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Showing posts from 2015

असहिष्णुता का बेचारा ढोल !

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बेकसूरों के नरसंहार की आग सुलगी है जहान में,   और असहिष्णुता का ढोल पिट रहा, हिंदुस्तान में।  यहां पिटता हुआ ढोल तो सुनाई दे रहा है यूरोप में, किन्तु,ये कोई नहीं पूछता कि पोप क्यों है कोप में।   भड़की हुई है आग तो सीरिया, अफगानिस्तान में,  और असहिष्णुता का ढोल पिट रहा, हिंदुस्तान में।  त्रिभुवन में जब भी छाया लबेद का अन्धकार घना,    इतिहास साक्षी,ये हिन्द हर बेस हा रे का सहारा बना।   मुझे ये लग रहा, आ गया है खोट  कहीं  ईमान में, जभी, असहिष्णुता  का ढोल पिट रहा,हिंदुस्तान में।   चित्र: हमारे महान शहीद  कैप्टन कालिया       

सृष्टि कोप !

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सच

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संशय

क्षद्म-दाम-वाम के नापतोल बहुत हो गए, क्या करें,    सब  रंग  फीके पड़ गए घोल बहुत हो गए, क्या करें।       कलतलक जिन्हें जानता न था, श्वान भी गली का, ऐसे दुर्बुद्धिवृन्दों के मोल बहुत हो गए , क्या करें।   जिसको भी देखो,यहां से वहाँ लुढ़कता ही जा रहा, ये थालियों के बैंगन गोल बहुत हो गए, क्या करें।  कथानक अंतर्निहित मद का  खो दिया संचार ने,  डुगडुगी बजाने  को ढोल बहुत हो गए , क्या करें।   हरतरफ से उद्विकास की छिजने लगी अब "आश", 'परचेत'  तृभूमि में "होल"बहुत हो गए, क्या करे।    

कुछ कर !

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बाजुओं में अपनी, तू बल जगा , किसान का वंशज है, हल लगा।  फटकने न दे तन्द्रा पास अपने, आलस्य निज तन से पल भगा।  किसान का वंशज है, हल लगा।।  चिराग उपज का न कभी बुझे,  पुकारती है खेत की माटी तुझे, अंकुरित आशा का वो बीज हो,  जिसे दे न पाये कभी जल दगा। किसान का वंशज है, हल लगा।।  समर्थ है शख्शियत,ये सिद्ध कर , परिश्रम से खुद को समृद्ध कर , तन नजर आये न मलीन झगा, सीस पे चमके सदा शीतल पगा ,  किसान का वंशज है, हल लगा।। जोत का ध्येय दिल में पाले रख,  अन्न-कण श्रेष्ट को संभाले रख,  कर बंजरों में भी वो प्रजननक्षम,  बने जो तेरा खुद वसुधा तल सगा।  किसान का वंशज है, हल लगा।।

ज्ञानार्जन

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फ़रियाद

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रहन ग़मों से अतिभारित,  काँटों से भरी आवागम दी,  मन तुषार,आँखों में नमी ज्यादा, सांसो में हवा कम दी,     तक़ाज़ों का टिफिन लेकर, सिर्फ़ इतनी सी ग़िला तुझसे ,     कि ऐ ज़िन्दगी, तूने हमें,  दर्द ज्यादा और दवा कम दी। कहीं गले ही न पड़ जाए, इस डर से कभी किसी ने भेंटा ही नहीं, अपने बाजूओं को फैलाकर तहेदिल से  किसी ने लपेटा ही नहीं,  यहां सिर्फ कांच के टुकड़ों सी बिखरकर रह गई है तू ऐ जिंदगी , बदकिस्मत, हाथ कटने के डर से तुझे किसी ने समेटा ही नहीं।         

ईद है जी !

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शुद्धात्मा !

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आज की भोर पर  मज़हबी नजर आया  तमाम जग सा,  एक तो श्री गणेश चतुर्थी,  उसपर विश्वकर्मा दिवस सा, कुलबुलाहट सी जगी दिल में  शुद्ध-निर्मल होने की, धो डाला सब गंगाजल से,       मोबाइल फोन को भी नहीं बख्शा।   Happy Ganesh Chaturthi & V.Karma Day !       

