Sunday, August 9, 2026

कबूलनामा

 दौर-ए-जवानी का वो मदहोश 

वक्त भी क्या था,

शाम को घर लौटते हुए राह मे,

फूल भी मिले, कांटे भी मिले,

घर की देहलीज पर पहुंचकर 

हाथ मे पकड़ा उनका पसंदीदा कुछ हो तो,

मुस्कुराहट भी मिलती थी, वरना चांटे भी मिले।

 

Saturday, August 8, 2026

रूबर

 सेवानिवृत्ति का जुनून 

आहिस्ता-आहिस्ता 

मौत के घाट उतार देगा हमको, 

कहां मालूम था कि 

गांव का अकेलापन इकदिन, 

इस कदर मार देगा हमको।

पशेमानी

तुम्हारी ख़्वाहिशों के बोझ तले दबकर भी 

मैं तुमको जरूर नजर आया होता,

अगर ऐ जालिम तुमने, कामयाबी का दर्जा पाने को 

अपना ये जाल न बिछाया होता।

Monday, August 3, 2026

परिवेश

अफसोस, कि अब ये
कैसा ज़माना आ रहा है,
बोलने को तो गद्दार 
भूख हड़ताल पर बैठे हैं 
मगर, आनलाइन 
विदेशों से
वास्ते उनके, खाना आ रहा है।



बंजारा

अरे ओ बंजारे!

ठिकाना ना ही 

तेरा मुकम्मल है 

और ना ही मेरा मुकम्मल,

पहचान मतलबी,

राह अजनबी, 

अचानक मिल गए

इक वीराने सहरा मे,

फिर मिलें न मिलें

तू भी मुसाफिर, 

मैं भी मुसाफिर!

Sunday, August 2, 2026

अधूरी धड़कन।

 राह चलते जिंदगी की  

मैं गुम हो गया, 

भीड़ मे रहते हुए भी 

तन्हाई मे खो गया, 

कोई तो आए पास मेरे, 

गिड़गिड़ाए एहसास मेरे, 

एकाकी रात, अधूरे ख्वाब,

चादर ओढ़ मैं सो गया।

अफसोस

 निष्पक्षता धसी दुराचार के दल-दल मे,

निडरता कुटिलता से डर गई, 

कागजों के बागी तेबर देखकर,

कलम जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर गई।


दौर-ए-काॅकरोच, हया गुमशुदा हुई,

परतें शराफ़त की चेहरों से उतर गई, 

मोटी सी वो किताब जिसे 

बाबासाहेब ने लिखा था,

सुना है उसे, 

अपने ही घर की चुहिया कुतर गई।