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Showing posts from July, 2013

बनाने वाले ने हमें भी अगर, ऐसा ऐ काश बनाया होता

बनाने वाले ने हमें भी अगर, ऐसा ऐ काश बनाया होता, किसी यूरोप की मेम को, हमारी भी सास बनाया होता।       गोरी सी इक जोरू होती,और हम वी.वी.आईपी भी होते,   हर मोटे रईस ने अपना, हमें खासमखास बनाया होता।     चाटुकारों की इक पूरी फ़ौज,चरण वन्दना में लींन होती, कहीं भी बेधड़क घुसने का,हमारा भी पास बनाया होता। कहाँ से कहाँ पहुँच जाते, फिर हम चूड़ी बेचने वाले भी , शहर के हर शागिर्द ने हमें, अपना ब़ास बनाया होता। ऐ बनाने वाले , भाग्य हमारा ऐसा झकास बनाया होता,  किसी यूरोप की मेम को, हमारी भी सास बनाया होता।    

हर गांधी में अगर हमने महात्मा न ढूढा होता !

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कुटिलता, संकीर्णता, स्वार्थ-परायणता, खुदगर्जी, अर्थोपार्जन अथवा भौतिक उपलब्धियों की दौड आज इस देश को इस मुकाम पर ले आयेगी, कभी सपने में भी नहीं सोचा था। व्यथित मन बस, मूक-दर्शक बनकर इर्द-गिर्द घटित होते वृत्तांत को सिर्फ अपने मानस-पटल पर संकलित किये जा रहा है। अब, आगे क्या होगा ? यह प्रश्न निरंतर एक गूढ़ पहेली की भांति संभावनाओं और आशंकावों का मकडजाल मन के किसी कोने में बुनने में व्यस्त है। असंयम, संयम पर निरंतर हावी होता सा प्रतीत होता है, और अन्दर की तमाम कसमसाहट शान्ति के अंतिम हथियार, यानि कलम उठाने को एक बार फिर विवश कर देती है।  कुछ साल पहले अपने इसी ब्लॉग पर फ्रांस की महान क्रांति से सम्बंधित एक लेख लिखा था।   उसको लिखने से पहले जब मैं उस क्रान्ति का अध्ययन कर रहा था, तो उस क्रान्ति  के  केंद्र में मुझे लोगों की भूख एक बारूद का ढेर और शाही परिवार का वह सवाल  कि 'खाने के लिए अगर राशन नहीं है तो ब्रेड क्यों नहीं खाते', उस बारूद के ढेर की तरफ जाती एक चिंग...

कार्टून कुछ बोलता है- दहशतगर्द भोजन !

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कार्टून कुछ बोलता है - इसने तो घास भी नहीं डाली !

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'चीड़-पिरूल' विद्युत और उत्तराखंड !

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अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हुए उत्तराखंड को लगभग तेरह साल हो चुके है। कौंग्रेस और बीजेपी ने यहाँ बारीबारी से राज किया। आज की तिथि तक कुल 2309 दिन उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार रही और 2330 दिन कॉग्रेस की। बीजेपी के चार मुख्यमंत्रियों क्रमश: सर्वश्री नित्यानंद स्वामी, भगत सिंह कोश्यारी, बीसी खंडूरी  और रमेश पोखरियाल ने राज किया, जबकि कॉग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों सर्वश्री एन डी तिवारी और विजय बहुगुणा ने यह सौभाग्य प्राप्त किया। लेकिन इसे उत्तराखंड का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि एक अलग राज्य बनने पर जो उम्मीदे और अपेक्षाए उसने संजोई थी, उसपर कोई भी राजनीतिक दल खरा नहीं उतरा। अक्सर हमारा तमाम तंत्र अपनी अक्षमता को छुपाने के लिए पर्याप्त धन और सुविधाओं के अभाव  का रोना रोता रहता है। लेकिन अगर इच्छाशक्ति हो, मन में अपने क्षेत्र, राज्य  और देश को सशक्त बनाने का जज्बा हो तो सीमित स्रोतों से सरकार को सालाना मिलने वाली आय भी राज्य के विकास में एक महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकती है। उत्तराखंड में चीड़ के जंगलों की बहुताय...

