जाने कहाँ खो गया !
वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझको। नन्हें हाथों को चारपाई के पायों पर मारकर बजाया करता था जिन्हें शौक से , चांदी की वो एक जोड़ी धागुली, मेरे नामकरण पर, जो दे गए थे, मेरे नाना मुझको। वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।। बड़े चाव से खाता था, जिसपर, छांछ और झंगोरे का वो स्वादिष्ट पहाड़ी व्यंजन, 'छंछेड़ी' नाम था जिसका, कांस की वह रकाबी, बचपन में जिसपर दादी माँ परोसती थी खाना मुझको। वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।। यूं तो खोई हुई चीज के इसकदर, अनुरागी हम हरगिज न रहे, जिंदगी में उतार-चढ़ाव के मौसम, बहुत आये और गए, मगर, वो अपने पहाड़ी गाँव का मौसम, सांझ ढलते, आहिस्ता -आहिस्ता डूबता सूरज, घाटी से आगे खिसकता विशालकाय पहाड़ों का प्रतिविम्ब, जो बेइंतहां भाता था सुहाना मुझको। वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझ...