तुझे न पा सकने का मुझे मलाल तो था,
क्यों न पा सका, दिल मे ये सवाल तो था,
न पा सकने की चाहे वजह कोई भी रही हो,
वो पल था,दिन था,महिना था और साल तो था।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
तुझे न पा सकने का मुझे मलाल तो था,
क्यों न पा सका, दिल मे ये सवाल तो था,
न पा सकने की चाहे वजह कोई भी रही हो,
वो पल था,दिन था,महिना था और साल तो था।
अब छोड देंगे वो भी पीछा करना,
हमारी परछाइयों का,
उनको भी रास आने लग गया है,
आलम ये तन्हाइयों का।
इक शुष्क दरिया समझते थे हमें
'परचेत', जो समंदर की चाह वाले,
उनको भी अब अंदाजा हो गया हैं,
हमारे दिल की गहराइयों का।
तूफान, नदियां समंदर पे
तू न इस तरह हमसे सवाल कर,
डूबती हुई कई कश्तियां
हम भी लाए हैं भंवर से निकाल कर।
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छुपा लो जितना छुपाना है खुद को,
परदो के पीछे, फिर नहीं आएंगे हम,
बस, और कुछ दिनों की ही बात है,
किसी दिन लेटे-लेटे तेरी गली से गुजर जाएंगे हम।
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हम गाय,भैंस,घोड़े नहीं थे,
फिर भी बंधे हमेशा तबेले रहे,
तन्हाइयां साथ अपने बहुत थी,
सफर में किन्तु अकेले रहे।
गिले-शिकवे तुम हजार करोगे और
खुदा होने का दावा भी बार-बार करोगे,
'परचेत' पूछता है अरे वो जाहिलों,
खुद के दिल से खुद का कब दीदार करोगे।
खुदगर्जी के वास्ते न कभी
किसी को बदनाम किया तूने,
किसी की भी उपलब्धियों को
न कभी अपने नाम किया तूने,
क्योंकि तू इक हद की हद तक
परचेत था 'परचेत',
इसलिए जिंदगीभर,
अपनी शर्तो पर काम किया तूने।
जिंदगीभर पकते रहे यह सुनते-सुनते
कि नेगेटिव नहीं हमेशा पौजेटिव सोचो,
काश कि जमाने को अस्पताल का
यह दस्तूर भी पता होता कि
नेगेटिव आए तो सही,
पौजेटिव मतलब जेब पर डाका।
जिंदगी मे जो रात आखिरी होगी,
समझ लेना कि वो बात आखिरी होगी,
झख मारते रहे तेरे वास्ते,
जिंदगी भर 'परचेत',
अब ये सावन की बरसात आखिरी होगी।
जो किसी के भी दिल में नहीं बसता हो,
उसे तू अपने दिल में ऐसे न बसाया कर,
इतनी सी आरज़ू है तुझसे मेरी 'परचेत',
अपना ग़म लेके इधर-उधर मत जाया कर।
उनको देखकर कुछ न भाया,
सहज थे,असहज से भा गए,
नूर चेहरे का तो तब छलका,
महफ़िल में जब तुम आ गए।
अगाध होते हैं रिश्ते दिलों के,
इक ज़माना था जो हम गाते,
तय पथ था और सफ़र अटल,
उम्मीदों पे कब तक ठहर पाते।
जागी है जब कुछ ऐसी तमन्ना
कि इक नये सांचे में ढल जाते,
नजर आता जो सुकून हमको,
कागज पर लफ्ज़ उतर जाते ।
सफर जारी है धीमे-धीमे मगर,
मुकर्रर वो रास्ते नहीं भाते,
घर की मुंडेरी पे बैठने को 'परचेत',
अब परिंदे भी नहीं आते।।
गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे थे,
तमाशबीन बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे से रूठे थे।
डरी सूरत बता रही थी,बिखरे महीन कांच के टुकडो की,
कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे थे।
ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन,
इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे थे।
पटकी जा रही थी हर चीज,जो पड़ जाए कर-कमल उनके,
वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे थे।
तनिक शुश्रुषा की कमी 'परचेत', मनुहार मिलाना भूल गए,
फकत इतने भर से ही बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे थे।
तुझे न पा सकने का मुझे मलाल तो था, क्यों न पा सका, दिल मे ये सवाल तो था, न पा सकने की चाहे वजह कोई भी रही हो, वो पल था,दिन था,महिना था औ...