Tuesday, January 31, 2012

रिश्तों का इल्म !


प्रणय-धड़कन का दिल में बसने,
जीवन के सहभागी बनने हेतु
रिश्तों की बुनियाद में
यकीन नाकाफी क्यों?
दो दिलों के इकरारनामे को मुद्रांकित
करवाने की हठ-धर्मिता कैंसी?

तुम जानती हो कि
अनुबंध असीम नहीं होते,
और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत
सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही
एकनिष्ठता की कोमल डोर को
रहन पर नहीं रख सकता ,
क्योंकि मियाद खत्म होने के बाद
यह मुसाफिर तन्हा ही फिर से
दश्त का वीरान सफ़र तय नहीं कर पायेगा।  

Sunday, January 29, 2012

संकल्प !



 




भ्रष्टाचार के इस कानन में,
आग लगाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ।

अशक्तजन का और न  होवे 
प्राबल्य सद्सद्विवेक नाश,
मन में बैठे उसके भय को,
दूर भगाना चाहता हूँ॥


परिवार एवं बंशवाद का,
हम पर कोई राज न हो,
देश तमाम में जनमानस,
रोटी को मोहताज न हो।

प्रतिरूप प्रजा का हो जिसमे ,
राज वो पाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


महाभारत के  इस कौशल में ,
हो उपोद्घात न  छक्कों का,
जन्नत और न बनने  पाये
यह लुच्चे, चोर-उचक्कों का।

अस्मिता का मातृभूमि की,
गीत मैं गाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥

क्षुद्र सियासी लाभ के खातिर,
इंतियाज न कोई संचित हो,
सम-सुयोग मिले सबको,
हक़ से न कोई वंचित हो।

ऊँच-नीच, धर्म-जाति का,
हर भेद मिटाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


हर दिन हर घर में यहां   
क्रिसमस, ईद ,दीवाली हो,
देश के कोने-कोने में,
समृद्धि और खुशहाली हो।

शहीदों के सपनों का सच्चा,
स्वराज मैं पाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


छवि गूगल से साभार !




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Friday, January 27, 2012

नाम की क्या फिकर.....




रूठो न इस तरह कि बात ख़ास से आम हो जाए,
बेकस धडकनों की हयात सुबह की शाम हो जाए।

कुछ इसतरह संभाले हम, बिखरने की ये कवायद,
फजीहत न महफ़िल में,रिश्तों की सरेआम हो जाए।

ढूढ़ते रहें तहेदिल से, नफरतों में तेरी मुहब्बत को,
फासलों को बढ़ाने की हर कोशिश नाकाम हो जाए।

वक्त के दिए जख्मों पर  परस्पर मरहम लगा के,
दिलों को यूं मनायें,जान इक-दूजे के नाम हो जाए।

आगाज कर 'परचेत' कुछ ऐंसा,अंजाम सुखद हो,
नाम की फिकर कैसी जब दुनिया बदनाम हो जाए।

Wednesday, January 25, 2012

मजबूत लोकतंत्र के मायने !


ज्यों-ज्यों पांच राज्यों उत्तराखंड, मणिपुर, पंजाब, उत्तरप्रदेश और गोवा के विधान सभा चुनावों में मतदान के दिवस नजदीक आ रहे हैं,, ख़ास कुछ न करते हुए भी आप और हम यह तो खूब अवलोकित कर ही सकते हैं कि हमारे समाज में ऐसा क्या ख़ास गलत हो रहा है जो वजहों में भी प्रतिबिंबित होता नजर आता है। और जल्दी ही यह स्पष्ट भी हो जाता है कि यद्यपि हम एक लोकतांत्रिक समाज हैं, मगर वे निर्णय जो सीधे तौर पर हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं, उनमे देश के सभी नागरिकों की समान भागीदारी नहीं होती है।
आज यानि २५ जनवरी, २०१२ को भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना दिवस के अवसर पर इस आयोग द्वारा इसे राष्ट्रीय मतदाता दिवस के तौर पर मनाने की दूसरी पहल की जा रही है,(यह कार्यक्रम इस दिवस पर पिछले साल शुरू किया गया था)  जिसमे जगह-जगह मताधिकार के प्रति जन जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन कर युवा मतदाताओ को मतदान करने की शपथ दिलाने और इस वर्ष १८-१९ वर्ष की आयु पूरा कर चुके युवा मतदाताओं को मतदाता पहचान-पत्र बांटे जाने का कार्यक्रम है। और यह कहना गलत न होगा कि निर्वाचन आयोग ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए जो कदम उठाया है, वह एक सराहनीय कदम और सही मायने में अक्लमंदी का काम है।



मगर इन सारे प्रयासों के मध्य अब सवाल यह उठ खडा होता है कि आखिर यह मजबूत लोकतंत्र है किस चिड़िया का नाम? एक मजबूत लोकतंत्र के क्या मायने होते है? कल मेरी अपने एक मित्र से फोन पर बात हो रही थी, वे बता रहे थे कि आगामी ३० तारीख को उत्तराखंड में उनके क्षेत्र में चुनाव है, और अभी तक वहां ज्यादातर लोगो को यह मालूम नहीं है कि उनके क्षेत्र से कौंग्रेस और बीजेपी का उम्मीदवार है कौन ? और अगर यही हाल रहा तो वो परम्परागत मतदाता, जिन्हें कौंग्रेस और बीजेपी में से किसी एक पार्टी के उम्मीदवार को वोट देना होगा, वे वगैर यह जाने कि अगले पांच वर्षों तक उनके क्षेत्र का राज्य में प्रतिनिधित्व कौन शख्स करने जा रहा है, सिर्फ पार्टी के नाम पर वोट डाल दिए जायेंगे। सूचना क्रांति के इस भीषण दौर में भी यह कितनी हास्यास्पद और शर्म की बात है हमारे इस लोकतंत्र के लिए। अमेरिका की तर्ज पर मतदातावों के समक्ष दो प्रत्याशियों की बौद्धिक क्षमता और वाकपटुता जानने के लिए उनके बीच सार्वजनिक वाद-विवाद तो इस देश में अभी दूर की कौड़ी है , मगर क्या मजबूत लोकतंत्र के यही मायने है कि राजनैतिक पार्टियों ने भले ही अपने प्रत्याशियों के तौर पर चोर, लुटेरे, देशद्रोही, बलात्कारी, हत्यारे और अराजक तत्वों को खडा किया हो, और हम एक अच्छे नागरिक का फर्ज अदा करते हुए आँख मूंदकर उनमे से किसी एक को वोट डाल आयें?