गुरु स्तुति ! (शिक्षक दिवस के अवसर पर)

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अज्ञान के इन तूफानों में, हे गुरुदेव ! तुम दक्ष पाण्डित्य खेवनहार हो, जहालत के भवसागर में तैरती, ज्ञान और हुनर की पतवार हो। स्वधर्म है सहभाजना बोध-विद्या,   तुम प्रतीति  लहराती धार हो, सदा शांतचित मुख भाव-भंगिमा, हो सेज सिंधु भाटा या ज्वार हो।   रहते खुले सबके लिए सुजान पट,   तुम बुद्धि-विकास का आधार हो,  बांटने का है न कोई हद-हासिया, हो इसपर या सात सागर पार हो।   पार पा जाती है नैया उसी की , पा गया जो तुम्हारा प्यार हो,   अज्ञान के इन तूफानों में, हे गुरुदेव ! तुम दक्ष पाण्डित्य खेवनहार हो।   अत: हे गुरुदेव , आप सदैव मेरे पूज्य रहोगे ! स भी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाए !

पैरोडी -कुछ ऐसे भी बेअक्ल होते हैं

मन्ना डे  जी  का गाया  हुआ एक गाना है,…… " कुछ ऐसे भी पल होते है " उसी पर एक पैरोडी बनाई है; कुछ ऐसे भी बेअक्ल होते हैं, जो अक्लमंदों की हर बात पे रोते है, समझते तो खुद को बहुत ज्ञानी है, किन्तु होते असल में खोते है।      कुछ ऐसे भी बेअक्ल होते हैं ............................    ये 'वाद'यही गाते है कि गधा खेत खाए और कुम्हार मारा जाए', किस से छीने और किसका खाएं, हर वक्त यही ख्वाब संजोते है।    कुछ ऐसे भी बेअक्ल होते हैं ............................   समझते है, जग है सारा इनका, हो जाता ऐसे ही गुजारा इनका,   औरों  की करके नींद हराम, खुद चैन की गहरी नींद में सोते हैं।    कुछ ऐसे भी बेअक्ल होते हैं ............................    नीरव चाहे जब कोई,ये आकर के शोर मचाते हैं दुनिया भर का,  लत है इन्हे हराम का खाने की, हरतरफ नफरत के बीज बोते है।  कुछ ऐसे भी बेअक्ल होते हैं ............................    ...

व्यापमात्मा !

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धूर्त,पतित यह दौर कैंसा, मगज भी घूम जाते है,   कुटिल बृहत् कामयाबी के शिखर भी चूम जाते है।     मारक जाल बिछाये है, हरतरफ शठ-बहेलियों ने,   शिकंजे में न जाने कितने, फ़ाख़ता रोज आते है।    मुक़ाम हासिल न कर पाएं  वो जब माकूल कोई,   तो नेक,सुजान फिर दिल अपना मग्मूम पाते हैं।     'व्यापमात्मा' का पड़ जाए जहां मनहूस साया,  मुल्क काबिलों के हुनर से महरूम रह जाते है।   कोई पूछता न हो जिन कुकुरमुत्तों को गाँव में, शहर आके वे भी 'परचेत' मशरूम कहलाते हैं।  मगज  = माथा  फ़ाख़ता = कबूतर  मग्मूम = दुखी 

कार्टून कुछ बोलता है - श्रेष्ठ योग !

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छणिकाएँ

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एहसास : 'अच्छे दिन"  अभी दूर की कौड़ी है, इस जोड़े का दुस्साहस देखकर  इतना तो एहसास  मिल ही गया।   रमादान:  इबादत के इस दौर में, मांगता हूँ मैं भी ये दुआ खुदा से कि   ऐ खुदा, कुछ अंधभक्तों को भी अपने, थोड़ी सी अक़्ल देना। क्रेडिट कार्ड:  बनकर आया है जबसे अपनी श्रीमती जी का क्रेडिट कार्ड,  घर ई-कॉमर्स कंपनियों के   दफ़्ती,डिब्बों के ढ़ेर में तब्दील हो गया है।    अच्छे दिनों के इंतज़ार में : जरुरत से ज्यादा 'लीद' निकाली है  जबसे कम्बख्त  मैगी ने,  बुरे दिन लौट आये है स्वास्थ्य विघातक अर्वाचीन  बीवियाँ के।   योग जूनून: कुछ इसतरह फंस गई जिंदगी  अलोम -विलोम के चक्कर में कि अब तो बीवी के हाथों की सुबह की चाय भी नसीब नहीं होती।       

कार्टून कुछ बोलता है - दुम

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शुभ वसंत !

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