Posts

Showing posts from July, 2009

लघु व्यंग्य- अरहर महादेव !

सावन का महीना है, इस पूरे मास में हिन्दू महिलाए प्रत्येक सोमवार को शिव भगवान् का व्रत रखती है, शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना करती है तथा उन्हें श्रदा-पूर्वक ताजे पकवानों का भोग चढाती है।    पिछले सोमवार को थोडा जल्दी उठा गया था, और बरामदे में बैठ धर्मपत्नी के साथ चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अच्छे मूड में होने का इजहार उनपर कर चुका था।   अतः ब्लैकमेलिंग में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल मेरी धर्मपत्नी ने मुझे जल्दी नहा  -धोकर तैयार होने को कहा।  मैंने कारण उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि मुझे भी आज उनके साथ मोहल्ले के बाहर, सरकारी जमीन को   कब्जाकर बने-बैठे शिवजी के मंदिर में पूजा-अर्चना करने और भोग लगाने चलना है।   स्नानकर तैयार हुआ तो धर्मपत्नी भी किचन में जरूरी भोग सामग्री बनाकर तैयार बैठी थी।   अतः हम चल पड़े मंदिर की और।   मंदिर पहुंचकर कुछ देर तक पुजारी द्वारा आचमन और अन्य शुद्धि विधाये निपटाने के बाद हम दोनों ने मंदिर के बगल में स्थित भगवान् शिव की करीब दो मीटर ऊँची प्रतिमा को दंडवत प्रणाम किया।   इस बीच धर्मपत्नी थाली प...

इन्द्रदेव मेहरबान हुए भी तो...!

Image
झमाझम बारिश, सावन की मस्ती है, दिखा दिया, इन्द्रदेव  ने वो क्या हस्ती है। पानी-पानी हुई राजधानी, बारिश की चर्चा हर एक ज़ुबानी। जहां चला करती थी कलतक बस, कारे, चल रही आज वहाँ कश्ती है। दिखा दिया, इन्द्रदेव  ने वो क्या हस्ती है।। बारिश दिन-रैन, सब के सब बेचैन, एक  ही दिन में ये हाल, हर बाशिंदा बेहाल , कीचड का सैलाब, डूबी सारी बस्ती है। दिखा दिया, इन्द्रदेव  ने वो क्या हस्ती है।।

लघु कथा- सुजाता

सुजाता के पिता शहर मे बिजली विभाग के दफ़्तर मे वरिष्ठ कलर्क थे ! सुजाता के दादा जी की मृत्यु के तुरन्त बाद ही गांव की जमीन-जायदाद बेचकर उन्होने उसी शहर मे एक घर खरीद लिया था ! परिवार मे कुल ६ सदस्य थे, दादी मा, सुजाता के माता-पिता और तीन भाई-बहन, यानि सुजाता और उसके दो भाई ! पिता बडे ही निठुर और स्वार्थी स्वभाव के इन्सान है, लिहाजा उनकी इस निठुरता का ही परिणाम था कि सुजाता की मां को समय पर उचित चिकित्सकीय सहायता न मिल पाने की वजह से करीब सात साल पहले उनका निधन हो चुका था ! मां की मृत्यु के बाद घरेलू कामों का बोझ नन्ही सुजाता, जो तीनो भाई-बहनो मे सबसे बडी थी,के कन्धो पर आन पडा था, किन्तु जब तक दादी मां थी, उसे घर पर थोडा सा सहारा था, और वह अपनी पढाई जारी रखे थी, एवम जैसे-तैसे कर उसने दसवीं पास कर ली थी! किन्तु दो साल पहले दादी मां भी चल बसी, और तब से सम्पूर्ण घर की जिम्मेदारी उसी को सम्भालनी पड रही थी! पिता ने उसे दसवी से आगे पढाने से साफ़ इन्कार कर दिया था ! सुजाता की हार्दिक इच्च्छा थी कि वह पढ-लिखकर अध्यापिका बनेगी, लेकिन निष्ठुर पिता के आगे उसकी इतनी भी हिम्मत नही हुई कि व...

अजीब बिडम्बना है !

