Saturday, April 25, 2026

Yकीं

 रात गहरी बहुत है मगर, 

यकीं रखो, हम सोएंगे नहीं।

तूम रुलाने की जितनी भी कोशिश कर लो, 

रोएंगे नहीं,

बेदना के पार्क मे सन्नाटे संग 

खामोशी भी बैठी है 'परचेत',

इसलिए किसी के बहकावे में आकर, 

आपा खोएंगे नहीं।


Monday, April 20, 2026

बोल संस्करण !

हमने तो मरने को नहीं कहा था,

अरे वो, हमें पत्थर दिल कहने वालों,

जो पास है तुम्हारे उसी पे जी लेते,

मुफलिसीतंगदिली मे जीने वालों ।


बस, मेरे साथ सिर्फ इक मेरी गिला़ और

तुम्हारे संग तमाम सिकवों का काफ़िला,

मैं अभिभूत और ऐतबार पराजित, 'परचेत',

यकीं रख, लम्बा न चल पायेगा ये सिलसिला।


सिसकियां आई, हिस्कियां आई और पराज भी आए हैं,

देहलीज पे तेरी, युवा आए और उम्रदराज भी आए हैं,

अरे वो, हुस्न की मलिका, नागवार है इतराना तेरा,

उम्र दराजी के तजुर्बे  में हमने  तो उन्हें भी देखा है,  

 कबूतर के चेहरे मे मु़डेरी पर जो बाज आए हैं।


जो आज आनी चाहिए थी, वो तुम्हें आज आती नहीं,

खुद को हुश्न की मलिका बताते हुए लाज आती  नहीं,

हमने तो, तुम्हारे हुस्न की बस खैर मांगी थी, ऐ दोस्त!

जो जवानी में न आ सके, वो उम्र दराज आती नही।


न निशां पड़ते, न ही दाग होते,

तले जिसके अंधेरा न होता, 

ऐ काश! कि हम वो चराग होते,

हम कहते, छुप लो बनकर प्यार

हमारे इस सूने से दिल में,

छुप लेते,अगर जो तुम राग होते।


 

Sunday, April 19, 2026

सवाल

किस राह मे गिर गया, अबे 'परचेत'  साले!

फूल था और राह तूने अपनी कांटों की चुनी!

Tuesday, April 14, 2026

कबाब में हड्डी

अबे, पहले तो ये बता तू है कौन?

 तुम जैसों के मुंह लगना मेरा चस्का नहीं,

मेरी तो बीवी से भी बिगड़ी पड़ी है,

चल हट, मुझे सम्हालना तेरे बस का नहीं।


Monday, April 13, 2026

श्रद्धांजलि!

वो बिन वजह हंसना तेरा, 

वो बिन वजह रोना तेरा,

जिंदगी और कुछ भी नहीं,

तेरी -मेरी कहानी है। 

इक प्यार का नगमा....

#आशाभोंसलेविनम्रशर्द्दाजली!

बंदिशें ।


मायके ठहरने का वक्त बिटिया जानती है, ज्यादा न रुक पाएगी,

हेमंत ऋतु भी आई, कल शिशिर भी वसंत संग चली जाएगी।

Sunday, April 12, 2026

बताएं भी किसे?

 बेरुखी, खामोशी, यादों का बोझ,

फेहरिस्त लम्बी है इस  तन्हाई की,

अब क्या? उम्र कट गई 'परचेत' , 

राह तकते-तकते इक हरजाई की।

Saturday, April 11, 2026

पुरानी यादें।

भले ही वो हैंगओवर मेरे  लिए कुछ ही पल का था,

नशा मेरे प्यार का मगर, तीखा नहीं हल्का था,

क्या बताऊं किस कदर उस नशे मे मैं खो गया,

नशा जो पलभर के वास्ते तेरी आंखों से छलका था।

Friday, April 10, 2026

कुदरत













परिंदों ने घर बसाया, बच्चों संग फुर हुए,

निशानियां बसावट की मैं देख पाया था,

अपने छोटे से आशियां में उनके लिए,

जो मैंने भी इक छोटा सा नीड़ बनाया था।




Thursday, April 9, 2026

बंदिशें अपनी।


रातें अक्सर ही मुझसे सवाल किया करती हैं, 

और एक मैं हूं कि उनका जबाब ही नहीं देता,

कभी नयन थकते थे, अब कदम थकनें लगे हैं,

और कितना चल पाऊंगा, मैं हिसाब ही नहीं देता।


जज़्बात ऐसे लगने लगे हैं  मानो ये जज़्बाती नहीं,

जमाने की हसरतें और आदतें हैं जो जाती नहीं,

अधजगी नीदं मे जुबां लगे है कुछ पढने को आतुर,

और मैं हूं कि उसे पढ़ने को किताब ही नहीं देता।



अनियमित नींदचर्या, स्लीपिंग डिसआर्डर कह लो,

दर्द की कोई सीमा नहीं जितना सह सको, सह लो,

डगमगाते कदम कहते हैं कि बहक जाने दो हमें भी,

मगर 'परचेत' मौका-ए-बहकना ख्वाब ही नहीं देता।













Saturday, April 4, 2026

सलाह

तू खुद ही से इकबार रूबरू तो हो जा,

फिर जो कहना है, उसे आलेख लेना,

अरे वो, कश्ती के मुसाफिर, उतरने से पहले,

एकबार समन्दर तो जाकर देख लेना।

Saturday, March 21, 2026

अंदाज!

मेरी डांडी-कांठियों का मुलुक ज्यैल्यू,

Go there in the spring.