चुनावों में देश के करदाता की गाडी कमाई का अरबों-खरबों रूपया खर्च किया जाता है, क्या हमारी सरकार और चुनाव आयोग के पास उसे व्यावहारिक तौर पर खर्च करने की इच्छा शक्ति नहीं है? सरकार और चुनाव आयोग द्वारा  चुनावों में धन और बाहुबल के उपयोग और आपराधिक छवि के उम्मीदवारों का चुनावों में प्रत्याशी  बनने का रोना तो खूब रोया जाता है, मगर क्या कभी इसे रोकने के सार्थक और ईमानदार प्रयास किये जाते है? पिछले आम चुनावों में प्रत्याशी का ब्योरा मतदाताओं को उपलब्ध कराने के खूब शिगूफे छोड़े गए थे, मगर ऐसा कुछ आज किसी को चुनाव-सुधार के धरातल पर हुआ नजर आता है ? किसी भी विधानसभा अथवा लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा कितने उम्मीदवार खड़े होते है ? १०,२०,३०,४० और अधिकतम ५०, फिर क्यों नहीं हर मतदाता केंद्र पर, जहाँ वोट देने आये मतदातावों की कतार लगाई जाती है, उस कतार के दायें-बाएं उस क्षेत्र के हर उम्मीदवार का पोस्टरों के जरिये यह ब्योरा मतदाता की जानकारी के लिए उपलब्ध  कराया  जाता है कि अमुक प्रत्याशी ने अपनी  कुल कितनी सम्पति घोषित की है, उसके ऊपर कितने और किस प्रकार के आरोप अब तक लगे है, और कितने और किस प्रकार के आरोपों में उसपर मुक़दमे दायर हैं, उसकी पृष्ठभूमि क्या है? आजादी के ६५ साल बाद भी क्यों नहीं इस प्रकार की तात्कालिक जानकारी देने की व्यवस्था के गई ? क्योंकि सरकार  में बैठे लोगो के खुद के कपड़ों पर ही अनेकों दाग हैं।



उत्तरप्रदेश की मौजूदा सरकार ने भले ही मजबूरियों और चुनावी हथकंडों के तौर पर अपने मंत्रीमंडल के मंत्रियों और विधायकों का एक अच्छा-खासा हिस्सा निकाल बाहर किया हो, या फिर वे जेल की सलाखों के पीछे हों, मगर यह तो साबित हो ही गया कि पिछले पांच सालों से कौन से महापुरुषों के हाथों में उत्तर प्रदेश की सत्ता की बागडोर थी। क्या एक मजबूत लोकतंत्र और दलित-दमित की दुहाई देकर देश-प्रदेशों को ऐंसे लोगो के हवाले कर दिया जाये ? जब मौजूदा सरकार पांच साल पहले सत्ता में आई थी तो जनता ने उसवक्त किसके कुशासन से क्षुब्द होकर इन्हें सता की बागडोर सौंपी थी? क्या पांच साल बाद उस पिछली सरकार (एसपी की सरकार ) के सारे गुनाह और करतूतें माफ़ कर दी जाएँ इस चुनाव में? क्यों नहीं चुनाव आयोग हर उस राजनैतिक दल, जो पहले उस प्रदेश में सता में रहे हो, उनके कार्यकाल के दौरान हुए प्रमुख घपलों और कुशासन को पोस्टरों पर उतार मतदान के समय मतदाता को उपलब्ध करता है? उत्तरप्रदेश की आज जो स्थिति है उसका जिम्मेदार कौन ? और फिर ५ साल पहले जनता ने जिसे इसको सुधारने की जिम्मेदारी सौंपी थी, उन्होंने जनता के इस विश्वास को कैसे तोडा किसी से छुपा नहीं। अब यदि वह जोड़-तोड़ और अनैतिक हथकंडों एवं भोली-भाली जनता की भावनाओं को हथियार बनाकर दोबारा सत्ता हथिया ले तो क्या उसके पिछले सारे गुनाह माफ समझे जाएँ, यही एक मजबूत लोकतंत्र की परिभाषा है?



राजनैतिक दल जिसतरह वोटरों को लुभाने के लिए सामूहिक रिश्वत की राजनीति अपना रहे है, अनाप-शनाप प्रलोभन दे रहे है, क्या एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र में ऐसे प्रलोभनों की राजनेतावों को छूट दी जा सकती है? कल तो फिर ये वोटरों से यह भी वादा कर आयेंगे कि यदि वे सत्ता में आये तो देश का विभाजन कर उन्हें अलग देश दे देंगे । सत्ता में आकर और उच्च पदों पर आसीन होकर, जनता के ही धन की हेराफेरी कर उसे धन से राजनैतिक दल अथवा नेता वोटरों को लुभाने का काम करते है और अपना घर भरते है, तो क्या वह एक मजबूत लोकतंत्र का द्योतक है? यहाँ एक और मुख्य बात मैं कहना चाहूँगा कि हम हिन्दुस्तानियों ने "ढुलमुल" शब्द को सदियों पहले गले लगा लिया था और उसी की परिणिति थी तीन-तीन गुलामियाँ। इसी  ढुलमुल परिपाटी पर चलते  भ्रष्टता,गुलामी और गद्दारी इस कदर हमारी रगों से चिपक गई कि हम सिर्फ और सिर्फ अपने दुष्कार्यों को सही ठहराने के लिए तर्क ढूढ़ते है।


और अंत में एक सबसे अहम् सवाल वोटर की आजादी का। इस देश में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के कुछ तथाकथित ठेकेदार जो सही मायनो में सबसे बड़े साम्प्रदायिक प्रवृति के लोग है, वे एक वक्त पर तो अन्ना जी पर यह आरोप लगाते है कि कहने के लिए यह लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए चलाया जा रहा आंदोलन है, लेकिन किसी एक सवाल या मुद्दे पर किसी राजनैतिक दल को वोट नहीं देने की अपील क्या लोकतंत्र की मजबूती के लिए है, और आ वहीं दूसरी तरफ इन चुनावों में किसी एक राजनैतिक दल को वोट देने की अपनी पूरी जमात को फरमान जारी कर रहे है, और इतना ही नहीं उनकी यह भेड़ प्रवृति पिछले ६५ सालों से आँख मूँद इन वोट के ठेकेदारों के निर्देशों का अनुसरण भी कर रही है। क्या यही एक स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र की परिभाषा है? पिछले ६ दशकों में इस तरह की प्रवृति पर रोक लगाने के कारगर प्रयास क्यों नहीं किये गए ?



