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Showing posts from March, 2013

कहने लगा चाँद जबसे

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कहने लगा चाँद जबसे, चितचोर हमको, शरमाते हुए देखते हैं,सारे  चकोर हमको। कभी लगता नहीं था कहीं,जो उदास मन,   अब  रमने को कहता है, चहुँ ओर हमको।  बदरी ये चाहत की जबसे, छाई है मन में,   तेरी प्रीत की बारिश,करे सराबोर हमको।   परेशां होने न देता,अब गम के दरिया में,  तेरी मौजों का दिल नशीं, ये शोर हमको।  लिखने लगे है तबसे खुद तकदीर अपनी,   मिला महबूब का जबसे, यह ठौर हमको।   अब डगमगा न पाएगी, कभी प्रेम पथ से,  काली अंधियारी घटा भी, घनघोर हमको।  तेरी कश्ती से, है दरिया के हमें पार जाना,  कहे 'परचेत' मतवाला ये, मनमोर हमको।   

सच में , दुनिया देखिये कितनी छोटी हो गई !

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कल अमेरिकी न्यूज़ एजेंसी सीएनएन की वेब-साईट  पर यह रोचक खबर पढी थी, सोचा अपने ब्लॉग पर भी क्यों न इसे शेयर किया जाए। होली का पर्व होने  की वजह से तुरंत इस सम्बन्ध में लिख नहीं पाया था, सो आज यहाँ शेयर कर रहा हूँ ;  खबर यह थी कि  हवाई में गुम हुआ कैमरा  ताइवान में मिला।  हवाई द्वीप अमेरिका का प्रशांत महासागर के मध्य में स्थित एक प्रान्त है। यह अमेरिका का अकेला द्वीप है जो पूरी तरह द्वीपों से ही बना हुआ है और हवाई द्वीप समूह के अधिकांश द्वीप इसी प्रांत में सम्मिलित हैं। हवाई के आठ मुख्य द्वीप हैं, जो उत्तरपश्चिम से दक्षिणपूर्व में एक पंक्ति पर बिछे हैं। इन आठ द्वीपों के नाम हैं (उत्तरपश्चिम से शुरू होते हुए) - निइहाऊ, काउआइ, ओआहू, मोलोकाइ, लानाइ, काहोओलावे, माउइ और हवाई। इनमें हवाई का द्वीप सबसे बड़ा है।   कुछ ही ऐसे भाग्यशाली लोग होते है जिन्हें अपनी यात्रा के दौरान गुम  हुई कोई प्रिय वस्तु  पुन: वापस मिलने का सौभाग्य प्राप्त होता है। और ऐसी ही एक भाग्यशाली पर्यटक ह...

अबके इस होली में !

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अपनी "छवि" बदलनी चाही, अबके हमने इस होली में,    श्वेत-वसन स्व: अंग चढ़ाकर, अबीर, गुलाल,  रंग लगाकर, निकले घर से  टोली में।  PLANNING FOR HITTING THE STREET ! नज़ारे   उत्सव पर बड़े-बड़े थे,  पिचकारी लेकर चाँद खड़े थे, ना-नुकूर के खेल-खेल में  मल दिया गुलाल ठिठोली में।  SWEET TREATS :) फिर ऐसा  चढ़ा  रंग होली का ,  हाथ बढ़ा हमजोली का , कुछ लहंगे में थिरके तो,  कुछ थिरके फिर चोली में। STATUTORY WARNING: DRINKING IS INJURIOUS TO HEALTH   हसीं ख़्वाबों को संग में लेके, फिर रंग-बिरंगे सपने देखे, आँख खुली  देखा सूरज  छुपता घर की खोली में।        अपनी "छवि" बदलनी चाही, अबके हमने  इस होली में।   मगर अफसोस कि बदल नहीं पाए   AND FINALLY; BEATING THE RETREAT !! :) :)

गोदियाल ढाबा !

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हुए प्यार में तेरे दिवाने ऐसे, सड़क पर ही आ गए हम,अरे बाबा, उधार का खिलाते कब तक तुमको, इसलिए खुद ही खोल दिया ढाबा ! अब बना-बनाके पकवान अनेकों,  इतना खिलाएंगे तुमको,  जो तूम भी बोल उठो;    तेरे ढाबे का खा के, मैं बदरंग हो गई,   कल चोली सिलाई आज तंग हो गई,  और हम बोलेंगे;, कुड़ी के नखरे, ओए शाबा, ओए शाबा !!   

बिन पानी सब सून !

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याद आएगी शनै:- शनै:,  सबको  अपनी नानी, जब न दूध का दूध होगा,  न पानी का पानी।  यूं  तो अभी भी ये  कहाँ हो रहा,किंतु  विकल्प हैं, तब की सोचो,  जब न दूध ही होगा और न पानी।  कि मसला-ऐ-नीर है,  और मसला बड़ा  गंभीर है,   उपाय ढूढिये यथार्थपूर्ण, बंद करो  जंग ज़ुबानी।   हम और तुमने तो  खा-पी लिया खुदगर्जों,  ज़रा सोचोकिसके लिए  पैदा कर रहे हम परेशानी। छवि गूगल से साभार !

