कबूलनामा
दौर-ए-जवानी का वो मदहोश
वक्त भी क्या था,
शाम को घर लौटते हुए राह मे,
फूल भी मिले, कांटे भी मिले,
घर की देहलीज पर पहुंचकर
हाथ मे पकड़ा उनका पसंदीदा कुछ हो तो,
मुस्कुराहट भी मिलती थी, वरना चांटे भी मिले।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
दौर-ए-जवानी का वो मदहोश
वक्त भी क्या था,
शाम को घर लौटते हुए राह मे,
फूल भी मिले, कांटे भी मिले,
घर की देहलीज पर पहुंचकर
हाथ मे पकड़ा उनका पसंदीदा कुछ हो तो,
मुस्कुराहट भी मिलती थी, वरना चांटे भी मिले।
सेवानिवृत्ति का जुनून
आहिस्ता-आहिस्ता
मौत के घाट उतार देगा हमको,
कहां मालूम था कि
गांव का अकेलापन इकदिन,
इस कदर मार देगा हमको।
तुम्हारी ख़्वाहिशों के बोझ तले दबकर भी
मैं तुमको जरूर नजर आया होता,
अगर ऐ जालिम तुमने, कामयाबी का दर्जा पाने को
अपना ये जाल न बिछाया होता।
अरे ओ बंजारे!
ठिकाना ना ही
तेरा मुकम्मल है
और ना ही मेरा मुकम्मल,
पहचान मतलबी,
राह अजनबी,
अचानक मिल गए
इक वीराने सहरा मे,
फिर मिलें न मिलें
तू भी मुसाफिर,
मैं भी मुसाफिर!