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Showing posts from January, 2012

रिश्तों का इल्म !

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प्रणय-धड़कन का दिल में बसने, जीवन के सहभागी बनने हेतु रिश्तों की बुनियाद में यकीन नाकाफी क्यों? दो दिलों के इकरारनामे को मुद्रांकित करवाने की हठ-धर्मिता कैंसी? तुम जानती हो कि अनुबंध असीम नहीं होते, और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही एकनिष्ठता की कोमल डोर को रहन पर नहीं रख सकता , क्योंकि मियाद खत्म होने के बाद यह मुसाफिर तन्हा ही फिर से दश्त का वीरान सफ़र तय नहीं कर पायेगा।  

संकल्प !

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  भ्रष्टाचार के इस कानन में, आग लगाना चाहता हूँ, देश-प्रेम की नई वतन में, अलख जगाना चाहता हूँ। अशक्तजन का और न  होवे  प्राबल्य सद्सद्विवेक नाश, मन में बैठे उसके  भय को, दूर भगाना चाहता हूँ॥ परिवार एवं बंशवाद का, हम पर कोई राज न हो, देश तमाम में जनमानस, रोटी को मोहताज न हो। प्रतिरूप  प्रजा का  हो जिसमे , राज वो पाना चाहता हूँ, देश-प्रेम की नई वतन में, अलख जगाना चाहता हूँ॥ महाभारत के  इस कौशल में , हो उपोद्घात न  छक्कों का, जन्नत और न बनने  पाये यह लुच्चे, चोर-उचक्कों का। अस्मिता का मातृभूमि की, गीत मैं गाना चाहता हूँ, देश-प्रेम की नई वतन में, अलख जगाना चाहता हूँ॥ क्षुद्र सियासी लाभ के खातिर, इंतियाज न कोई संचित हो, सम-सुयोग मिले सबको, हक़ से न कोई वंचित हो। ऊँच-नीच, धर्म-जाति का, हर भेद मिटाना चाहता हूँ, देश-प्रेम की नई वतन में, अलख जगाना चाहता हूँ॥ हर दिन  हर घर में यहां    क्रिसमस, ईद ,दीवाली हो, देश के कोने-कोने में, समृद्धि और खुशहाली हो। श...

नाम की क्या फिकर.....

रूठो न इस तरह कि बात ख़ास से आम हो जाए, बेकस धडकनों की हयात सुबह की शाम हो जाए। कुछ इसतरह संभाले हम, बिखरने की ये कवायद, फजीहत न महफ़िल में,रिश्तों की सरेआम हो जाए। ढूढ़ते रहें तहेदिल से, नफरतों में तेरी मुहब्बत को, फासलों को बढ़ाने की हर कोशिश नाकाम हो जाए। वक्त के दिए जख्मों पर  परस्पर मरहम लगा के, दिलों को यूं मनायें,जान इक-दूजे के नाम हो जाए। आगाज कर 'परचेत' कुछ ऐंसा,अंजाम सुखद हो, नाम की फिकर कैसी जब दुनिया बदनाम हो जाए।

मजबूत लोकतंत्र के मायने !

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ज्यों-ज्यों पांच राज्यों उत्तराखंड, मणिपुर, पंजाब, उत्तरप्रदेश और गोवा के विधान सभा चुनावों में मतदान के दिवस नजदीक आ रहे हैं,, ख़ास कुछ न करते हुए भी आप और हम यह तो खूब अवलोकित कर ही सकते हैं कि हमारे समाज में ऐसा क्या ख़ास गलत हो रहा है जो वजहों में भी प्रतिबिंबित होता नजर आता है। और जल्दी ही यह स्पष्ट भी हो जाता है कि यद्यपि हम एक लोकतांत्रिक समाज हैं, मगर वे निर्णय जो सीधे तौर पर हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं, उनमे देश के सभी नागरिकों की समान भागीदारी नहीं होती है। आज यानि २५ जनवरी, २०१२ को भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना दिवस के अवसर पर इस आयोग द्वारा इसे राष्ट्रीय मतदाता दिवस के तौर पर मनाने की दूसरी पहल की जा रही है,(यह कार्यक्रम इस दिवस पर पिछले साल शुरू किया गया था)  जिसमे जगह-जगह मताधिकार के प्रति जन जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन कर युवा मतदाताओ को मतदान करने की शपथ दिलाने और इस वर्ष १८-१९ वर्ष की आयु पूरा कर चुके युवा मतदाताओं को मतदाता पहचान-पत्र बांटे जाने का कार्यक्रम है। और यह कहना गलत न होगा कि निर्वाचन आयोग ने ल...

श्रद्धांजली नेता जी को !

