जो किसी के भी दिल में नहीं बसता हो,
उसे तू अपने दिल में ऐसे न बसाया कर,
इतनी सी आरज़ू है तुझसे मेरी 'परचेत',
अपना ग़म लेके इधर-उधर मत जाया कर।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
जो किसी के भी दिल में नहीं बसता हो,
उसे तू अपने दिल में ऐसे न बसाया कर,
इतनी सी आरज़ू है तुझसे मेरी 'परचेत',
अपना ग़म लेके इधर-उधर मत जाया कर।
उनको देखकर कुछ न भाया,
सहज थे,असहज से भा गए,
नूर चेहरे का तो तब छलका,
महफ़िल में जब तुम आ गए।
अगाध होते हैं रिश्ते दिलों के,
इक ज़माना था जो हम गाते,
तय पथ था और सफ़र अटल,
उम्मीदों पे कब तक ठहर पाते।
जागी है जब कुछ ऐसी तमन्ना
कि इक नये सांचे में ढल जाते,
नजर आता जो सुकून हमको,
कागज पर लफ्ज़ उतर जाते ।
सफर जारी है धीमे-धीमे मगर,
मुकर्रर वो रास्ते नहीं भाते,
घर की मुंडेरी पे बैठने को 'परचेत',
अब परिंदे भी नहीं आते।।
गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे थे,
तमाशबीन बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे से रूठे थे।
डरी सूरत बता रही थी,बिखरे महीन कांच के टुकडो की,
कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे थे।
ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन,
इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे थे।
पटकी जा रही थी हर चीज,जो पड़ जाए कर-कमल उनके,
वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे थे।
तनिक शुश्रुषा की कमी 'परचेत', मनुहार मिलाना भूल गए,
फकत इतने भर से ही बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे थे।
तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे
हम, तुम्हारे बाप के पास,
घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि
बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।
रात गहरी बहुत है मगर,
यकीं रखो, हम सोएंगे नहीं।
तूम रुलाने की जितनी भी कोशिश कर लो,
रोएंगे नहीं,
बेदना के पार्क मे सन्नाटे संग
खामोशी भी बैठी है 'परचेत',
इसलिए किसी के बहकावे में आकर,
आपा खोएंगे नहीं।
हमने तो मरने को नहीं कहा था,
अरे वो, हमें पत्थर दिल कहने वालों,
जो पास है तुम्हारे उसी पे जी लेते,
मुफलिसी, तंगदिली मे जीने वालों ।
बस, मेरे साथ सिर्फ इक मेरी गिला़ और
तुम्हारे संग तमाम सिकवों का काफ़िला,
मैं अभिभूत और ऐतबार पराजित, 'परचेत',
यकीं रख, लम्बा न चल पायेगा ये सिलसिला।
सिसकियां आई, हिस्कियां आई और पराज भी आए हैं,
देहलीज पे तेरी, युवा आए और उम्रदराज भी आए हैं,
अरे वो, हुस्न की मलिका, नागवार है इतराना तेरा,
उम्र दराजी के तजुर्बे में हमने तो उन्हें भी देखा है,
कबूतर के चेहरे मे मु़डेरी पर जो बाज आए हैं।
जो आज आनी चाहिए थी, वो तुम्हें आज आती नहीं,
खुद को हुश्न की मलिका बताते हुए लाज आती नहीं,
हमने तो, तुम्हारे हुस्न की बस खैर मांगी थी, ऐ दोस्त!
जो जवानी में न आ सके, वो उम्र दराज आती नही।
न निशां पड़ते, न ही दाग होते,
तले जिसके अंधेरा न होता,
ऐ काश! कि हम वो चराग होते,
हम कहते, छुप लो बनकर प्यार
हमारे इस सूने से दिल में,
छुप लेते,अगर जो तुम राग होते।
अबे, पहले तो ये बता तू है कौन?
