ओझल
वादों-इरादों की राह बहुत लम्बी थी, मैं ऊब गया,
आसां जो तेरे प्यार की दरिया मिली, मै डूब गया।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
सफर रुका नहीं और
मिलते गये काफिले हमको,
शिकवे गले मिले और
दिल पे लगा गये गिले हमको,
इम्तहानों के दौर से,
हम बेधडक गुज़रे हैं 'परचेत',
हौंसले रक्त से मिले
और फैसले वक्त से मिले हमको।
दोनों की ही सरकारी नौकरी थी,
अच्छी तनख्वाह के अलावा,
ऊपरी मे भी खूब लूटा-खसौटा,
सोना-चांदी जो हाथ आया समेटा,
कुछ नहीं तो भागते चोर का लंगोटा।
अपने दोनों ही बच्चों को उन्होंने
अच्छे स्कूलों से तालीम दिलवाई
किसी कोर्स के लिए प्रतिस्पर्धा से
जब वो चयनीत न हो पाए तो
अवैध चंदे की थाली सजवाई।
बच्चे दोनों मूल छोड़कर अपना
अब, विदेश जाकर बस गए हैं,
और मां-बाप सूरत को तरस गये हैं,
लौटकर मिलने आएंगे वो कभी,
पति-पत्नी इसी भ्रम मे है,
बाप पिछले साल गुजर गया,
मां अभी वृद्धाश्रम मे है।
ठुकरा गई थी वो जो हमको
दौर-ए-जवानी कुछ तन्हाइयां,
उम्र के इस पड़ाव पर फिर से,
बेताब हैं हमें गले लगाने को 'परचेत'।
न नींद ही बची,
न खुद को मच्छरों से ही बचा पाए,
रात भर खुजलाते-खुजलाते
करते रहे हाये-हाए,
पैर पसारने को हमने
चारपाई और चादर बडी की थी,
मगर 'परचेत',
फिर भी खुलकर नही सो पाए।