हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे,
मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में।
बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले,
हमने तो प्यासे को भी पानी पिलाया था, मदीने में।।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे,
मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में।
बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले,
हमने तो प्यासे को भी पानी पिलाया था, मदीने में।।
पता नहीं किसको ढूंढते रहे थे हम,
सबसे पूछा, डाकिया,धोबी,खलासी,
सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,
लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,
उम्र गुजरी,तबअहसास हुआ 'परचेत',
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।
मांग रही थी वो आज मुझसे
मेरे प्यार का हलफनामा,
मौर्निग वाक पर जाती है जो
पहनकर, रोज मेरा ही गर्म पजामा।
तुम्हारे ओठों से चिपककर सांसों के सहारे,
तुमपर ही समर्पित हो जाता,
ऐ काश कि अगर 'परचेत' !
मैं तुम्हारे सान्निध्य की कोई बांसुरी होता।
हिम्मत ही नहीं रही जब,
दिखाने को कुछ नया करके,
फायदा ही क्या है 'परचेत',
तब अफसानें बयां करके।
While landing at our courtyard,
A mysterious bumblebee
is humming,
It looks,
at our door,
a treasure trove of happiness
is coming.
मुहब्बत के खातिर तुम्हारी हर बगावत की,
हमेशा ही अगुवाई करता,
फक़त ख्वाबों में ही मुहब्बत की दुहाई दोगे
तो 'परचेत', अंजाम यही होगा।
दिलों की हसरत, मिलन की चाहत, न तो इबादत ही रंग लाई
और न ही दिल की दुआ ,
हो जाता मिलन अचानक हमारा भी किसी मोड़ पर 'परचेत,'
कभी ऐसा इत्तेफाक न हुआ।
सांझ ढले, मेरे साथ बैठकर
एक पैग व्हिस्की,
कभी वो संग-सग पीती थी,
जब न तो आभासी दुनिया थी,
और ना ही वो इस कदर ,
अलग ही दुनियां में रहकर जीती थी।
अब उसने व्हिस्की पीना छोड़ दिया है,
आजकल दिन-रात सेल-फोन पीती है।।
हौसलों के दमपर अभी तक,
जी है जिंदगी हमने,
डटकर किया है मुकाबला,
राह की दुश्वारियों का,
हर शै से निकले हैं हम,
उबरकर भी, उभरकर भी,
जरा भी न कभी बेबस हुए,
बोझ ढोते लाचारियों का।
वो लम्हा तुम जरा बताओ,
जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,
कौन सा था वो लम्हा-लम्हा
जिसमें, प्यार का रंग नहीं था?
तुम जानते हो कि मेरे होते,
सलामत है लाज तुम्हारी,
इसीलिए आज तक मैं,
तुम्हारे राज तक नहीं गया ।
मांगने की आदत जिंदगी में
मुझसे कभी पाली न गई,
मोहब्बत में इसीलिए मैं भरोंसे के
अल्फ़ाज़ तक नहीं गया ।
वो अब आ नहीं सकता फिर से,
गुज़र गया जो वक्त अपनी राहों से,
किन्तु, मुश्किल तो होगा जिंदगी तेरा
सुगमता से निकलना, मेरी पनाहों से।
घड़ी की तरह खिसकती जा रही हो,
पकड़कर रखूंगा तुझे अपनी बांहों से,
सुगम-दुर्गम, हर दौर जिया है तेरे संग,
मुझे फर्क नहीं पड़ता,साहों-सलाहों से।
वर्तमान तुम अपना व्यर्थ ही न गंवाना,
उलझकर बातों में किसी भविष्यवेता के,
बहकावे में कभी भी हरगिज़ मत आना,
सड़कछाप, किसी दो कौड़ी के नेता के।
क्या बताऊं कि ये
चोंतीस साल कैसे बीते,
किस मुश्किल में
हर लम्हा गुजरा जीते-जीते,
याद तो होगा तुम्हें कि मैंने
तुमको भी न्योता दिया था,
जवानी के फोल्डर जब मैंने,
'बीवी' ऐप डाउनलोड किया था!!
हूं मैं तुम्हारा यार ऐसा ,
कविता का सार जैसा,
प्रेम से गर प्यार ना निभे,
फिर प्यार का इजहार कैसा?
थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी
यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी,
बस, ग़लती यही रही हमारी कि
दुखती रग पर उंगली रख दी थी।
कडकछाप मुद्रीकृत सारे ब्लौगर-सलौगर,
यू-ट्यूब पे कमाई की धौंस वाले यूट्यूबर,
आज सबके सब मैंने पशेमान कर दिए,
दस सेंट एडसेंस से मैंने भी कमाए थे,
सारे के सारे गुगल को ही दान कर दिए।🤣
हमने भरोसा अभी भी कायम रखा है जीने मे, मगर, ऐ 'परचेत',यह दर्द असहनीय है सीने में। बड़े ही बुजदिल निकले ये सब, दिल दुखाने वाले, हमने ...