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Showing posts from January, 2014

एक और गणतंत्रदिवस और आशाओं-निराशाओं की आंखमिचोली !

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65 वें गणतन्त्र की  सभी देश वासियों  को हार्दिक शुभकामनाएं !  इस नूतनवर्ष  के प्रारम्भिक मास के उत्तरार्द्ध में हर वर्ष  की भांति, आइये इस वर्ष के लिए भी हम सभी मिलकर पुनः एक सुखमय और समृद्ध भारत का सपना सजोए, उसकी कामना करें । आज महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से देश का जन - जन किस कदर त्रस्त  है इसका अहसास सिर्फ  इसी बात से हो जाता है कि जनता को जिधर भी  इससे मुक्ति के लिए एक आशा की किरण नजर आती है वह वहीं उसे लपकने पहुँच जा ती  है।   वो बात और है कि  उसे हर तरफ निराशा ही हाथ नजर आती है।   तमाम देश और खासकर दिल्लीवासियों को भी एक ऐसी ही सुनहरी किरण नजर आई थी, किन्तु उसे लपकने के बाद दिल्लीवासियों को भी एक बड़ी निराशा के साथ शेक्सपियर याद आ गया।  उन्हें भी यही सबक मिला कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।  उम्मीदें सभी लगाए बैठे थे किन्तु  पिछले दिनों जो कुछ अपने आस-पास नजर आया उससे यही अहसास हुआ कि अगर चोरों के हाथ में सत...

सदी का सबसे छोटा ठट्ठा - 'आम-आदमी' !

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छवि गूगल से साभार ! अमूमन जब किसी चीज को उपहास, परिहास अथवा मजाक के नजरिये से देखा जाता है तो अक्सर कहा जाता है कि अमूक चीज उस ख़ास वक्त, साल अथवा सदी का सबसे बड़ा जोक  बन गया है।  लेकिन यहाँ बात इसके उलट है और मुझे ऐसा लगता है कि शायद ही इस सदी में कोई इससे भी छोटा जोक बन पाये और वह जोक है 'आम-आदमी'। वर्णमाला के मात्र पांच अक्षरों अथवा सिर्फ दो शब्दों का ठट्ठा (जोक )। आम के साथ इसे वक्त का क्रूर उपहास कहिये अथवा आम का दुर्भाग्य समझिये कि जिस आम का नाम आते ही मुंह में रस आ जाता था, आज निचले दर्जे के आदमी की महत्वाकांक्षा की वजह से उसी आम का नाम सुनते ही लोगो के मुंह में गाली आ जाती है।  उस वक्त दिमाग में एक ही ख्याल दौड़ता है कि अगर कमवख्त कच्चा मिले तो अचार ड़ाल दें और अगर पका मिले तो चूसकर फेंक दे। आदमी भी बखूबी जानता है कि ये आम महाशय भी कोई हलके में लेने वाली चीज नही है।  बड़े किस्म का आम तो फिर भी थोड़ा परिपक्व और गम्भीर होता है किन्तु ये जो छोटे कद का आम है, ये है बड़ी ही कुxx  चीज।   ठीक से नहीं सम्हाला तो कब कमवख्त फिसलकर रस और गुठली समेत सड़...

'रहें ना रहें हम महका करेंगे' ........... … श्रद्धांजली ।

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नैन-पलकों से उतरकर, गालों पे लुडकता नीर रोया, वो जब जुदा हमसे हुए तो, यह ह्रदय तज धीर रोया। मालूम होता तो पूछ लेते, यूं रूठकर जाने का सबब, बेरुखी पर उस बेवफा की,दिल से टपकता पीर रोया। तिमिर संग घनों की सेज पर,ओढ़ ली चादर चाँद ने, चित पुलकितमय मनोहारी, मंद बहता समीर रोया। देखकर खामोश थे सब, कुसुम , तिनके, पात, डाली,  खग वृक्ष मुंडेर, ढोर चौखट, चिखुर तोरण तीर रोया। अनुराग बुनते ही हो क्यों, 'परचेत' अपने  इर्द-गिर्द, विप्रलंभ अन्त्य साँझ पर वो,  देह लिपटा चीर रोया।    

कार्टून कुछ बोलता है -मौसेरा कथापुराण !

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