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Showing posts from March, 2026

अंदाज!

मेरी डांडी-कांठियों का मुलुक ज्यैल्यू, Go there in the spring. हैरा बण मा बुरांश का फूल जब बण मा आग  लगाणा होला, भीटा पाखों थैं फ्योलिं का फूल,  पिन्ग्ला रंग मा रंग्याणा होला .. लाइयां पैयां ग्वीराल फूलु ना, The earth will be decorated, Go there and sing.

O sitting moon !

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O setting moon! Come back soon. For me, you are not a dark midnight, for me, to be honest, you are a happy noon. O setting moon! Come back soon.

पुनर्विवरण !

रातों के हर पहर-दोपहर,  जब भी  मैं करवट बदलूं, बदली हुई हर करवट पर,  कसम से आहें भरता हूं , उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना,  कह देता कि  मैं तुमपर मरता हूं , मत पूछो, ये नशा कौन सा करता हूं,  सच में, मैं तुम्हें बतानें से डरता हूं।

वज़ह!

गर तुम न खरीददार  होते, यकीन मानिए,  टके-दो-टके में भला कौन बिकता? मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी कभी, बस, निवेश गलत किया है तुमने, इसीलिए घर में "धन" नहीं टिकता।

वाजिब बात

रूठ जाते हैं मुझसे मेरे अपने ही और  मुझको मनाने मे जरा भी रुचि नहीं, दिलचस्प हों भी अगर मुहब्बत की राहें, क्या फायदा, जब दिल मे ही शुचि नहीं?  

कश्मकश

सबब खामोशी, तेरा बहाना अच्छा है, इश्क़ हुआ मगर इजहार न किया, अंदाज़े मोहब्बत छुपाना अच्छा है, शकुन बुरा ही सही, दिल जलाना अच्छा है।

हकीकत

उजागर न होने दिया हमने  उजागर न करने के ऐब से, वाकिफ बहुत खूब थे हम, तुम्हारे छल और फरेब से।

सलाह

कह रहा हूं मैं तुमसे,  ऐ बेस्वाद, बेसुरे भड़वे, जुबां पे थोड़ी मीठास घोल, मत बोल इतने भी बोल कडुए। तू शिद्दत रख और  समर्पण कर, मत पड़ फरेब में जिस्मानी शाम की, रूहानी एहसास खुदा की इबादत ,  लिखदे तू जाकर अपने नाम की।

मन की हकीकत

न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची, बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची, उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत', थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।

तब्दीली

तेरी याद आना  गुज़रे जमाने की बात हो गई, पानी का गिलास  सामने टेबिल पर पड़ा देखकर, अब तो हिचकियों भी नहीं आती।

सफर अभी बाकी है।

अभी नहीं, सफ़र जब खत्म होने की दहलीज पर होगा,  तभी सोचेंगे ऐ जिंदगी ! कि ज़ख्म कहां-कहां से मिले।

परिभाषा

कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं कि जो फटते नहीं, फासले अगर बढ़ने लगें तो फिर घटते नहीं।

हो ली,,,

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पर्व रंगों का है वेरंगीन बन, बैठा हूं बातें करता खुद से, कभी न जाने क्यों ऐसा लगे, हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से।   मदहोश-बेखबर, था तो नहीं, दर्द का एहसास है बे-खुद से, घाव जिस्म पे मेरे आहिस्ता कर, अनुनय यही है बस, हुद-हुद से।