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जैसा कि हम सभी जानते है कि आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोष का जन्म दिवस है। २८ अप्रैल १९३९ जिस दिन वे कौंग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर उससे अलग हुए थे, उससे पहले के उनके कार्यों और उपलब्धियों और साथ ही इस दरमियां हुई उठापटक को मैं कौंग्रेस की परम्परागत शैली से ख़ास भिन्न नहीं देखता, क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि अगर १९२८ के कोलकता अधिवेशन में गांधीजी अंग्रेज हुकूमत से सिर्फ डोमिनियन स्टेटस की मांग के पक्षधर नहीं बनते और नेताजी के पूर्ण स्वराज्य की मांग का समर्थन करते तो क्या पता शायद भारत द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले ही अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया होता। खैर, ये बात और है की आज के हालातों पर जब नजर डालता हूँ तो सोचता हूँ कि ठीक ही हुआ जो गांधी जी ने उनकी बात नहीं मानी और देश जल्दी आजाद नहीं हुआ। लेकिन यहाँ पर उसके बाद के उनके देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और कुर्बानियों का संक्षित वर्णन विकिपीडिया और कुछ अन्य स्रोतों के सौजन्य से इस दिवस पर यहाँ अपने युवा शक्ति के लिए प्रस्तुत करना बेहतर समझता हूँ : 3 मई 1939 को नेताजी ने कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अप...

ऋतुराज वसंत आया !

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छंट गया  धरा से  शिशिर का सघन कुहा , सितारों से सजीला  तिमिर में गगन हुआ। भेदता है मधुर  कुहू-कुहू का गीत कर्ण, आतप  मंदप्रभा का  हो रहा अपसपर्ण। लाली ने छोड़ दी  अब ओढ़नी पाख्ली, मधुकर    ने फूल से  मधु-सुधा चाख ली। डाल-पल्लव कोंपलों के  रंग प्रकीर्ण है, छटा-सौन्दर्य से  हर चित माधुयीर्ण है। जोत ने धारण किया  सरसों के हार को, उऋर्ण कर दिया  अब  शीत ने तुषार को। भावे मन अमवा, महुआ की इत्रमय बयार, सजीव बन गए सभी  जवां और बूढ़े दयार। विभूषित वसुंधरा  बिखेरती पुरातन सुवर्ण, कश्मीर से केरला,  मणिपुर से मणिकर्ण। तज सभी उद्वेग-रंज,  खुशियाँ अनंत लाया, करने पूरी मुराद  ऋतुराज वसंत आया।। शब्दार्थ: आतप मंद्प्रभा = सूरज की मंद किरणे, सघन कुहा= घना कुहरा, अपसपर्ण=विस्तारण , पाख्ली = गर्म शॉल, प्रकीर्ण= भिन्न-भिन्न, माधुयीर्ण=प्रमोद से भरा, उऋर्ण=भारमुक्त, तुषार= ओंस छवि गुगुल से साभार !

स्टेनोग्राफर बनाम....

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एक आपात बुलावा आ जाने की वजह से ह्रदय रोग विशेषज्ञ और बाईपास सर्जन डाक्टर जैन एवं उनके असिस्टेंट डाक्टर त्रिवेदी सर्जरी के लिए ऑपरेशन टेबिल पर रखे मरीज से सम्बंधित   कुछ हिदायते, जेनी और जूली को देकर और उसे उनकी देख-रेख में छोड़कर तुरंत बगल वाले ऑपरेशन थियेटर में चले गए थे। इधर टेबिल पर बेहोश पड़े मरीज के सर्जरी के लिए फाड़े गए सीने के उसपार गाढा बैंगनी रंग लिए तह की सी मुद्रा में पड़े दिख रहे दिल में जब भी कोई हल्की सी कम्पन होती तो उसे गौर से देख रही जेनी, उसके बगल में खड़ी जूली की तरफ सिर घुमाकर हल्का सा मुस्कुरा भर देती थी। फिर कभी वह टेबिल पर रखी कास्त्रोविएजो कैंची को हाथ में लेकर उससे मरीज के दिल की उन तहों तो टटोलने लगती और फिर रुआंसी सी शक्ल बनाकर जूली से कहती कि माँ कहती थी कि मेरे लिए प्यार को इस निर्मम, कुकर्मी इंसान ने अपने दिल में छुपाकर रखा है, मैंने तो इसके दिल को सारा टटोल लिया, मुझे तो कहीं भी नजर नहीं आया। जूली ने मास्क से आधे ढके अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए चुटकी लेकर कहा; अरी, तू तो उसके दिल की सिर्फ बाहर की तहें ही टटोल रही है, क्या...