तुम जैसों के मुंह लगना मेरा चस्का नहीं,
मेरी तो बीवी से भी बिगड़ी पड़ी है,
चल हट, मुझे सम्हालना तेरे बस का नहीं।
वो बिन वजह हंसना तेरा,
वो बिन वजह रोना तेरा,
जिंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी -मेरी कहानी है।
इक प्यार का नगमा....
#आशाभोंसलेविनम्रशर्द्दाजली!
मायके ठहरने का वक्त बिटिया जानती है, ज्यादा न रुक पाएगी,
हेमंत ऋतु भी आई, कल शिशिर भी वसंत संग चली जाएगी।
बेरुखी, खामोशी, यादों का बोझ,
फेहरिस्त लम्बी है इस तन्हाई की,
अब क्या? उम्र कट गई 'परचेत' ,
राह तकते-तकते इक हरजाई की।
भले ही वो हैंगओवर मेरे लिए कुछ ही पल का था,
नशा मेरे प्यार का मगर, तीखा नहीं हल्का था,
क्या बताऊं किस कदर उस नशे मे मैं खो गया,
नशा जो पलभर के वास्ते तेरी आंखों से छलका था।
परिंदों ने घर बसाया, बच्चों संग फुर हुए,
निशानियां बसावट की मैं देख पाया था,
अपने छोटे से आशियां में उनके लिए,
जो मैंने भी इक छोटा सा नीड़ बनाया था।
रातें अक्सर ही मुझसे सवाल किया करती हैं,
और एक मैं हूं कि उनका जबाब ही नहीं देता,
कभी नयन थकते थे, अब कदम थकनें लगे हैं,
और कितना चल पाऊंगा, मैं हिसाब ही नहीं देता।
जज़्बात ऐसे लगने लगे हैं मानो ये जज़्बाती नहीं,
जमाने की हसरतें और आदतें हैं जो जाती नहीं,
अधजगी नीदं मे जुबां लगे है कुछ पढने को आतुर,
और मैं हूं कि उसे पढ़ने को किताब ही नहीं देता।
अनियमित नींदचर्या, स्लीपिंग डिसआर्डर कह लो,
दर्द की कोई सीमा नहीं जितना सह सको, सह लो,
डगमगाते कदम कहते हैं कि बहक जाने दो हमें भी,
मगर 'परचेत' मौका-ए-बहकना ख्वाब ही नहीं देता।
तू खुद ही से इकबार रूबरू तो हो जा,
फिर जो कहना है, उसे आलेख लेना,
अरे वो, कश्ती के मुसाफिर, उतरने से पहले,
एकबार समन्दर तो जाकर देख लेना।
मेरी डांडी-कांठियों का मुलुक ज्यैल्यू,
Go there in the spring.
हैरा बण मा बुरांश का फूल
जब बण मा आग लगाणा होला,
भीटा पाखों थैं फ्योलिं का फूल,
पिन्ग्ला रंग मा रंग्याणा होला ..
लाइयां पैयां ग्वीराल फूलु ना,
The earth will be decorated,
Go there and sing.
रातों के हर पहर-दोपहर,
जब भी मैं करवट बदलूं,
बदली हुई हर करवट पर,
कसम से आहें भरता हूं ,
उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना,
कह देता कि मैं तुमपर मरता हूं ,
मत पूछो, ये नशा कौन सा करता हूं,
सच में, मैं तुम्हें बतानें से डरता हूं।
गर तुम न खरीददार होते,
यकीन मानिए,
टके-दो-टके में भला कौन बिकता?
मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी
कभी,
बस, निवेश गलत किया है तुमने,
इसीलिए घर में "धन" नहीं टिकता।
रूठ जाते हैं मुझसे मेरे अपने ही और
मुझको मनाने मे जरा भी रुचि नहीं,
दिलचस्प हों भी अगर मुहब्बत की राहें,
क्या फायदा, जब दिल मे ही शुचि नहीं?
