Thursday, July 18, 2013

होते न गर तुम खुदगर्ज इतने !












दर्द-ऐ -दिल चीज क्या है,तुमने ये न हरगिज कहा होता,
एक कतरा गर सितम का, दिल ने  तुम्हारे सहा होता।

ह्रदय-संवेदना की गहराइयों से, तुम यूं न होते बेखबर,

इक पुलिंदा ख्वाहिशों का, कभी आंसुओं में बहा होता।

बढ़ते न हरदम  फासले, होते न गर  खुदगर्ज  इतने,   

हुजूम नाइंसाफियों का ये सारा,यूं न इतरा रहा होता।  

कर डालते घायल जिगर, तुम तोड़कर हमारा यकीं ,  

बुरा जो हमने भी अगर,  कभी तुम्हारा चाहा होता। 

वक्त के हर वार पे ये न भूलो, ढाल बनकर हम खड़े थे,

वरना शोखियों का बुत तुम्हारा, एक पल में ढहा होता।    

12 comments:

  1. बढ़ते न हरदम फासले, होते न गर खुदगर्ज इतने,
    हुजूम नाइंसाफियों का तुम्हारा,यूं न इतरा रहा होता।

    बेहतरीन और सटीक गजल.

    रामराम.

    ReplyDelete
  2. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल और अभिव्यक्ति .......!!

    ReplyDelete
  3. बहुत उम्दा,सुंदर गजल ,,,वाह वाह,,,

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

    ReplyDelete
  4. सुन्दर अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर..

    ReplyDelete
  6. सुन्दर अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete

कश्मकश

खुबसूरत सपने हमने भी सजाए थे, क्योंकि हम भी कभी फितरत वाले थे, पूरे न हुए वो अलग बात है, 'परचेत', मगर ख्वाब तो हमनें भी बहुत पाले थे...