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Showing posts from January, 2009

एक सच यह भी !

शनिवार का दिन था, शाम के करीब सवा पाँच बजे होगे। दफ़्तर से थोड़ा जल्दी निकल पड़ा था घर के लिए । सराए काले खाँ पार कर जैसे ही निजामुद्दीन पुल की तरफ़ मुडा, एक तेज रफ़्तार बाइक कुछ अजीबोगरीब ढंग से मेरी बाए ओर से मुझे ओवरटेक करते हुए निकली। मैं अपनी गाड़ी सँभालते हुए बस इतना ही बडबड़ाया, " मरेगा इडीयट "। कुछ दूर तक मै उस बाइक को जाते देखता रहा, एक २५-३० साल की उम्र का युवा जोडा कुछ ज्यादा ही जल्दी में लगता था। शनिवार को अधिकांश दफ़्तरो मे छुट्टी होने की वजह से सड्को पर भीड अन्य दिनो के मुकाबले थोडा कम होती है अतः मै भी अपनी ६०-६५ की स्पीड में चलता रहा। मुश्किल से आधा किलोमीटर चला हूंगा कि यकायक यातायात धीमा पड़ गया, आगे सड़क पर एक टेंपो ख़राब पड़ा था। वह जोडा जो बाइक पर जा रहा था, एक बार फ़िर से मेरी गाड़ी के आगे था। जैसे ही खराब पडे टेंपो को पार किया, यातायात ने फ़िर से गति पकड़ ली थी ! मै भी अपनी पुरानी ६०-६५ वाली स्पीड में आ गया था। वेंसे तो जब मेरे आगे कोई परिवार वाला किसी दुपहिये पर जा रहा हो, तो मैं कुछ ज्यादा ही सतर्क हो जाता हू , लेकिन इस बार आगे वाले की ग़लत ड्राइविंग ...

वो वही थी ?

उनकी पहली मुलाकात गर्मियों के दिनों में गाँव में खेली जा रही रामलीला के सेट पर हुई थी।  इस रामलीला में कृष्णा सूपर्णखा का और मुकेश लक्ष्मण का पाठ अदा कर रहे थे। पहली ही नजर दो  दिलों को इसकदर  भेद जायेगी, दोनों ने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा।  गर्मियों की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुले तो चूँकि दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे, मुकेश बारहवी में था और कृष्णा दसवी कक्षा में थी, तो दोनों का मिलना-जुलना जारी रहा।  अब तक वे दोनों एक दूसरे को मन ही मन चाहने भी लगे थे। पहाडी इलाका होने की वजह  से सर्दियों के दिनों में स्कूल के अध्यापक गुनगुनी  धूप सेखने के उद्देश्य से बच्चो की अलग-अलग कक्षाएं, बाहर स्कूल के प्रागण में लगाते थे । दसवी, ग्यारहवी और बारहवी की कक्षाए पास-पास ही लगती थी । जब भी कृष्णा घर से कोई ख़ास पकवान बनाकर लंच के लिए टिफिन में लाती, तो मुकेश को लंच-ब्रेक पर इशारों-इशारों में स्कूल के पीछे की सीढीनुमा क्यारियों में बुला लेती, और फिर दोनों वहीँ बैठकर लंच करते । ...

अनिष्ट से आशंकित एक कली !

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सूबे-मुल्क की  राजधानी में  ,  हुमायु के मकबरे के पास, माली के छोटे से उपवन में बैठी थी एक कली उदास ! कली खिलकर किसी भी पल फूल बनने के कगार पर खड़ी थी, भवितव्यता चिंता की लकीरें   तमाम उसके माथे पर पडी थी ! पूछा जो उलझन का सबब, वो बोली  भाव-विभोरकर, मुझे बलि चढ़ाया जाएगा संभवतया अगली भोर पर ! मृत्यु-शय्या पर है शठ नेता,  कुटिल जुट रहे उसकी गेह पर, मैं गिरना नहीं चाहती  मगर  भ्रष्ट सियासतदानों की देह पर  !

संध्या की चितकार !

जब कभी इंसान अपने फुरसत के पलो को जी रहा होता है और एक सरसरी निगाह अपने गुजरे वक्त पर डालता है तो उसे महसूस होता है कि समय कितनी जल्दी पंख लगाकर उड़ गया । वह उन लम्हों को याद करता है जो उसकी जीवनचर्या पर एक अमिट छाप छोड़ जाते है । और कुछ ख़ास किस्म के गुजरे लम्हे तब अक्सर याद आ जाते है जब उस आतीत में घटी घटना से मिलता जुलता कोई नज़ारा अचानक आँखों के सामने आ जाए । ऐंसा ही कुछ ख़ास मेरे साथ भी घटित हुआ था, या यह कहना उचित होगा कि मेरी आँखों के आगे घटित हुआ था। शायद गुजरे साल की 'आखिरी संध्या' शब्द प्रयोग करना ठीक नही है, अपितु नए साल की 'पूर्व संध्या' शब्द एक सकारात्मक सोच की ओर ध्यान अग्रसर करता है । आने वाले साल की ओर एक आशावादी दृष्टीकोण परिलक्षित करता है । अभी कुछ दिन पहले, नए साल की पूर्व संध्या पर दफ्तर से घर लौट रहा था तो सड़क पर दो मोटरसाईकिल सवारों के, नशे में धुत होकर मचाये जा रहे हुडदंग ने मुझे मेरे अतीत में लौटने पर मजबूर कर दिया । ३१ दिसम्बर, २००२ की शाम, हर नए साल की पूर्व शाम की तरह ही एक ख़ास शाम थी, २००३ के आगमन का वेसब्री से, जश्न मनाकर इंतज़ार किया जा रह...