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Showing posts from January, 2011

पलायन !

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कायनात की कुदरती तिलस्म ओढ़े, शान्त एवं सुरम्य, उन पर्वतीय वादियों में जंगल-झाड़ों को, दिन-प्रतिदिन सिमटते, सरकते देखा, चट्टानों,पहाड़ों को बारिश में खिसकते,दरकते देखा।   काफल, हीसर,किन्गोड़ से  दरख्त-झाड़ियाँ खूब लदे पड़े देखे, वृद्ध देवदार,चीड व बांज सब उदास, खामोश खड़े देखे , कफु, घुघूती,हिलांस अभी भी बोलती है, किन्तु उनकी मधुर स्वर-लहरी, कोई सुनने वाला ही नहीं, ग्वीराळ, बुरांस अभी भी खिलता है, पर सौन्दर्य, खुशबुओं पर मुग्ध, पेड़ की टहनियों से उसे कोई चुनने वाला ही नहीं, शिखर, घाटियाँ जिधर देखो, सबकी सब सुनशान, वीरान घर, खेत-खलिहान, गाँव के गाँव यूँ लगे, ज्यों शमशान, शनै:-शनै: लुप्त होते कुदरती जलश्रोत, पिघलते ग्लेशियर, तेज बर्फीली सर्द हवाओं का शोर, बारहमासी और बरसाती, नदियों-नालों का प्रचंड देखा, बहुत बदला-बदला सा इस बार मैंने अपना वो उत्तराखंड देखा।  

जीवन पहेली !

जिन्दगी एक्सट्रीम है उनके लिए, जिन्होंने जीवन में बेहिसाब पा लिया, या फिर अनगिनत गवां लिया। जिन्दगी एक ड्रीम है उनके लिए, जीवन में जो सिर्फ पाने की ही चाह रखते है, कुछ गवाना नहीं चाहते। अगर यही सवाल कोई मुझसे पूछे तो , मैं तो बस यही कहूंगा कि जिन्दगी आइसक्रीम है, उसे तो वक्त के सांचे में ढलना है, कोई खाए या न खाए , उसे तो पिघलना है। इसलिए जहाँ तक संभव हो जितना खा सको उसे खाओ, चाटो... अंत में सिर्फ दो ही बातें होवेंगी, संतुष्ठी , या फिर पछतावा॥

जय हिंद !

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गणतन्त्र दिवस की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभ-कामनाये ! उम्मीद है इस दशक में हम लोग अपने देश के 'गण' को कुटिल राजनीतिक 'तंत्र'से मुक्त करा पाने में सफल होंगे ! बस, इस दिशा में हमारा निरंतर प्रयासरत रहना आवश्यक है ! जय हिंद !

पर्यावरण-कुछ अनुत्तरित सवाल !

एक कहावत है कि हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और ! बेशक देश के अखबारों और मीडिया ने इस खबर को कोई ख़ास तबज्जो न दी हो, मगर है खबर बड़ी रोचक ! हमारे इस देश की इस राजनीति ने पिछले साठ-बासठ सालों में और कुछ नहीं तो पैंतरेबाजी और आमजन की आँखों में धूल झोंकने की कला में दुनिया के अन्य लोकतान्त्रिक देशों से कही बढ़कर महारथ हासिल की है! हमारे देश का एक मंत्रालय है जो देश की पर्यावरण संबंधी समस्याओं पर नजर रखता है ! एक जमाने में इस मंत्रालय के मुखिया हुआ करते थे, श्री ए. राजा ! अपने महान कृत्यों की वजह से आज भारत का जन-जन इन्हें जानता है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में विकास से सम्बंधित कुल १७०० परियोजनाओं को हरी झंडी दिखाई और सिर्फ कुल १४ परियोजनाओं पर अपनी असहमति की मोहर लगाईं थी (शायद इन १४ परियोजनाओ से निजी तौर पर कुछ हासिल न हुआ हो, न होने की उम्मीद हो ) ! आज इस देश में व्यवस्था के नाम पर जो भ्रष्टचार का नंगा दौर चल रहा है, उसमे बिना मेज के नीचे से अपना मेहनताना (आज की सभ्य दुनिया के हम ज्यादातर हिन्दुस्तानी इसे अपना मेहनताना ही कहते है) लिए ही प्रमाणपत्र जारी हो जाने की कवायद परियों की कह...

समृद्ध होती राष्ट्र-भाषा !

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हमवतन ने मृतक की शख्सियत की भी क्या खूब दलील दी है ! "कंगला टाईप" था, मर गया, फिर भी शिनाख्त की अपील की है !! मेरा भारत महान !

अबूझ पहेली !

दक्षिणी दिल्ली के महारानी बाग स्थित उसके उस किराये के फ्लैट का मुख्य दरवाजा आधा भिडा देख दिल को एक अजीब किस्म की तसल्ली सी हुई थी, और शकून भी मिला था कि चलो अपनी मेहनत,अपना खर्च किया पेट्रोल और शनिवार का अवकाश बेकार नही गया, वह अवश्य घर पर ही होगा। आज की इस ४५-४६ की उम्र तक पहुचते-पहुचते कुछ ही ऐसे गिने-चुने मित्र मेरे पास रह गये है, जिनसे मिलकर दिल की हर बात बताने मे कोई हिचक नही होती। वह भी मेरे न सिर्फ़ कालेज के दिनों का मित्र है, अपितु १९८५-८६ मे पोस्ट-ग्रेजुएशन के उपरान्त हम साथ ही दिल्ली आये थे, और लाजपत नगर रेलवे कालोनी मे कमरा लेकर शुरुआती सालों मे इकठ्ठे ही रहे। सीधे ऊपर उसके कमरे की तरफ़ डग बढाने की बजाये मैं यह सोचकर वापस गाडी की तरफ़ मुडा कि ठीक से गाडी पार्क कर लूं, फिर उससे मिलने जाता हूं, ताकि यदि उसके साथ गपों मे ज्यादा देर हो भी जाये तो गली से गुजरते किसी बडे वाहन वाले को कोई दिक्कत न पेश आये। और आखिर आज हमारी मुलाकात भी तो करीब तीन महिने बाद होनी थी। अत: न सिर्फ़ ढेर सारी बातें थी, अपितु दिल मे गिले-शिकवे भी बहुत थे कि मैं पिछले करीब दो महिने से चिकनगुनिया से इस कदर पीडित...

नया साल-नया दशक मंगलमय हो !

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