हालांकि, देश में आज जिस तरह का राजनैतिक माहौल है, जिस तरह के लोग सता पर काबिज हो रहे है, एक सही मायने में परिपक्व और मजबूत लोकतंत्र को पाने के लिए अभी हमें बहुत लंबा सफ़र तय करना है, मगर मैं यह उम्मीद करता हूँ कि आने वाले समय में हम लोकतंत्र की खामियों को दूर करने और एक विकसित तथा लोकतांत्रिक आदर्श को स्थापित करने की ओर अपने चुनाव संबंधी सुधारात्मक ईमानदार प्रयास निरंतर जारी रखेंगे। मुझे विश्वास है कि हमारे लोकतंत्र में अभी ऐसे बहुत से परिवर्तनों की गुंजाईश है, जो हमें एक मजबूत लोकतंत्र और बेहतर भारत की ओर अग्रसर कर सकते है।



क्षुब्द मन से आप सभी को अपनी एक पुरानी कविता की इन दो लाइनों के साथ कि;

लूंठक, बटमारों के हाथ में आज  अपना देश है,
गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है।

गणतंत्र दिवस और मतदाता दिवस की हार्दिक वधाई देता हूँ !


UP 1st phase poll candidates: 38% criminals, 51% millionaires

Almost all major political parties have fielded candidates who have criminal cases registered against them. Samajwadi Party has 28 out of 55 (51 %), Bahujan Samaj Party 24 out of 55 (44 %), Bhartiya Janta Party 24 out of 55 (44 %), Indian National Congress 15 out of 54 (28 %), Peace Party 12 out of 42 (29 %), Janta Dal(U) 5 out of 20 (25 %), Rashtriya Lok Dal 1 out of 1 (100 %) candidates with declared criminal cases.Out of these 109 candidates with declared criminal cases, 46 (16 %) have been charged with serious criminal cases like murder, attempt to murder, kidnapping, robbery, extortion etc. BJP has 12, BSP 11 , SP 11 , Peace Party 6 , INC 5 , JD(U) 1 such candidates.




जय हिंद !


इस विषय पर आप मेरे इस पुराने लेख " ये वोटर कब सुधरेंगे " पर भी नजर डाल सकते है !

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Monday, January 23, 2012

श्रद्धांजली नेता जी को !

जैसा कि हम सभी जानते है कि आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोष का जन्म दिवस है। २८ अप्रैल १९३९ जिस दिन वे कौंग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर उससे अलग हुए थे, उससे पहले के उनके कार्यों और उपलब्धियों और साथ ही इस दरमियां हुई उठापटक को मैं कौंग्रेस की परम्परागत शैली से ख़ास भिन्न नहीं देखता, क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि अगर १९२८ के कोलकता अधिवेशन में गांधीजी अंग्रेज हुकूमत से सिर्फ डोमिनियन स्टेटस की मांग के पक्षधर नहीं बनते और नेताजी के पूर्ण स्वराज्य की मांग का समर्थन करते तो क्या पता शायद भारत द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले ही अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया होता। खैर, ये बात और है की आज के हालातों पर जब नजर डालता हूँ तो सोचता हूँ कि ठीक ही हुआ जो गांधी जी ने उनकी बात नहीं मानी और देश जल्दी आजाद नहीं हुआ।



लेकिन यहाँ पर उसके बाद के उनके देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और कुर्बानियों का संक्षित वर्णन विकिपीडिया और कुछ अन्य स्रोतों के सौजन्य से इस दिवस पर यहाँ अपने युवा शक्ति के लिए प्रस्तुत करना बेहतर समझता हूँ : 3 मई 1939 को नेताजी ने कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। मगर कुछ दिन बाद उनको कांग्रेस से निकाल दिया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही नेताजी ने स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र करने के लिए जनजागरण शुरू कर दिया। इसलिए अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। जब उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया तो उन्हें उनके घर पर नजरबदं कर दिया गया। उन्होंने नजरबंदी से निकलने की योजना बनाई और एक दिन वे भेष बदलकर पेशावर, काबुल होते हुए इटली और फिर जर्मनी पहुंचे। फिर वे एक दिन समुद्री रास्ते से मेडागास्कर, इंडोनेशिया होते हुए सिंगापुर पहुंचे और वहां से शुरू हुई आजाद हिंद फ़ौज की जंग। 21 अक्तूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गए। आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकडे़ हुए भारतीय युद्धबंदियोंको भर्ती किया। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।



द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। इसलिए उन्होंने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था। 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। 23 अगस्त 1945 को जापान की दोमेई समाचार संस्था ने बताया कि 18 अगस्त को नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस सफर के के बाद से ही उनका कुछ भी पता नहीं चला।












इस महान नायक को शत-शत नमन !



अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद का जयघोष तुम्हारा,


फिर याद करता तुम्हे ऋणी देश, ऐ बोष तुम्हारा,


आज के नेता स्वार्थपरता से न बाहर झाँक पाए,


खेद, हम कद्र तुम्हारी कुर्बानियों की न आंक पाए,


देश लूटा लुन्ठकों ने, अब लगे है कुकृत्य दफ़न पर,


ले जायेंगे संग शायद, जेब स़ी रहे अपने कफ़न पर,


आज फिर जवाँ सीनों में सुलग रहा रोष तुम्हारा !


फिर याद करता तुम्हे ऋणी देश, ऐ बोष तुम्हारा !!

Friday, January 20, 2012

ऋतुराज वसंत आया !


छंट गया धरा से 
शिशिर का सघन कुहा ,
सितारों से सजीला 
तिमिर में गगन हुआ।


भेदता है मधुर 
कुहू-कुहू का गीत कर्ण,
आतप मंदप्रभा का 
हो रहा अपसपर्ण।


लाली ने छोड़ दी 
अब ओढ़नी पाख्ली,
मधुकर  ने फूल से 
मधु-सुधा चाख ली।


डाल-पल्लव कोंपलों के 
रंग प्रकीर्ण है,
छटा-सौन्दर्य से 
हर चित माधुयीर्ण है।


जोत ने धारण किया 
सरसों के हार को,
उऋर्ण कर दिया अब 
शीत ने तुषार को।


भावे मन अमवा,
महुआ की इत्रमय बयार,
सजीव बन गए सभी 
जवां और बूढ़े दयार।


विभूषित वसुंधरा 
बिखेरती पुरातन सुवर्ण,
कश्मीर से केरला, 
मणिपुर से मणिकर्ण।


तज सभी उद्वेग-रंज, 
खुशियाँ अनंत लाया,
करने पूरी मुराद 
ऋतुराज वसंत आया।।



शब्दार्थ: आतप मंद्प्रभा = सूरज की मंद किरणे, सघन कुहा= घना कुहरा,
अपसपर्ण=विस्तारण , पाख्ली = गर्म शॉल, प्रकीर्ण= भिन्न-भिन्न,
माधुयीर्ण=प्रमोद से भरा, उऋर्ण=भारमुक्त, तुषार= ओंस

छवि गुगुल से साभार !


