड़ी जो देश के लिए खेलते है वे पाई-पाई को तरसते है और इस खेल के खिलाड़ी......? ...

अर्थ-अनर्थ !

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छवि गूगल से साभार , कार्टून को बड़े आकर में देखने के लिए कृपया उस पर क्लिक करे !

ताक बैठे है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर!

क्या कभी सोचा है तुमने इस सवाल पर, क्यों आज ये देश है अपना, अपने ही हाल पर। ढो रहा क्यों अशक्त शव अपना काँधे लिए, ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥ भ्रष्टाचार भरी आज यह सृष्ठि क्यों है, कबूतरों के भेष में बाजो की कुदृष्ठि क्यों है। 'शेर-ए-जंगल' लिखा क्यों है गदहे की खाल पर, ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥ महंगाई से निकलता दरिद्र का तेल क्यों है, राष्ट्र धन से हो रहा फिर लूट का खेल क्यों है।   शठ प्रसंन्न है आबरू वतन की उछाल कर, ताक बैठे  है गिद्ध क्यों, जनतंत्र की डाल पर॥

क्या लिखू ?

लिखने को तो बहुत कुछ था, मगर इस खिन्न मन की किन्ही गहराइयों से एक आवाज आ रही है कि लिखकर क्या करेगा ? अपना खून जलाएगा , अपने आँखों की रोशनी कमजोर करेगा, अपनी उँगलियों को कष्ट देगा, अपना बिजली का बिल बिठाएगा, अपने इन्टरनेट सर्विस प्रोवाईडर का घर भरेगा, अपने कंप्यूटर के की बोर्ड को गुस्से में जोर-जोर से उँगलियों से पीटेगा, अपने घरवालों पर खीजेगा, इससे ज्यादा है भी क्या तेरे बस का ? इसलिए रहने दे लल्लू , तेरे बस का कुछ नहीं ! लेकिन फिर मेरी अंतरात्मा की गहराइयों से कुछ विरोध के स्वर फूटने लगते है, जो चीख-चीखकर मुझसे ये कहते है कि गोदियाल, तू कबसे इतना स्वार्थी हो गया ? तू कबसे सिर्फ अपने ही बारे में सोचने लगा ? क्या यही तेरे उस तथाकथित स्वदेशप्रेम के नाटक का पटाक्षेप है, यदि हाँ, तो धिक्कार है तुझपर ! फिर तो डूब मर, कहीं चुल्लूभर पानी में ! इंतना कहने के बाद मेरी आत्मा मुझे यह कहकर धिक्कारने लगती है कि तू क्यों आया इस संसार में ? तुझे तो पैदा ही नहीं होना चाहिए था! ये शब्द मुझे इसकदर भेदते है कि मै जोर से चीख उठता हूँ, लेकिन मेरी वह चीख कोई नहीं सुनता, सिर्फ कमरे की दीवारें कांपकर रह जाती...

मर्यादा का पालन !

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राजनीति में मर्यादा का भी पालन होना चाहिए : मनमोहन सिंह एक और !! रहम करो माई बाप ! माया-ममता का पालन करते-करते तो हम सड़क पर आ गए और आप है कि.......!!!! छवि गुगुल से साभार

क्या सोचकर इस जश्न मे शरीक होवे?

जहां तक इन्सानों का सवाल है, मै समझता हू कि इस दुनिया मे भिन्न-भिन्न विचारधाराओं मे चार प्रकार का दृष्टिकोण रख्नने वाले लोग पाये जाते है, पहला आशावादी और दूसरा निराशावादी ( ये दोनो ही मिश्रित दृष्टिकोण वाले भी कहे जा सकते है ) तीसरा होता है घोर आशावादी और चौथा घोर निराशावादी। घोर आशावादी और घोर निराशावादी इन्सान आप शेयर मार्केट के उन तेजडियों और मंदडियों को कह सकते है, जो बाजार मे विपरीत परिस्थितियां होने के बावजूद भी शेयरों से इसी उम्मीद पर खेलते है कि आज मार्केट चढेगा अथवा उतरेगा। यह कतई मत सोचिये कि मै आप लोगो को लेक्चर दे रहा हू, बस यूं समझिये कि भूमिका बंधा रहा हू। मालूम नही लोग इस लेख को पढ्कर मुझे उपरोक्त मे से किस श्रेणी मे रखते है लेकिन इतना जरूर कहुंगा कि वर्तमान परिस्थितियों मे मुझे तो दूर-दूर तक अपने इस दृष्टिकोण मे बद्लाव के लिये आशा की कोई किरण नजर नही आ रही। जैसा कि आप सभी जानते है कि देश आज प्रत्यक्ष तौर पर अंग्रेजी दास्ता से मुक्ति की चौसठ्वी वर्षगाठ मना रहा है, यानि कहने को स्वराज मिले हुए त्रेसठ साल पूरे हो गये। लेकिन यहां के आम जन से मै कहुंगा कि अपने दिल पर हाथ रखक...