घुन लगी हत्यारन व्यवस्था !

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कल रात को टीवी पर खबरें देखते वक्त जब न्यूज एंकर ने दिल्ली के ग्रीनपार्क इलाके में एक ३३ वर्षीय डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता आनंद भास्कर मोरला की भरी  दोपहर बाज़ार में  एक नंगे बिजली के तार से करंट लगने से हुई दुखद मृत्यु का समाचार देते हुए यह कमेन्ट दिया कि देखा जाए तो  आनंद भास्कर की करंट लगने से मृत्यु नहीं बल्कि उनकी हत्या हुई है, और उसका हत्यारा हमारा यह  सिस्टम है, तो कुछ विचार मेरे मानसिक पटल पर उत्तराखंड त्रासदी के बारे में  भी कौंधे, जिन्हें यहाँ लिपिबद्ध कर रहा हूँ।  गत माह उत्तराखंड और तमाम देश के जिन लोगो ने उत्तराखंड की त्रासदी झेली, वे अभी भी उस सदमे से बाहर निकलने में असफल है। किन्तु हमारे इस तथाकथित महान लोकतंत्र की राजनीति के गिरगिटों के लिए तो मानो यह एक सुनहरे अवसर की भांति है, जो अपनी रंग बदने की शैली मे और निखार इसके माध्यम से लाने में जुटे हुए है। कोई पीड़ितों का हमदर्द बनकर उस जगह जाकर घडियाली आंसू बहा रहा है , तो कोई खबरिया टीवी चैनलों के कैमरों के आ...

कार्टून कुछ बोलता है- बधाई हो गुलामों, एक और युवराज.............. !

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लघु व्यंग्य- अरहर महादेव !

आपको शायद याद होगा कि जिस तरह आजकल टमाटर के दाम आसमान छूं रहे है, ठीक उसी तरह २००९ में अरहर की दाल के भाव भी ४३ रूपये से बढ़कर सीधे १०५ रूपये प्रति कीलो तक पहुँच गए थे । उसी वक्त मैंने यह लघु-व्यंग्य लिखा था ।  आज श्रावण मास के प्रथम सोमवार के अवसर पर दोबारा ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा हूँ, उम्मीद है आपको पढने में अच्छा लगेगा;            सावन का महीना शुरू हो गया है।  और यह बताने की शायद जरुरत नहीं कि इस पूरे मास में हिन्दू महिलाए प्रत्येक सोमवार को शिव भगवान की पूजा-अराधना कर व्रत (उपवास)रखती हैं ।  मंदिरों में शिव की पूजा-अर्चना की जाती है, तथा उन्हें श्रद्धा -पूर्वक ताजे पकवानों का भोग चढाया जाता  हैं ।    आदतन आलसी और अमूमन थोबडा सुजाकर, मुंह से आई-हूँ-हुच की कर्कश ध्वनि के साथ रोज सुबह खडा उठने वाला यह निठल्ला इंसान, उस रोज थोडा जल्दी उठा गया था ।  बरामदे में बैठ धर्मपत्नी के साथ सुबह की गरमागरम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अच्छे म...

गृह-स्वामिनी स्तुति !

