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सबक !

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जी भर के जी ले अभी ऐ जिन्दगी , फिर परेशान नजर आएगी, झुकी-झुकी सी कमर, लड़खड़ाते कदम, हैरान नजर आएगी, आइना सामने, चेहरे पे झुर्रियां, पशेमान नजर आएगी,  दिल बंद हो गया धड़कना जिस दिन, बे-जान नजर  आएगी।

न्याय-अन्याय !

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अतृप्त भाव

सुबह-सबेरे, स्कूल-बस पकड़ने की जद्दोजहद, दौड़ते विद्यार्थी की पीठ पर लदा वो बस्ता हूं मैं, खुद की तो ख़ाक मे मिला दी शख्सियत हमने, फिर भी अभी चुनिंदा दिलों मे बसता हूं मैं।  कभी दिल तो हमारा भी करता है रूठ जाने को, मगर चाह के भी एहसास न होने देता जमाने को, मन के कोने मे छुपा रखें हैं अतृप्त भाव सारे, चेहरे पर हमेशा ओढ़े रखता सरसता हूं मैं।   अबाधित जिंदगी की डगर, हमसे पूछती हो ? इतनी भी अंजान न बनो , सबकुछ बूझती हो, खुद का मुकाम पाने को जिसे पैरों से रौंदकर  कई एहसान फरामोश निकल गए, वो रस्ता हूं मैं।

किसे बताऊं?

शाम-ए-तन्हाई ! देख लिया सब-कुछ आज़माकर, दो पैग पीड़ा के 'परचेत', जिंदगी बसर हो गई,  चखने मे गम खा-खाकर।

कबूलनामा

  दौर-ए-जवानी का वो मदहोश  वक्त भी क्या था, शाम को घर लौटते हुए राह मे, फूल भी मिले, कांटे भी मिले, घर की देहलीज पर पहुंचकर  हाथ मे पकड़ा उनका पसंदीदा कुछ हो तो, मुस्कुराहट भी मिलती थी, वरना चांटे भी मिले।  

रूबर

  सेवानिवृत्ति का जुनून  आहिस्ता-आहिस्ता  मौत के घाट उतार देगा हमको,  कहां मालूम था कि  गांव का अकेलापन इकदिन,  इस कदर मार देगा हमको।

पशेमानी

तुम्हारी ख़्वाहिशों के बोझ तले दबकर भी  मैं तुमको जरूर नजर आया होता, अगर ऐ जालिम तुमने, कामयाबी का दर्जा पाने को  अपना ये जाल न बिछाया होता।