ब्लैकबेरी बनाम स्विस बैंक !

इसमे कोई सन्देह नही कि देश की आन्तरिक और सामरिक सुरक्षा के नज़रिये से ब्लैकबेरी सेलफोन प्रकरण अनेक देशों की सुरक्षा एजेंसियों के लिये एक संवेदनशील और चिन्ताजनक विषय बन गया है। और दुश्मन देश की गुप्तचर एजेंसिया और बुरे मंसूबे वाले आतंकवादी संगठन और लोग निश्चिततौर पर इसका गलत इस्तेमाल कर सकते है। भारत ही नही बल्कि विश्व के अनेक देशों जैसे चीन, अल्जीरिया, य़ूएई, सऊदी अरब, लेबनान और बहरीन ने भी इस बारे मे कदम उठाने शुरु कर दिये है। देश की सुरक्षा चिन्ताओं के प्रति हमारी अत्यधिक सजग सरकार ने भी त्वरित कार्यवाही करते हुए दूरसंचार प्रदाताओं और ब्लैकबेरी की निर्माता कम्पनी रिसर्च इन मोशन (रिम) को नोटिस दिया था कि अगर सुरक्षा एजेन्सियों को ब्लैकबेरी एंटरप्राइज सर्विसेज और ब्लैकबेरी मेसेंजर सर्विसेज तक पहुंच नही मुहैया कराई गई तो ३१ अगस्त तक ब्लैकबेरी की सेवायें बंद कर दी जायेंगी। मरता क्या नही करता वाली कहावत के हिसाब से शुरुआती ना-नुकुर के बाद ब्लैकबेरी ने सरकार की बात मान ली है। मानेंगे भी क्यों नही धंधा जो करना है। और देश की सुरक्षा के लिहाज से इसके उपभोक्ताओं को भी यह बात भली प्रकार से समझ आ...

मनमोहन सिंह जी की जय बोलिए क्योंकि वे भी आज २२७३ दिन के प्रधानमंत्री हो गए !

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आज जब एक दैनिक अंगरेजी अखबार की वेब-साईट पर उसकी न्यूज हेडिंग पर नजर गई तो पता चला कि मनमोहनसिंह जी इस देश के प्रधानमन्त्री की कुर्सी को लम्बे समय तक सुशोभित करने वाले तीसरे प्रधानमंत्री बन गए है ! नि:संदेह उनकी काबिलियत पर कोई शक नहीं किया जा सकता, मगर हर जगह इतनी अनिश्चितता के वातावरण में उस साईट का इस बात पर उत्साहित होना भी जायज ही है! उनके बारे में मेरा यह अपना आंकलन रहा है कि श्री मनमोहन सिंह जी के साथ अक्सर हर चीज "अति" वाली सीमा तक रही है! वे अति की सीमा तक साफ़ छवि वाले ऐंसे ईमानदार व्यक्ति है, जिन्हें अपने नेतृत्व के अधीन हो रहे तमाम भ्रष्टाचारों में से कोई एक भी भ्रष्ट कृत्य अथवा घोटाला नजर नहीं आता है! वे एक बड़े अर्थशास्त्री भी है ! और सुनने में आया है कि दुनिया के कई बड़े देशों के नेतावों ने कुछ समय पहले कनाडा में संपन्न अन्तराष्ट्रीय बैठक में उनकी इस बात के लिए जमकर तारीफ़ भी की कि उन्होंने तरह-तरह के टैक्स अपनी जनता पर लगाकर अन्तराष्ट्रीय मंदी का सफलतापूर्वक मुकाबला किया! अब यह पता नहीं कि उनका यह मंदी के साथ अर्थशास्त्रीय मुकाबला था, अथवा इस देश के करोड़ों लोगो ...

आस्था ही सड्क पर न आ जाये, इसका भी ध्यान रखे !

