'कुतरा', टुकड़ा-टुकड़ा बीजकों का, कुछ भी न बचा,
दीमक 'अभिषेक ' खा गए, इतिहास 'मनु 'का रचा।
दंग रह गए देशभर के, तमाम लगान महकमे वाले,
बलाघात देने वालो को ही, धूर्त देना चाहते हैं गच्चा।
तारीफे-काबिल लगती है इनकी, ये हाथ की सफाई,
निन्यानबे के फेर में कमवख्तों ने,करोडो लिए पचा।
दफ्तर था चार्टर्ड अकाउंटेंट का, या दीमक की बांबी,
देख दुर्गत वाउचरों की, न्यायतंत्र का भी माथा तचा।
निगला देश सारा,सालों कोलगेट, टूजी-ब्रश करते रहे,
सूबे का जब सुलतान बदला, कोहराम तब जाके मचा।
भविष्य उज्जवल नजर आता है इनका तो 'परचेत',
शठ-अपवंचक अगर दीमकों को, यूं ही देते रहे नचा।