हैरा बण मा बुरांश का फूल

जब बण मा आग  लगाणा होला,

भीटा पाखों थैं फ्योलिं का फूल, 

पिन्ग्ला रंग मा रंग्याणा होला ..

लाइयां पैयां ग्वीराल फूलु ना,

The earth will be decorated,
Go there and sing.

Thursday, March 19, 2026

O sitting moon !


O setting moon!

Come back soon.

For me, you are

not a dark midnight,

for me, to be honest, you are a happy noon.

O setting moon!

Come back soon.

Monday, March 16, 2026

पुनर्विवरण !

रातों के हर पहर-दोपहर, 

जब भी  मैं करवट बदलूं,

बदली हुई हर करवट पर, 

कसम से आहें भरता हूं ,

उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना,

 कह देता कि  मैं तुमपर मरता हूं ,

मत पूछो, ये नशा कौन सा करता हूं,

 सच में, मैं तुम्हें बतानें से डरता हूं।


Thursday, March 12, 2026

वज़ह!

गर तुम न खरीददार  होते,

यकीन मानिए, 

टके-दो-टके में भला कौन बिकता?

मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी

कभी,

बस, निवेश गलत किया है तुमने,

इसीलिए घर में "धन" नहीं टिकता।



वाजिब बात

रूठ जाते हैं मुझसे मेरे अपने ही और 

मुझको मनाने मे जरा भी रुचि नहीं,

दिलचस्प हों भी अगर मुहब्बत की राहें,

क्या फायदा, जब दिल मे ही शुचि नहीं?

 

Wednesday, March 11, 2026

कश्मकश

सबब खामोशी, तेरा बहाना अच्छा है,

इश्क़ हुआ मगर इजहार न किया,

अंदाज़े मोहब्बत छुपाना अच्छा है,

शकुन बुरा ही सही, दिल जलाना अच्छा है।


Monday, March 9, 2026

हकीकत

उजागर न होने दिया हमने 

उजागर न करने के ऐब से,

वाकिफ बहुत खूब थे हम,

तुम्हारे छल और फरेब से।

सलाह

कह रहा हूं मैं तुमसे, 

ऐ बेस्वाद, बेसुरे भड़वे,

जुबां पे थोड़ी मीठास घोल,

मत बोल इतने भी बोल कडुए।


तू शिद्दत रख और  समर्पण कर,

मत पड़ फरेब में जिस्मानी शाम की,

रूहानी एहसास खुदा की इबादत ,

 लिखदे तू जाकर अपने नाम की।


Sunday, March 8, 2026

मन की हकीकत

न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची,

बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची,

उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत',

थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।


Friday, March 6, 2026

तब्दीली

तेरी याद आना 

गुज़रे जमाने की बात हो गई,

पानी का गिलास 

सामने टेबिल पर पड़ा देखकर,

अब तो हिचकियों भी नहीं आती।

सफर अभी बाकी है।

अभी नहीं, सफ़र जब खत्म होने की दहलीज पर होगा, 

तभी सोचेंगे ऐ जिंदगी ! कि ज़ख्म कहां-कहां से मिले।


परिभाषा

कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं

कि जो फटते नहीं,

फासले अगर बढ़ने लगें

तो फिर घटते नहीं।

Wednesday, March 4, 2026

हो ली,,,









पर्व रंगों का है वेरंगीन बन,

बैठा हूं बातें करता खुद से,

कभी न जाने क्यों ऐसा लगे,

हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से।

 

मदहोश-बेखबर, था तो नहीं,

दर्द का एहसास है बे-खुद से,

घाव जिस्म पे मेरे आहिस्ता कर,

अनुनय यही है बस, हुद-हुद से।



Friday, February 27, 2026

दरकार नहीं

मैं  अभी सो रहा हूं, मर्जी के हिसाब से, 

मर्जी के हिसाब से मुझे जागना है,

तुम मत रुको मेरे लिए, ऐ ज़िन्दगी,

भाग लो, जितनी तेजी से तुम्हें भागना है।

Wednesday, February 25, 2026

लुभावना

सफर मे धूप तो बहुत होगी,

सूरज को ढक सको तो चलो, 

एम्बूलैंस लेकर जा रही है रोगी, 

राह उसकी रोक सको तो चलो।

Friday, February 20, 2026

इल्तज़ा

 मोहब्बत मे, आंखों मे भर आए आंसुओं को

गिरने न देना 'परचेत',

क्योंकि प्यार के आंसू ही रूह की खुराक होते हैं।

Wednesday, February 18, 2026

वाजिब सवाल !

सवाल ये नहीं है कि जवानी में हम क्यों जीने मरने की कसमें खाते हैं,

सवाल ये है कि साठ के बाद ही क्यों 'परचेत',दर्द भरे गीत पसंद आते हैं।

Tuesday, February 10, 2026

वाहियात

आज उन्होंने जैसे मुझे, 

पानी पी-पीकर के कोसा,

इंसानियत से 'परचेत', 

अब उठ गया है भरोसा।


Monday, February 9, 2026

दुविधा

इश्क़ कोई पोंछा नहीं है,

सिखा गई आज काम वाली बाई,

किधर जाऊं समझ नहीं आता,

आगे कुआं है और पीछे खाई।


पैगाम

इस जिंदगी का फलसफा बस, इतना सा रहा 'परचेत', 

मुकाम पर हम खुद को लानत-मलामत हजार देते हैं,

संदेश उसतक पहूंचा देना, ऐ तख्त पर लटकाने वालों, 

चलो, कुछ यूं करते हैं अब जिंदगी, तुझको गुज़ार देते हैं।


Sunday, February 8, 2026

हकीकत

बेवफा क्या हुआ,

कतार में खड़े हैं कुशलक्षेम पूछने वाले,

जब बावफ़ा था 'परचेत' 

