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Showing posts from April, 2026

कुपत

तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे हम, तुम्हारे बाप के पास, घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि  बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।

Yकीं

  रात गहरी बहुत है मगर,  यकीं रखो, हम सोएंगे नहीं। तूम रुलाने की जितनी भी कोशिश कर लो,  रोएंगे नहीं, बेदना के पार्क मे सन्नाटे संग  खामोशी भी बैठी है 'परचेत', इसलिए किसी के बहकावे में आकर,  आपा खोएंगे नहीं।

बोल संस्करण !

हमने तो मरने को नहीं कहा था, अरे वो, हमें पत्थर दिल कहने वालों, जो पास है तुम्हारे उसी पे जी लेते, मुफलिसी ,  तंगदिली मे जीने वालों । बस, मेरे साथ सिर्फ इक मेरी गिला़ और तुम्हारे संग तमाम सिकवों का काफ़िला, मैं अभिभूत और ऐतबार पराजित, 'परचेत', यकीं रख, लम्बा न चल पायेगा ये सिलसिला। सिसकियां आई, हिस्कियां आई और पराज भी आए हैं, देहलीज पे तेरी, युवा आए और उम्रदराज भी आए हैं, अरे वो, हुस्न की मलिका, नागवार है इतराना तेरा, उम्र दराजी के तजुर्बे  में हमने  तो उन्हें भी देखा है,    कबूतर के चेहरे मे मु़डेरी पर जो बाज आए हैं। जो आज आनी चाहिए थी, वो तुम्हें आज आती नहीं, खुद को हुश्न की मलिका बताते हुए लाज आती  नहीं, हमने तो, तुम्हारे हुस्न की बस खैर मांगी थी, ऐ दोस्त! जो जवानी में न आ सके, वो उम्र दराज आती नही। न निशां पड़ते, न ही दाग होते, तले जिसके अंधेरा न होता,  ऐ काश! कि हम वो चराग होते, हम कहते, छुप लो बनकर प्यार हमारे इस सूने से दिल में, छुप लेते,अगर जो तुम राग होते।  

सवाल

किस राह मे गिर गया, अबे 'परचेत'  साले! फूल था और राह तूने अपनी कांटों की चुनी!

कबाब में हड्डी

अबे, पहले तो ये बता तू है कौन?  तुम जैसों के मुंह लगना मेरा चस्का नहीं, मेरी तो बीवी से भी बिगड़ी पड़ी है, चल हट, मुझे सम्हालना तेरे बस का नहीं।

श्रद्धांजलि!

वो बिन वजह हंसना तेरा,  वो बिन वजह रोना तेरा, जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी -मेरी कहानी है।  इक प्यार का नगमा.... #आशाभोंसलेविनम्रशर्द्दाजली!

बंदिशें ।

मायके ठहरने का वक्त बिटिया जानती है, ज्यादा न रुक पाएगी, हेमंत ऋतु भी आई, कल शिशिर भी वसंत संग चली जाएगी।

बताएं भी किसे?

  बेरुखी, खामोशी, यादों का बोझ, फेहरिस्त लम्बी है इस  तन्हाई की, अब क्या? उम्र कट गई 'परचेत' ,  राह तकते-तकते इक हरजाई की।

पुरानी यादें।

भले ही वो हैंगओवर मेरे  लिए कुछ ही पल का था, नशा मेरे प्यार का मगर, तीखा नहीं हल्का था, क्या बताऊं किस कदर उस नशे मे मैं खो गया, नशा जो पलभर के वास्ते तेरी आंखों से छलका था।

कुदरत

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परिंदों ने घर बसाया, बच्चों संग फुर हुए, निशानियां बसावट की मैं देख पाया था, अपने छोटे से आशियां में उनके लिए, जो मैंने भी इक छोटा सा नीड़ बनाया था।

बंदिशें अपनी।

रातें अक्सर ही मुझसे सवाल किया करती हैं,  और एक मैं हूं कि उनका जबाब ही नहीं देता, कभी नयन थकते थे, अब कदम थकनें लगे हैं, और कितना चल पाऊंगा, मैं हिसाब ही नहीं देता। जज़्बात ऐसे लगने लगे हैं  मानो ये जज़्बाती नहीं, जमाने की हसरतें और आदतें हैं जो जाती नहीं, अधजगी नीदं मे जुबां लगे है कुछ पढने को आतुर, और मैं हूं कि उसे पढ़ने को किताब ही नहीं देता। अनियमित नींदचर्या, स्लीपिंग डिसआर्डर कह लो, दर्द की कोई सीमा नहीं जितना सह सको, सह लो, डगमगाते कदम कहते हैं कि बहक जाने दो हमें भी, मगर 'परचेत' मौका-ए-बहकना ख्वाब ही नहीं देता।

सलाह

तू खुद ही से इकबार रूबरू तो हो जा, फिर जो कहना है, उसे आलेख लेना, अरे वो, कश्ती के मुसाफिर, उतरने से पहले, एकबार समन्दर तो जाकर देख लेना।