सबब खामोशी, तेरा बहाना अच्छा है,
इश्क़ हुआ मगर इजहार न किया,
अंदाज़े मोहब्बत छुपाना अच्छा है,
शकुन बुरा ही सही, दिल जलाना अच्छा है।
कह रहा हूं मैं तुमसे,
ऐ बेस्वाद, बेसुरे भड़वे,
जुबां पे थोड़ी मीठास घोल,
मत बोल इतने भी बोल कडुए।
तू शिद्दत रख और समर्पण कर,
मत पड़ फरेब में जिस्मानी शाम की,
रूहानी एहसास खुदा की इबादत ,
लिखदे तू जाकर अपने नाम की।
न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची,
बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची,
उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत',
थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।
तेरी याद आना
गुज़रे जमाने की बात हो गई,
पानी का गिलास
सामने टेबिल पर पड़ा देखकर,
अब तो हिचकियों भी नहीं आती।
अभी नहीं, सफ़र जब खत्म होने की दहलीज पर होगा,
तभी सोचेंगे ऐ जिंदगी ! कि ज़ख्म कहां-कहां से मिले।
पर्व रंगों का है वेरंगीन बन,
बैठा हूं बातें करता खुद से,
कभी न जाने क्यों ऐसा लगे,
हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से।
मदहोश-बेखबर, था तो नहीं,
दर्द का एहसास है बे-खुद से,
घाव जिस्म पे मेरे आहिस्ता कर,
अनुनय यही है बस, हुद-हुद से।
मैं अभी सो रहा हूं, मर्जी के हिसाब से,
मर्जी के हिसाब से मुझे जागना है,
तुम मत रुको मेरे लिए, ऐ ज़िन्दगी,
भाग लो, जितनी तेजी से तुम्हें भागना है।
सफर मे धूप तो बहुत होगी,
सूरज को ढक सको तो चलो,
एम्बूलैंस लेकर जा रही है रोगी,
राह उसकी रोक सको तो चलो।
मोहब्बत मे, आंखों मे भर आए आंसुओं को
गिरने न देना 'परचेत',
क्योंकि प्यार के आंसू ही रूह की खुराक होते हैं।
सवाल ये नहीं है कि जवानी में हम क्यों जीने मरने की कसमें खाते हैं,
सवाल ये है कि साठ के बाद ही क्यों 'परचेत',दर्द भरे गीत पसंद आते हैं।
इश्क़ कोई पोंछा नहीं है,
सिखा गई आज काम वाली बाई,
किधर जाऊं समझ नहीं आता,
आगे कुआं है और पीछे खाई।
इस जिंदगी का फलसफा बस, इतना सा रहा 'परचेत',
मुकाम पर हम खुद को लानत-मलामत हजार देते हैं,
संदेश उसतक पहूंचा देना, ऐ तख्त पर लटकाने वालों,
चलो, कुछ यूं करते हैं अब जिंदगी, तुझको गुज़ार देते हैं।
बेवफा क्या हुआ,
कतार में खड़े हैं कुशलक्षेम पूछने वाले,
जब बावफ़ा था 'परचेत'
तो गली का कुत्ता भी नहीं पूछता था।
अपने मुहल्ले में जरा सा सोबर दीखिए
ओर संस्कृत बोलना सीखिए,
खुद ही पूरी संस्कृत मत खाइए,
थोड़ा बीवी को भी सिखाइए।
जब झगड़े का मूड़ हो तो संस्कृत में ही लड़ना,
जमकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ना,
झगड़ा कोई सुन रहा होगा, मन में न खल रहा होगा,
पड़ोसियों को लगे कि घर में हवन-पूजन चल रहा होगा।
अपने जो भी कहने को थे, सब अजनबी हुए,
और खामोशियां बन गई हमारी जीवन साथी,
क्या नहीं त्यागा था उनके लिए हमने 'परचेत',
हम-सफ़र तो थे किंतु, उनसे हम-नवाई ना थी।
अपना तन-मन लुटा के हारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी,
आगोश तुम्हारे, मेरा सुलभ लगे मन,
चाहे तन हो कितना ही भारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।
