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Showing posts from June, 2013

उत्तराखंड त्रासदी- कुछ अनुत्तरित सवाल !

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१६ -१७ जून को उत्तराखंड के ऊपर वर्षी आसमानी विपदा ने इस देश की इक्कीसवीं सदी की तथाकथित विकास-परस्त सरकारों के चूले उखाड़ फेंके है। नि:संदेह एक बड़ा सवाल यह खडा हो गया है कि विकास सिर्फ देश और समाज  केन्द्रित होना चाहिए या फिर प्रकृति केन्द्रित भी। यह सवाल तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर जब अपने देश में विकास के माड़ल के संदर्भ में तमाम संसदीय राजनैतिक दलों की समझ एक सी ही है। ' उखाड़ फेंके है'  से याद आया कि आजकल एक ख़ास राजनैतिक पार्टी "फेंकू" के फोबिया से काफी परेशान है। उसे शायद नींद में सपने भी फेंकू के ही आते होंगे। स्वाभाविक भी है कि जो फेंकू काम यह राजनैतिक पार्टी आजादी से भी दो दशक पहले, इनके दादाजी द्वारा इस पार्टी की कमान संभालने के बाद से ही कर रही थी, उसे चुनौती देने वाला इनसे भी 'ग्रेट फेंकू' सिर्फ १०-१२ सालों में  ही पैदा हो गया और अपनी साख बना भी ली।खैर, देश के वे तमाम लोग जिन्होंने इस आपदा को झेला है, कम से कम इस तथाकथित 'ग्रेट फें...

कार्टून कुछ बोलता है- उत्तराखंड त्रासदी !

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निकले तो थे गुपचुप दर्द बांटने  बाढ़ पीड़ितों का,   दर्मियाँ सफर तो भेद उनका  किसी पे उजागर न हुआ,   मगर खुला भी तो कब,  जब मंजिल पे वो पूछ बैठे;    "आखिर इस जगह हुआ क्या था ?"   

प्रभु, चाह न रही मुझे अब तीरथ की।

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देखी ऐसी जो गत,  तेरे दर,सत-पथ की, प्रभु,चाह न रही,  मुझे अब तीरथ की। धाम तेरे आने की, जो  थी  मन अभिलाषा, दुखियारे जन को, देते  ख़त्म हुई  दिलासा।  हुई खण्डित धुन, जोश, मुराद, मनोरथ की, प्रभु,चाह न रही,  मुझे अब तीरथ की। पुण्य-सफर दुष्कर होगा, अनजाने थे वो,  वैकुण्ठ में पग धारण को  दीवाने थे वो।      खिले-अधखिले सब ही  लील गई नदिया, कुम्पित-मुरझाए से, बचे फूल हैं बगिया।  थर-थर कांपी तो होगी, रूह भगीरथ की, प्रभु,चाह न रही,  मुझे अब तीरथ की। उन्हें इल्म न था,  जाकर तेरे द्वारे, वक्त भी दे जाएगा  उन्हें जख्म करारे।  लुटेगी लाज प्रांगण  तेरे, नथ-नथ की,    प्रभु,चाह न रही,  मुझे अब तीरथ की। बनकर तलवार, छड़ी कुदरत की घूमी, विध्वंसित हो गई,  जो थी देव-भूमि।   घुले ही जा रही,  बेकली मन-मथ की, प्रभु,चाह न रही,  मुझे अब तीरथ की।

अब तो नहीं जाओगे न पहाड़ों पर ? जाना भी नहीं, प्लीज !

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सर्वप्रथम हर उम्र  के उन दिवंगतों को मेरी भावभीनी श्रृद्धांजली, जिन्होंने 16-17 जून, 2013 को आये पहाड़-प्रलय में न सिर्फ अपनी जान गंवाई अपितु बहुत ही कष्टकारी माहौल में अपनी अंतिम साँसे गिनी। अब ये चाहे मानव निर्मित हो या फिर दैविक प्रलय, किन्तु आपदा से उपजी विपदा की इस घड़ी में हर इंसान का यह पहला कर्तव्य बनता है कि पीड़ितों का दुःख-दर्द समझे और उन्हें हर संभव मदद पहुंचाए।   अब बात उत्तराखंड की , मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से यह  जानकार मन को थोड़ा शान्ति का अनुभव हुआ कि स्थानीय लोगो ने अपनी तमाम कठिनाइयों को दरकिनार कर अपने पास मौजूद  सीमित साधनों से ही सही किन्तु बाहर से आये तमाम सैलानियों और धार्मिक श्रद्धालुओं की यथा-संभव मदद की। अच्छे लोंगो के बीच कुछ बुरे लोग भी अवश्य होते है और ऐसे  धुर्त लोग किसी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकते, वे यह भी भूल जाते है कि जिन मजबूर लोगो से वो आज फायदा उठाने की कोशिश कर रहे है, उन्ही के जैसी मजबूर...