कार्टून कुछ बोलता है- कैसे नहीं चलेगी सरकार ?

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"ये कैदे बामशक्कत, जो तूने की अता है"

   बसर हो रही कहाँ,कैसे,तुझको सब पता है, ये कैदे बामशक्कत, जो  तूने की  अता है।   माना कि दूर बहुत है, मगर अंजान नहीं तू, देख सब कुछ रहा,सिर्फ नजरों से लापता है।  हथिया लिया यहाँ पे, ठग,चोरों ने सिंहासन, कुछ पर केस चल रहा, कुछ सजायाफ्ता हैं।      नारी की अस्मिता यहाँ,खतरे से खाली नहीं,  दरिन्दे दिखा रहे सरेराह,क़ानून को धता है।  पता नहीं क्या हुआ, आदमी को इस देश के, गद्दार,नमकहराम फल-फूल रहे अलबता हैं।   

कहानी - भाग्य अपने हिस्से का !

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"सॉरी, गोंट टु गो, आई वेस्टेड सो मच आफ योर टाइम।" हल्की सी कराह खुद में समेटे ये भारी-भरकम स्वर जब कानो में पड़े तब जाकर यह अहसास हुआ कि साथ में कोई अजनबी बैठे हैं। मोटी, घनी और घुमावदार सफ़ेद मूछों से सुसज्जित उस रौबीले चेहरे पर एक नजर डालने के उपरान्त मैं कहना चाहता था, "प्लीज स्टे अ लिटिल लौंगर" किन्तु न जाने क्या सोचकर मैंने खुद को रोक लिया था।  डग धीरे-धीरे एक ख़ास दिशा में बढ़ाते, उम्र के तकरीबन सत्तर वसंत पार कर चुके उन रिटायर्ड ब्रिगेडियर साहब को मैं और मेरा परिवार खामोश अंदाज में तब तक निहारता रहा, जब तक वे सज्जन टिप्पन टॉप के ठीक सामने, विपरीत दिशा में पार्क अपनी हरे रंग की जोंगा जीप में नहीं बैठ गए थे।  और फिर उसे मोड़कर हमारे सामने  की सड़क से, अंग्रेजों के जमाने के उस गिरजाघर के लॉन में खेल रहे मेरे दोनों बच्चों की तरफ खिड़की से हाथ हिलाते हुए वहाँ से निकल नहीं गए थे। मैं और  मेरी धर्म-पत्नी यह देखकर  हैरान थे कि ड्राइविंग सीट पर बैठे उन ब्रिगेडियर साहब के बगल की सीट पर एक अधेड उम्र सं...

कार्टून कुछ बोलता है- रंगभेद !

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यह ज़माना भला कब था,

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हो जाएगा जो अब भला, यह ज़माना भला कब था, राज धूर्तता का ही चला, शराफत का चला कब था। अस्मिता, अस्तित्व की, मालूम सबको है हकीकत,   तन भले ही खोखला हो,किन्तु मन को खला कब था। आलम  देखकर दरिंदगी का ,सौम्य दिल बेचैन होते, लहू शिष्टता का  ही  जल रहा,शठता का जला कब था। दस्तूर सारे  अपने - अपने, मुक़रर्र वक्त चलते गए, उगा देख जुल्मों का सूरज,कौन पूछे ढला कब था। पैदा हुए अधम घाव 'परचेत', सभ्यता की खाल पर, खुरचते तो सब रहे, मरहम किसी ने मला कब था।   

लघु कथा- आदत हाथ फैलाने की !

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दो-तीन दिन पहले मैंने यह लघु-कथा अपने आचलिक भाषा के ब्लॉग पर गढ़वाली में लिखी थी, आज उसका हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ;  एक ब्राह्मण पुजारी के तौर पर अपना सांसारिक जीवन शुरू करने वाले उसके वृद्ध पिताजी    इलाके भर में  एक दिव्य-महात्मा  के तौर पर प्रसिद्द हो गए थे। इलाके के लोग यहाँ तक मानते थे कि अगर    वे  किसी को   कोई वरदान अथवा शाप दे दें तो वह शत-प्रतिशत सच निकलता था। मगर एक वो कहावत "चिराग तले अन्धेरा" भी उन पर बखूबी चरितार्थ होती थी, और उसकी वजह थी, पंडित जी का अपना इकलौता लड़का, निकम्मा, निठल्ला और आलसी।  बचपन से ही पता नहीं यह कैसी आदत उसने पकड़ ली थी कि चाहे कोई दोस्त हो, मास्टर जी हों, अथवा कोई रिश्तेदार हों, जहां मौक़ा मिला, उनके आगे पैसों के लिए हाथ फैला देता था।  पंडित जी उसकी इस आदत से बड़े दुखी थे। किन्तु उसकी इस आदत के लिए कुछ हद तक वे खुद भी जिम्मेदार थे क्योंकि पंडित जी अपने आदर्शों के भी पक्के थे। सिद्धता का गुण खुद...