संबंधों के तौर-तरीके मैं ना जानू,
और बनावटीपन मैं ना मानू,
या फिर कह लो दुनियादारी,
अब रह नहीं सकती मैं कुंवारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।
कोमल हूं पर कमजोर नहीं हूं,
सहमी-सहमी भोर नहीं हूं,
हर पल साथ खड़े हो जब तुम,
कहके दिखाए कोई मुझे अबला नारी,
ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।
शरीक हुए थे जो कल के कवि सम्मेलन में,
वो सब के सब, एक ही थाली के चट्टे-बट्टे थे,
एक से बढ़के एक पैदाइशी चमचे, तलवेचाट,
बस,यही कहूंगा कि सबके सब उल्लू के पठ्ठे थे।🤣
रिश्तों की खाइयों को पाटिये कि अब और न बढ़ें,
दिलों के सहरा में नजर आ रही दरार बहुत भारी है,
अगम्य राह, सत्य का पथ इतना दुर्गम कैसे हो गया,
बाधित क्यों है आवाजाही, तहक़ीक़ात अभी जारी है।
सदचित विभ्रम है और कानून का कोई खौफ नहीं,
राष्ट्र भयभीत किया जा रहा, बिखरने की तैयारी है,
समृद्धि के पथ पर पता नहीं यह कौन सी दुश्वारी है,
संयम पांवों तले क्यों आया, तहक़ीक़ात अभी जारी है।
हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे,
मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में।
बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले,
हमने तो प्यासे को भी पानी पिलाया था, मदीने में।।
पता नहीं किसको ढूंढते रहे थे हम,
सबसे पूछा, डाकिया,धोबी,खलासी,
सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,
लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,
उम्र गुजरी,तबअहसास हुआ 'परचेत',
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।
मांग रही थी वो आज मुझसे
मेरे प्यार का हलफनामा,
मौर्निग वाक पर जाती है जो
पहनकर, रोज मेरा ही गर्म पजामा।
तुम्हारे ओठों से चिपककर सांसों के सहारे,
तुमपर ही समर्पित हो जाता,
ऐ काश कि अगर 'परचेत' !
मैं तुम्हारे सान्निध्य की कोई बांसुरी होता।
हिम्मत ही नहीं रही जब,
दिखाने को कुछ नया करके,
फायदा ही क्या है 'परचेत',
तब अफसानें बयां करके।
While landing at our courtyard,
A mysterious bumblebee
is humming,
It looks,
at our door,
a treasure trove of happiness
is coming.
मुहब्बत के खातिर तुम्हारी हर बगावत की,
हमेशा ही अगुवाई करता,
फक़त ख्वाबों में ही मुहब्बत की दुहाई दोगे
तो 'परचेत', अंजाम यही होगा।
दिलों की हसरत, मिलन की चाहत, न तो इबादत ही रंग लाई
और न ही दिल की दुआ ,
हो जाता मिलन अचानक हमारा भी किसी मोड़ पर 'परचेत,'
कभी ऐसा इत्तेफाक न हुआ।
सांझ ढले, मेरे साथ बैठकर
एक पैग व्हिस्की,
कभी वो संग-सग पीती थी,
जब न तो आभासी दुनिया थी,
और ना ही वो इस कदर ,
अलग ही दुनियां में रहकर जीती थी।
अब उसने व्हिस्की पीना छोड़ दिया है,
आजकल दिन-रात सेल-फोन पीती है।।
हौसलों के दमपर अभी तक,
जी है जिंदगी हमने,
डटकर किया है मुकाबला,
राह की दुश्वारियों का,
हर शै से निकले हैं हम,
उबरकर भी, उभरकर भी,
जरा भी न कभी बेबस हुए,
बोझ ढोते लाचारियों का।
वो लम्हा तुम जरा बताओ,
जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,
कौन सा था वो लम्हा-लम्हा
जिसमें, प्यार का रंग नहीं था?
