Posts

Showing posts from 2014

नूतन वर्ष की मंगलमय कामनाएं !

Image
शुभकामनाये और मंगलमय नववर्ष की दुआ !                                                   

नृशंसता का यथार्थ !

Image
नापाक  हरकते  कभी पाक नहीं होती , चालबाजी  कभी इत्तेफाक नहीं  होती , वास्ता दे-दे के जो अनुसरण करवाये , ऐसे मजहबों की कोई धाक नहीं होती।   बलात् भगत जितना भी बद्ध दिखाए, जहन किंतु श्याम वर्ण त्याग न पाए ,  क्रिया, मुख से जितना भी दम्भ  भरे, त्रासित छाती  कभी  चाक नहीं होती।   नियम,नियमावली ऐसे कामगार के,  तामील होती है ज्यूँ ,बेड़ियां  डार के , एक आजाद शख़्सियत वहाँ  होती है,  जहां बंदिशों की कोई ताक नहीं होती। अपने लिए तो बटोरा उस पार तक,  और दूसरों का छीना जीने का हक़ , नृशंसता की हर हद लांघी है फिर भी, शर्म से नीची कोई नाक नहीं होती। साये में जिंदगी कोई करामात ही है , मुकाम मिले तो वो भी खैरात ही है , अस्तित्व का सच तो ये  है 'परचेत ', अवसानोपरांत कोई ख़ाक नहीं होती। 

हुनर ने जहां साथ छोड़ा, सलीका वहाँ काम आया।

Image
इक ऐसा मुकाम आया,तोहमत छली का आम आया,  वंश-नस्ल का नाम उछला, गाँव ,गली का नाम आया।     हमी से सुरूरे-इश्क में , कही हो गई कोई भूल शायद,   मुहब्बत तो खरी थी हमारी,नकली का इल्जाम आया।   नजर से आके जब लगे वो, आशिकी का तीर बनकर,     खुशी की सौगात लेकर, पर्व दीपावली का धाम आया।    सत्कार काँटों  ने किया पर, थे हमारे ख्वाब कोमल, सीने लगूंगी फूल  बनके , इक कली   का पैगाम आया।   राग-बद्ध करने चला जब, प्रीति के दो लब्ज 'परचेत' , हुनर ने जहां साथ छोड़ा,  फिर वहाँ सलीका काम आया।

जोरू-दासत्व

Image
हुई जबसे शादी, जीरो वाट के बल्ब की तरह जलता हूँ,    यूं  तो पैरों पे अपने ही खड़ा हूँ मगर, रिमोट से चलता हूँ। माँ-बाप तो पच्चीस साल तक भी नाकाम रहे ढालने में, अब मोम की तरह बीवी के बनाये, हर साँचे में ढलता हूँ।   न ही काला हूँ, कलूटा हूँ,  न ही गंजा हूँ और न लंगड़ा हूँ , फिर भी उससे दहशतज़दा हूँ, उसकी नजरों में खलता हूँ।      डोर से बँधी इक पतंग सी बन कर  रह गई है जिंदगी ,   सब  ठीक हो जाएगा यही समझाकर दिल को छलता हूँ।   हकीकत तो ये है कि खुद कमाकर पालता हूँ पेट अपना , किंतु एहसास ये मिलता है,किसी के टुकड़ों पर पलता हूँ।    जोड़ी थी जिसने जन्मपत्री, बेड़ा-गरक हो उस पंडत का,    उजला भी काला दिखे अब तो 'परचेत',  आँखें मलता हूँ।    

'मनु' का इतिहास और दीमक की 'बाम्बी' !

Image
'कुतरा',  टुकड़ा-टुकड़ा बीजकों का, कुछ भी न बचा, दीमक 'अभिषेक ' खा गए, इतिहास 'मनु 'का रचा।   दंग रह गए देशभर के, तमाम लगान महकमे वाले,  बलाघात देने वालो को ही, धूर्त देना चाहते हैं गच्चा।   तारीफे-काबिल लगती है इनकी, ये हाथ की सफाई,    निन्यानबे के फेर में कमवख्तों ने,करोडो लिए पचा। दफ्तर था चार्टर्ड अकाउंटेंट का, या दीमक की बांबी,  देख दुर्गत वाउचरों की, न्यायतंत्र का भी माथा तचा।  निगला देश सारा,सालों कोलगेट, टूजी-ब्रश करते रहे,  सूबे का जब सुलतान बदला, कोहराम तब जाके मचा।      भविष्य उज्जवल नजर आता है इनका तो 'परचेत',      शठ-अपवंचक अगर दीमकों को, यूं ही देते रहे नचा।          

लघु-व्यंग्य:- गई भैंस एयरपोर्ट में !