Thursday, January 19, 2012

स्टेनोग्राफर बनाम....

एक आपात बुलावा आ जाने की वजह से ह्रदय रोग विशेषज्ञ और बाईपास सर्जन डाक्टर जैन एवं उनके असिस्टेंट डाक्टर त्रिवेदी सर्जरी के लिए ऑपरेशन टेबिल पर रखे मरीज से सम्बंधित   कुछ हिदायते, जेनी और जूली को देकर और उसे उनकी देख-रेख में छोड़कर तुरंत बगल वाले ऑपरेशन थियेटर में चले गए थे। इधर टेबिल पर बेहोश पड़े मरीज के सर्जरी के लिए फाड़े गए सीने के उसपार गाढा बैंगनी रंग लिए तह की सी मुद्रा में पड़े दिख रहे दिल में जब भी कोई हल्की सी कम्पन होती तो उसे गौर से देख रही जेनी, उसके बगल में खड़ी जूली की तरफ सिर घुमाकर हल्का सा मुस्कुरा भर देती थी। फिर कभी वह टेबिल पर रखी कास्त्रोविएजो कैंची को हाथ में लेकर उससे मरीज के दिल की उन तहों तो टटोलने लगती और फिर रुआंसी सी शक्ल बनाकर जूली से कहती कि माँ कहती थी कि मेरे लिए प्यार को इस निर्मम, कुकर्मी इंसान ने अपने दिल में छुपाकर रखा है, मैंने तो इसके दिल को सारा टटोल लिया, मुझे तो कहीं भी नजर नहीं आया। जूली ने मास्क से आधे ढके अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए चुटकी लेकर कहा; अरी, तू तो उसके दिल की सिर्फ बाहर की तहें ही टटोल रही है, क्या पता उसने तेरे लिए प्यार को दिल की उस गठरी के अन्दर छुपा रखा हो।

उसका इतना कहना था कि क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में अन्दर ही अन्दर जल रही जेनी ने अपना दस्तानेयुक्त दांया हाथ मरीज के दो-फाड़ हुए पड़े सीने के अन्दर घुसेड दिया और उसके दिल की दोनों तहों को हथेली में लेकर जोर से उसे पिचका दिया। जूली को जेनी से ऐंसे व्यवहार के कदापि भी अपेक्षा न थी, उसने चीखते हुए और यह कहते हुए कि साली तू पागल हो गई है क्या, बांये हाथ से एक जोर का चांटा उसकी गर्दन पर कसा। जेनी ने हौले से अपना हाथ मरीज के सीने से ऊपर उठाया और आंसुओं के समंदर में तैरती अपनी आँखों की कातर नज़रों से जूली को निहारा, मुंह से उसके एक भी शब्द नहीं फूटा। जूली भयभीत नजरों से मरीज के दिल को देख रही थी, जो दबाव पड़ने से सिकुड़ सा गया था और धमनियों से उसके काला गाढा खून निकल आया था। तभी सामने से थियेटर का दरवाजा खुला और डाक्टर जैन और उनके सहायक डाक्टर अन्दर  प्रविष्ट हुए। जेनी और जूली को तो जैंसे सांप सूंघ गया था, जूली थर-थर कांप रही थी।

अगले दिन सुबह करीब ग्यारह बजे बाईपास सर्जन डाक्टर जैन मरीज से बातों में मशगूल थे और उसे ह्रदय से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ और सावधानियां बता रहे थे, कि तभी एक ट्रे लेकर जेनी उधर से गुजरी और  डाक्टर जैन ने उसे कड़कती स्वर-ध्वनी में आवाज दी, सिस्टर...... ! जेनी डरी-डरी सी डाक्टर जैन के समीप पहुँची तो सामने बिस्तर पर लेटा मरीज सकपका कर उठने की कोशिश करने लगा। डाक्टर ने उसे रिलैक्स होकर आराम से लेटे रहने की हिदायत दी और फिर चेहरे पर व्यंगात्मक मुस्कान लाकर जेनी को घूरते हुए बोले ;इनसे मिलिए  ये सिस्टर जेनी है , और इन्ही के करामाती इलाज से आप बिना बाईपास सर्जरी के ही ठीक हो गए है, और जहां तक मैं समझता हूँ आपके दिल की धमनियों में अब शायद ही दुबारा कोई रुकावट पैदा हो, क्योंकि धमनियों में जमा हुआ सारा रक्त का थक्का पूरी तरह से साफ़ होकर बाहर निकल चुका है, मेरे लिए यह घटना वाकई किसी  चमत्कार जैसा है, और आपको सिस्टर जेनी का इसके लिए शुक्रिया भी अदा करना चाहिए। मरीज ने एक हल्की मुस्कान चेहरे पर लाते हुए जेनी को निहार उसकी तरफ अपने दोनों हाथ जोड़ दिए थे। जेनी, डाक्टर जैन को 'मैं जाऊ सर' कहकर तेज कदमो से उस वार्ड से बाहर निकल गई थी। आठ साल पुराना मंजर, जब बड़ी बेआबरू होकर वह सुप्रियो के घर से निकली थी, इसवक्त उसकी आँखों के सामने किसी चलचित्र की भांति चल रहा था................................।

विज्ञापन का एक छोटा सा प्रारूप सुप्रियो ने ज्यों ही केबिन में अपनी मेज के ठीक सामने बैठे अपने कार्मिक प्रबंधक श्री गुप्ता को सौंपा तो वह उस पर नजर डालते ही एकदम सकपका कर बोल पडा.... सर, ये क्या, हमारी कंपनी में हिन्दी स्टेनोग्राफर की क्या जरुरत ? आपको तो एक कंप्यूटर ऑपरेटर की जरुरत थी, और आप विज्ञापन हिंदी आशुलिपिक का निकाल रहे है ? हिन्दी में तो हमारे ऑफिस में कोई काम.... सुप्रियो ने शांत स्वर में उसकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा; गुप्ताजी आप सवाल बहुत ज्यादा करते है, मुझे किस चीज की ज्यादा जरुरत है, इसका ध्यान मुझे आपसे बेहतर है, इस कम्पनी का वाइसप्रेसिडेंट-संचालन मैं हूँ, ना कि आप।..... आप जाइये और ऐड निकलवाइए......प्लीज !

