किसकदर बेहयाई भरी ऐ खुदा, तुमने इन दगाबाजों में, मेज़ तले ये मसलते हैं हाथ और झाड़-पोंछते दराजों में। फल-फूलता आ रहा है यह तिजारत, बदस्तूर जमाने से, कहीं पोसते हैं इसे ये संत-समागमों में, कहीं नमाज़ों में। दौलत-वैभव,ढोंग, धौंसिया,ये प्रयोजन इनकी तृष्णा का, इशारों-इशारों में राग छेड़ते और बोल ढालते हैं साजों में। दरियादिली-परोपकार की, माशाल्लाह क्या मिशाल दें, गोश्त अलगाते कबूतरों को और दाना बांटते है बाजों में। जेहन में सिर्फ वोट बसा है और खोट बसा है नीयत में, मुलामियत ओढ़े चहरे पे और कुटिलता काम-काजों में। तख़्त -ए-रियासत तजुर्बाकार है शख्सियत के खेल में, जालिमों की करतूतों को,पिरोंए कहाँ तक अल्फाजों में।