तो गली का कुत्ता भी  नहीं पूछता था।



Saturday, February 7, 2026

संस्कृत सीखिए

 अपने मुहल्ले में जरा सा सोबर दीखिए

ओर संस्कृत बोलना सीखिए,

खुद ही पूरी संस्कृत मत खाइए,

थोड़ा बीवी को भी सिखाइए।


जब झगड़े का मूड़ हो तो संस्कृत में ही लड़ना,

जमकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप मढ़ना,

झगड़ा कोई सुन रहा होगा, मन में न खल रहा होगा,

पड़ोसियों को लगे कि घर में हवन-पूजन चल रहा होगा।

Friday, February 6, 2026

ऐ जिंदगी!

अब और कहां तक  होगी इससे भी बदसूरत ज़्यादा,

जिंदगी, तू जिंदा कम नजर आती है, मूरत ज्यादा।



Thursday, February 5, 2026

पश्चाताप

अपने जो भी कहने को थे, सब अजनबी हुए,

और खामोशियां बन गई हमारी जीवन साथी,

क्या नहीं त्यागा था उनके लिए हमने 'परचेत',

हम-सफ़र तो थे किंतु, उनसे हम-नवाई ना थी।



ओ रे पिया, मैं तुम्हारी

अपना तन-मन लुटा के हारी,

ओ रे पिया, मैं तुम्हारी,

आगोश तुम्हारे, मेरा सुलभ लगे मन,

चाहे तन हो कितना ही भारी,

ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।


संबंधों के तौर-तरीके मैं ना जानू,

और बनावटीपन मैं ना मानू,

या फिर कह लो दुनियादारी,

अब रह नहीं सकती मैं कुंवारी,

 ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।


कोमल हूं पर कमजोर नहीं हूं,

सहमी-सहमी भोर नहीं  हूं,

हर पल साथ खड़े हो जब तुम,

कहके दिखाए कोई मुझे अबला नारी,

 ओ रे पिया, मैं तुम्हारी।




कोप

शरीक हुए थे जो कल के  कवि सम्मेलन में,

वो सब के सब, एक ही थाली के चट्टे-बट्टे थे,

एक से बढ़के एक पैदाइशी चमचे, तलवेचाट,

बस,यही कहूंगा कि सबके सब उल्लू के पठ्ठे थे।🤣


Wednesday, February 4, 2026

तहकिकात अभी जारी रहेगी

 


तहक़ीक़ात अभी जारी है

रिश्तों की खाइयों को पाटिये कि अब और न बढ़ें,

दिलों के सहरा में नजर आ रही दरार बहुत भारी है,

अगम्य राह, सत्य का पथ इतना दुर्गम कैसे हो गया,

बाधित क्यों है आवाजाही, तहक़ीक़ात अभी जारी है।‌


सदचित विभ्रम है और कानून  का कोई खौफ नहीं, 

राष्ट्र भयभीत किया जा रहा, बिखरने की तैयारी है, 

समृद्धि के पथ पर पता नहीं यह कौन सी दुश्वारी है, 

संयम पांवों तले क्यों आया, तहक़ीक़ात अभी जारी है।


Tuesday, February 3, 2026

दिल की बात

हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे,

मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में।

बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले,

हमने तो प्यासे को भी पानी पिलाया था, मदीने में।।


नादानी

पता नहीं किसको ढूंढते रहे थे हम, 

सबसे पूछा, डाकिया,धोबी,खलासी, 

सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,

लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी, 

उम्र गुजरी,तबअहसास हुआ 'परचेत', 

जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।

इश्क़-ए-सर्दी

मांग रही थी वो आज मुझसे 

मेरे प्यार का हलफनामा,

मौर्निग वाक पर जाती है जो

पहनकर, रोज मेरा ही गर्म पजामा।


Monday, February 2, 2026

तमन्ना

तुम्हारे ओठों से चिपककर सांसों के सहारे,

तुमपर ही समर्पित हो जाता,

ऐ काश कि अगर 'परचेत' ! 

मैं तुम्हारे सान्निध्य की कोई बांसुरी होता।

स्वीकारोक्ति

हिम्मत ही नहीं रही जब,

दिखाने को कुछ नया करके,

फायदा ही क्या है 'परचेत',

तब अफसानें बयां करके।




Sunday, February 1, 2026

Imagination

While landing at our courtyard, 

A mysterious bumblebee 

is humming,

It looks,

at our door, 

a treasure trove of happiness 

is coming.

नासमझ

मुहब्बत के खातिर तुम्हारी हर बगावत की,

हमेशा ही अगुवाई करता,

फक़त ख्वाबों में ही मुहब्बत की दुहाई दोगे

तो 'परचेत', अंजाम यही होगा।



Saturday, January 31, 2026

अधूरी हसरत

दिलों की हसरत, मिलन की चाहत, न तो इबादत ही रंग लाई 

और न  ही दिल की दुआ ,

हो जाता मिलन अचानक हमारा भी किसी मोड़ पर 'परचेत,' 

कभी ऐसा इत्तेफाक न हुआ।

Friday, January 30, 2026

दौर-ए-बदलाव

सांझ ढले, मेरे साथ बैठकर 

एक पैग व्हिस्की,

कभी वो संग-सग पीती थी,

जब न तो आभासी दुनिया थी,

और ना ही वो इस कदर ,

अलग ही दुनियां में रहकर जीती थी।

अब उसने व्हिस्की पीना छोड़ दिया है,

आजकल दिन-रात सेल-फोन पीती है।।

Thursday, January 29, 2026

हौंसला

हौसलों के दमपर अभी तक, 

जी है जिंदगी हमने,

डटकर किया है मुकाबला, 

राह की दुश्वारियों का,

हर शै से निकले हैं हम, 

उबरकर भी, उभरकर भी,

जरा भी न कभी बेबस हुए, 

बोझ ढोते लाचारियों का।

Wednesday, January 28, 2026

सवाल

वो लम्हा तुम जरा बताओ,

जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,

कौन सा था वो लम्हा-लम्हा

जिसमें, प्यार का रंग नहीं था?


