गलियां सब वीरां-वीरां सी, उखड़े-उखड़े सभी खूंटे थे,
तमाशबीन बने बैठे दो सितारे, सहमे-सहमे से रूठे थे।
डरी सूरत बता रही थी,बिखरे महीन कांच के टुकडो की,
कुपित सुरीले कंठ से कहीं कुछ, कड़क अल्फाज फूटे थे।
ताफर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन,
इन्हें देखकर भला कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे थे।
पटकी जा रही थी हर चीज,जो पड़ जाए कर-कमल उनके,
वाअल्लाह, बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे थे।
तनिक शुश्रुषा की कमी 'परचेत', मनुहार मिलाना भूल गए,
फकत इतने भर से ही बदन के सारे, सुनहरे तिलिस्म टूटे थे।












