Tuesday, January 31, 2012

रिश्तों का इल्म !


प्रणय-धड़कन का दिल में बसने,
जीवन के सहभागी बनने हेतु
रिश्तों की बुनियाद में
यकीन नाकाफी क्यों?
दो दिलों के इकरारनामे को मुद्रांकित
करवाने की हठ-धर्मिता कैंसी?

तुम जानती हो कि
अनुबंध असीम नहीं होते,
और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत
सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही
एकनिष्ठता की कोमल डोर को
रहन पर नहीं रख सकता ,
क्योंकि मियाद खत्म होने के बाद
यह मुसाफिर तन्हा ही फिर से
दश्त का वीरान सफ़र तय नहीं कर पायेगा।  

18 comments:

  1. तुम जानती हो कि
    अनुबंध असीम नहीं होते,
    और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत
    सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही
    एकनिष्ठता की इस कोमल डोर को
    रहन पर नहीं रखना चाहता,

    गहन अभिव्यक्ति ..सीमित अनुबंधों में फंसे सिवाय कुंठाओं के कुछ नहीं मिलता

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  2. वाकई गहन है..
    kalamdaan.blogspot.com

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  3. धड़कन का दिल में बसने,
    जीवन के सहभागी बनने हेतु
    रिश्तों की बुनियाद में
    यकीन नाकाफी क्यों?... bilkul nahi... bahut achhi baat kahi

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  4. अंतिम पाँच पंक्तियाँ रिश्तों की गहनता को परिभाषित कर गईँ !

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  5. आपके इस रचना की चर्चा कल के चर्चा मंच पे की जायेगी ..

    सादर

    कमल

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  6. गहन अभिव्यक्ति.... बहुत उम्दा रचना

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  7. बहुत ही नाजुक होते हैं रिश्ते..

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  8. //क्योंकि मियाद खत्म होने के बाद
    यह मुसाफिर तन्हा ही फिर से
    दश्त का वीरान सफ़र तय नहीं कर पायेगा!

    bahut hi gehra khayaal sir..
    bahut sundar rachna .. :)

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  9. मुहर तो हृदय की लगती है..

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  10. अब तो पंडित-मुल्ला के दिन गए... बस करारनामे पर सारे रिश्ते टिके हैं :)

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  11. वाह! ज़बरदस्त लिखा है..

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  12. बेहद गहन भाव्।

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  13. तुम जानती हो कि
    अनुबंध असीम नहीं होते,
    और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत
    सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही
    एकनिष्ठता की इस कोमल डोर को
    रहन पर नहीं रखना चाहता,

    वाह गहन अभिव्यक्ति ... भाषा में नवीनता लिए ... पर यस सच है अनुबंध असीम नहीं होता ...

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  14. ओह...क्या लिखा है आपने...गोदियाल जी
    बेहतरीन रचना!

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