एक और गणतंत्रदिवस और आशाओं-निराशाओं की आंखमिचोली !
65 वें गणतन्त्र की सभी देश वासियों को हार्दिक शुभकामनाएं ! इस नूतनवर्ष के प्रारम्भिक मास के उत्तरार्द्ध में हर वर्ष की भांति, आइये इस वर्ष के लिए भी हम सभी मिलकर पुनः एक सुखमय और समृद्ध भारत का सपना सजोए, उसकी कामना करें । आज महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से देश का जन - जन किस कदर त्रस्त है इसका अहसास सिर्फ इसी बात से हो जाता है कि जनता को जिधर भी इससे मुक्ति के लिए एक आशा की किरण नजर आती है वह वहीं उसे लपकने पहुँच जा ती है। वो बात और है कि उसे हर तरफ निराशा ही हाथ नजर आती है। तमाम देश और खासकर दिल्लीवासियों को भी एक ऐसी ही सुनहरी किरण नजर आई थी, किन्तु उसे लपकने के बाद दिल्लीवासियों को भी एक बड़ी निराशा के साथ शेक्सपियर याद आ गया। उन्हें भी यही सबक मिला कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती। उम्मीदें सभी लगाए बैठे थे किन्तु पिछले दिनों जो कुछ अपने आस-पास नजर आया उससे यही अहसास हुआ कि अगर चोरों के हाथ में सत...