रिश्तों का इल्म !
प्रणय-धड़कन का दिल में बसने, जीवन के सहभागी बनने हेतु रिश्तों की बुनियाद में यकीन नाकाफी क्यों? दो दिलों के इकरारनामे को मुद्रांकित करवाने की हठ-धर्मिता कैंसी? तुम जानती हो कि अनुबंध असीम नहीं होते, और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही एकनिष्ठता की कोमल डोर को रहन पर नहीं रख सकता , क्योंकि मियाद खत्म होने के बाद यह मुसाफिर तन्हा ही फिर से दश्त का वीरान सफ़र तय नहीं कर पायेगा।