एक सच यह भी !
शनिवार का दिन था, शाम के करीब सवा पाँच बजे होगे। दफ़्तर से थोड़ा जल्दी निकल पड़ा था घर के लिए । सराए काले खाँ पार कर जैसे ही निजामुद्दीन पुल की तरफ़ मुडा, एक तेज रफ़्तार बाइक कुछ अजीबोगरीब ढंग से मेरी बाए ओर से मुझे ओवरटेक करते हुए निकली। मैं अपनी गाड़ी सँभालते हुए बस इतना ही बडबड़ाया, " मरेगा इडीयट "। कुछ दूर तक मै उस बाइक को जाते देखता रहा, एक २५-३० साल की उम्र का युवा जोडा कुछ ज्यादा ही जल्दी में लगता था। शनिवार को अधिकांश दफ़्तरो मे छुट्टी होने की वजह से सड्को पर भीड अन्य दिनो के मुकाबले थोडा कम होती है अतः मै भी अपनी ६०-६५ की स्पीड में चलता रहा। मुश्किल से आधा किलोमीटर चला हूंगा कि यकायक यातायात धीमा पड़ गया, आगे सड़क पर एक टेंपो ख़राब पड़ा था। वह जोडा जो बाइक पर जा रहा था, एक बार फ़िर से मेरी गाड़ी के आगे था। जैसे ही खराब पडे टेंपो को पार किया, यातायात ने फ़िर से गति पकड़ ली थी ! मै भी अपनी पुरानी ६०-६५ वाली स्पीड में आ गया था। वेंसे तो जब मेरे आगे कोई परिवार वाला किसी दुपहिये पर जा रहा हो, तो मैं कुछ ज्यादा ही सतर्क हो जाता हू , लेकिन इस बार आगे वाले की ग़लत ड्राइविंग ...