कल कारगिल युद्द की दसवीं सालगिरह पर टीवी पर प्रोग्राम देखते-देखते बस यूं ही विचार-मग्न था, कि तभी कुछ ख्यालात दिलो-दिमाग मे आये, और उन्हे मैने कुछ इस तरह भावो मे पिरोया: तमाम समस्यायें जैसे जम्मु-कश्मीर की समस्या, मावो और नक्सली समस्या, आतंक की समस्या इत्यादि, इत्यादि जिनको सुलझाने के नाम पर ये आम जनता और सुरक्षाकर्मियों को मरवाते है , किसने खडी की रहती है ? जिन गरीबो का ये, करते आये है शोषण, वही इन्हे जिताकर, सत्ता तक पहुंचाते है ! जिनकी वजह से, मरते है ये सुरक्षा कर्मी, वही इन्हे जानपर खेल, खतरों से बचाते है !! (वीवीआईपी सुरक्षा के नाम पर) आज हम जब किस्से कहानियों मे पढ्ते है कि पुराने जमाने मे राजा महाराजा लोग, मुस्लिम आक्रमणकारी और अंग्रेज अपने ऐशो-आराम के लिये उस गरीब किसान पर जो दिन-रात मेह्नत करके खेतों मे अनाज उगाता था, टै़क्स लगाकर अपनी तिजोरी भरते थे और मजे करते थे ! अथवा जब हम लोग कोई बॉलीवुड फिल्म देखते है जिसमे कि एक मजदूर दिन-रात अपना खून-पसीना बहाकर कोयले की खदान मे काम करता है , और जब वह अपने खून-पसीने की पगार लेकर घर को निकलता है तो गेट पर भाई (हराम की खाने ...

किसे जिम्मेदार ठहराएं ?

अपने बचाव और जनता की नजरों में धूल झोंकने के लिए सत्ता में बैठे हमारे इन कुटिल राजनीतिज्ञों ने अनेको उपाय ढूंढ निकाले है ! अगर कुछ हो जाए तो बस पुलिस जांच, सीबीआई जांच, न्यायिक जांच, ये आयोग, वो आयोग, ये अंकेक्षक, वो परीक्षक ! मगर अंत में नतीजा क्या, वही ढाक के तीन पात ! ये लोग बखूबी इस बात को समझते है कि हिन्दुस्तानियों की याददास्त बड़ी कमजोर है, उन्हें सुबह का खाया हुआ शाम को याद नहीं रहता, तो कई सालो बाद जब तक किसी आयोग की रिपोर्ट इनको मिलेगी और ये उसे सार्वजनिक करेंगे, तब तक तो हिन्दुस्तानी जनता उस घटना को भुला चुकी होंगी ! जो एक-आदा भूलेंगे नहीं, उन्हें रोजी रोटी और रोजमर्रा की मुसीबतों में ही इस तरह से उलझा के रखो कि वह लीक से परे हटकर और कोई बात सोच ही न पाए ! हाल में प्रकाशित अंकेक्षक और महालेखापरीक्षक, जो कि सरकारी खर्च का ऑडिट करता है, ने अपनी आडिट रिपोर्ट में सरकारी खर्च और रक्षा सौदों में गंभीर अनियमितताओ के जो आरोप लगाए है, उनकी सुनवाई कहाँ होगी और कौन करेगा ? महालेखापरीक्षक का मानना है कि जितने में (नौ हजार एक सौ करोड़ रूपये) हमारी सरकार रूस से पुराना विमान बाहक पो...

फिर आज नया उल्फ़त का तराना है

Image
आओ, फिर आज नया उल्फ़त का तराना है, मेह की रिमझिम फुहार, मौसम वो पुराना है। किये थी कबसे हमें बेचैन , दिल की हसरत, लम्बी सैर पे जाने  का, उम्दा सा बहाना है। लिए संग चलेंगे चंद अल्फाज, प्रेम के अपने, जिगर पे लिखने को, इक नया अफसाना  है। दिल खोल के खर्च करेंगे, वक्त का हर लम्हा, समर्पण का  हमारे पास  अनमोल खज़ाना है। मुल्तवी पल 'परचेत', जुल्फों की घनेरी छाँव, बीत जाए सफ़र सकूँ से, महफूज ठिकाना है।  

पाक-अमेरिकी सांठ-गाँठ और हमारी नादानियाँ !

कितनी हास्यास्पद बात है कि २६/११ के शर्मनाक आतंकवादी मुंबई हमले, और उसके बाद की कार्यवाही में यह स्पष्ट हो जाने के बाद कि यह हमला पाकिस्तान की सरकारी तंत्र के द्वारा नियोजित था, जिस भारत को आक्रामक होना चाहिए था, वह कोने में बचाव की मुद्रा में खडा है, और जिस देश को इस घटिया हरकत के लिए शर्मशार होना चाहिए था, वह आक्रामक है ! अगर थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि बलूचिस्तान में भारत अपनी खुफिया एजेन्सी के मार्फ़त हस्तक्षेप कर रहा है, तो क्या हम पाकिस्तान को इतना भी टका सा जबाब नहीं दे सकते कि तुम अगर हमारे देश में पिछले ६० सालो से खून खराबा करते आ रहे हो, तो हम क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे ? हाल के शर्म-अल-शेख की बैठक के नतीजे और उसके बाद की पाकिस्तानी प्रतिक्रियाओं और वहाँ के अखबारों की मन-गढ़ंत कहानियो से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में वास्तविक शान्ति स्थापित करने के प्रति कितना गंभीर है ! हम शायद यह जानते नहीं, या फिर जान-बूझकर नादान बने रहते है कि अमेरिका एक ऐंसा स्वार्थी दूकानदार है जो मोहल्ले में सिर्फ उसे सलाम करता है, जो उसकी दुकान पर सामान खरीदने जाता है! आखिर ...

