उत्तराखंड त्रासदी- कुछ अनुत्तरित सवाल !
१६ -१७ जून को उत्तराखंड के ऊपर वर्षी आसमानी विपदा ने इस देश की इक्कीसवीं सदी की तथाकथित विकास-परस्त सरकारों के चूले उखाड़ फेंके है। नि:संदेह एक बड़ा सवाल यह खडा हो गया है कि विकास सिर्फ देश और समाज केन्द्रित होना चाहिए या फिर प्रकृति केन्द्रित भी। यह सवाल तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर जब अपने देश में विकास के माड़ल के संदर्भ में तमाम संसदीय राजनैतिक दलों की समझ एक सी ही है। ' उखाड़ फेंके है' से याद आया कि आजकल एक ख़ास राजनैतिक पार्टी "फेंकू" के फोबिया से काफी परेशान है। उसे शायद नींद में सपने भी फेंकू के ही आते होंगे। स्वाभाविक भी है कि जो फेंकू काम यह राजनैतिक पार्टी आजादी से भी दो दशक पहले, इनके दादाजी द्वारा इस पार्टी की कमान संभालने के बाद से ही कर रही थी, उसे चुनौती देने वाला इनसे भी 'ग्रेट फेंकू' सिर्फ १०-१२ सालों में ही पैदा हो गया और अपनी साख बना भी ली।खैर, देश के वे तमाम लोग जिन्होंने इस आपदा को झेला है, कम से कम इस तथाकथित 'ग्रेट फें...