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बजती जब छम-छम पायल, दिल होकर रह जाता घायल, सच बोलूँ तो है ये दिल नादां, तेरी इक मुस्कान का कायल। जैसा भी यह इश्क है मेरा, तेरे प्यार ने पाला है, अनुराग जताने का तेरा, हर अन्दाज निराला है। अंतर का प्यासा मतवाला, तुम बनकर आई मधुबाला,   ममस्पर्शी भाव जगाकर, साकी बन भरती रीता प्याला,  इक बेसुध को होश में लाई,प्रिये तू ऐसी हाला है, अनुराग जताने का तेरा, हर अन्दाज निराला है। देखी जो सूरत,गला सुराही, आकाश ढूढने लगा बुराई, मिलन की पहली रुत बेला पर, चाँद ने हमसे  नजर चुराई। खुसफुसाके कहें सितारे,कैसी किस्तम वाला है, अनुराग जताने का तेरा, हर अंदाज निराला है। आई जबसे हो तुम घर-द्वारे, दमक उठे सब अंगना-चौबारे, पूरे हुए, बुने वो मेरे नटखट, हर अरमां, हर ख्वाब कुंवारे। कांटे ख़त्म हुए गुलों ने,घर-दामन सम्भाला है, अनुराग जताने का तेरा, हर अंदाज निराला है। मिले तुम, अहोभाग हमारा, निष्छल ह...

बात गुजरे जमाने की !

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पट ब्याह हुआ था,  चट हुई थी मंगनी,     छब्बीस का मैं था,  बीस की जीवन संगनी। इक-दूजे से मन की बातें,हम हरबात को दिल से कहते थे,    मगर न जाने कमबख्त पड़ोसी,क्यों पिलसे-पिलसे रहते थे। आँखों ही आँखों में बातें,  जीने-मरने की सौगातें, दिन होते थे रोज सुहाने, और सलोनी होती रातें।  हम हरदम ही गोरी मुखडे पर, इक काले तिल से रहते थे, आलम ये था कि कमबख्त पड़ोसी, पिलसे-पिलसे रहते थे।        खेल खेलते सुर्ख लवों का,  बिंदी,माथे और भवों का, चंचलता की परिपाटी पर,  दौर था चलता कहकहों का।      अकेले कभी तन्हा पल में भी, हम भरी महफ़िल से रहते थे, मगर न जाने कमबख्त पड़ोसी, क्यों पिलसे-पिलसे रहते थे। हंसना,कभी रोना-धोना,   छत मुंडेर, आँगन का कोना, आलिंगन कर बाहों में,     मीठे-मीठे ख्व़ाब पिरोना।   एक नींव पर कभी इस...

जिनकी खुद की कोई प्रेरणा नहीं वो औरों के क्या प्रेरणास्रोत बनेगे ?

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देश की सड़कें तो पिछले कुछ दशकों से इस बात की आदी हो चुकी है कि रसूकदार लोगो के उनपर चलने के लिए न कोई कायदे कानून होते हैं और न ही कोई ट्रैफिक पुलिस के चालान का डर, इसलिए अब उन सड़कों को कोई शर्म जैसी चीज महसूस नहीं होती।  लेकिन छवि में दिख रहा स्कूटर अवश्य खुद को लज्जित महसूस कर रहा होगा कि न सिर्फ भारी भरकम शरीर वाला एक इंसान, बल्कि २०१४ में देश की सत्ता पर काबिज होने के प्रबल दावेदार एक बड़ी पार्टी के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर चुका व्यक्ति बिना हैलमेट उसपर सवार होकर देश के नियम-कानूनों को खुले-आम धत्ता बता रहा है।        

होते न गर तुम खुदगर्ज इतने !

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दर्द-ऐ -दिल चीज क्या है,तुमने ये न हरगिज कहा होता, एक कतरा गर सितम का, दिल ने  तुम्हारे सहा होता। ह्रदय-संवेदना की गहराइयों से, तुम यूं न होते बेखबर, इक पुलिंदा ख्वाहिशों का, कभी आंसुओं में बहा होता। बढ़ते न हरदम  फासले, होते न गर  खुदगर्ज  इतने,    हुजूम नाइंसाफियों का ये सारा,यूं न इतरा रहा होता।   कर डालते घायल जिगर, तुम तोड़कर हमारा   यकीं ,   बुरा जो हमने भी अगर,  कभी तुम्हारा चाहा होता।  वक्त के हर वार पे ये न भूलो, ढाल बनकर हम खड़े थे, वरना शोखियों का बुत तुम्हारा, एक पल में ढहा होता।     

एक महीना- त्रासदी उपरान्त !

