हमने तो मरने को नहीं कहा था,
अरे वो, हमें पत्थर दिल कहने वालों,
जो पास है तुम्हारे उसी पे जी लेते,
मुफलिसी, तंगदिली मे जीने वालों ।
बस, मेरे साथ सिर्फ इक मेरी गिला़ और
तुम्हारे संग तमाम सिकवों का काफ़िला,
मैं अभिभूत और ऐतबार पराजित, 'परचेत',
यकीं रख, लम्बा न चल पायेगा ये सिलसिला।
सिसकियां आई, हिस्कियां आई और पराज भी आए हैं,
देहलीज पे तेरी, युवा आए और उम्रदराज भी आए हैं,
अरे वो, हुस्न की मलिका, नागवार है इतराना तेरा,
उम्र दराजी के तजुर्बे में हमने तो उन्हें भी देखा है,
कबूतर के चेहरे मे मु़डेरी पर जो बाज आए हैं।
जो आज आनी चाहिए थी, वो तुम्हें आज आती नहीं,
खुद को हुश्न की मलिका बताते हुए लाज आती नहीं,
हमने तो, तुम्हारे हुस्न की बस खैर मांगी थी, ऐ दोस्त!
जो जवानी में न आ सके, वो उम्र दराज आती नही।
न निशां पड़ते, न ही दाग होते,
तले जिसके अंधेरा न होता,
ऐ काश! कि हम वो चराग होते,
हम कहते, छुप लो बनकर प्यार
हमारे इस सूने से दिल में,
छुप लेते,अगर जो तुम राग होते।

