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Showing posts from December, 2010

जिन बच्चों को झूठ सिखाया जाता है उनकी नस्ल हिंसक होती है - भगवान बुद्ध !

वैसे फिलहाल इस तरह का लेख लिखने के कदाचित मूड मे न था, किन्तु इन्सान के आस-पास जब कुछ घट्नाये ऐंसी जन्म ले लेती है, जो कहीं उसके मानस पटल पर कुछ उद्वेलित भाव छोड जायें, तो निश्चिततौर पर इन्सान अपने आन्तरिक भावों को नियंत्रण मे रख पाने मे दिक्कत महसूस करता है. और ऐसा ही कुछ मै भी महसूस कर रहा था. इस पावन-भूमि पर समय-समय पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया, और आज हम उन्हे भगवान के शीर्ष रखने की कोशिश इसीलिये करते हैं क्योंकि हजारों साल पहले उनके द्वारा सिखाया गया बौद्धिक, आद्ध्यात्मिक और व्याव्हारिक आचरण आज भी सौ प्रतिशत प्रसांगिक हैं, और समय की कसौटी पर एकदम खरा उतरता हैं. वो आज भी हमारे लिये प्रेरणास्रोत का काम करता है. भगवान बुद्ध भी अपने समय की एक ऐसी ही दिव्य, आलौकिक ह्स्ती थे, जिन्होने कहा था कि जिन बच्चों को झूठ सिखाया जाता है उनकी नस्ल हिंसक होती है . अभी कुछ दिनों पहले यानि १६ दिसम्बर, जिस दिवस को आज से ४० साल पहले भारत ने पाकिस्तान पर एक निर्णायक विजय प्राप्त की थी, और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश), पश्चिमी पाकिस्तान से अलग हुआ था, उसके बारे मे भारतीय मीडिया की वेब साइटों पर खास कु...

आगाज इक्कीसवीं सदी का !

नफ़रती जूनून मे सुलगता शिष्ट ये समाज देखा , अमेरिकी द्वी-बुर्ज देखे और मुंबई का ताज देखा।   आतंक का विध्वंस देखा कश्मीर से  कंधार तक , हमने ऐ सदी इक्कीसवीं, ऐसा तेरा आगाज देखा। सब लड़खड़ाते दिखे, यक़ीन, ईमान  धर्म-निष्ठा, छलता रहा दोस्त बनके ,हर वो धोखेबाज देखा। बनते हुए महलों को देखा, झूठ की बुनियाद पर, छल-कपट,आडम्बरों का, इक नया अंदाज देखा। नमक, रोटी और प्याज, आहार था जो दीन का , उसे खून के आंसू रुलाता, मंडियों में प्याज देखा। माँ दिखी अपने शिशु को, घास की रोटी खिलाती. बरसाती गोदामों में सड़ता, सरकारी अनाज देखा।   फक्र था चमन को जिस,अपने तख़्त-ए-ताज पर, चौखटे एक दबंग चंड की,दम तोड़ता वो नाज देखा। बयाँ  इन शब्दों  में करते  हो रहा अफ़सोस है , किंतु 'परचेत' अबतक तो हमने,सिर्फ जंगल-राज देखा। 

इस आतंकवाद को भी समझना होगा !

न सिर्फ़ देशभर मे अपितु पडोसी मुल्कों जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश मे भी विकीलीक्स के इस खुलासे के बाद कि आजादी के बाद से ही इस देश को नरक मे धकेलने वाले एक शाही परिवार को , देश के लिये हिन्दु आतंकवाद से कितनी चिन्ता हो रही है , तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गरम है। और खुद को दुनिया का स्वयंभु पुलिसवाला बताने वाला एक देश जहां इराक और अफ़गानिस्तान मे मुसलमानों को समूची मानवता का दुश्मन बताकर लाखों की तादाद मे बेगुनाहों की जान ले चुका, वह इस देश के मुसलमानों को शरीफ़ इन्सानों का खिताव देने से भी नही चूकता क्योंकि इस देश मे पिछले एक दशक के बम विस्फ़ोटों और आतंकवादी हमलों मे जिन हजारों बेगुनाहों और सुरक्षाबलों के जवानो की जानें गई, इनकी सोच के हिसाब से अमेरिकियों के मुकाबले उनकी जान की तो कोई कीमत ही नही थी। और वह सब हमले मुस्लिमों ने नही, "मुस्लिम आतंकवादियों" (मानो ए कही अलग दुनिया से टपके हो ) ने किये, इस देश के मुस्लिमों में से सिर्फ़ कुछ ही ने इन्हे लौजिस्टिक सपोर्ट प्रदान की थी, बस। सिमी और इन्डियन मुजाहिदीन के कैडरों मे जितने लोग भर्ती है, वे सब तो पाकिस्तान से आये हुए है, यहां क...