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उत्तराखंड में आई प्रलय को एक महिना गुजर चुका। अमूमन यह होता है कि जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो देश के एक क्षेत्र विशेष को ही प्रभावित करती है। लेकिन शायद  मेरे जीवनकाल में तो कम से कम यह पहली घटना रही होगी, जिसने न सिर्फ उत्तराखंड अपितु समूचे देश के हर राज्य, यहाँ तक कि दुनिया को गहरे जख्म दिए। तीर्थ यात्रा और पर्यटन मौसम होने की वजह से देश और दुनिया के लोग उसवक्त  वहाँ पहुंचे  हुए थे।  इस आपदा में जिनके बिछड़ गए उन लोगो को अपनों के आने का अभी भी इंतजार है। यहाँ से मेरे भी चार सगे संबंधी सौ से अधिक लोगो के उस दस्ते में शामिल थे, जो १७ जून की सुबह केदारनाथ के दर्शन कर वापस लौट रहे थे, और जब वह जलजला आया। ये उनकी खुश किस्मती और ऊपर वाले की असीम कृपा थी कि वे चारों १७वे दिन वापस यहाँ पहुँच गए। सौ से अधिक में से सिर्फ बीस लोग ही वापस आ पाए।हाल ही में फोन पर बातों के दौरान वे बता रहे थे कि उनके अधेड़ उम्र पड़ोसी दम्पति इतने भाग्यशाली नहीं थे, और उनके घर वालों को आज भी उनके ल...

क्या से क्या हो गया !

निकम्मों को अब मुल्क लायक कहता है, राजकर्ता को प्रजा का सहायक कहता है,  खलनायक थे जो कभी  सभ्य-समाज के, उनको यह ज़माना अधिनायक कहता है। स्याह वेश,बीहड़ों के होते थे जो शहंशाह, समाज, व्यवस्था ने बदल दी उनकी राह। चटक पोशाक पहने घुमते  क्षद्म बेषधारी, अब  हक़ से लूटते है, तब लूट थी चाह। डाकू और दस्यु इनका उपनाम होता था, सर पर हर एक के मोटा इनाम होता था। पोशाक भले ही अपने अंगरक्षको को दे दी, किंतु करते वही हैं जो तब काम होता था।               जुबाँ पर इनके मुफ़्त उपहार के वायदे है, ठेंगे पर रखते, सरकारी नियम-क़ायदे हैं। चम्बल बनाके रख दिया बस्ती-नगर को,  असत चित में बसे, अनाचार के फायदे है। और अंत में ; ऐ खुदा !  हक़ हमको, हमारा कब मिलेगा, भ्रष्टाचार से,  देश को छुटकारा कब मिलेगा।  कश्ती जो फंस गई,  इस एक पापिनी भंवर में,  उस डोलती नैंय...

अदालती फैसलों से असहज परजीवी !

देर से ही सही, किन्तु लोकतंत्र के लिए नासूर बन चुकी राजनीतिक विद्रधि के उपचार हेतु हाल ही में हमारी न्यायव्यवस्था के कुछ ऐतिहासिक फैसलों से जहां एक ओर व्याधिग्रस्त राजनीति के स्वास्थ्य सुधार के प्रति धुंधली सी उम्मीद की किरण जगी है, वहीं दूसरी ओर कुछ परभक्षियों की रातों की नीद भी हराम हो गई है, और ये कुटिल रोग-विषाणु इस नव-अन्वेषित दवा का तोड़ निकालने में जुट गए है। जैसा कि विगत दिनों में हमने देखा कि देश की सर्वोच्च न्याय संस्था ने वर्षों से लंबित मामलों की सुनवाई करते हुए दो महत्वपूर्ण फैसलों में आपराधिक छवि के उन सभी परोपजीवियों, जिनपर गंभीर आपराधिक मामले तो दर्ज है, किन्तु वे चोरी और भ्रष्टाचार से इकट्ठा किये हुए धन और हराम के माल के सेवन से अर्जित बाहुबल के आधार पर साफ़ बच निकलते थे, ऐसे पराश्रयी, कामचोरों के लिए प्रजातंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं (संसद और विधानमंडल )में सुगमता से घुसने के चोर दरवाजों पर कुछ महीन कानूनी जालियों के अवरोध यह निर्णय देकर खड़े कर दिए है कि  अगर कोई प...

