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Showing posts from June, 2010

मन की !

आजकल यात्रा एवं अत्यधिक व्यस्तता की वजह से अपने ब्लॉग के लिए कुछ लिख पाने में असमर्थ हूँ , फिर भी जब भी वक्त मिलता है कंप्यूटर खोल टिपियाने बैठ जाता हूँ ! इस टिपियाने और ब्लॉग जगत का विचरण करने का भी अपना ही अलग मजा है ! यहाँ जो दो बाते मेरे मन को अक्सर बहुत उद्वेलित करती है, वह मैं आज आप लोगो को बताना चाहता हूँ ; १.बी. एस पाबला साहब का प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा जिसमे जब कभी इस किस्म की हेडिंग पाबला साहब ने लिखी होती है कि " हरिभूमि में विस्फोट " तो मुह से तुरंत निकलता है ' हे राम !, सत्यानाश हो इन आतंकवादियों का ! २. मोडरेशन लगे किसी ब्लॉग पर टिपण्णी करो और उसके तुरंत बाद स्क्रीन पर आपको दिखाई दे कि " आपकी टिपण्णी ब्लॉग मालिक के पास भेज दी गई है, प्रमाणित होने पर दिखने लगेगी " इस चेतावनी को पढ़कर मुझे तो पहले ऐसा महसूस होता है मानो मैंने कोई गुनाह कर दिया हो, दूसरा ऐसे भी लगता है कई बार कि मानो मैं दिल्ली जलबोर्ड के दफ्तर के बाहर अपनी अर्जी लेकर खडा हूँ पानी सप्लाई बहाल करने की प्रार्थना लेकर ! बाई दी वे क्या आपको भी ऐसा कुछ महसूस होता है ?

ज्वलंत सवाल: क्या भोपाल त्रासदी मसले पर कौंग्रेस ने देश को धोखा दिया है-आपकी क्या राय है ?

ब्लॉगबाणी पर पढने वाले पाठक एवं ब्लॉगर मित्रों, आपसे एक सवाल: देश, काल और परिस्थितियों में घटनाएं और दुर्घटनाये एक अलग विषय है, जिन पर अलग से बहस चल ही रही है, लेकिन भोपाल त्रासदी पर हाल के न्यायिक फैसले के बाद जो बाते एन्डरसन के मामले में सामने आयी है, उससे आपको नहीं लगता कि कौंग्रेस ने भोपाल त्रासदी मामले में देश को धोखा दिया है! इस विषय पर आपकी क्या राय है ? क्या आप भी सोचते है कि कौंग्रेस ने देश को धोखा दिया है ? 'हाँ' के लिए कृपया ब्लोग्बाणी पर मौजूद ब्लॉगबाणी स्कोर पर "पसंद" का चटका लगाए और 'ना' के लिए "नापसंद" का चटका लगाए ! नोट: मैं उम्मीद करता हूँ कि आप इसे इस तरह कदापि नहीं लेंगे कि मैं अपनी इस पोस्ट को हिट करवाने के लिए यह कर रहा हूँ, बल्कि इस तरह से लेंगे कि इस विषय पर हिन्दी ब्लॉगजगत के ज्यादातर लोगो की राय क्या है!

इस तरह फर्ज अदा करते मंत्रालय !

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जितनी सरकारी रकम खर्च करके सम्बद्ध मंत्रालयों द्वारा अपने चेहते अखबारों की इस विज्ञापन के द्वारा आर्थिक मदद की जाती है, उतने धन से या यूं कहूँ कि सिर्फ एक दिन के विज्ञापन पर खर्च की गई रकम से शायद दस हजार बाल मजदूरों का जीवन संवर जाता ! इस विज्ञापन से आप किस तबके के लोगों को जागरूक कर रहे है ? जो अखबार पढ़ना जानता ही नहीं, या फिर जिसके पास अखबार खरीदकर पढने की औकात नहीं ! क्या शोषणकर्ता वर्ग इन विज्ञापनों को महत्व देता है ?

भ्रष्ट राजनीति और रसूकदारों की रखैल बनकर रह गई है, हमारी यह न्याय व्यवस्था !

शुरू करने से पहले एक छोटी सी पहेली ; "यू मस्ट ब्रिंग दी चेंज" (You must bring the change !) यह महान वाक्य किसने कहा ? अगर न मालूम हो तो आप इसका उत्तर लेख के नीचे देख सकते है । किस तरह हमारी न्यायिक व्यवस्था की खामियों को अपने फायदे का हथियार बना ये न्यायतंत्र के खिलाड़ी इस कमजोर लोकतांत्रिक ढाँचे की खिल्ली उड़ा सकते है, यह आजकल आ रहे न्यायालयों के भिन्न-भिन्न फैसलों से स्पष्ट है। कम से कम अभी हाल ही में रुचिका-राठौर केस में हरियाणा की एक अदालत का फैसला, व कल ही आया भोपाल त्रासदगी का फैसला तो इसी बात की तरफ इशारा करते है कि हमारी यह न्यायव्यवस्था भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और रसूकदारों की रखैल बन कर रह गई है। वह त्रासदी दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी थी। हजारों लोग और जानवर इसमें मारे गए। जो इसकी चपेट में आने के बाद भी बच गए, उनके लिए सही दवाओं का इंतजाम अभी तक नहीं हो पाया है। सिर्फ उनके लक्षणों को देखकर उन्हें दवाएं दी जाती हैं। असली मर्ज की दवा उन्हें नहींमिली। यही कारण है कि वे अभी भी गैस के शिकार हैं। और इन फैसलों और न्याय में देरी से यह भी साफ़ तौर पर जाहिर है कि हमारे देश ...

स्टेयरिंग कवर !

