Monday, August 3, 2026

परिवेश

अफसोस, कि अब ये
कैसा ज़माना आ रहा है,
बोलने को तो गद्दार 
भूख हड़ताल पर बैठे हैं 
मगर, आनलाइन 
विदेशों से
वास्ते उनके, खाना आ रहा है।



बंजारा

अरे ओ बंजारे!

ठिकाना ना ही 

तेरा मुकम्मल है 

और ना ही मेरा मुकम्मल,

पहचान मतलबी,

राह अजनबी, 

अचानक मिल गए

इक वीराने सहरा मे,

फिर मिलें न मिलें

तू भी मुसाफिर, 

मैं भी मुसाफिर!

Sunday, August 2, 2026

अधूरी धड़कन।

 राह चलते जिंदगी की  

मैं गुम हो गया, 

भीड़ मे रहते हुए भी 

तन्हाई मे खो गया, 

कोई तो आए पास मेरे, 

गिड़गिड़ाए एहसास मेरे, 

एकाकी रात, अधूरे ख्वाब,

चादर ओढ़ मैं सो गया।

अफसोस

 निष्पक्षता धसी दुराचार के दल-दल मे,

निडरता कुटिलता से डर गई, 

कागजों के बागी तेबर देखकर,

कलम जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर गई।


दौर-ए-काॅकरोच, हया गुमशुदा हुई,

परतें शराफ़त की चेहरों से उतर गई, 

मोटी सी वो किताब जिसे 

बाबासाहेब ने लिखा था,

सुना है उसे, 

अपने ही घर की चुहिया कुतर गई।

Tuesday, July 28, 2026

ओझल

 वादों-इरादों की राह बहुत लम्बी थी, मैं ऊब गया,

आसां जो तेरे प्यार की दरिया मिली, मै डूब गया।

यथार्थता


सफर रुका नहीं और 

मिलते गये काफिले हमको,

शिकवे गले मिले और

दिल पे लगा गये गिले हमको, 

इम्तहानों के दौर से, 

हम बेधडक गुज़रे हैं 'परचेत',

हौंसले रक्त से मिले 

और फैसले वक्त से मिले हमको।


Thursday, July 23, 2026

विडम्बना देखिए

 दोनों की ही सरकारी नौकरी थी, 

अच्छी तनख्वाह के अलावा,

ऊपरी मे भी खूब लूटा-खसौटा,

सोना-चांदी जो हाथ आया समेटा,

कुछ नहीं तो भागते चोर का लंगोटा।


अपने दोनों ही बच्चों को  उन्होंने 

अच्छे स्कूलों से तालीम दिलवाई

किसी कोर्स के लिए प्रतिस्पर्धा से

जब वो चयनीत न हो पाए तो

अवैध चंदे की थाली सजवाई।


बच्चे दोनों मूल छोड़कर अपना

अब, विदेश जाकर बस गए हैं,

और मां-बाप सूरत को तरस गये हैं,

लौटकर  मिलने आएंगे वो कभी,

पति-पत्नी इसी भ्रम मे है,

बाप पिछले साल गुजर गया,

मां अभी वृद्धाश्रम मे है।