रमजान की राजनीति !

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सर्वप्रथम सभी को, खासकर मुस्लिम बंधुओं को रमजान के पवित्र मास  की हार्दिक मुबारकबाद ! मैं उपरोक्त विषय पर कुछ नहीं लिख रहा बस, नीचे एक फोटो और एक लिंक लगा रहा हूँ। और एक सवाल सभी बुद्धिजीवियों, खासकर मुस्लिम बुद्धिजीवियों से करना चाहूंगा कि  निम्नांकित को देखने-पढने से आप क्या समझे ?   १) मोदी के 'रमजान मुबारक' से तिलमिलाई कांग्रेस २) पिछले सोमवार को  सम्मलेन में इमामों का अभिवादन करती श्रीमती दीक्षित    चलते-चलते एक पुराना जोक: फुर्सत के पलों में हवाईजहाज और रॉकेट गप लड़ा रहे थे।  रॉकेट बड़ी-बड़ी छोड़े जा रहा था कि मैं चाँद पर जाता हूँ, मंगल पर जाता हूँ, अंतरिक्ष  में मै  तो ......   हवाई जहाज बीच में ही उसे टोकते हुए: अरे वो तो ठीक है यार।  जाने को तो मैं भी आसमान में बहुत दूर-दूर की सैर करता हूँ, किन्तु तू ये बता कि जब तू जमीन से आसमान  में जाता है तो एकदम सीधे कैसे ऊपर को उछल जाता है ? मुझे तो ऊपर उठने के लिए पहले रनवे पर बहुत दूर तक तेजी से दौड़ना पड़ता है ! ...

कहीं शतरंज की बिसात उल्टी तो नहीं बिछ गई, लालू जी ?

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अभी कल ही की तो बात है।  उच्चतम न्यायालय ने झारखंड की अदालत को चारा घोटाला कांड में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से संबंधित मामले मे फैसला सुनाने से रोक दिया था। इसे लालू प्रसाद यादव के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। लालू प्रसाद यादव की अपील पर कोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी। लालू प्रसाद ने इस बिनाह पर  निचली अदालत के न्यायाधीश के प्रति पक्षपात की आशंका व्यक्त करते हुए न्यायालय में दावा किया कि सुनवाई कर रहे निचली अदालत के न्यायाधीश, नीतीश कुमार मंत्रीमंडल के एक वरिष्ठ मंत्री के रिश्तेदार है। जब सुप्रीम कोर्ट का कल यह फैसला आया था तो कुछ अजीब सा मन हुआ था। हालांकि जो मैं सोच रहा हूँ, वह मेरी क़ानून के बारे में अल्प जानकारी की वजह से  यह संभव है कि शायद मैं गलत सोच रहा हूँ।     उक्त फैसले के बाद कल शायद लालूजी से ज्यादा खुश कोई और रहा हो, और वे मन ही मन सोच रहे होंगे कि क्या पटकनी दी है  उन्होंने। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस केस की सुनवाई के दौरान जो ऐतिहा...

वो जो कभी वादियाँ थी !