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अब जब श्रावण मास अपने अंतिम चरण मे पहुंच गया तो अब जाकर उत्तर भारत के खासकर चार राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा के बहुत से लोगो की जान मे जान आई है। हर साल की भांति इस साल भी सड्कों पर कांवड़ियों का हुजूम उमडा। पूरे श्रावण माह कांवड़िये उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धूम मचाये रहते हैं। दूर-दूर से ये हरिद्वार आते हैं, और यहां से गंगाजल लेकर इच्छित शिव मंदिर में जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। यहां तक कि ये कांवड़िये अब गंगोत्री और गौमुख तक जाने लगे हैं। इनका दायरा अब राज्य स्तर तक पहुंच रहा है। जिसके लिये सम्बद्ध राज्य सरकार और प्रशासन को एक महिने पहले से युद्ध-स्तर पर तैयारियां शुरू करनी पडती हैं। चुंकि यह करोडों हिन्दुओं की अस्था से जुडा मसला है इसलिए भावनाऒं का आदर भी नि:सन्देह जरूरी है। मगर साथ ही हमे यह भी देखना होगा कि कहीं कोई चीज अत्याधिक तो नही हो रही? भग्वान शिव के प्रति जनता के मन मे जो आदर और आस्था है, हमारे कृत्य कहीं उसे कोई चोट तो नही पहुचा रहे ? क्योंकि पिछले आठ-दस सालों से जबसे हमारे इस देश की दोयम दर्जे की राजनीति ने आस्था के इस क्षेत्र मे अपनी घुस...

ये अहसान फरामोश भिखमंगे !

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मेरा मानना है कि विपदा में फंसा हर प्राणी सबसे असहाय होता है, और हमने जहां तक इस भारत भूमि का इतिहास है, अपने पूर्वजों के मुख से, अपने पौराणिक गर्न्थों में, अपने संस्कारों में यही पाया है, यही पढ़ा है कि इंसान तो छोडिये, विपदा में फंसे प्राणी की पशु-पक्षी भी मदद करते है! किस्से-कहानियों में अक्सर जाल में फंसे शेर और चूहे की कहानी, डूबती चींटी और चिड़िया जैसी अनेकों कहानिया तो आपने भी पढी होंगी ! मानवता के नाते एक विवेकशील इंसान का यही परमधर्म होता है कि अपनी काविलियत के हिसाब से, मुसीबत में फसे जरूरतमंद की यथोचित मदद करे! यही इंसानियत का सार है,और यह भी कह लीजिये कि एक सच्चा धर्म भी यही है! और मैं यह भी खूब समझता हूँ कि शायद उससे बढ़कर और कोई बेरहम इंसान इस दुनिया में नहीं सकता , जो दो शब्द सम्वेदना और सहानुभूति के न कहकर, पीड़ितों का उपहास उडाये ! अपना एक पड़ोसी मुल्क है पाकिस्तान ! घृणा से परिपूर्ण देश (फुल ऑफ़ हेट )! कुछ हमारे मित्र जो यह कहकर कि पाकिस्तानियों को छोडिये, उनसे हमें क्या लेना, उनसे पल्ला झाड़ने की बाह्यमन से कोशिश तो करते है, मगर साथ ही यह भी जानते है कि आज भी अधिकाँश पाक...

ये ईशू के भक्त, अल्लाह के वन्दों से कुछ कम अमानवीय नहीं !

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आज बात मैं यहाँ गोरी चमड़ी के ईशू भक्तों की मानवता के प्रति भेद-भावपूर्ण और संवेदनहीन अमानवीय कृत्यों की करने जा रहा था, मगर चूँकि जब शीर्षक ही मैंने ऐंसा दे मारा तो मुझे यह भी बताना पड़ेगा कि जिन भक्तों से मैं इनकी तुलना कर रहा हूँ, उन अल्लाह के वन्दों का मानवता के प्रति हालिया अपराध क्या था? तो लीजिये एक नजर अफगानिस्तान की इस लडकी जिसका नाम बीबी अइशा है, के चित्र पर दौड़ाइए, जिसके अल्लाह भक्त तालीबानी पति ने १७ साल की इस लडकी के नाक-कान काट डाले और वह भी तब,जब वह उसके बच्चे की माँ बनने वाली थी ! इसलिए उम्मीद करता हूँ कि मेरे इस लेख का शीर्षक कुछ लोगो को चुभेगा नहीं ! आइये अब बात करते है इन गोरी चमड़ी के ईशू भक्तों की ! इनकी कारगुजारियों से तो इतिहास पटा पड़ा है ! मसलन कैसे इन्होने अमेरिका पहुँचने पर वहाँ के रेड इंडियंस का समूल नाश किया, कैसे इन्होने अपने अधीन गुलाम देशों में लोगो का उत्पीडन किया! और हालिया विक्किलीक्स का वीडियो तो आप सभी ने देखा होगा कि ईराक में कैसे सड़क किनारे खड़े लोगो को इन्होने हैलीकॉप्टर से निशाना बनाकर मौत की नींद सुलाया ! मगर इनका पिछली सदी का जो सबसे बड़ा घृणित कृ...

जैचंद की तो फितरत है पीठ पे छुरा घोंपना, इस वोट-बैंक का कोई तो विकल्प ढूंढो यारों !!