सूरज चाँद से मिला !

Image
आज तडके, दूर गगन में, एक अरसे के बाद, फुरसत से, सूरज अपनी महबूबा, चाँद से मिला, और कुछ पलों तक दोनों एक दूसरे को निहारते रहे, जी भर के ! भले ही उनका यह मधुर मिलन, देखने वालो को, खूब भा गया ! मगर सोचता हूँ कि, वो मिले तो आसमां में थे, फिर धरा पर क्यों, अँधेरा छा गया ? फिर सोचता हूँ कि हो न हो, ये आशिक अभी भी पुराने ख्यालातों के है, इनपर अभी तक, पश्चिम का जादू नहीं चला ! वरना इसतरह, रोशनी बुझाकर क्यों अँधेरे मे एक दूसरे को, प्यार करते भला ?

हर एक आम आदमी रोता है

जनतंत्र की शय्या पे हर रहनुमा , कलुषता की चादर ओढ़ के सोता है, सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में,   आज हर एक आम आदमी रोता है।   हुआ कर्तव्य गौण, प्रमुख आसन, निकम्मा, सुप्त पडा वृथा-प्रशासन, लाज बचाती फिर रही द्रोपदी, चीर-हरण  में  है मग्न  दुश्शासन।   धोये थे पग मर्यादा पुरुषोतम के , वही केवट अब दुष्ट-धूमिल पग धोता है, सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में, आज हर एक आम आदमी रोता है।   चुनाव  के नाम पर गड़बड़झाला, परिवारवाद का है  बोलबाला, इंसाफ़  न पाता  निश्शक्त मुद्दई , फरियाद न कोई सुनने वाला ! घोटालों  की परिक्रामी कुर्सी पर,  अलसाया दफ़्तरशाह सोता है,  सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में, आज हर एक आम आदमी रोता है।  शर्मशार हो रही पतित नैतिकता, शरमो-हया निगल गई नग्नता, संस्कृति नाच रही रात पबो में, सभ्यता बन गई समलैंगिकता ! जहां सब कुछ मंहगा, मौत है सस्ती, मुफ़लिस निज-शव काँधे रख ढोता है, सवा...

फालतू लोग बहुत है !

आज श्रावण मास का पहला सोमवार है, और सुबह से ही शिव मंदिरों में लोगो का तांता लगा है ! दूसरी ओर कांवड़ यात्रा, या यूँ कहूं कि शिव भगवान की महिमा का सड़क-प्रदर्शन अपने चरम पर है! कहीं लंबा ट्रको का जत्था शिव भगवान् का रथ बनकर, फिल्मी अंदाज़ में नाच-गान करता हुआ, समूचे यातायात को बाधित कर अपनी मस्त चाल में आगे बढ़ रहा है तो कहीं मोटर साइकिलों पर कुछ युवा कावडीये इस तरह उस जल कलश को ले जा रहे है कि उनमे से बारी-बारी से एक कावडिया कलश लेकर सड़क पर दौड़ता है, और उसके पीछे वो चार-पांच मोटरसाइकिल सवार दौड़ते है, सारे यातायात के नियम कानूनों को ताक पर रखकर ! चालान काटने में मुस्तैद दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के जवान भी आजकल किसी कोने पर बैठ सुर्ती फाँक रहे है ! यह सब देखकर मुझे अपने उस कुलगुरु पर बड़ा क्रोध आ रहा था, जिन्होंने मुझे बचपन में इस तरह के उटपटांग उपदेश सुनाये थे कि इंसान होने के नाते हमारा फर्ज है अपने कर्तव्य का उचित निर्वहन ! इस दुनियां में आजतक इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले, जिसमे कोई भगवान् अथवा परमात्मा इंसानों से यह कहता पाया गया हो कि तुम अपना कर्तव्य छोड़कर, मुझे खुश करने के लिए...

शर्म-अल-शेख का 'शर्म' !