भर्ती की निश्चित प्रक्रिया पूरी होने के बाद आकांक्षा बनर्जी उर्फ़ जेनी (वह खुद को इसी नाम से पुकारना ज्यादा पसंद करती थी) को सुप्रियो के चयनानुसार इस पद के लिए चयनित कर लिया गया था। हालांकि जेनी किसी कोर्ट-कचहरी की आशुलिपिक बनने की ख्वाइशे ज्यादा दिल में संजोये थी, किन्तु उपयुक्त अवसर न मिल पाने की वजह से उसने यह नौकरी सहर्ष स्वीकार कर ली थी। इसकी एक वजह और भी थी कि यह जगह उसके घर से मात्र कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर थी, साथ ही वहाँ तक आवागमन के साधनों की भी कोई कमी नहीं थी। शीघ्र ही जेनी ने अपनी कुशलता के बल पर न सिर्फ सुप्रियो के दफ्तर का एक टंकक और वैयक्तिक सचिव का पूरा काम संभाल लिया था, अपितु खाली समय में वह उसके लिए निजी हिन्दी आशुलिपिक और टंकक का काम भी कुशलता पूर्वक करने लगी थी, और कहना गलत न होगा कि उसने अपनी इसी खासियत से सुप्रियो का मन भी जीत लिया था।

एकतीस वर्षीय सुप्रियो एक साहित्यिक, सह्रदय किन्तु अल्पभाषी, अंतर्मुखी नौजवान था। दफ्तर में जेनी के आ जाने से मानो उसे कई मानसिक बोझों से मुक्ति मिल गई थी, साथ ही उसने मन ही मन एक निश्चय भी कर लिया था। समय बीता और जैसा कि अमूमन पत्र-पत्रिकाओं में पढने को अक्सर मिलता रहता है.... एक वह वक्त भी आ ही गया जब सुप्रियो और जेनी प्रणय-बंधन में बंधकर एक दूसरे के हो गए। शादी के दो महीने तक तो सबकुछ सामान्य ही चला, मगर फिर जल्दी ही किसी फ़िल्मी अंदाज में रिश्तों के मध्य खटास पैदा होने लगी। सुप्रियों अति तो नहीं कहेंगे मगर हाँ, एक निश्चित मात्र में नियमित शराब का आदी था और रात को भी जबतब नशे में जेनी से हिंदी की आशुलिपि करवाता रहता था। जेनी को भी जल्दी ही यह महसूस होने लगा था कि सुप्रियो को एक जीवन साथी की कम और एक आशुलिपिक की जरुरत ज्यादा थी, और सुप्रियो का साहित्य-प्रेम उनके निजी जीवन में अनावश्यक दखल दे रहा है। और इसी कशमकश के बीच एक वह दिन भी आ ही गया जब वह रूठकर अपनी माँ के पास अपने मायके चली गई।

जेनी के मायके में सिर्फ उसकी माँ और छोटी बहन अभिलाषा थी, पिता का स्वर्गवास बहुत पहले ही हो गया था। चूँकि उसके पिता जल निगम में कार्यरत थे, और उनकी ड्यूटी के दौरान ही आकस्मिक मृत्यु हुई थी, अत: मृत्यु पश्चात जेनी की माँ को उसके पिता के स्थान पर निगम में ही नौकरी मिल गई थी। फलस्वरूप जेनी और उसकी बहन के लालन-पालन में माँ को ख़ास दिक्कतों का सामना नहीं करना पडा था। जेनी के इस तरह अचानक मायके आ जाने से माँ के माथे पर बल पड़ गए थे, चिंतित माँ ने उसकी कुशलक्षेम पूछी तो वह फफककर माँ के सीने से जा लगी। जिस माँ ने परिपक्व बसंत की फागुनी बयार देखने से पहले ही पतझड़ को गले लगा लिया था और अपनी तमाम उम्र, अपनी दोनों बेटियों के सुखद भविष्य के लिए समर्पित कर दी थी, उसका मन इसवक्त दुविधा और उलझन की दो नावों पर सवार था। एक तरफ वह सोच रही थी कि शायद इसे मेरी और अपनी बहन की याद सता रही होगी, इसलिए यह इसतरह यहाँ चली आई , दूसरी तरफ मन के किसी कोने में यह आशंका भी उठ रही थी कि कहीं इसके और सुप्रियो के बीच में कोई खटपट तो.....! ढाढस बंधाने और कुछ पल बीतने के बाद उसकी माँ ने जेनी के सिर पर हाथ फेरते हुए उससे सुप्रियो का हालचाल पूछा तो जेनी की आँखे एकबार पुन: छलछला आई। सुबकते हुए अपना सिर माँ के सीने पर टिकाते हुए वह बोली, मम्मी, मैंने गलत साथी चुन लिया, वह मुझसे नहीं मेरी आशुलिपि से प्रेम करता है, उसका मेरे प्रति ज़रा भी लगाव नहीं है। स्थिति को समझते हुए उसकी माँ ने एक बार फिर से उसके सिर पर हाथ फेरा, और कहा कि तू तो पगली है, सुप्रियो एक समझदार लड़का है, प्यार कोई दिखाने की वस्तु थोड़े ही है, जो वो तुझे दिखाता फिरे। तेरे लिए उसका प्यार उसके दिल में छुपा हुआ है, जा अभी तू अपने कमरे में आराम कर, हम फिर बाद में बात करेंगे।

