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Showing posts from March, 2021

फुलदेई..

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जनि प्यारी बेट्ळौंन तख 'फूलदेई' सुबेरी-सुबेर कै तेरी देळी मा, वनि, 'फुलदेई' की खबर पौंछी यख टीवी परै, मेरी 'देहळी' मा। फूल मेट्या, फूल जनि बेट्ळौंन सग्वाडि, पुंग्डी, बौण बिटीकी, नांगि खुट्यौंन, सुबेरी-सुबेर, चसा पाळा, ह्यूं  मा हिटीकी। जसिलो ब़िंसरी घाम पौंछी, डा़ंंडी, पांखी, गद्वारी, भेळी मा, वनि, 'फुलदेई' की खबर पौंछी यख टीवी परै, मेरी 'देहळी' मा।

खलिश..

जब वो, दर्द-ऐ-दिल अपना,  शब्दों मे न समेट पाया तो कमबख़्त, आंसू बनके उसकी आँखों से छलक आया।

जम़ाना...

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  जिसदिन से तरसीम ऊपर गया मिरी शख़्सियत और हैसियत का, ख़्याल सताने लगा है जमाने को,  मिरी खै़रियत और  कैफि़यत का। तरसीम/तर्सीम= लेखाचित्र(graph)

ऐ जिंदगी...

ऐ जिंदगी, तू मेरे घर मत आना... अकेला ही रहता हूँ, हर गम अकेले ही सहता हूँ, दिनभर दौड-धूप का मारा,  दुनियांं से थका हारा, साफ-सफाई का मोहताज..... पसंद नहीं आएगा तुझको, ये मेरा कबाड़खाना। ऐ जिंदगी, तू मेरे घर मत आना... यही काफी है मेरे लिए कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ, हर गम-ओ-खुशी तेरे दरमियाँ से गुजरता हूँ, मगर रूठे जो तू कभी... तो फिर मनाने को , दे न पाऊंगा तुझको मैं दिल का कोई नज़राना । ऐ जिंदगी, तू मेरे घर मत आना...