पलायन !
कायनात की कुदरती तिलस्म ओढ़े, शान्त एवं सुरम्य, उन पर्वतीय वादियों में जंगल-झाड़ों को, दिन-प्रतिदिन सिमटते, सरकते देखा, चट्टानों,पहाड़ों को बारिश में खिसकते,दरकते देखा। काफल, हीसर,किन्गोड़ से दरख्त-झाड़ियाँ खूब लदे पड़े देखे, वृद्ध देवदार,चीड व बांज सब उदास, खामोश खड़े देखे , कफु, घुघूती,हिलांस अभी भी बोलती है, किन्तु उनकी मधुर स्वर-लहरी, कोई सुनने वाला ही नहीं, ग्वीराळ, बुरांस अभी भी खिलता है, पर सौन्दर्य, खुशबुओं पर मुग्ध, पेड़ की टहनियों से उसे कोई चुनने वाला ही नहीं, शिखर, घाटियाँ जिधर देखो, सबकी सब सुनशान, वीरान घर, खेत-खलिहान, गाँव के गाँव यूँ लगे, ज्यों शमशान, शनै:-शनै: लुप्त होते कुदरती जलश्रोत, पिघलते ग्लेशियर, तेज बर्फीली सर्द हवाओं का शोर, बारहमासी और बरसाती, नदियों-नालों का प्रचंड देखा, बहुत बदला-बदला सा इस बार मैंने अपना वो उत्तराखंड देखा।