अगली सुबह उसकी माँ ने पहले सुप्रियो को फोन किया और उसे अपने यहाँ दिन के भोजन पर आमंत्रित किया और फिर बहुत देर तक जेनी को समझाती रही, अपने घर की परिस्थितियाँ उसे याद दिलाई और कहा कि बेटी, नए घर, नई जगह पर सामंजस्य बिठाने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है, तुझे इतनी जल्दी इन निष्कर्षों पर नहीं पहुंचना चाहिए। देख लेना सुप्रियो के दिल में तेरे लिए बहुत प्यार छुपा है, मैंने अभी उससे फोन पर बात भी की थी और उसे लंच पर बुलाया है,.... तू फ़िक्र मत कर सब ठीक हो जाएगा। दोपहर में ठीक वक्त पर सुप्रियो अपनी ससुराल पहुँच गया था, माँ की दिलाशाओं और सुप्रियो की बातों में आकर जेनी एक बार पुन: उसके साथ हो ली थी। किन्तु लाख कोशिशों के बाद भी उनके गृहस्थ की गाडी ठीक से पटरी पर आने को तैयार न थी, सांझ ढलते ही सुप्रियो रोज की भांति अपनी औकात पर आ जाता था। आखिरकार वह दिन भी आ ही गया, जिसकी जेनी को आशंका थी। सुप्रियो ने आज कुछ ज्यादा ही पी ली थी, और जब थोड़ी देर की तू-तू..मैं..मैं के बाद जेनी ने यह कहा कि तुम्हे मैं नहीं, मेरी आशुलिपि चाहिए तो सुप्रियो भड़क गया और वह सब कह गया जिसकी जेनी ने सपने में भी आश नहीं की थी। उसने कहा, तुम इसे आज के बाद मेरी मूक गर्जन समझ लो या फिर गगनभेदी चुप्पी, लेकिन अगर तुम्हे मेरे साथ रहना है तो मेरी शर्तों पर चलना होगा,अन्यथा ...... !

सुप्रियो के शब्द मानो जेनी पर बिजली गिरा रहे थे, उसने झटपट अपना सामान समेटा और सुप्रियो को हमेशा के लिए विदा कहकर अपने मायके चली आई थी। स्टेनोग्राफी से उसे अब नफरत सी हो गई थी. अत: अपनी माँ की सलाह पर उसने नर्स का कोर्स ज्वाइन कर लिया था। साथ ही वह अब सुप्रियो संग बिठाये पलो को एक दु:स्वप्न मानकर उसे हमेशा के लिए भुला देना चाहती थी। समय पंख लगाकर उड़ता चला गया। इसबीच नर्स की ट्रेनिंग पूरी कर उसने दूसरे शहर के ह्रदय रोग से सम्बंधित एक बड़े हॉस्पीटल में नौकरी ज्वाइन कर ली थी। उसकी छोटी बहन अभिलाषा की भी शादी हो चुकी थी, और उसकी माँ भी नौकरी से सेवानिवृत हो गई थी,इसलिए वह अपनी माँ को भी अपने साथ ही ले आई थी।

करते-करते यूँ ही कुछ साल और गुजर गए। नर्स के पेशे में आने के बाद जेनी को अपनी घनिष्ठ मित्र के रूप में एक अन्य नर्स केरल की जूली भी मिल गई थी, जिससे वह अपना सारा दुखदर्द और खुशियाँ बांटती थी। जेनी की रोजमर्रा की जिन्दगी अब एंजियोग्राम,एंजियोग्राफी,एंजियोप्लास्टी,हार्ट अटैक, स्टेंटिंग प्रोसेस एवं बाई पास सर्जरी जैसे शब्दों पर आकर सिमट गई थी, कि तभी एक दिन एक ख़ास मरीज ने उनके अस्पताल में दस्तक दी.....।

मंगलवार का दिन, जेनी की अस्पताल की नौकरी का साप्ताहिक छुट्टी का दिन.....जूली भी जेनी के संग उसी घर में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती थी। जेनी कुछ दिनों से उदास सी चल रही थी, अत: उसकी माँ इस बाबत उससे और जूली से सुबह से तीन बार पूछ चुकी थी कि उसका चेहरा इतना मुरझाया क्यों है? मगर उसे न तो संतोषप्रद जबाब न जूली से मिला था और न ही जेनी से। फिर माँ ने उसे मूली के परांठो का नाश्ता खिलाकर यह प्रस्ताव उसके समक्ष रख ही रही थी कि क्यों न आज हम सभी अभिलाषा के घर चलें, बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हुई और साथ ही जेनी का मूड भी कुछ सुधर जाएगा...कि तभी एक लम्बी होंडा एकोर्ड घर के बाहर रुकी। ड्राइवर ने तेजी से अपनी सीट से उतरकर कार के पीछे से घूमकर आकर बांई तरफ का पिछली सीट का दरवाजा खोला। सुप्रियो आहिस्ता-अहिस्ता गाडी की सीट से नीचे उतरा और घर के दरवाजे से कमरे की तरफ बढ़कर जेनी की माँ से मुखातिव हुआ। उसने सलीके से माँ के पैर छुए और फिर सीधा खडा होकर उसने दोनों हाथ जोड़ लिए। जेनी की माँ ने चेहरे पर बिना कोई भाव प्रकट किये उसे सामने पड़े सोफे पर बैठने का इशारा किया।

मगर सुप्रियो सोफे पर बैठने के बजाये माँ के चरणों में गिर पडा और गिडगिडाने लगा; आप और जेनी मुझे माफ़ कर दो माँ, बस, मुझे मेरा प्रायाश्चित करने का सिर्फ और सिर्फ एक मौक़ा और दे दो। मैं जेनी की हर ख्वाइश पूरी करने का भरसक प्रयत्न करूंगा, जेनी की खुशियों के लिए मैं नशा क्या हर व्यसन छोड़.... ! जेनी सुप्रियो संग जाने के लिए तैयार हो रही थी और जूली उसे कुहनी मारकर कनखियों से निहारते हुए चिढाने की कोशिश करते हुए कह रही थी... देखा तूने, आखिरकार माँ का बोला हुआ ही सच निकला न कि उसने तेरे लिए प्यार अपने दिल में छुपाकर  रखा है ...................अब उसे दुबारा पिचकाकर बाहर निकालने की कोशिश मत करना ।

इतश्री !











 
























Wednesday, January 11, 2012

नसीहत


फैसला  हुकूमत का 
फर्ज है प्रजा के लिए 
मगर,अज्ञ कारिंदे*
यह भी तो देखें ,
कि उड़ता है क्यों 
सरेआम  मजाक 
उनके फरमान का।


जिन्दगी  तो तमाम हुई
'कर' भरते -भरते  ,
हुकूमते  हिन्द  !
कुछ ऐंसा  न करना कि
खुद ही  अपना 
महसूल* भी
हमें चुकाना पड़े 
अंत में शमशान का।


इज़हार-ऐ-बेकसी
मन की कोई 
तब करे  भी तो 
करे  किससे,
अजनबियों के देश में
जब न हो कोई 
अपनी पहचान का।



उसे इंसान क्या कहना
जो पीड़ा का मर्म
ही न समझे , 
अरे खिजां* में  तो डाली भी
समझती है दर्द
नख्ल़*से बिछड़े 
किसी ख़ेज़ान*का।


रिश्तों के
क़त्ल को खुदगर्ज 
देकर नाम लोकशाही का
खाप-पंचायत,
चौपालों में 
रोज हाट सजाते है 
झूठी शान का।


सुकून-ए-दिल
मिलता है महत* यथेष्ठ 
मार्ग -दर्शन करके ,
अंतर्द्वंद्व में गुम्फित,
कुंठित और
दिग्भ्रमित 
किसी नादान का।

शिक्षा की उपादेयता
तब विघ्नित मानिए,
शत-प्रतिशत
कतिपय जब
व्यावहारिक न हो
उपयोग अर्जित ज्ञान का।



कारिंदे=कर्ता-धर्ता , महसूल = शुल्क (टैक्स) , ह्रस्व = छोटे , खिजां = पतझड़ ,नख्ल़ = पेड़ , ख़ेज़ान= पत्ता, महत = बहुत

Friday, January 6, 2012

(कु)खुश-वाह-वाह मानसिकता और आरएसएस !