यकीनन

तुम जानते हो कि मेरे होते, 

सलामत है लाज तुम्हारी,

इसीलिए आज तक मैं,

तुम्हारे राज तक नहीं गया ।

मांगने की आदत जिंदगी में 

मुझसे कभी पाली न गई,

मोहब्बत में इसीलिए मैं भरोंसे के 

अल्फ़ाज़ तक नहीं गया ।

Tuesday, January 27, 2026

टीस

साफ-गोई की सजा यह मिली हमको 

कि हम झूठे बन गये,

यही वजह थी कि जहां के आगे ऐ जिंदगी, 

हम अनूठे बन गये।

संतुष्टि


यूं तो इस मेरे किरदार को, 

अंधेरों से हमेशा शिकायत ही रही,

किंतु चलता चला गया, 

नुक़्स भी मिले, दिशा भी मिली।

Monday, January 26, 2026

फलसफा जिंदगी











वो अब आ नहीं सकता फिर से, 

गुज़र गया जो वक्त अपनी राहों से,

किन्तु, मुश्किल तो होगा जिंदगी तेरा 

सुगमता से निकलना, मेरी पनाहों से।

घड़ी की तरह खिसकती जा रही हो, 

पकड़कर रखूंगा तुझे अपनी बांहों से,

सुगम-दुर्गम, हर दौर जिया है तेरे संग,

मुझे फर्क नहीं पड़ता,साहों-सलाहों से।

Sunday, January 25, 2026

राय

वर्तमान  तुम अपना व्यर्थ ही न गंवाना,

उलझकर बातों में किसी भविष्यवेता के,

बहकावे में कभी भी हरगिज़ मत आना,

सड़कछाप, किसी दो कौड़ी के नेता के।

Saturday, January 24, 2026

पल-पल



क्या बताऊं कि ये 

चोंतीस साल कैसे बीते,

किस मुश्किल में 

हर लम्हा गुजरा जीते-जीते,

याद तो होगा तुम्हें कि मैंने 

तुमको भी न्योता दिया था,

जवानी के फोल्डर जब मैंने, 

'बीवी' ऐप डाउनलोड किया था!!

Friday, January 23, 2026

सवाल!

हूं मैं तुम्हारा यार ऐसा ,

कविता का सार जैसा,

प्रेम से गर प्यार ना निभे,

फिर प्यार का इजहार कैसा?



Wednesday, January 21, 2026

एहसास !

थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी

यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी,

बस, ग़लती यही रही हमारी कि

दुखती रग पर उंगली रख दी थी।



Tuesday, January 20, 2026

दानदाता च महीपति;



कडकछाप मुद्रीकृत सारे ब्लौगर-सलौगर, 

यू-ट्यूब पे कमाई की धौंस वाले यूट्यूबर,

आज सबके सब मैंने पशेमान कर दिए,

दस सेंट एडसेंस से मैंने भी कमाए थे,

सारे के सारे गुगल को ही दान कर दिए।🤣


Saturday, January 17, 2026

बहुरूपिये!

अब कहूं भी कैंसे कि तू हिसाब-ए-मुहब्बत, 

किस तरह मुझसे गिन-गिन के लेती थी,

रहती तो हमेशा नज़रों के सामने थी, मगर

जमाने के आगे कुछ कम ही दिखाई देती थी।

दिले नादान



याद तो होगा तुमको 

वो दौर-ए-जवानी,

इक दोराहे पर अचानक 

हम-तुम मिले थे,

जहां सड़क तो 

खाली-खाली थी मगर,

सड़क किनारे कुछ 

चाहत के फूल खिले थे।

शनै:-शनै: जब हमने 

कदम बढ़ाए उसतरफ, 

इधर, इसतरफ 

एक वीरान सा सहरा था, 

उधर एक अशांत  मन 

जमीं पे ठहरा था,

अंततः न तो छांव ही मिल पाई, 

न पानी ही,

ज़ख्म जो तुमने दिया था, 

बहुत गहरा था।


Friday, January 16, 2026

अफसोस।

 दिन-रात हो कि सुबह-शाम बस,

यही अफसोस कचोटता है हाए,

ऐ जिंदगी तुझे हम तमाम उम्र,

बड़े सलीके से नहीं रख पाए।

समझ !

देहिक अपच हो तो खुशी 

एक कब्ज़हर चूर्ण जैसा होता है,

यूं तो समय प्रतूर्ण है मगर,

 हर पल महत्वपूर्ण जैसा होता है।



Tuesday, January 13, 2026

छंद

पर्व लोहड़ी का था

और हम आग देखते रहे,

उद्यान राष्ट्रीय था और

हम बाघ देखते रहे।

ताक में बैठे शिकारी

हिरन-बाज देखते रहे,

हुई बात फसल कटाई की,

हम अनाज देखते रहे।

समझ, नासमझ !