तुम जानते हो कि मेरे होते,
सलामत है लाज तुम्हारी,
इसीलिए आज तक मैं,
तुम्हारे राज तक नहीं गया ।
मांगने की आदत जिंदगी में
मुझसे कभी पाली न गई,
मोहब्बत में इसीलिए मैं भरोंसे के
अल्फ़ाज़ तक नहीं गया ।
वो अब आ नहीं सकता फिर से,
गुज़र गया जो वक्त अपनी राहों से,
किन्तु, मुश्किल तो होगा जिंदगी तेरा
सुगमता से निकलना, मेरी पनाहों से।
घड़ी की तरह खिसकती जा रही हो,
पकड़कर रखूंगा तुझे अपनी बांहों से,
सुगम-दुर्गम, हर दौर जिया है तेरे संग,
मुझे फर्क नहीं पड़ता,साहों-सलाहों से।
वर्तमान तुम अपना व्यर्थ ही न गंवाना,
उलझकर बातों में किसी भविष्यवेता के,
बहकावे में कभी भी हरगिज़ मत आना,
सड़कछाप, किसी दो कौड़ी के नेता के।
क्या बताऊं कि ये
चोंतीस साल कैसे बीते,
किस मुश्किल में
हर लम्हा गुजरा जीते-जीते,
याद तो होगा तुम्हें कि मैंने
तुमको भी न्योता दिया था,
जवानी के फोल्डर जब मैंने,
'बीवी' ऐप डाउनलोड किया था!!
हूं मैं तुम्हारा यार ऐसा ,
कविता का सार जैसा,
प्रेम से गर प्यार ना निभे,
फिर प्यार का इजहार कैसा?
थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी
यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी,
बस, ग़लती यही रही हमारी कि
दुखती रग पर उंगली रख दी थी।
कडकछाप मुद्रीकृत सारे ब्लौगर-सलौगर,
यू-ट्यूब पे कमाई की धौंस वाले यूट्यूबर,
आज सबके सब मैंने पशेमान कर दिए,
दस सेंट एडसेंस से मैंने भी कमाए थे,
सारे के सारे गुगल को ही दान कर दिए।🤣
अब कहूं भी कैंसे कि तू हिसाब-ए-मुहब्बत,
किस तरह मुझसे गिन-गिन के लेती थी,
रहती तो हमेशा नज़रों के सामने थी, मगर
जमाने के आगे कुछ कम ही दिखाई देती थी।
याद तो होगा तुमको
वो दौर-ए-जवानी,
इक दोराहे पर अचानक
हम-तुम मिले थे,
जहां सड़क तो
खाली-खाली थी मगर,
सड़क किनारे कुछ
चाहत के फूल खिले थे।
शनै:-शनै: जब हमने
कदम बढ़ाए उसतरफ,
इधर, इसतरफ
एक वीरान सा सहरा था,
उधर एक अशांत मन
जमीं पे ठहरा था,
अंततः न तो छांव ही मिल पाई,
न पानी ही,
ज़ख्म जो तुमने दिया था,
बहुत गहरा था।
पर्व लोहड़ी का था
और हम आग देखते रहे,
उद्यान राष्ट्रीय था और
हम बाघ देखते रहे।
ताक में बैठे शिकारी
हिरन-बाज देखते रहे,
हुई बात फसल कटाई की,
हम अनाज देखते रहे।
मिले न 'फूल' तो हमने
'चतुरों' से दोस्ती कर ली,
मजबूरी का नाम गांधी,
जिंदगी यूं ही बसर कर ली।
उलझकर मेरी बातें कुछ यूं,
तुम्हारी बातों में रह गई,
दिल की जो भी ख्वाहिशें थी,
जज्बातों में बह गई।
जिया उलझाने की तुम्हारी
ये हरकतें बड़ी नासाज़ लगी,
श्रुतिपुट जो सुनना न चाहते थे
वो तुम्हारी नज़रें कह गई।
शाम-ओ-सहर,
हमारे मिलने पर,
बीवियों की डपट का
जो रंग लग गया,
अब क्या बताऊं,
तुम्हें ऐ दोस्त!