अपने इस गौरवशाली महान और प्राचीनतम हिन्दू सनातन धर्म ( जिसका संस्कृत वाक्यांश है 'चिरकालिक आचार' / 'अनंत धर्म' ) का एक प्रबल समर्थक होने के नाते मेरी हमेशा यही कोशिश रहती है कि हर उस बात, स्थान, व्यक्ति और संस्था का समर्थन करू जो इसके पक्ष में हो, और हर उसका विरोध करू जो इसे किसी भी किसी तरह से ठेस पहुंचाने की कोशिश करता हो! और शायद यही वजह थी कि मैं आरएसएस का शुभचिंतक रहा हूँ ! यही नहीं वक्त-वेवक्त जब भी किसी ने किसी मंच पर इसके ऊपर कीचड उछालने की कोशिश की हो, मैंने हमेशा अपने ढंग से उसका पुरजोर विरोध भी किया !



जहाँ तक बीजेपी का सवाल है, यह शायद नामुमकिन ही है कि कहीं पर इस नाम का जिक्र आये और लोग भाजपाइयों की तारीफ़ में निम्न दो बातों का उल्लेख न करें; एक तो इनका बड़बोलापन और दूसरा इसकी 'कथनी और करनी' में जमीन आसमान का फर्क (दोगलापन) ! और अपने देश में खासकर मैंने यह देखा है कि इन विशेषताओं वाले प्राणी अगर कभी लग्न और ईमानदारी से भी कोई प्रयास कर रहे हो तो देखने वाले को अक्सर वह भी " ड्रामेबाजी " ही नज़र आती है! हाँ, इसमें दोष देखने वाले का नहीं अपितु इस किस्म के प्राणियों का ही है, क्योंकि अपनी साख बनानी तो दूर, अपने प्रति संदेह का धरातल भी वह खुद ही तैयार करता है ! और यह स्थिति विशेषकर तब पैदा होती है जब यह पता न लगे कि इनका सुप्रीम कमांडर है कौन और इनकी जबाबदेही है किसके प्रति ? इस तरह के सिपय-सालार जहां मौक़ा मिले, कुछ भी बोल देते हैं, क्या करना है, क्या बोलना है क्या नही, कोई बंधन ही नही! और यही ताजा-ताजा दृश्य उत्तरप्रदेश में देखने को मिल रहा है! एक समय था जब मै भी यह मानकर चलता था कि इस पार्टी में आगे चलकर देश को नई ऊँचाइयों, नए आयामों पर ले जाने की क्षमता है, लेकिन लगता है मेरा यह भ्रम भी श्री आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के ख्वाबो की तरह निरंतर क्षुब्दता की परतों तले दफ़न हो जाएगा ! ऐंसा नही कि इनमे पढ़े लिखे , समझदार, ईमानदार और कर्मठ लोगो की कमी है, कमी है तो बस एक सुदृढ नेतृत्व की, पारदर्शिता की , दृड़ संकल्प की, कमी है अपने संकीर्ण दृष्टिकोण और निजी स्वार्थो को छोड़कर एक व्यापक परिदृश्य में सोचने की !



निश्चित तौर पर आज इन्होने मेरे जैसे ऐसे उन अनेकों शुभचिंतकों का दिल दुखाया है जो अपने हिन्दू धर्म के प्रति सजग हैं, लेकिन जिस बात का मुझे सबसे बड़ा अफ़सोस है, और आश्चर्य भी है, वह है आरएसएस की ढुलमुल और दोहरी नीति ! बीजेपी की अच्छी चीजों की वाह-वाही का सेहरा अपने सिर और गलतियों का ठीकरा उसके सिर ! बीजेपी का हालिया कदम नि:संदेह ही एक अविवेकपूर्ण निर्णय कहा जा सकता है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक राजनैतिक दल है, और अपने अन्य राजनैतिक दलों के विरादारों से ख़ास भिन्न नहीं है! किन्तु सवाल यह उठता है कि क्या आरएसएस भी एक राजनैतिक संघठन है? यदि हाँ, तो वह भी बीजेपी के हालिया कदम का बराबर का हिस्सेदार है, और यदि नहीं तो फिर क्यों नहीं वह खुद को बीजेपी से पूर्णतया अलग-थलग कर देता है? यदि राजनीति को इस्तेमाल करने का इतना ही शौक है तो क्यों नहीं श्रीमती सोनिया गांधी की तरह बीजेपी को एक मजबूत और निर्णायक नेतृत्व प्रदान करते हो? गडकरी साहब को किसने अध्यक्ष के तौर पर प्रतिस्थापित किया? जबसे वे अध्यक्ष बने, क्या कोई एक वाकया हो, जहां पर समय रहते उचित और विवेकपूर्ण निर्णय लिया गया हो? हाँ, उत्तरप्रदेश जैसे विवादास्पद निर्णय किसी को कानो-कान खबर हुए बिना ही ले लिए जाते है ! यदि बीजेपी की राजनीति में हस्तक्षेप की गुंजाइश रखते हो तो फिर क्यों नहीं इस अकुशल नेतृत्व के मुद्दे पर अभी तक कोई निर्णय लिया गया? सीधी बात है कि या तो साफ़-साफ़ अपने को राजनीति से अलग कर दो या फिर एक जिम्मेदार बडेभाई की भूमिका निभाओ !