हाथ जोड़कर पहले कहे देता हूँ, ज्यादा नहीं लिखूंगा, क्योंकि इन जड़-बुद्धि स्वदेशियों की समझ में ख़ास कुछ नहीं घुसने वाला ! मगर क्या करू कहना, लिखना, उपदेश देना अपना पैदाइसी डिस-ऑर्डर है, इसलिए खाली-पीली ही सही , मगर थोड़ा-बहुत शकुन पाने के वास्ते कुछ जरूर लिखूंगा ; भाइयों, ये कदापि मत सोचियेगा, कि मैं किसी वर्ग विशेष के खिलाफ लिख रहा हूँ, या फिर भावनाए भड़का रहा हूँ ! कहने को तो मैं भी मौके के हिसाब से एक क्षुद्र आस्तिक बनाम नास्तिक (ज्यादातर अपने सेक्युलरों की तरह ) हूँ, मगर क्या करू, सच उगलना भी अपनी मजबूरी है ! - कभी सोचा आपने कि आज जो कुछ देश में हो रहा है, घपले , भ्रष्टाचार और लूटमार और ऊपर से किसी की कोई जबाबदेही नहीं, वह क्यों हो रहा है? क्योंकि हर कोई जानता है कि इस देश के लोग कायर है , अपनी निजी जरूरतों से बाहर नहीं झाँकने वाले, जब तक कोई सिकंदर, बाबर और फिरंगी आकर इनकी ................................................ ! -कि जब कोई विजय का बिगुल इनके सिर के ऊपर बजा देता है तभी ये जागते है, वरना तो दिल्ली की गद्दी पर कौन राज कर रहा है इन्हें कोई परवाह ही नहीं .......! अब असल ब...

अब अपना मुह बंद रखे इस वृहत लोकतंत्र के तंग दिल सनम !

भ्रष्ठाचार और मक्कारी तो मानो हमारी रग-रग में रची बसी है ! सार्वजनिक धन की चोरी को हम अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते है, और ऊपर से सीना जोरी भी ! शरमो-हया और दुनिया की लोक-लाज तो जयचंद के कुटुंबी वंशजों ने तभी बेच खाई थी, जब मंगोलों, मुगलों और फिरंगियों ने इन जयचंद की औलादों की मदद से बारी-बारी से हमारी इस पावन भूमि को अपवित्र किया था! कुछ ही पृथ्वीराज थे, जो जी-जान और मेहनत से तीन-तीन गुलामियों की मार झेलते हुए भी थोड़ा बहुत अपनी और अपने देश की पारंपरिक संस्कृति, लोक-लाज और सत्यनिष्ठा को बचाए रखने में कामयाब रहे थे ! मगर उन्हें क्या मालूम था कि कालान्तर में युगों से भेड़ की खालों में छुपे बैठे कुछ जयचंद के घरेलू भेड़िये, एक दिन आजादी मिलने पर अचानक लोकतंत्र की आढ़ में शराफत, इमानदारी, समानता, कौशल और नेतृत्व का नकली लवादा ओढ़कर देश में बची-खुची शर्मो-हया का भी गला घोंट देंगे ! मजेदार बात यह नहीं है कि देश में फैले भ्रष्ठाचार और अराजकता से पर्दा उठ रहा है, अपितु मजेदार बात यह है कि कुछ शकुनियों के फेंके फांसे उन पर ही उलटे पड़ने लगे है! जैसा कि मैं पहले भी अपनी पोस्टों में लिख चुका हूँ कि ...

तेरे चाहने वाले, तमाम बढ़ गए है|

सर्द मौसमी पुरवाइयों के पैगाम बढ़ गए है, कुदरत के कातिलाना इंतकाम बढ़ गए है।   मुश्किल हो रहा है इस तेरे शहर में जीना, शाम-ए-गम की दवा के दाम बढ़ गए है॥ तरक्की की पहचान थी जो चौड़ी सड़कें, उन पर भी सुबह-शाम जाम बढ़ गए है। चुसे,पिचकाए मिल जाते हैँ पटरियों पर, आदमी दीखता नही बस आम बढ़ गए है॥ किया बेदखल जबसे हया को शहर से, नुक्कड़ों पर तभी से बदनाम बढ़ गए है। 'बेईमानी' से की है 'दौलत' ने जबसे शादी, नैतिक पतन  के काफी काम बढ़ गए है॥ परमार्थ रखा जबसे तृष्णा ने नाम अपना, स्वामी-महंतों के कुटिल धाम बढ़ गए है। कहे 'परचेत' खुश होले घोटालों की जननी, तेरे चाहने वाले तो अब तमाम बढ़ गए है॥