उत्तराखंड त्रासदी -'प्रलय' और क्या है ?

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सृष्टि को उपहित न कर, वरना कुदरत भी कहर देगा, कभी किसी गाँव-खलियान, कभी किसी शहर देगा।  अखंड,भंगुर वसन्त,वैभव, तय है उजड़ना एक दिन,  छल-कपट,बेईमानियों को, कब तलक न ठहर देगा।  लांघते ही रहे अगर हद को, जो तय की है प्रकृति ने, अमृत हमें जो दिया है उसने, बनाके उसे जहर देगा।  बाढ़, सूखा, तूफाँ,भूकंप, ये अचूक हैं हथियार उसके,     कहीं बहेगा सैलाब बनकर, तो  कहीं वो लहर देगा।  'प्रलय' और क्या है, यही है,  जो दृष्ठिगौचर हो रहा,    करेंगे न पथ दुरस्त हम, वो प्रतिकार हर पहर देगा।     अद्भुत सामर्थ्य है 'परचेत', कुदरत की हर कृति में,   निसर्ग,सुघर गजल को,  वो क्यों नई बहर देगा। अंत में एक चिट्ठी उत्तराखंड से ( सौजन्य से आज तक ( साभार ): इधर, फेसबुक और टि्वटर पर भी लोगों ने मदद की अपील शुरू कर दी है. कई मर्मस्‍पर्शी संदेश पढ़ने को मिल रहे हैं. उन्‍हीं संदेशों में से एक सं...

यथा सरकार तथा मौसम विभाग ! (लघु व्यंग्य)

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कल मंत्रिमंडल विस्तार के बाद हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने अपना कीमती भाषण दिया, जिसमे उन्होंने देश की वर्तमान और भविष्य की राजनीति से सम्बंधित काफी उपयोगी बाते कहीं।  या यूं कह लीजिये कि उन्होंने कुछ राजनीतिक सर्टिफिकेट अपने भाषण में बांटे और कुछ राजनीतिक भविष्यवाणियाँ भी की। मैं बड़ी टकटकी लगाए महोदय के बोल सुन रहा था। वैसे भी जब कोई महत्वपूर्ण पद पर बैठा इंसान देश से सम्बंधित ज्वलंत मुद्दों पर साल में एक-आदा बार आने वाले किन्हीं त्यौहारों की ही भांति अपना मुह खोले, तो उस ख़ास पल की उपयोगिता स्वत: बढ़ जाती है। कुछ दिनों से  मॉनसून की प्रचंडता और उद्विग्नता के समाचार हमारे अतिविश्वश्नीय मीडिया की सुर्खियाँ बनी हुई थी, अत: मैं यह उम्मीद भी कर रहा था कि मौसम  और मॉनसून के हालिया व्यवहार पर वे शायद यह भी अवश्य कहेंगे कि पश्चिमी देशों के मौसमों की ही तरह यहाँ के मॉनसून और तूफानों को भी मर्यादा में रहकर  भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणी की कद्र करनी होगी, लेकिन वे ऐसा कुछ नहीं ब...

मुश्किल

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बड़ा अ जब दस्तूर है  इस बेदर्द जमाने का, घर की चौखट तो कभी  लांघी ही नहीं  हमने  और लोग कहते  है  कि हम गुम-राह हो गए है।  xxxxxxxxxxxxxxxxxxxx जब उदासी की बदली, तेरे आशियाने पे घिरे, यादों की बारिश, जज्बातों के ओले, सब मेरे ही अंगना गिरें।  आरजू खुदा से है ,  सलामत रहे तेरी  उम्मीदों का आसमां,  तेरे अरमानो की जमीं पे,  न कभी पानी फिरे।।  

ऐ दुनियादारी !

अपना भी न पाये तुझे ढंग से, हुई भी न तू हमारी,        अलगा भी न सके खुद से, तुझको ऐ दुनियादारी। छोड़ देते जो अगर साथ तेरा, तो ही अच्छा होता, न सीने में बेचैनी होती और न  दिल में बेकरारी। क्या बाहर, क्या घर में,लटके रहे सिर्फ अधर में,  रिश्तों-वास्तों की ही  हर तरफ , रही मारामारी।     पार्थिव होकर के पड़े जब, तेरे चक्करों में हम,  जिन्दगी तमाम हमने, उलझनों में ही गुजारी।    खातिर मर्जे-उदासी खोले,हमदर्दी के दवाखाने,   मुफ्त में औषध बांटी, छुपाकर अपनी लाचारी। सहचर बनके संग चले, मिला जो कोई अकेला,  किंतु कांधा भी न मिला परचेत, हमें अपनी बारी। जख्म हमको न अगर गहरा, तुमने दिया होता, तो फिर भला क्यों ये ज़हर हमने भी पिया होता,     अगर  तुम उन जख्मों पे नमक ही न छिड़कते, तो कुछ सहारा मरहमों का हमने भी लिया होता।