समझ नही आता कि इसे आत्म-कथा कहूं, लघु कथा कहूं या फिर कोई एक बेसुरा गीत, मगर जीवन सफ़र मे कुछ बातें ऐसी होती रहती है जिनके निष्कर्षों को हम अपने-अपने अन्दाज मे, अपनी-अपनी विश्लेषण शैली मे समायोजित करने की कोशिश मे लगे रहते है। आम दिनचर्या से निकलकर आने वाली कुछ बाते, वारदातें एक ही वक्त मे जहां किसी के लिये कोई मायने नही रखती, वहीं वह किसी दूसरे हेतु अहम सी बन जाती है। वो शनिवार का दिन था। दिल्ली मे इस खास वार अथवा दिन पर ज्यादातर सरकारी और कुछ अर्ध-सरकारी तथा प्राईवेट संस्थाओं के दफ़्तर बन्द रहते है। मेरा दफ़्तर भी उस दिन आधे दिन के लिये ही खुलता है। अत: श्रीमती जी ने पिछ्ली शाम को ही तय कर लिया था कि दफ़्तर जाते वक्त ही उन्हे मैं रास्ते मे एक परिचित के घर छोडता जाऊ, और फिर दोपहर को लौटते मे पिक-अप भी करता चलू। सुबह नियत समय पर दफ़्तर के लिये निकला, श्रीमती जी साथ थी। ज्यों ही घर-मोहल्ले से निकल मुख्य सडक पर पहुंचे, श्रीमती जी बोली, आज शनिवार की वजह से सडक पर यातायात बहुत कम दीख रहा है, लाओ गाडी मैं चलाऊ? इतने कर्ण-प्रिय सुरीले स्वर मे किये गये आग्रह को भला मैं नजरन्दाज करने की हिमाकत कर भ...

सदविचार !

Patience(धैर्य)और Sense(विवेक)एक दूसरे के पूरक है, मगर जहां Patience दिखाने वाला उसे जरूरत से ज्यादा दिखा रहा हो,समझ लीजिये कि उसमे Sense की कमी है! - पी सी गोदियाल

जमाना !

सर  पे  बाल न हों तो  फिजूल में कंघे नहीं लेना , आईने में उभरते अपने ही अक्श का संज्ञान  नंगे नहीं लेना , ज़माना सचमुच में  बहुत खराब हो गया है , इसीलिये बेवजह   किसी से पंगे नहीं लेना।  

छि घृणित राजनीति !

अभी कुछ दिनों पहले देश ने वह भयावह मंजर देखा, जब हावडा-कुर्ला लोकमान्य तिलक ज्ञानेश्वरी सुपर डीलक्स एक्सप्रेस, जोकि कलकता से मुंबई जा रही थी, के १३ डिब्बे जगराम से १३५ किलोमीटर दूर सरडीहा और खेमासुली रेलवे स्टेशनों के बीच रेलवे स्टेशनों के बीच तडके १:३० बजे रेल पटरी पर किये गए ब्लास्ट की वजह से दुर्घटनाग्रस्त हो गए, जिसमे १५० से अधिक यात्री मारे गए और करीब २०० से अधिक घायल हुए ! उसी दिन मैंने इस बाबत एक लेख लिखा था जिसमे आशंका जताई थी कि यह सिर्फ नक्सली अथवा माओवादी कृत्य ही नहीं, कुछ और भी हो सकता है, क्योंकि उस घटना के ठीक दो दिन बाद पश्चिम बंगाल में म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुनाव होने वाले थे! आज एक खबर पर सहसा नजर गई , जिसमे कहा गया है कि माओ-नक्सली प्रवक्ता ने बीबीसी को फोन कर ( भारतीय सेक्युलर मीडिया पर तो उन्हें भी भरोसा नहीं रहा ) बताया कि वह घृणित कृत्य उन्होंने नहीं किया ! कल ही मैंने कहीं पर यह खबर भी पढी थी कि घटना का ठीकरा जिस पीसीपीए के सर फोड़ा जा रहा था, उसने भी अपने को इस घटना को अंजाम देने की बात से इनकार करते हुए अपने को अलग कर लिया ! हालांकि मैं इन वाम विचारधारा के...

जवानो के लिए मौत बिछवा रही है सरकार !

ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा है, माओवादियों और नक्सलियों के देशभर के करीब २० राज्यों में फैलते जा रहे जाल और केंद्र सरकार की इस ओर बरती जा रही बेहद उदासीनता पूर्ण नीति के चलते, आने वाले समय में हमारे सुरक्षा बलों के जवानों के लिए इन राज्यों में किसी भी तरह की आवाजाही न सिर्फ उनकी जान के लिए बल्कि आम नागरिकों के जीवन के लिए भी एक गंभीर ख़तरा बनती जा रही है! सरकार यह भली प्रकार से जानती है कि ये आतंकवादी किसी भी नेक इरादे से शांति वार्ता के लिए कभी भी आगे नहीं आयेंगे! दूसरी तरफ, किसी सैन्य कार्यवाही के लिए इनके मंत्रियों के विवादास्पद और परस्पर विरोधी बयानों की चलते, इन आतंकवादियों को अपनी गुरिल्ला गतिविधियों के लिए संगठित होने और निरंतर तैयारी का मौका मिल रहा है ! यूँ तो बहुत पहले से ही ये आतंकवादी बिहार झारखंड, उड़ीसा, प. बंगाल और छतीसगढ़ के घने जंगलो को जाने वाले सभी तरह के मार्गों पर बारूदी सुरंगे बिछाए रखे है, मगर हाल के लालगढ़ की सुरक्षाबलों की कार्यवाही के अनुभवों के आधार पर अब ये लोग अपनी घात लगा कर हमला करने की किसी भी तैयारी में कोई चूक नाहे होने देना चाहते और उसे और ...