मिले न 'फूल' तो हमने 

'चतुरों' से दोस्ती कर ली,

मजबूरी का नाम गांधी, 

जिंदगी यूं ही बसर कर ली।





Sunday, January 11, 2026

द्वंद्व

उलझकर मेरी बातें कुछ यूं,  

तुम्हारी बातों में रह गई,

दिल की जो भी ख्वाहिशें थी, 

जज्बातों में बह गई।

जिया उलझाने की तुम्हारी 

ये हरकतें बड़ी नासाज़ लगी,

श्रुतिपुट जो सुनना न चाहते थे 

वो तुम्हारी नज़रें कह गई।



Saturday, January 10, 2026

असर

शाम-ओ-सहर,

हमारे मिलने पर,

बीवियों की डपट का

जो रंग  लग गया,

अब क्या बताऊं, 

तुम्हें ऐ दोस्त!

कांच के गिलासों पे भी

जंग लग गया।

Friday, January 9, 2026

खुदानाखास्ता

गैर समझा करते थे जिन्हें हम,

दिल ने उन्हें कुछ इसतरह अपनाया,

दूर भाग खड़ी हुई तन्हाई हमसे,

हम अकेले को जब मिला हमसाया ।


फिर वो हमसाया कुछ यूं हमें भाया,

तमाम जिंदगी की पलट गई काया,

जिन परछाइयों से डरते थे कभी हम,

आखिर,उन्हीं परछाइयों ने हमें अपनाया।

 

Tuesday, January 6, 2026

मुफ्तखोरी

जब भी, जो भी जुबां पे आता है तुम्हारी, बक देते हो, 

मुफ्त में जिसका भी लिखा हुआ मिल जाए पढ़ देते हो, 

फुर्सत मिले तुम्हें तो सोचना, एक कमेंट के भूखें को

क्या, सही में कभी आप उसको उसका हक देते हो?



Thursday, January 1, 2026

आगाज़ - 2026 !


वर्ण आखिरी, वैश्य, क्षत्रिय, विप्र सभी,

सनातनी नववर्ष का जश्न मनाया कभी ?

नहीं, स्व-नवबर्ष के प्रति जब व्यवहार ऐसा,

फिर  पश्चिमी  नवबर्ष  पर तकरार कैसा?


समझ पाओ तो समझ लेना क्षुब्ध भावनाएं,

आपको  नूतनवर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। 🎂 🙏


Tuesday, December 30, 2025

संकल्प-२०२६

सलीके से न खुशहाली जी पाया, न फटेहाल में, 

बबाल-ए-दुनियांदारी फंसी रही,जी के जंजाल में, 

बहुत झेला है अब तक, खेल ये लुका-छिपी का,

मस्ती में जीयूंगा तुझे अब ऐ जिंदगी, नए साल में।

Monday, December 29, 2025

हल?

 हां, उलझनें हैं क्योंकि 

बीच हमारे अनबन है,

दरमियां फासले हैं, मगर

मिलने  का भी मन है।

Friday, December 26, 2025

सलाह

दीवार सामर्थ्य की और तू फांद मत,

अपनी औकात में रह, हदें लांघ मत,

संवेदनाएं अगर जिंदा रहे तो अच्छा है,

बेरहम बनकर उन्हें खूंटी पे टांग मत।

Wednesday, December 24, 2025

मलाल

साफगोई की भी तहज़ीब होती है,

डूबने वालों की भी यह सदा आई,

आखिरी उम्मीद थी मेरी तुम मगर,

बुलाने पर भी मेरे शहर नहीं आई।

Tuesday, December 23, 2025

ऐ धोबी के कुत्ते!

सुन, प्यार क्या है,

तेरी समझ में न आए तो,

अपने ही प्यारेलाल को काट खा,

किंतु, ऐ धोबी के कुत्ते!

औकात में रहना, ऐसा न हो,

न तू घर का रहे, न घाट का।


सुनो पथिक!



कोई  दयार-ए-दिल की रात मे

वहां चराग सा जला गया,

जो रहता था कभी उधर,

सुना है, अब वो शहर चला गया।



Saturday, December 20, 2025

मलाल

इस मुकाम पे लाकर मुझे, तू बता ऐ जिन्दगी!

दरमियां तेरे-मेरे, अचानक ऐंसी क्या ठन गई,

जिन्हें समझा था अपनी अच्छाइयां अब तक,

वो सबकी सब पलभर मे बुराइयां क्यों बन गई।

दगा किस्मत ने दिया, दोष तेरा नहीं, जानता हू,

जीने का तेरा तर्क़ मुझसे भी बेहतर है, मानता हूं,

मगर, इसे कुदरत का आशिर्वाद समझूं कि बद्दुआ 

मुखबिर मेरे खिलाफ़, मेरी ही परछाईं जन गई।

Friday, December 12, 2025

व्यथा

 तुझको नम न मिला

और तू खिली नहीं,

ऐ जिन्दगी !

मुझसे रूबरू होकर भी

तू मिली नहीं।

Thursday, December 11, 2025

दुआ !

 हिन्दुस्तान हमारा विकास की राह पर है,

बस, अब आप अपनी गुजर-बसर देखना,

मैंने भी आप सबके लिए दुआएं मांगी हैं,

अब, तुम मेरी दुआओं का असर देखना।

Saturday, December 6, 2025

उलझनें

 थोडी सी बेरुखी से  हमसे जो

उन्होंने पूछा था कि वफा क्या है,

हंसकर हमने भी कह दिया कि

मुक्तसर सी जिंदगी मे रखा क्या है!!


Friday, December 5, 2025

मौसम जाड़े का..

