अधूरे ख्वाब
खुशियों तक पहुंचने के
दिल मे अरमान बहुत थे,
नहीं पहुंच पाया 'परचेत'
राह मे तूफान बहुत थे।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
अपनी हर परेशानी का सबब, मैं तेरे मूंह पे फेंक देता,
गर ये कश्ती का मुसाफिर 'परचेत', समंदर देख लेता।
कुशल नेतृत्व और दृढ़ संकल्प के लिए
५६ इंच की छाती ढूंढते हैं,
और रोज़मर्रा के संचालन के लिए
अनुसूचित जाति, जनजाति ढूंढते हैं
पडोस का माहौल, आबोहवा और रहन-सहन,
बिन बात खिलखिलाना, ठिकाना रास आना,
अगर हमसे पूछना ही है 'परचेत, तो यह पूछो
कि किया जाता है कैसे मुस्कुराकर गम छुपाना।
यही पूछने को बेताब है 'परचेत' जमाने भर से कि
आखिर दीखता कैंसा होगा पलकों का शामियाना ।