Tuesday, November 16, 2021

खोट

रूप कुरूप नजर जो आये,

अयथार्थ दिशा मे दर्पण देखो, 

तृप्ति हेतु करो जो अर्पण,

उस अर्पण का तर्पण देखो।


क्या बदला है गत बर्षों मे,

नजर न आए, कण-कण देखो,

दृष्टि का यह दोष है कह लो,

सृष्टि बदलती क्षण-क्षण देखो।


पतित प्राण असंख्य जगत मे,

जम्हूरियत का वरण देखो,

बडबोली हो रही दुःशीलता,

आचरण का हरण देखो।


मोल इसकदर डोल रहा क्यों,

सनातन अपना प्रण देखो,

तन-मन और कसैला मत कर,

मन-मंदिर का जनगण देखो।


सुख की इच्छा दुःख का कारण,

माया बडी विलक्षण देखो,

शीश झुकाया दर पर किसके,

मन का व्यग्र समर्पण देखो।


9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (17-11-2021) को चर्चा मंच        "मौसम के हैं ढंग निराले"    (चर्चा अंक-4251)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    --
     हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   
    'मयंक'

    ReplyDelete
  2. सुख की इच्छा दुःख का कारण,

    माया बडी विलक्षण देखो,

    शीश झुकाया दर पर किसके,

    मन का व्यग्र समर्पण देखो।... सही कहा आपने ।देखने को तो बहुत कुछ है, पर देखता कौन है ? सराहनीय सृजन ।

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुंदर

    ReplyDelete
  4. सुख की इच्छा दुःख का कारण,

    माया बडी विलक्षण देखो,

    शीश झुकाया दर पर किसके,

    मन का व्यग्र समर्पण देखो।

    मन को छूने वाली पंक्तियाँ..अगर व्यक्ति ये सब कर ले तो उसकी चिंताओं का हरण हो जाए....

    ReplyDelete
  5. रूप कुरूप नजर जो आये,
    अयथार्थ दिशा मे दर्पण देखो,
    तृप्ति हेतु करो जो अर्पण,
    उस अर्पण का तर्पण देखो।
    बेहतरीन सृजन

    ReplyDelete

मिथ्या

सनक किस बात की,  जुनून किस बात का? पछतावे की गुंजाइश न हो,  शुकून किस बात का?