सुना न पाऊंगा मैं, कोई कहानी रस भरी,

जुबां पे दास्तां तो है मगर, वो भी दर्द भरी,

सर्द हवाएं, वयां करने को बचा ही क्या है?

यह जाड़े का मौसम है , दिसम्बर-जनवरी।


सोचा था कर दूंगा आज, इश्क तुम्हारे नाम,

बर्फ से ढकी हुई पहाड़ी ठिठुरन भरी शाम,

दिल कहता था, छलकागें इश्कही-विश्कही,

मगर, "बूढ़े साधू" ने बिगाड़ दिया सारा काम।








Thursday, December 4, 2025

दास्तां!

जिंदगी पल-पल हमसे ओझल होती गई,

साथ बिताए पलों ने हमें इसतरह रुलाया,

व्यथा भरी थी हर इक हमारी जो हकीकत ,

इस बेदर्द जगत ने उसे इत्तेफ़ाक बताया।


कभी दिल किसी और का न हमने दुखाया,

दर्द को अपने हमेशा हमने, सीने मे छुपाया,

रुला देना ही शायद फितरत है इस ज़हां की,

बोझ दुनियां का यही सोच, कांधे पे उठाया।


Saturday, November 29, 2025

जस दृष्टि, तस सृष्टि !

धर्म सृष्टा हो समर्पित, कर्म ही सृष्टि हो,

नज़रों में रखिए मगर, दृष्टि अंतर्दृष्टि हो,

ऐब हमको बहुतेरे दिख जाएंगे दूसरों के, 

क्या फायदा, चिंतन खुद का ही निकृष्ट हो।


रहे बरकरार हमेशा, हमारा बाहुमुल्य मुल्य,

ठेस रहित रहे भावना, आकुण्ठित न कृष्टि हो,

विगत बरसात, किसने न‌ देखा वृष्टि-उत्पात, 

दुआ करें, अगली बरसात सिर्फ पुष्प-वृष्टि हो।

Thursday, November 27, 2025

हद पार

बस भी करो अब ये सितम,

हम और न सह पाएंगे,

बदकिस्मती पे अपनी, 

बल खाए न रह पाएंगे।

किस-किस को बताएं अब,

अपनी इस जुदाई का सबब,

क्या मालूम था,फैसले तुम्हारे,

हमें इस कदर तड़पाएंगे।।

Friday, November 21, 2025

अनिश्चय!


पिरोया न करो सभी धागे एक ही सरोकार मे, 

पता नहीं कब  तार इनके, तार-तार हो जाएं,

यह न चाहो, हसरत भी संग चले, हकीकत भी,

पता नहीं खेने वाले कब, खुद पतवार हो जाएं।

भरोसे का कतई दौर नहीं, किसको पता है कि

जो नाख़ुशगवार थे हमको,कब ख़ुशगवार हो जाएं,

वजूद पे अपने इश्क का ऐसा खुमार मत पालो,

मौसमों के पैंतरों से भी, प्रचण्ड बुखार हो जाएं।

शुन्यता के दौर में राहें अंजानी, नैया मझधार मे,

पार पाने की जद्दोजहद, ख्वाहिशें दुश्वार हो जाएं,

हमने कसम खाई थी 'परचेत' तुम्हारे ही होकर रहेंगे,

दौर-ए-बेवफ़ाई, क्या पता किस नाव पे सवार हो जाएं ।






Thursday, November 6, 2025

झूम-झूम !

हमेशा झूमते रहो सुबह से शाम तक,

बोतल के नीचे के आखिरी जाम तक,

खाली हो जाए तो भी जीभ टक-टका,

तब तलक जीभाएं, हलक आराम तक।

झूमती जिंदगी, तुम क्या जान पाओगे?

अरे कमीनों ! पाप जिसे निगल जाएगा

तुम्हारे न चाहते हुए भी, ठग बहराम तक।



Thursday, October 16, 2025

मौन-सून!

ये सच है, तुम्हारी बेरुखी हमको,

मानों कुछ यूं इस कदर भा गई,

सावन-भादों, ज्यूं बरसात आई, 

गरजी, बरसी और बदली छा गई।

मैं तो कर रहा था कबसे तुम्हारा 

बेसब्री से आने का इंतजार, किंतु 

तुम आई तो मगर, मेरे विरां दिल की

छोटी सी पहाड़ी जमीन दरका गई।।

Tuesday, October 14, 2025

संशय !

मौसम त्योहारों का, इधर दीवाली का अपना चरम है,

ये मेरे शहर की आ़बोहवा, कुछ गरम है, कुछ नरम है,

कहीं अमीरी का गुमान है तो कहीं ग़रीबी का तूफान है,

है कहीं पे फुर्सत के लम्हें तो कंही वक्त ही बहुत कम है।


है कहीं तारुण्य जोबन, जामों मे सुरा ज्यादा नीर कम है,

हो गई काया जो उम्रदराज, झर-झर झरता जरठ गम है,

सार यह है कि फलसफा जिंदगी का  है अजब 'परचेत',

कहीं दीपोत्सव की जगमगाहट, कहीं रोशनी का भ्रम है।


Thursday, September 25, 2025

गिला

जीवन रहन गमों से अभिभारित,

कुदरत ने विघ्न भरी आवागम दी,

मन तुषार, आंखों में नमी ज्यादा,

किंतु बोझिल सांसों में हवा कम दी,

तकाजों का टिफिन पकड़ाकर भी,

हमें रह गई बस  गिला इतनी तुमसे,

ऐ जिन्दगी, तूने दर्द ज्यादा दवा कम दी।

Wednesday, September 24, 2025

पिता !