कांच के गिलासों पे भी
जंग लग गया।
गैर समझा करते थे जिन्हें हम,
दिल ने उन्हें कुछ इसतरह अपनाया,
दूर भाग खड़ी हुई तन्हाई हमसे,
हम अकेले को जब मिला हमसाया ।
फिर वो हमसाया कुछ यूं हमें भाया,
तमाम जिंदगी की पलट गई काया,
जिन परछाइयों से डरते थे कभी हम,
आखिर,उन्हीं परछाइयों ने हमें अपनाया।
जब भी, जो भी जुबां पे आता है तुम्हारी, बक देते हो,
मुफ्त में जिसका भी लिखा हुआ मिल जाए पढ़ देते हो,
फुर्सत मिले तुम्हें तो सोचना, एक कमेंट के भूखें को
क्या, सही में कभी आप उसको उसका हक देते हो?
वर्ण आखिरी, वैश्य, क्षत्रिय, विप्र सभी,
सनातनी नववर्ष का जश्न मनाया कभी ?
नहीं, स्व-नवबर्ष के प्रति जब व्यवहार ऐसा,
फिर पश्चिमी नवबर्ष पर तकरार कैसा?
समझ पाओ तो समझ लेना क्षुब्ध भावनाएं,
आपको नूतनवर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। 🎂 🙏
सलीके से न खुशहाली जी पाया, न फटेहाल में,
बबाल-ए-दुनियांदारी फंसी रही,जी के जंजाल में,
बहुत झेला है अब तक, खेल ये लुका-छिपी का,
मस्ती में जीयूंगा तुझे अब ऐ जिंदगी, नए साल में।
दीवार सामर्थ्य की और तू फांद मत,
अपनी औकात में रह, हदें लांघ मत,
संवेदनाएं अगर जिंदा रहे तो अच्छा है,
बेरहम बनकर उन्हें खूंटी पे टांग मत।
साफगोई की भी तहज़ीब होती है,
डूबने वालों की भी यह सदा आई,
आखिरी उम्मीद थी मेरी तुम मगर,
बुलाने पर भी मेरे शहर नहीं आई।
सुन, प्यार क्या है,
तेरी समझ में न आए तो,
अपने ही प्यारेलाल को काट खा,
किंतु, ऐ धोबी के कुत्ते!
औकात में रहना, ऐसा न हो,
न तू घर का रहे, न घाट का।
इस मुकाम पे लाकर मुझे, तू बता ऐ जिन्दगी!
दरमियां तेरे-मेरे, अचानक ऐंसी क्या ठन गई,
जिन्हें समझा था अपनी अच्छाइयां अब तक,
वो सबकी सब पलभर मे बुराइयां क्यों बन गई।
दगा किस्मत ने दिया, दोष तेरा नहीं, जानता हू,
जीने का तेरा तर्क़ मुझसे भी बेहतर है, मानता हूं,
मगर, इसे कुदरत का आशिर्वाद समझूं कि बद्दुआ
मुखबिर मेरे खिलाफ़, मेरी ही परछाईं जन गई।
हिन्दुस्तान हमारा विकास की राह पर है,
बस, अब आप अपनी गुजर-बसर देखना,
मैंने भी आप सबके लिए दुआएं मांगी हैं,
अब, तुम मेरी दुआओं का असर देखना।
थोडी सी बेरुखी से हमसे जो
उन्होंने पूछा था कि वफा क्या है,
हंसकर हमने भी कह दिया कि
मुक्तसर सी जिंदगी मे रखा क्या है!!