बड़े अफ़सोस के साथ यह सब लिख रहा हूँ, और यह कहते हुए अत्यंत खेद है कि पिछले कुछ सालों में जो मैंने अवलोकित किया उससे ऐसा लगता है कि आरएसएस साठ पार कर गए कुछ बुजुर्ग सज्जनों की चौपाल मात्र बनकर रह गई है! जो अपने उस लक्ष्य से भटक गई है जो स्वर्गीय डा० हेडगेवार ने सोची थी! समय की मांग है कि हम जागें और पुन: अपनी वह साख स्थापित करें जो पिछले ७०-७५ सालों में हमने बरकरार रखी थी, अन्यथा, हमारे दिग्विजय जी जो कहते आयें है, लोगो को उसपर मजबूरन विश्वास करना ही पडेगा !



Thursday, January 5, 2012

परिवहन नियोजन !


हालाँकि द्रुतगामी-उन्नति को यथार्थ के धरातल पर उचित ढंग से परिभाषित करना अभी बाकी है, किन्तु इसमें कोई दो राय नहीं है कि अपना देश तेजी से प्रगति कर रहा है। और इसी प्रगति की एक झलक आपको आज से दिल्ली के प्रगति मैदान में शुरू हुए कारों और वाहनों के महाकुम्भ में देखने को मिल जायेगी। पब्लिक पागल हुए जा रही है, नई-नई कारों के माडलों को देखने और खरीदने के लिए। सुनने में आया है कि एक निर्माता तो ऐसी गाडी भी प्रदर्शित कर रहा है जिसमे कि आपको घर का मजा भी मिलेगा और दफ्तर का भी,यानि सड़क पर ही घर भी और दफ्तर भी।



दश्त-ओ-सहरा में वाहन-ऐ- कतार आ रही है,
चाल में घोंघे-कछ्वों की भी रफ़्तार आ रही है।

खिलाने-पहनाने को यथेष्ठ यद्यपि न हो घर में,
कर्ज लेकर के किस्तों में ऑडी -कार आ रही है।

तड़क-भड़क ने यों इसकदर मंथर बना दिया,
हैं घर में चार-जने तो गाडी भी चार आ रही है।

तमाम शिशिर गुजार दी अर्ध-आस्तीन में ही,
और नए नए मॉडल देख मुंह में लार आ रही है।

बावले दृश्यदर्शियों को देख सोचता है 'परचेत',
गुलिस्तां में ये कैसी रौनक-ऐ-बहार आ रही है।



यह सच है कि एक अदद घर और कार हर इन्सान का सपना होता है, लेकिन यह भी सच है कि सपनो और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क होता है। क्या हमने कभी सोचा है कि अगर इस देश की कुल आवादी (१२२ करोड़ ) में से करीब 5० करोड़ लोग भी अपनी-अपनी गाड़ियां खरीदकर सड़कों पर चलाने लगे तो चलाएंगे कहाँ ? ज्यादा दूर क्यों जाएँ, दिल्ली जो कि इस देश की धड़कन है इसका ही एक उदाहरण लेकर हकीकत से वाकिफ हो लिया जाए;

गत वर्ष के आंकड़ों के मुताविक दिल्ली की कुल सड़कों की लम्बाई लगभग ३२००० किलोमीटर है। और ऐसा अनुमान है कि दिल्ली की कुल आवादी लगभग २ करोड़ है (एनसीआर से रोज यहाँ आने वाले लोगो की तादाद मिलाकर)। तकरीबन एक करोड़ वाहन (निजि एवं सार्वजनिक ) दिल्ली में रजिस्टर्ड है, जिनमे से आधे दिल्ली की सड़कों पर औसतन रोज चलते है। ये तो सिर्फ अंदाजन आंकड़े मैंने यहाँ प्रस्तुत किये मगर जो मुख्य बात अब मैं कहने जा रहा हूँ, वह यह कि मान लीजिये कि कुल आवादी के सौ प्रतिशत लोग यानि अपनी कारें खरीद लें, और औसतन प्रति कार की लम्बाई साढ़े तीन मीटर है तो दो करोड़ गाड़ियों की कुल लम्बाई हुई, सात करोड़ मीटर अगर एक हजार से इसे विभाजित करें तो कुल कारों की लम्बाई आई 70 हजार किलोमीटर, इसके अलावा सार्वजानिक वाहनों और अन्य राज्यों से आने वाले वाहनों की लम्बाई अलग से मान लीजिये कि २० हजार कलोमीटर है तो कुल लम्बाई हो गई ९०००० कलोमीटर और यदि सड़क पर हर जगह तीन लेन मौजूद है, कुल सड़कों की लम्बाई हुई ९६००० किलोमीटर, यानि ९०००० किलोमीटर लम्बी गाड़ियों के लिए चलने का स्थान बचा मात्र ६००० किलोमीटर।



तो क्या करोगे सरकार,
कहाँ चलाओगे तुम अपनी कार ?
पेट खराब हो जाए और
मैदान आ रहा हो बारम्बार तो
इमरजेंसी हेतु खरीद लाने पड़ेगे
कुछ पन्निया और जार,,(सड़क पर गाडी छोड़कर भी नहीं जा सकते :) )
बेवक्त और बिना मौसम ही
गाना पडेगा राग मल्हार !!!

सोचो-सोचो ! कहीं फिर ऐसा न हो कि एक दिन पूरा देश ही जाम होकर रह जाए।



सुदृढ़ अर्थव्यवस्था अपनी,ऐसे ये सरकार कर रही है,
तंग गलियों को भी वाहनों से गुलजार कर रही है।



मेरी राय में होना यह चाहिए था कि सरकार सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुदृढ करती और निजी वाहन के लिए किसी भी प्रकार के लोन  लेने को प्रतिबंधित करती। दूसरी तरफ इस प्रगति के साथ-साथ प्रकृति की दुर्गति अलग। जिस तरह के जाम लगते हैं, अभी तो फ्लाय-ओवर नए है , मगर ज्यों-ज्यों पुराने होते चले जायेंगे, उनकी भार सहन क्षमता कमजोर होती जायेगी, और भगवान न करे कभी भयंकर जाम के बीच कोई पुल बैठ गया तो ..... सोचो-सोचो....!   

इसलिए अंत में परिवहन-नियोजन की अपील के साथ यही कहूँगा कि;

पंगु न हो पथ-परिचालन लच्छा,
हर घर में एक ही वाहन अच्छा !



जय हिंद !



छवि गूगल से साभार !



दिल्ली/एनसीआर, क्या चिकित्सा मर्ज का मूल मेदांता सरीखे अस्पताल नहीं ?

  चूँकि दिल्ली के मैक्स और हरियाणा  के  फोर्टिस अस्पताल का मुद्दा गरम है, इसलिए इस प्रसंग को उठाना जायज समझता हूँ। पिछले कुछ दशकों से अधिक...