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डर लगता है वहाँ,  बिजलियों की  कडकड़ाहट से,  डर लगता है अब वहाँ,  बादलों की गडगड़ाहट से।  वीरान हुए खण्डहरों में,  नीरवता ही पसरी पडी है, डर लगता है वहाँ,  चमगादडों की फडफड़ाहट से। फिर कोई खतरे में है,  जो फ़ौजी फ़रिश्ते आ गए,  डर लगता है वहाँ, पग-बूटों की ठकठकाहट से।  फिर न जाने किसका  आशियाना जमींदोज हुआ, डर लगता है वहाँ, दरकते शैलों की धडधड़ाहट से।  सैलाब में प्रियजन खोये, नयनों के समक्ष जिसने, डर लगता है वहाँ,  उस बूढ़ी माँ की बडबड़ाहट से।     कुछ अभागे वो पात,  जो टूटे थे आंधी में ड़ाल से, डर लगता है उन, शुष्क पत्तों की खडखड़ाहट से।  वो जो दर-किवाड़ घर के,   बने थे  उजड़े दयार से,  डर लगता है अब उनपर, धीमी सी खटखटाहट से। वो सिसकिया जो गूंजती है,  वहाँ नदी के बीहड़ो में,    डर लगता है अब उस...

एक भावी गजल-चल तुझे भी झेल लेंगे !

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जो साल सडसठ ठेले है  हमने, चंद और भी ठेल लेंगे, बड़े-बड़े 'नमो'ने  झेले हैं हमने, चल तुझे भी झेल लेंगे। है नाउम्मीदी से तो बेहतर, कुछ नए से अरमां जगाएं, शतरंज के सब हैं खिलाड़ी, खेल नूतन फिर खेल लेंगे। हुआ अगर नहीं भी सुचारू, आने से  तेरे आवागमन,  है आदत हमें धकेलने की, मील चंद और धकेल लेंगे। सिवाए झेलने और ठेलने के, हमने किया भी तो  क्या ,      पापड़ ही पापड ही बेले है अबतक, कुछ और बेल लेंगे।  क्षद्मनिर्पेक्ष बनकर राष्ट्र अपना,लूट खाया है जिन्होंने,   सफल समझेंगे तुझे गर ये भी लोण,लकड़ी,तेल लेंगे।       विधर्मी आंच में 'परचेत', फुल्के सेक जाते खुदगरज,  सियासी इस दौर-ए-नफ़रत, हम मिलाप-ए-मेल लेंगे।          

आतुरता !

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आगमन पर मौसम-ए- बरसात, अगर एक पौधा  बरगद का जो मैं रोपूँ , तो  हर कोई यही कहेगा; 'पागल है, नीलगिरि के रोप, फायदे में रहेगा'।   

सुखी और लम्बी उम्र चाहिए? लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव लड़िये !

बहनजियों / भाभीजियों ! जी चौंकिए मत,  शीर्षक एकदम सही पढ़ा आपने। और ये नहीं कि इस रामबाण औषधि के बारे में आपको पहले से कोई जानकारी न हो। मगर क्या करे, ये कम्वख्त १२०० सालों की लम्बी गुलामी का विषाणु जो हमारी रगों में अन्दर तक घुसा हुआ है, पहले तो यह माँ-बाप को भयभीत करके उनके लाडलों को बीए, एमए करने पर मजबूर कर देता है और फिर ले जाकर खडा कर देता है किसी क्लर्क या चपरासी की भर्ती की लाइन मे, बस। यह कम्वख्त अधिकांश भारतीयों को इससे हटकर सोचने का वक्त ही नहीं देता, क्योंकि इसे तो ज्यादा से ज्यादा आम-आदमी पैदा करने में ही रूचि हैं, ताकि उन्हें यह अपने पसंदीदा, देश में मौजूद उन लुच्चे-लफंगे, जाहिल-गंवार और भ्रष्ट, महापुरुषों और महास्त्रियों के पेट का निवाला बनवा सके, जो इसके झांसे में न आकर स्कूल, कॉलेज जाने और आम-आदमी बनने के बजाये सीधे नेता बन गए।  बहनजियों / भाभीजियों ! प्लीज, मेरी आप से विनती है कि आप हमारे   जीजाजियों / भाईजियों को यह जरूर बोलिएगा कि अबके आपके इल...