रूप कुरूप नजर जो आये, अयथार्थ दिशा मे दर्पण देखो, तृप्ति हेतु करो जो अर्पण, उस अर्पण का तर्पण देखो। क्या बदला है गत बर्षों मे, नजर न आए, कण-कण देखो, दृष्टि का यह दोष है कह लो, सृष्टि बदलती क्षण-क्षण देखो। पतित प्राण असंख्य जगत मे, जम्हूरियत का वरण देखो, बडबोली हो रही दुःशीलता, आचरण का हरण देखो। मोल इसकदर डोल रहा क्यों, सनातन अपना प्रण देखो, तन-मन और कसैला मत कर, मन-मंदिर का जनगण देखो। सुख की इच्छा दुःख का कारण, माया बडी विलक्षण देखो, शीश झुकाया दर पर किसके, मन का व्यग्र समर्पण देखो।