सुना न पाऊंगा मैं, कोई कहानी रस भरी,
जुबां पे दास्तां तो है मगर, वो भी दर्द भरी,
सर्द हवाएं, वयां करने को बचा ही क्या है?
यह जाड़े का मौसम है , दिसम्बर-जनवरी।
सोचा था कर दूंगा आज, इश्क तुम्हारे नाम,
बर्फ से ढकी हुई पहाड़ी ठिठुरन भरी शाम,
दिल कहता था, छलकागें इश्कही-विश्कही,
मगर, "बूढ़े साधू" ने बिगाड़ दिया सारा काम।
जिंदगी पल-पल हमसे ओझल होती गई,
साथ बिताए पलों ने हमें इसतरह रुलाया,
व्यथा भरी थी हर इक हमारी जो हकीकत ,
इस बेदर्द जगत ने उसे इत्तेफ़ाक बताया।
कभी दिल किसी और का न हमने दुखाया,
दर्द को अपने हमेशा हमने, सीने मे छुपाया,
रुला देना ही शायद फितरत है इस ज़हां की,
बोझ दुनियां का यही सोच, कांधे पे उठाया।
धर्म सृष्टा हो समर्पित, कर्म ही सृष्टि हो,
नज़रों में रखिए मगर, दृष्टि अंतर्दृष्टि हो,
ऐब हमको बहुतेरे दिख जाएंगे दूसरों के,
क्या फायदा, चिंतन खुद का ही निकृष्ट हो।
रहे बरकरार हमेशा, हमारा बाहुमुल्य मुल्य,
ठेस रहित रहे भावना, आकुण्ठित न कृष्टि हो,
विगत बरसात, किसने न देखा वृष्टि-उत्पात,
दुआ करें, अगली बरसात सिर्फ पुष्प-वृष्टि हो।
बस भी करो अब ये सितम,
हम और न सह पाएंगे,
बदकिस्मती पे अपनी,
बल खाए न रह पाएंगे।
किस-किस को बताएं अब,
अपनी इस जुदाई का सबब,
क्या मालूम था,फैसले तुम्हारे,
हमें इस कदर तड़पाएंगे।।
पिरोया न करो सभी धागे एक ही सरोकार मे,
पता नहीं कब तार इनके, तार-तार हो जाएं,
यह न चाहो, हसरत भी संग चले, हकीकत भी,
पता नहीं खेने वाले कब, खुद पतवार हो जाएं।
भरोसे का कतई दौर नहीं, किसको पता है कि
जो नाख़ुशगवार थे हमको,कब ख़ुशगवार हो जाएं,
वजूद पे अपने इश्क का ऐसा खुमार मत पालो,
मौसमों के पैंतरों से भी, प्रचण्ड बुखार हो जाएं।
शुन्यता के दौर में राहें अंजानी, नैया मझधार मे,
पार पाने की जद्दोजहद, ख्वाहिशें दुश्वार हो जाएं,
हमने कसम खाई थी 'परचेत' तुम्हारे ही होकर रहेंगे,
दौर-ए-बेवफ़ाई, क्या पता किस नाव पे सवार हो जाएं ।
हमेशा झूमते रहो सुबह से शाम तक,
बोतल के नीचे के आखिरी जाम तक,
खाली हो जाए तो भी जीभ टक-टका,
तब तलक जीभाएं, हलक आराम तक।
झूमती जिंदगी, तुम क्या जान पाओगे?
