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बढ़ता (एंटी) सोशल नेटवर्किंग: खतरे में यकीन का अस्तित्व !

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निहित स्वार्थों की वजह से  डिजिटल प्रौद्योगिकी  के  इस जटिल युग में  पढ़ा-लिखा इंसान, प्रौद्योगिकी का  इसकदर दुरुपयोग करने लगेगा  कि  मानव समाज में  'यकीन' शब्द की अहमियत को  ही खतरे में डाल दिया जाएगा, यह कम से कम मैंने तो शायद ही कभी सोचा हो।  सोशल मीडिया अथवा सोशल नेटवर्किंग साइट्स की सुगमता और  उपलब्धता ने  हमारे समाज में मौजूद तुच्छ प्रवृति के असंख्य लोगों के लिए समाज में अराजकता फैलाने के नए- नए घातक हथियार सरलता से उपलब्ध करा दिए है।  जोकि एक सभ्य समाज के लिए बहुत ही चिंता  का विषय होना चाहिए।        अभी पिछले एक हफ्ते में घटित, ऐंसी  ही चार घटनाओं का सचित्र वर्णन यहाँ करना चाहूंगा। १: केरल में हाल की  भीषण बाढ़ और तवाही से निपटने के लिए हमारे सेना, अर्द्ध सैनिक और पुलिस बलों के  वीर जवान जान पर खेलकर दिन रात जूझ रहे हैं। जहाँ एक ओर  वहां मौजूद बीएसएफ के जवान आदेश का इंतजार किये वगैर ही बाढ़ पीड़ितों की मदद क...