नसीहत

फैसला  हुकूमत का  फर्ज है प्रजा के लिए  मगर, अज्ञ कारिंदे* यह भी तो देखें , कि उड़ता है क्यों  सरेआम   मजाक  उनके फरमान का। जिन्दगी  तो तमाम हुई 'कर' भरते -भरते  , हुकूमते  हिन्द  ! कुछ ऐंसा  न करना कि खुद ही  अपना  महसूल* भी हमें चुकाना पड़े  अंत में शमशान का। इज़हार-ऐ-बेकसी मन की  कोई  तब  करे  भी तो  करे  किससे, अजनबियों के देश में जब न हो कोई  अपनी पहचान का। उसे इंसान  क्या  कहना जो पीड़ा का मर्म ही न समझे ,  अरे  खिजां* में  तो डाली भी समझती है दर्द नख्ल़*से बिछड़े  किसी ख़ेज़ान*का। रिश्तों के क़त्ल को खुदगर्ज  देकर  नाम लोक शाही का खाप-पंचायत, चौपालों में  रोज  हाट सजाते है  झूठी शान का। सुकून-ए-दिल मिलता है महत*  यथेष्ठ  मार्ग -दर्शन करके , अंतर्द्वंद्व में गुम्फित, कुंठित और दिग्भ्रमित  किसी नादान का। शिक्षा की...

हद-ए-गुजर !

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(कु)खुश-वाह-वाह मानसिकता और आरएसएस !

अपने इस गौरवशाली महान और प्राचीनतम हिन्दू सनातन धर्म ( जिसका संस्कृत वाक्यांश है 'चिरकालिक आचार' / 'अनंत धर्म' ) का एक प्रबल समर्थक होने के नाते मेरी हमेशा यही कोशिश रहती है कि हर उस बात, स्थान, व्यक्ति और संस्था का समर्थन करू जो इसके पक्ष में हो, और हर उसका विरोध करू जो इसे किसी भी किसी तरह से ठेस पहुंचाने की कोशिश करता हो! और शायद यही वजह थी कि मैं आरएसएस का शुभचिंतक रहा हूँ ! यही नहीं वक्त-वेवक्त जब भी किसी ने किसी मंच पर इसके ऊपर कीचड उछालने की कोशिश की हो, मैंने हमेशा अपने ढंग से उसका पुरजोर विरोध भी किया ! जहाँ तक बीजेपी का सवाल है, यह शायद नामुमकिन ही है कि कहीं पर इस नाम का जिक्र आये और लोग भाजपाइयों की तारीफ़ में निम्न दो बातों का उल्लेख न करें; एक तो इनका बड़बोलापन और दूसरा इसकी 'कथनी और करनी' में जमीन आसमान का फर्क (दोगलापन) ! और अपने देश में खासकर मैंने यह देखा है कि इन विशेषताओं वाले प्राणी अगर कभी लग्न और ईमानदारी से भी कोई प्रयास कर रहे हो तो देखने वाले को अक्सर वह भी " ड्रामेबाजी " ही नज़र आती है! हाँ, इसमें दोष देखने वाले का नहीं अपित...

परिवहन नियोजन !

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हालाँकि द्रुतगामी-उन्नति को यथार्थ के धरातल पर उचित ढंग से परिभाषित करना अभी बाकी है, किन्तु इसमें कोई दो राय नहीं है कि अपना देश तेजी से प्रगति कर रहा है। और इसी प्रगति की एक झलक आपको आज से दिल्ली के प्रगति मैदान में शुरू हुए कारों और वाहनों के महाकुम्भ में देखने को मिल जायेगी। पब्लिक पागल हुए जा रही है, नई-नई कारों के माडलों को देखने और खरीदने के लिए। सुनने में आया है कि एक निर्माता तो ऐसी गाडी भी प्रदर्शित कर रहा है जिसमे कि आपको घर का मजा भी मिलेगा और दफ्तर का भी,यानि सड़क पर ही घर भी और दफ्तर भी। दश्त-ओ-सहरा में वाहन-ऐ- कतार आ रही है, चाल में घोंघे-कछ्वों की भी रफ़्तार आ रही है। खिलाने-पहनाने को यथेष्ठ यद्यपि न हो घर में, कर्ज लेकर के किस्तों में ऑडी -कार आ रही है। तड़क-भड़क ने यों इसकदर मंथर बना दिया, हैं घर में चार-जने तो गाडी भी चार आ रही है। तमाम शिशिर गुजार दी अर्ध-आस्तीन में ही, और नए नए मॉडल देख मुंह में लार आ रही है। बावले दृश्यदर्शियों को देख सोचता है 'परचेत', गुलिस्तां में ये कैसी रौनक-ऐ-बहार आ रही है। यह...