Image
बड़े-बड़े दावे करने वाली मोदी सरकार की सुरक्षाखामियों की पोल आखिरकार खोली भी तो किसने,  भैंस ने।  यह सरकार खुद दिल्ली में बैठकर बड़े-बड़े वादे  कर  रही है, और यहां से करीब हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर भैंसे अतिसंवेदनशील इलाकों में अतिक्रमण पर आमादा हैं। भैस के दुस्साहस से खिंसियाई सरकार जहां अपनी सफाई में यह तर्क दे रही है कि चूँकि भैंस का रंग काला होता है, इसलिए एयरपोर्ट पर तैनात सुरक्षाकर्मी रात के अँधेरे में घुसपैठ रोकने में नाकामयाब रहे होंगे।  वहीं विपक्ष को भी बैठे-बिठाए एक गंभीर मुद्दा मिल गया है है और वह सरकार पर यह  तंज कसने से  बाज नहीं आ रही है कि जो सरकार एक काली भैस को न ट्रेस कर सके वह भला काले बुर्केधारी इसीस अथवा अलकायदा को क्या ख़ाक ट्रेस कर पाएगी।    उधर नाम न बताने की शर्त पर गुजरात सरकार के एक आलानेता ने आरोप लगाया है कि यह सारी घटना साजिशन हुई है।  भैस आजमखान साहिब की रही होगी और चूँकि आदित्यनाथ जी के आजमखान साहिब पर  हालिया बयान से वह खासा नाराज थी, अत:  लखनऊ से चुपके से प्रधानमन्त्री जी के ...

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये !

Image
सभी मित्रों, शुभचिंतकों को मंगलमय दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं अपनी इन चार पंक्तियों के साथ ; यूं ही खुशियाँ बिखेरे हर तीज-त्यौहार,  यूं ही मनती रहे दिवाली तेरे घर में रोज ।     निशा के तिमिर को नित डराता रहे,  तेरे घर के जगमगाते चरागों का ओज ।।  

कार्टून कुछ बोलता है - आह्वान

Image

कार्टून कुछ बोलता है - करे कोई, भरे कोई !

Image

तेरे इसरार पे मैं, हर हद पार करता हूँ।

Image
बयां यह बात दिल की मैं, सरेबाजार करता हूँ,  ख़ब्त ऐसी ये कभी-कभी ,ऐ मेरे यार करता हूँ।  (खब्त =पागलपन ) जबसे हुआ हूँ दीवाना,तुम्हारी मय का,ऐ साकी, उषा होते ही निशा का, मैं इन्तजार करता हूँ। अच्छा नहीं अधिक पीना,कहती हो सदा मुझसे,    तेरा इसरार कुछ ऐसा, मैं हर हद पार करता हूँ। (इसरार=आग्रह ) जो परोसें जाम कर तेरे, ठुकराना नहीं मुमकिन,  है अधम हाला  बताओ तुम , मैं इन्कार करता हूँ।  खुद पीने में कहाँ वो रस, जो है तेरे पिलाने में, सरूरे-शब तेरी निगाहों में,ये इकरार करता हूँ। करे स्तवन तेरा 'परचेत', लगे कमतर,ऐ साकी, ये मद तेरी सुधा लागे, मधु से प्यार करता हूँ।

बेवफ़ा

Image
तरुण-युग, वो कालखण्ड, जज्बातों के समंदर ने    सुहाने सपने प्रचुर दिए थे,  मन के आजाद परिंदे ने दस्तूरों के खुरदुरेपन में कैद  जिंदगी को कुछ सुर दिए थे।    और फिर शुरू हुई थी  अपने लिए इक अदद् सा  आशियाना ढूढ़ने की जद्दोजहद,  जमीं पर ज्यूँ कदम बढे  कहीं कोई तिक्त मिला, और कभी कोई शहद। सफर-ऐ-सहरा आखिरकार,  मुझे अपने लिए एक   सपनो की मंजिल भाई थी, पूरे किये कर्ज से फर्ज  और गृह-प्रवेश पर                संग-संग मेरे "ईएम आई" थी।             अब नामुराद बैंक की  'कुछ देय नहीं ' की पावती ही,  हाथ अपने रह गई,  हिसाब क्या चुकता हुआ   कि  वो नाशुक्र गत माह  मुझे अलविदा कह गई।    दरमियाँ उसके और मेरे  रिश्ता अनुबंधित था, वक्त का भी यही शोर रहा है,...

