चुनावी महाकुम्भ का आरती विसर्जन और …।
और आखिरकार खत्म हो ही गया, चुनाव का एक और महाकुम्भ। हमेशा की भांति इस बार भी लोकतंत्र के इस वैतरणी संगम पर बहुत से संतों और पापियों ने मोक्ष प्राप्ति की आस और अपने तमाम पापों को धोने की मंशा से डुबकी लगाईं। यह बात और है कि वैभव की चकाचौंध मे अंधे हुए अनेकानेक श्रद्धालूओं ने प्रयास तो अपने तमाम पापों को धोने का किया था, मगर इस शुद्धिकरण क़ी हड़बड़ाहट मे मेला-मार्ग से गुजरते वक्त वो कितने और पाप अपने खाते मे हस्तांतरित कर गये, खुद भी नहीं जानते। आस्था ही जब अपने मूल से भटक जाये तो पथिक का राह भटकना तो स्वाभाविक ही है। आजादी के बाद से ही हालांकि समय-समय पर इस देवास्थल के पुजारियों की करतुतों और कारगुजारियों से लोकतंत्र का यह पवित्र धाम कलुषित होता रहा है, किन्तु जितना पिछले एक दशक मे देखने को मिला, मै समझता हूँ कि शायद ही इतना कभी पहले हुआ हो। गत दस वर्षों का यह कालखण्ड स्वतन्त्र भारत के इतिहास मे एक ऐसा दुरास्वप्...