Wednesday, August 12, 2026

अतृप्त भाव

सुबह-सबेरे, स्कूल-बस पकड़ने की जद्दोजहद,

दौड़ते विद्यार्थी की पीठ पर लदा वो बस्ता हूं मैं,

खुद की तो ख़ाक मे मिला दी शख्सियत हमने,

फिर भी अभी चुनिंदा दिलों मे बसता हूं मैं। 


कभी दिल तो हमारा भी करता है रूठ जाने को,

मगर चाह के भी एहसास न होने देता जमाने को,

मन के कोने मे छुपा रखें हैं अतृप्त भाव सारे,

चेहरे पर हमेशा ओढ़े रखता सरसता हूं मैं।

 

अबाधित जिंदगी की डगर, हमसे पूछती हो ?

इतनी भी अंजान न बनो , सबकुछ बूझती हो,

खुद का मुकाम पाने को जिसे पैरों से रौंदकर 

कई एहसान फरामोश निकल गए, वो रस्ता हूं मैं।


Tuesday, August 11, 2026

किसे बताऊं?

शाम-ए-तन्हाई !

देख लिया सब-कुछ आज़माकर,

दो पैग पीड़ा के 'परचेत',

जिंदगी बसर हो गई, 

चखने मे गम खा-खाकर।

Sunday, August 9, 2026

कबूलनामा

 दौर-ए-जवानी का वो मदहोश 

वक्त भी क्या था,

शाम को घर लौटते हुए राह मे,

फूल भी मिले, कांटे भी मिले,

घर की देहलीज पर पहुंचकर 

हाथ मे पकड़ा उनका पसंदीदा कुछ हो तो,

मुस्कुराहट भी मिलती थी, वरना चांटे भी मिले।

 

Saturday, August 8, 2026

रूबर

 सेवानिवृत्ति का जुनून 

आहिस्ता-आहिस्ता 

मौत के घाट उतार देगा हमको, 

कहां मालूम था कि 

गांव का अकेलापन इकदिन, 

इस कदर मार देगा हमको।

पशेमानी

तुम्हारी ख़्वाहिशों के बोझ तले दबकर भी 

मैं तुमको जरूर नजर आया होता,

अगर ऐ जालिम तुमने, कामयाबी का दर्जा पाने को 

अपना ये जाल न बिछाया होता।

Monday, August 3, 2026

परिवेश

अफसोस, कि अब ये
कैसा ज़माना आ रहा है,
बोलने को तो गद्दार 
भूख हड़ताल पर बैठे हैं 
मगर, आनलाइन 
विदेशों से
वास्ते उनके, खाना आ रहा है।



बंजारा

अरे ओ बंजारे!

ठिकाना ना ही 

तेरा मुकम्मल है 

और ना ही मेरा मुकम्मल,

पहचान मतलबी,

राह अजनबी, 

अचानक मिल गए

इक वीराने सहरा मे,

फिर मिलें न मिलें

तू भी मुसाफिर, 

मैं भी मुसाफिर!