समझ पाओ तो

यूं समझिए कि

तुम्हारा आई कार्ड,

 निष्कृयता नाजुक, 

 और निष्पादन  हार्ड।

( यह चार लाइनें पितृपक्ष के दरमियां लिखी थी पोस्ट करना भूल गया,,,,,बस यही तो है कलयुगी बेटों का कमाल)


कशिश !

उनपे जो ऐतबार था, अब यह समझ वो मर गया,

यूं समझ कि जो पैग का खुमार था, देह से उतर गया,

परवाह रही न जिंदगी को अब किसी निर्लज्ज की,

संजोए रखा बना के मोती, नयनों से खुद झर गया।

Friday, September 19, 2025

फटने को तत्पर, प्रकृति के मंजर।


अभी तक मैं इसी मुगालते में जी रहा था

सांसों को पिरोकर जिंदगी मे सीं रहा था,

जो हो रहा पहाड़ो पर, इंद्रदेव का तांडव है,

सुरा को यूं ही सोमरस समझकर पी रहा था।


किंतु अब जाके पता चला कि तांडव-वांडव कुछ नहीं ,

विकास-ए-परती धरा ये, स्वर्ग वालों को खटी जा रही, 

ये तो "ऋतु बरसात' इक बहाना था बादल फटने का,

नु पता आपरेशन सिंदूर देख, इंद्रदेव की भी फटी जा रही।




Friday, September 12, 2025

उपजीवी !


मिली तीन-तीन गुलामियां तुमको प्रतिफल मे,

और कितना भला, भले मानुष ! तलवे चाटोगे।

नाचना न आता हो, न अजिरा पे उंगली उठाओ,

अरे खुदगर्जों, जैसा बोओगे, वैसा ही तो काटोगे।।


अहम् ,चाटुकारिता को खुद आत्मसात् करके,

स्वाभिमान पर जो डटा है,उसे तुम क्या डांटोगे।

आम हित लगा नाटा, निहित हित में देश बांटा,

जाति-धर्म की आड़ में जन और कितना बांटोगे।।


स्वाधीनता नाम दिया, जुदा भाई को भाई से किया,

औकात क्या है अब तुम्हारी जो बिछड़ों को सांटोगे।

जड़ें ही काट डाली जिस वटवृक्ष की 'परचेत' तुमने, 

उस दरख़्त की डालियों को, और कितना छांटोगे।।


 

Friday, September 5, 2025

इतना क्यों भला????

बडी शिद्दत से उछाला था हमने 

दिल अपना उनके घर की तरफ,

लगा,जाहिर कर देंगे वो अपनी मर्जी,

तड़पकर उछले हुए दिल पर हमारे।


रात भर ताकते रहे यही सोचकर, 

सिरहाने रखे हुए सेलफोन को,

सहमे से सुर,फोन करेंगे और कहेंगे, 

कुछ गिरा तो है दिल पर हमारे।


मुद्दत गुज़र गई, दिल को न सुकूं आया,

दीवानगी का वो सफर 'मुकाम-ए-परचेत',

कारवां जिगर का भटका वहीं पर कहीं जहां,

लगी 'तंगदिल' की मुहर नरमदिल पर हमारे।

Sunday, August 31, 2025

प्रलय जारी










चहुॅं ओर काली स्याह रात,

मेघ गर्जना, झमाझम बरसात,

जीने को मजबूर हैं इन्सान,

पहाड़ों पर पहाड़ सी जिंदगी,

फटते बादल, डरावना मंजर,

कलयुग का यह जल प्रपात।



Wednesday, August 20, 2025

लघुकथा-पहाड़ी लूना !

पहाड़ी प्रदेश , प्राइमरी स्कूल था दिगोली, चौंरा। गांव से करीब  दो किलोमीटर दूर। अपने गांव से पहाड़ी पगडंडी पर पैदल चलते हुए जब तीसरी कक्षा का नन्हा सा छात्र पल्सर दिगोली गांव  होते हुए सुबह-सवेरे 'चौंरा' स्कूल को निकलता था तो अक्सर उसकी भेंट दिगोली गांव की लूना की मां, जोकि सुबह-सवेरे गाय-भैंस के गोबर का तसला सिर पर उठाए 'मौऴेकी मरास' की तरफ जा रही होती थी, से अक्सर हो जाया करती थी।

राह में उसे देखकर लूना की मां उसे पुचकारते हुए गढ़वाली लहजे में कुछ यूं कहती, "अरे मेरा बच्चा, इस ठंड में ठंडी ओंस में चप्पलों में सुकूल जा रहा है।"...... यह लगभग रोजाने का ही क्रम था। गर्मी की छुट्टियां खत्म होने के बाद जुलाई के प्रथम सप्ताह में आज जब वह चौथे दर्जे में प्रवेश हेतु घर से निकला था तो बीच में फिर लूना की मां से मुलाकात हो गई। उसने चिरपरिचित अंदाज में फिर उसे पुचकारते हुए सम्बोधित किया, "बच्चा, आज मैं भी अपनी लूना को सुकूल में भर्ती करा रही हूं, कल से तू उसे भी अपने साथ लेते हुए सुकूल जाना। पल्सर ने भी हां में अपनी मुंडी हिला दी थी।

तब से शुरू हुआ साथ-साथ  स्कूल जाने का  पल्सर और लूना का यह क्रम लगभग दो साल चला, जब तक कि पल्सर छठी कक्षा में माध्यमिक स्कूल धद्दी घंडियाल न चला गया। तीन साल बाद पांचवीं उत्तीर्ण करने के उपरांत लूना के पिता उसे और उसके परिवार के साथ रोहिणी, दिल्ली शिफ्ट गये थे।

