जस दृष्टि, तस सृष्टि !
धर्म सृष्टा हो समर्पित, कर्म ही सृष्टि हो, नज़रों में रखिए मगर, दृष्टि अंतर्दृष्टि हो, ऐब हमको बहुतेरे दिख जाएंगे दूसरों के, क्या फायदा, चिंतन खुद का ही निकृष्ट हो। रहे बरकरार हमेशा, हमारा बाहुमुल्य मुल्य, ठेस रहित रहे भावना, आकुण्ठित न कृष्टि हो, विगत बरसात, किसने न देखा वृष्टि-उत्पात, दुआ करें, अगली बरसात सिर्फ पुष्प-वृष्टि हो।