दिनभर लडते रहे,
बेअक्ल, मैं और मेरी तन्हाई,
बीच बचाव को,
नामुराद अक्ल भी तब आई
जब स़ांंझ ढले,
घरवाली की झाड खाई।
बेअक्ल, मैं और मेरी तन्हाई,
बीच बचाव को,
नामुराद अक्ल भी तब आई
जब स़ांंझ ढले,
घरवाली की झाड खाई।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
रात गहरी है मगर यकीं रख, मैं सोऊंगा नहीं। तू, जितना मर्जी मुझे रुलाने की कोशिश कर, मगर, मैं तनिक भी रोऊंगा नहीं, बेदना बहुत है इस दिल में म...