Posts

Showing posts from August, 2020

एक लघु मगर जरूरी पोस्ट- अभी सोने का नहीं, लुडक जाओगे।

Image
ज्यादा पुरानी बात नहीं है, आपको याद होगा शेयर बाजार जब इक्तालिस हजारी थे तो 55 हजारी की बात की जा रही थी और कर कौन रहे थे ? बाजारू गिद्ध। फिर क्या हुआ ? 41 हजारी 30 से भी कहीं नीचे आ लुडका। अब भला , दोष कोरोना का ही क्यों न रहा हो। बस, इस संक्षिप्त पोस्ट के मार्फत आपको यही चेताना है कि वही स्थिति आज  बुलियन मार्केट की है। दलाली गिद्धों ने तात्कालिक फायदे के लिए इसे चढाया हुआ है, बहुत आवश्यकता के अलावा इसमे न उल्झें। नीचे दो चित्र चस्पा किए हैं उनसे स्थिति को समझने की कोशिश करें।

यह मोड...

Image
कभी लगा ही नहीं, फासला-ए-मोहब्बत, शब्दों की मोहताज रही हो, प्रेम सदा ही प्रबल रहा,  बात वो कल की हो,  या फिर आज रही हो। तुम्हीं बताओ, बीच हमारे दूरियों के दरमियाँ, कुछ गलत एहसास तुमको होने दिया हो हमने, बावजूद इसके कि कभी   तबीयत भी नासाज रही हो।।

ऐ जिंदगी।

ऐ जिंदगी बता, तूने क्यों ये गजल छेडी, इन बदरंग सफो़ंं मे, हम तो जिये ही जा रहे थे तुझको,  हर पल हसींंन लम्हों मे, दफाओं की दरकार तो सिर्फ़,  शिकायतों को हुआ करती है, हमने तो कभी सोचा ही नहीं,  नुक्शानों मे जिए कि नफ़ोंं मे। ऐ जिंदगी, मुझको अब इतना भी मत तराश कि  बदन की दरारें, नींद मे खलल का सबब बन जांए।

बेवफा ख्वाहिशे

Image
  इतनी संजीदा जे बात तुमने,  गर यूं मुख़्तसर सी न कही होती, मिलने को हम तुमसे,  मुक्तसर से अमृतसर पैदल ही चले आते।

सरकारों की नासमझी और प्रशासन की अकर्मण्यता का खामियाजा भुगतने को मजबूर पहाड़ी।

Image
 01 अप्रैल 1973 को बंगाल टाइगर्स को बचाने की मुहिम के तहत तत्कालीन इंदिरा सरकार ने टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किया था। मकसद यही था कि तेजी से लुप्त होती जा रही बंगाल टाइगर की आबादी को संरक्षित किया जाये, किंतु भ्रष्टाचार से ग्रसित सिस्टम के तहत कोई खास सफलता हासिल न हुई। परिणाम स्वरूप, २००६ मे, जब श्रीमती सोनिया गांधी की सरकार सत्ता मे थी , टाइगर्स की की गई गिनती मे टाइगर्स की आवादी मात्र १४११ रह गई।  फिर शुरू हुआ सरकार, नौकरशाहों और तथाकथित पर्यावणविदों द्वारा अपनी अक्षम्यताऔं पर पर्दा डालने का सिलसिला। विभिन्न स्थानों से बाघ, तेंदुए इत्यादि मांसाहारी प्राणी एक वन से दूसरे वनों को स्थानांतरित किये गये और ऐसे ही बहुत से हिंसक प्राणी उत्तराखंड के जंगलों मे छोड दिए गये। मगर, बुद्धि से पैदल ये ज्ञानी लोग यह भूल गये कि जिन मांसाहारी प्राणियों को वे उत्तराखंड के जंगलों मे छोड रहे हैं,उनके पोषण की इन्होंने क्या व्यवस्था की है। होना ये चाहिए था जिस वक्त एक निश्चित संख्या मे हिंसक जन्तुओं को उत्तराखंड के जंगलों मे छोडा गया था, उसके छह गुना तादाद मे अहिंसक जीवों जैसे पहाड़ी हिरन और अन्य पहाड़ी...

लगता नहीं है दिल मेरा, इन उजडी हुई दीवारों मे

Image
  लगता नहीं है दिल मेरा, इन उजडी हुई दीवारों मेंं, दम घुटता है कभी-कभी,  भीत के बंद कीवारों मेंं। सजर खामोश,पता ना चले, कब दिन उगे, कब ढले, कब नमी थी, कब शुष्कता, समीप से गुजरी बहारों मेंं। दम घुटता है कभी-कभी,  भीत के बंद कीवारों मेंं।। मंजर हसीं हो तो क्या सही, दफ्ऩ दिल मे ही हैं बाते कई, मुसाफिर बहुत हैं राह मे मगर, बंद हैं सभी अपने दयारों मे। दम घुटता है कभी-कभी,  भीत के बंद कीवारों मेंं।। एक ही चमन के सभी अनजाने, यूंही पल-पल गुजरे, गुजरे जमाने, जाने, कब, कौन, कहां खप गया, इस गली उस गली, पास बाजारों में। दम घुटता है यहां हरदम,  भीत के बंद कीवारों मेंं।।

पावन पर्व

Image
आप सभी ब्लौगर मित्रों को स्वतंत्रता दिवस की मंगलमय                                  शुभकामनाएं।🙏

अभी जाना तो नहीं चाहते थे वे इस दौर से, राहत न मिली तो जाना पडा इंदौर से।

भांति-भांंति के हुरी ख्वा़ब,  मन मे लेकर इंदौर से  झूमते हुए निकले थे जो कल, जन्नत फुल होने की वजह से, सुना है, उन्हें खुदा के  किसी 'राहत' कैंप मे ठहराया गया है,बल ।

दोष

मालूम था हमको,वो बुरी चीज है, जिसे पीती है दुनियांं बडे नाज से, मगर, ऐ साकी, बर्बाद हम यूं हुए, कुछ तेरे पिलाने भर के अन्दाज से।

देवनगरी,"अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या"

Image
जन्मस्थली मुक्त हो गई, दैत्य कारावास से, श्रीराम लौटेंगे अवध, आज फिर वनवास से। दीपों से जगमगा उठे हैं, निर्मल सरयू के तट, सजने लगे फिर दोबारा,अयोध्या के सूने पट। गूंज रहा देश कौशल,'श्रीराम' के जयघोष से, मुक्त होगी शीघ्र दुनिया,व्याधि,संताप दोष से। हासिल करेंगे रामराज, दुष्टजनों के नाश से, श्रीराम लौटेंगे अवध, आज फिर वनवास से।                                           

मैं क्या बोलूं ?

धर्म-ईमान, मालूम है,  यहां सबकुछ, टके-सेर बिकता है, और जो खरीददार, वो वैंसा है नहीं,  जैंसा दिखता है।

गजब।

Image
ऐ खुदा,  क्या लॉकडाउन की वजह से, बंद हो गई है तेरी चक्की भी, सैनेटाइजेशन की हद तो देखो, दाम अलग किंंतु स्वाद एक जैसा दे रही, कच्ची और पक्की भी। अब तो हैरानगी यह देखकर और बढने लगी है कि सोशल-डिस्टेंसिग बरत रही, मेरे गांव की मक्की भी।।😀