Sunday, April 12, 2026

बताएं भी किसे?

 बेरुखी, खामोशी, यादों का बोझ,

फेहरिस्त लम्बी है इस  तन्हाई की,

अब क्या? उम्र कट गई 'परचेत' , 

राह तकते-तकते इक हरजाई की।

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कुपत

तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे हम, तुम्हारे बाप के पास, घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि  बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।