बर्ष गुजरे, उम्र गुज़री, जब लूना २७ की हुई तो मां को उसकी शादी का ध्यान आते ही पल्सर का भी ख्याल आया। और मां ने अपने गांव दिगोली के एक रिश्तेदार के जरिए पल्सर के परिवार से सम्पर्क कर उसका बायोडाटा और जन्मपत्री मंगवा ली थी। लूना पढ़ने में होनहार थी, आइआइएमटी यूनिवर्सिटी से एमटेक करने के बाद उसे एक मल्टी नेशनल कंपनी में २६ लाख बार्षिक सेलरी पैकेज पर पुणे में नौकरी भी मिल गई थी।

लूना के पिता ने पल्सर का बायोडाटा लूना को दिखाते हुए उससे पूछा कि इस लड़के को जानती हो, तेरे लिए यह रिश्ता कैसा रहेगा? लूना ने नाक-भौंह सिकोड़ते हुए जबाब दिया, यार पापा आप कैसी बात करते हो, उसका सालाना सेलरी पैकेज देख रहे हो, मेरे से आधे से भी एक लाख कम हैं। आप सोच भी कैसे सकते हो कि मैं इस लड़के से शादी के लिए मान जाऊंगी? मां ने भी बीच में लूना को टोकते हुए कहा, सेलरी ही तो तेरे से कम है उसकी, बाक़ी तो लड़का सब तरह से ठीक है। मैं तो कुछ नहीं कमाती, तो क्या तेरे पापा और मैंने घर नहीं चलाया, तुम्हें नहीं पढ़ाया -लिखाया?

मगर लूना कहां मानने वाली थी, मां-बाप की भी एक न चली। उधर साल-छह महिने बाद पल्सर का रिश्ता भी गांव की एक भोली-भाली लड़की, स्कूटी से पक्का हो गया था। वक्त अपनी रफ़्तार से चलता रहा, लूना के मां बाप ने सेंकड़ों रिश्ते तलाशें मगर लूना किसी मे ये कमी, किसी मे वो कभी निकालती रही। और जब लूना ३७ की हुई तो रिश्ते आने ही बंद हो गये।

अब जब वह इक्तालीसवें साल में पहुंची तो एक उमेर नाम का व्यक्ति जिससे उसकी मुलाकात अक्सर शाम को एक कैफ़े में हो जाया करती थी और जिसने उसे खुद का परिचय एक बिजनेसमैन के तौर पर दिया था, और असल मे था वह कबाड़ का व्यापारी, लूना उसे दिल दे बैठी थी। और फिर दोनों ने ही मिलकर शादी का दिन भी तय कर लिया था।

 बात बूढ़े मां-बाप के पास घर तक पहुंची तो दोनों सुनकर सन्न रह गये। 'मैं बोलती थी न तुमको कि मत पढ़ाओ इसे इतना, मत दो इतनी छूट.....' लूना की मां फफक-फफककर रोने लगी थी। कश्मकश भरा वक्त भारी पड़ने लगा था, शादी (निकाह) का दिन नजदीक आ गया था, बूढ़े मां-बाप पुणे पहुंच चुके थे। शादी से ठीक एक दिन पहले पिता ने बाजार से सैमसंग का ६५३लीटर का ₹८०००० का फ्रीज और एक ₹१३००० का बड़ा सा नैभिगो का सूटकेस खरीदा और अपने साथ उसे विवाह स्थल पर ले आए , लूना की विदाई के वक्त उसे उपहार स्वरूप भेंट में देने के लिए।

Friday, August 8, 2025

साम्यवादी कीड़ा !


लगे है दिल्ली दानव सी,

उन्हें जन्नत लगे कराची है,

तवायफ बनकर लेखनी जिनकी,

भरे दरवारों में नाची है।


हैं साहित्य मनीषी या फिर 

वो अपने हित के आदी हैं,

चमचे हैं राज घरानों के जो

निरा वैचारिक उन्मादी हैं।


अभी सिर्फ एक दशक में ही 

जिनको, मुल्क लगा दंगाई है,

देश के अन्दर अभी के उनको

विद्वेष, नफ़रत दी दिखलाई है।


पहली बार दिखी है ताईद,

मानों पहली बार बबाल हुए,

पहली बार पिटा है मोमिन 

ये पहली बार सवाल हुए।


चाचा से मनमोहन तक मानो

वतन में शांति अनूठी थी,

अब जाकर ही खुली हैं इनकी 

अबतक आंखें शायद फूटी थी।


नहीं साध सका भद्र जिस दनुज को

वो बनता खुद सव्यसाची है,

लगे है दिल्ली दानव सी जिनको

उन्हें जन्नत लगे कराची है।



Wednesday, May 14, 2025

वक्त की परछाइयां !


उस हवेली में भी कभी, वाशिंदों की दमक हुआ करती थी,

हर शय मुसाफ़िर वहां,हर चीज की चमक हुआ करती थी,

अतिथि,आगंतुक,अभ्यागत, हर जमवाडे का क्या कहना,

रसूखदार हवेली के मालिकों की, धमक हुआ करती थी।

वक्त की परछाइयों तले, आज सबकुछ वीरान हो गया,

चोखट वीरान,देहरी ख़ामोश,आंगन में रमक हुआ करती थी।


 

Yकीं

  रात गहरी बहुत है मगर,  यकीं रखो, हम सोएंगे नहीं। तूम रुलाने की जितनी भी कोशिश कर लो,  रोएंगे नहीं, बेदना के पार्क मे सन्नाटे संग  खामोशी भ...