अरे कमीनों ! पाप जिसे निगल जाएगा
तुम्हारे न चाहते हुए भी, ठग बहराम तक।
ये सच है, तुम्हारी बेरुखी हमको,
मानों कुछ यूं इस कदर भा गई,
सावन-भादों, ज्यूं बरसात आई,
गरजी, बरसी और बदली छा गई।
मैं तो कर रहा था कबसे तुम्हारा
बेसब्री से आने का इंतजार, किंतु
तुम आई तो मगर, मेरे विरां दिल की
छोटी सी पहाड़ी जमीन दरका गई।।
मौसम त्योहारों का, इधर दीवाली का अपना चरम है,
ये मेरे शहर की आ़बोहवा, कुछ गरम है, कुछ नरम है,
कहीं अमीरी का गुमान है तो कहीं ग़रीबी का तूफान है,
है कहीं पे फुर्सत के लम्हें तो कंही वक्त ही बहुत कम है।
है कहीं तारुण्य जोबन, जामों मे सुरा ज्यादा नीर कम है,
हो गई काया जो उम्रदराज, झर-झर झरता जरठ गम है,
सार यह है कि फलसफा जिंदगी का है अजब 'परचेत',
कहीं दीपोत्सव की जगमगाहट, कहीं रोशनी का भ्रम है।
जीवन रहन गमों से अभिभारित,
कुदरत ने विघ्न भरी आवागम दी,
मन तुषार, आंखों में नमी ज्यादा,
किंतु बोझिल सांसों में हवा कम दी,
तकाजों का टिफिन पकड़ाकर भी,
हमें रह गई बस गिला इतनी तुमसे,
ऐ जिन्दगी, तूने दर्द ज्यादा दवा कम दी।
समझ पाओ तो
यूं समझिए कि
तुम्हारा आई कार्ड,
निष्कृयता नाजुक,
और निष्पादन हार्ड।
( यह चार लाइनें पितृपक्ष के दरमियां लिखी थी पोस्ट करना भूल गया,,,,,बस यही तो है कलयुगी बेटों का कमाल)
उनपे जो ऐतबार था, अब यह समझ वो मर गया,
यूं समझ कि जो पैग का खुमार था, देह से उतर गया,
परवाह रही न जिंदगी को अब किसी निर्लज्ज की,
संजोए रखा बना के मोती, नयनों से खुद झर गया।
अभी तक मैं इसी मुगालते में जी रहा था
सांसों को पिरोकर जिंदगी मे सीं रहा था,
जो हो रहा पहाड़ो पर, इंद्रदेव का तांडव है,
सुरा को यूं ही सोमरस समझकर पी रहा था।
किंतु अब जाके पता चला कि तांडव-वांडव कुछ नहीं ,
विकास-ए-परती धरा ये, स्वर्ग वालों को खटी जा रही,
ये तो "ऋतु बरसात' इक बहाना था बादल फटने का,
नु पता आपरेशन सिंदूर देख, इंद्रदेव की भी फटी जा रही।
मिली तीन-तीन गुलामियां तुमको प्रतिफल मे,
और कितना भला, भले मानुष ! तलवे चाटोगे।
नाचना न आता हो, न अजिरा पे उंगली उठाओ,
अरे खुदगर्जों, जैसा बोओगे, वैसा ही तो काटोगे।।
अहम् ,चाटुकारिता को खुद आत्मसात् करके,
स्वाभिमान पर जो डटा है,उसे तुम क्या डांटोगे।
आम हित लगा नाटा, निहित हित में देश बांटा,
जाति-धर्म की आड़ में जन और कितना बांटोगे।।
स्वाधीनता नाम दिया, जुदा भाई को भाई से किया,
औकात क्या है अब तुम्हारी जो बिछड़ों को सांटोगे।
जड़ें ही काट डाली जिस वटवृक्ष की 'परचेत' तुमने,
उस दरख़्त की डालियों को, और कितना छांटोगे।।
जो किसी के भी दिल में नहीं बसता हो, उसे तू अपने दिल में ऐसे न बसाया कर, इतनी सी आरज़ू है तुझसे मेरी 'परचेत', अपना ग़म लेके इधर-उधर...