मेरे ब्लॉग के प्रिय पाठक गण: ब्लॉग के उचित नियंत्रण और पाठको की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मैंने अपने दो अन्य ब्लॉग My Lyrics और Tirchhi Nazar को आज से इसी ब्लॉग में समावेशित कर दिया है ! साभार ! Godiyal हर जगह अपने को एक भला व्यक्ति शाबित करने की कवायद में, हमारे प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी यह भी भूल गए कि देश के अन्दर भले ही एक व्यक्ति का अपना निजी गौरव ज्यादा अहमियत नहीं रखता हो, किन्तु विदेश में राष्ट्र के गौरव का तो हम कम से कम थोडा बहुत ख्याल रख सकते है! यह हमारे लिए बड़े शर्म की बात है कि हम शर्म-अल-शेख में अपने उस दुश्मन देश के आगे झुके, जो अपनी घिनौनी हरकतों से पिछले ६०- ६२ सालो से इस देश के लाखों मासुमो का खून बहाने के लिए जिम्मेदार है, जिसने लाखो माताओं की गोदे सूनी की, जिसने लाखो महिलाओं का सिन्दूर उजाडा, वह भी तब जब हमारे पास इस बात के पुख्ता सबूत थे, कि वह पूरा देश ही, उस देश की सरकार ही तथा उस देश की सेना और खुफिया तंत्र ही २६/११ के मुंबई काण्ड का दोषी है ! सिर्फ २६/११ ही इन्होने किया होता तो एक बारी माफ़ भी किया जा सकता था, किन्तु हमारे पास तो पूरे ६० सालो का इ...

आया फिर सावन !

गूँज उठी खनखनाती घंटियाँ, जल उठे मंदिरों में दीप पावन।   घुमड़-घुमड़, गरज-गरजकर, आया चौखटों पर उदार सावन।  लग रहा तय समय खेतिहर की , इन्द्रदेव ने सुन ली  गुजारिश।  हो रही जरुरत के मुताविक, कही थोड़ी, कही अधिक बारिश।  जहां मुरझा गई थी कुसुम-कलियाँ, वहाँ आ गई अब रुत सुहानी। बाग़- बगीचे, खेत-खलिहान, हो गए  हैं सब पानी-पानी।  संचित नीर  ताल-पोखरों के , परिंदे पर फड़फड़ाकर नहाए।  मेढकी भी किसी हौद-कुण्ड से गीत, मधुर नया इक गुनगुनाए।  

किसलिए ?

पंक अद्भव हो रहा  चित , व्यग्र तुम्हारे किसलिए, वक्ष पर लिए फिर रहा  विद्वेष प्यारे किसलिए। छोड़ जाना है यहीं सब, द्रव्य संचय जितना करे , लगा घूमता पैबंद झूठ के फिर ढेर सारे किसलिए।       हर मर्ज का उपचार गर,  सिर्फ यह बाहुल्य होता,  अंततः सूरमा भी बड़े  होते बेचारे किसलिए।   धन का हर  मुहताज को,   नि:संदेह आसरा यथेष्ठ हैं, सिर्फ वैषभ्य की वजह से  वो रहें बेसहारे किसलिए।   खुदगर्जी की हद हमें  क्यों,  नींद से महरूम कर दे , दिवस को  तममय बनायें  तजकर उजारे किसलिए।  

लघु कथा- अच्छी खबरों वाला चैनल !

करीब दस साल पहले मेरी मिश्रा जी से पहली बार तब मुलाक़ात हुई थी, जब मैं अपने नए मकान में प्रवेश से पूर्व पुताई करवा रहा था, और वे मेरे मकान से कुछ दूरी पर स्थित एक प्लाट को खरीदने के विचार से उसे देखने वहाँ आये थे ! लघु परिचय में उन्होंने बताया कि वे एनआरआई है, और अमेरिका में रहते है! फिर मैंने उनसे पूछा था कि आप इनवेस्टमेंट पॉइंट आफ व्ह्यु से प्लाट खरीद रहे होंगे, तो उनका जबाब था नहीं, बुढापे के लिए खरीद रहा हूँ ! लेकिन आपने तो बताया कि आप अमेरिका में सेटल्ड है? मैंने फिर सवाल किया ! वे बोले, सो तो है, मगर वह हम जैसे लोगो के लिए बुढापे में रहने लायक जगह नहीं है, सोचता हूँ कि एक कुटिया इंडिया में बनाकर अपना बुढापा शांति से काटूं ! कुछ दिनों बाद उन्होंने वह प्लाट खरीद लिया था, और फिर वे मेरे घर पर आये थे, यह बताने कि उन्होंने वह प्लाट खरीद लिया है, और परसों वे वापस अमेरिका जा रहे है, अतः हम लोग उनके प्लाट का भी ध्यान रखे! मैंने उन्हें आस्वस्थ किया कि जब तक हम लोग यहाँ पर है, आप लोग बिलकुल भी चिंता न करे ! चाय की चुस्किया लेते-लेते उन्होंने अपने कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी हमे सुनाये, जो ...