क्या हमारे भगवानो को शर्म भी आती होगी ?

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इंसानों और खासकर हममें से अधिकाँश स्वार्थी हिन्दुस्तानियों ने तो काफी पहले ही शर्म को इस देश से निष्काषित कर दिया था,किन्तु जब मैं नीचे चस्पा किये गए चित्र  और ऐसे ही अन्य अनेक मार्मिक चित्र देखता हूँ तो मेरे जेहन में बस एक ही सवाल कौंधता है कि क्या  हमारे भगवानो को शर्म आती होगी या फिर उन्होंने भी हमारी देखा-देखी  देवलोक से भी उसे निष्काषित  कर दिया होगा ?   उपरोक्त चित्र में एक बौद्ध भिक्षु जले हुए मंदिर में अपने इष्ट की पूजा में तल्लीन है।  यह छवि  बांग्लादेश के कोक्स बाजार की है, जहां मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इसे जला दिया था। हाल ही में वहां की जमात-ऐ-इस्लामी के एक पाकिस्तान समर्थित नेता जोकि १९७१ में अनेको बेगुनाहों के क़त्ल का दोषी है को वहाँ की अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाये जाने के बाद, उसकी पार्टी के लोगो और अन्य  मुस्लिम कट्टरपंथियों ने एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत कई हिन्दुओं को मार डाला, हिन्दुओं के करीब ७०० घर जला डाले, और दर्...

कार्टून कुछ बोलता है- अब तक का सबसे तीब्र विरोध !

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कार्टून कुछ बोलता है -लापरवाही का आलम इधर भी है और उधर भी है !

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कार्टून कुछ बोलता है - एक उभरते उम्मीदवार का अंत !

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नयन-सुख की लाचारी को उसका धैर्य समझने का भ्रम !

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  शहर की भीड-भाड और गुजरते वाहनों से भरी सडको पर से निकलते हुए कभी आपने भी शायद कुछ ऐसा नजारा देखा होगा  कि कोई आँखों से लाचार व्यक्ति किसी कनजेस्टेड  सड़क को पार करने के इन्तजार में एक हाथ में छड़ी पकडे और एक हाथ मदद के लिए उठाये हुए बहुत देर तक सड़क के एक कोने पर तब तक खडा रहता है, जब तक कि कोई दयालू प्रवृति का इंसान  उसे सड़क पार न करवा दे। दफ्तर जाने के रास्ते में मुझे भी ऐसे ही एक सज्जन के दर्शन अक्सर हो जाते है। और जब मैं उन सज्जन से पास से गुजरते हुए अपने गंतव्य पर निकलता हूँ, तो बहुत से भाव और बिचार मेरे मन-मस्तिष्क पर अक्सर कौंधने लगते है।    पिछले  रविवार की बात है, एक  मित्र  संग किसी काम से बाजार निकला था। मित्र महाशय ने अभी हाल में एक स्कूटी ( हौंडा एक्टिवा) खरीदी थी, बाजार की भीड़-भाड का अंदाजा लगाकर हम दोनों ने उसी से निकलना मुनासिब समझा। जनाब ने यह कहकर चाबी मुझको पकड़ा दी थी कि ज़रा तू चलाकर देख। चूकि...

अबला-गुहार !

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हे धृतराष्ट्र ! साल में एक दिन तुम कहते हो कि  आज महिला दिवस है, साथ ही यह भी जानते हो  कि  गांधारी के  इस राज में, महिला कितनी विवश है।     याद रखो,  इतिहास साक्षी है  कि  इस धरा पर जब-जब नारी दमन हुआ है, उसके तुरंत बाद  कुरुक्षेत्र और लंका दहन हुआ है।    

जिन्दगी इक खुशनुमा सफ़र होती !

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जिन्दगी यूं इसतरह न गुजर होती, न बसर होती, अगर मिली इसको, जो बस इक तेरी नजर होती। पीते ही क्यों प्यालों से,  निगाहें अगर पिला देती, गुजरती जो मेरे दिल पे, तेरे दिल को खबर होती।    तेरे आगोश पनाह मिलती,धन्य होते तुझे पाकर,  बेरहम, बेकदर जमाने में, हमारी भी कदर होती। सजाते हम भी आशियाना,इस वीरां मुहब्बत का,  यादे गुजरे हुए लम्हों की, अमर और अजर होती। अगर तुम्हे जो पा लेते,  ख्वाइश शेष क्या होती,     कुछ तलाश नहीं करते,उल्फत न मुक्तसर होती। डूबती इस नैया के,  संग जो खेवनहार तुम होते,  ये जिन्दगी 'परचेत',  इक खुशनुमा सफ़र होती।   छवि  गूगल से साभार !