नवगीत- हम भारत वाले! (रिमिक्स)

साल २०११ चंद हफ्तों बाद हमारी देहरी पर होगा अत: आप सभी से यह अनुरोध करूंगा कि देश के वर्तमान हालात के अनुरूप इस रिमिक्स को खूब गुनगुनाये नए साल पर; करलो जितनी जांचे, आयोग जितने बिठाले, नए साल में फिर से करेंगे, मिलकर नए घोटाले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! आज पुराने हथकंडों को छोड़ चुके है, क्या देखे उस लॉकर को जो तोड़ चुके है, हर कोई है जब लूट रहा देश-खजाना, बड़े ठगों से हम भी नाता जोड़ चुके हैं, सुथरे घर, उजली पोशाके, कारनामे काले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! अभी लूटने है हमको तो कई और खजाने, भ्रष्टाचार के दरिया है अभी और बहाने, अभी तो हमको है समूचा देश लुटाना, देश की दौलत से रोज नए खेल रचाने, आओ मेहनतकश पर मोटा टैक्स लगाए, नेक दिलों को भी खुद जैसा बेईमान बनाए, पड़ जाए जो फिर सच,ईमानदारी के लाले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! करलो जितनी जांचे, आयोग जितने बिठाले, नए साल में फिर से करेंगे, मिलकर नए घोटाले ! हम भारत वाले, हम भारत वाले !! जय हिंद !

अहसास !

ये बताओ, तुम्हारे उस बहुप्रितिक्षित कुम्भ आयोजन का क्या हुआ, जो तुम्हारे हुश्न, मुहब्बत और वफ़ा की त्रिवेणी पर अर्से से प्रस्तावित था ? मैं तो कबसे अपने मन को इस बात के लिए प्रेरित किये था कि इस बार मैं भी संगम पर डुबकी लगा , जिगर के कुछ दाग धो ही डालूँगा ! अब तो यही सोचकर संयम पैरों तले से फिसलता नहीं कि प्रतीक्षा करवाना तुम्हारी पुरानी आदत है !!

दुनिया जाए भाड़ में !

ऑफिस के काम से मुंबई जाना हुआ। सुबह ११  बजे ही काम निपट गया। छोटा सा काम था, अत: आधे घंटे में ही निपट लिया। वापसी सवा तीन बजे की थी, अत: समय गुजारने के लिए सोचा कि मैरीन ड्राइव पास में है, क्यों न कुछ देर मैरिन ड्राइव पर चहल कदमी की जाए। सामने सड़क पार की और पहुँच गए। वैसे तो बीसियों बार उस सड़क से गुजर चुका  हूँ, मगर पैदल का आनंद पहली बार ले रहा था। वहां पत्थरों की आड़ में बहुत सी दिव्य-आत्माए बैठी थी, कोई घर से दफ्तर के बहाने निकला होगा तो कोई कालेज के बहाने, जिस तरह कतारबद्ध वे लोग बैठे थे, उससे यह भी अहसास हुआ कि मुंबई के लोग कितने अनुशासित है। अत: उन्हें देख मेरे  दिमाग में  थोड़ा सा पका आपके समक्ष पेश है ; लड़कपन  बिगड़ा  माँ-बाप के लाड में , यौवन, संग अंतरंग झाड की आड़ में, छूं  गए जब  कुछ बुलंदियां प्यार की,  जोरू आई और लग गए 'जर 'जुगाड़ में।   खैर, इसी का तो नाम जिंदगी है।