आस्था और श्रद्धा

Image
भावुक था विदाई पर  वहाँ पीहर पक्ष  का हर बंदा, किया  प्रस्थान  ससुराल , तज  मायका निकली नंदा। हुआ पराया  पीहर, छूटे रिश्तों के सब ताने-बाने, रूपकुण्ड से आगे पथ पर  साथ चले सिर्फ  "चौसींगा" वही जाने-माने।           Heavy Snowfall at Manali in the month of September रूठकर गई थी ससुराल वालों से,   और पीहर में थी  वह चौदह सालों से, बिन उसके शिव उदास,  लगता था घर उनको   सूना-सूना,खाली-खाली।  अब जब वह   वापस कैलाश लौटी,  इन्द्रदेव भी खुश हुए,   कुछ यूं मदद की शिव की,  सितम्बर में बनाया   दिसम्बर  का सा मौसम     और खूब बर्फबारी हुई, कल 'मना'ली।।   कैलास के लिए विदा हुई नंदा, छह खाडू गए साथ 'यमराज की गली' पार कर 12 हजार पहुंचे श‌िलासमुद्र इंसानों जैसी इन शिलाओं में छिपे हैं मां नंदा के रहस्य ...

जोग लिखी

Image
मंजुल  समर,शीतल बयार, सर्द जाड़े,  वन,हिमनद,गाँव-गलियन, खेत,बाड़े ।   ख़ुद बालपन हुआ संबल जिनसे कभी,  चीड़, देवदार, बुराँस वो सब वृक्ष छाड़े।     प्रकट उसमे भी था अग्रज  प्रेम होता,  जब लिया करते वो हमको  हाथ आड़े।    तरेरकर नयन,रूबरू होते थे जो कभी,   वो वैर-विद्वेष,गिले-शिकवे सब पछाड़े।  उदर वास्ते  सुरम्य हिमशिखर बिसरे,    पड़े निन्यानवे  के फेर में, गि न पहाड़े।  कोहलू के से बैल बनकर रह गए अब ,    हर रात बीते दारूण यहां, दिन दहाड़े।  बन गए ज्यूँ कि श्वान धोबी  का 'परचेत',  हुए कुटुम्ब से महरूम,मुलाज़मत  लताडे।   

नादाँ !

Image
थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,   रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।    तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,   हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए। उलटबासी  शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम, क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी, किस-किस से नहीं पूछा पता उसका, क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी,   सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,         लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,         उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ, जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी। 

कार्टून कुछ बोलता है : संसद को बंदरों से बचाने का अनोखा तरीका !

Image

मानव निर्मित बढ़ती त्रासदियां !

Image
पिछले  दो दिनों  में लगातार दो प्राकृतिक आपदाओं, एक  उत्तराखंड  और दूसरे  पुणे  ने  लगभग १६० जिन्दगियों  को पलभर में लील  लिया।  इसे प्राकृतिक आपदा कहने में  बड़ा आसान लगता है कि  जी बाढ़ आने , बादल फटने अथवा लैंडस्लाइड  की वजह से ऐसा हो गया ।  जबकि  कड़वी सच्चाई यह है  कि  ये मानव निर्मित आपदाए है।   बादल पहले भी फटते  थे, बाढ़ पहले भी आती थी  और लैंडस्लाइड पहले भी होती थी,  लेकिन सिर्फ कुछ ख़ास मौकों और  प्रकृति के अत्यधिक बिकराल होने पर ही  जन-धन की हानि होती थी।   आज की तरह हर कोस पर ज़रा सा  बारिश होने  या बाढ़ आने से ऐसा नुकशान नहीं हुआ करता था।  हम अगर इतिहास में  थोड़ा सा पीछे जाएँ तो  सन  १९७० में बिरही नदी पर  सन १८९३ में  बनी विशाल झील के टूटने ने  जो बिकराल रूप  उत्तराखंड  के चमोली से हरिद्वार तक धरा था,  और  भारी जन-धन की जो हानि उस जमाने  में हुई थी, कल्पना करके रूह काँप जाती है...

भारतीय परम्पराएँ और मार्क्स, मैकॉले तथा इब्न रुश्द के छद्म भक्त !

देख रहा हूँ कि मार्क्स, मैकॉले  और  इब्न रुश्द के मुखौटों में छिपे कुछ पश्चमी  दलाल  श्री दीना नाथ बत्रा जी की  किताब पर काफी हायतौबा  मचाये हुए हैं।  वेंडी डोनिजर की तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह से गलत किताब का बचाव करने के लिए तो ये स्वार्थांध  दौड़ पड़े थे, वह सिर्फ इसलिए क्योंकि मामला  एक  पश्चमी लेखिका से सम्बद्ध था। और जो उन अनेक भारतीयों की यह मानसिकता भी  दर्शाता है कि स्वदेशी को   फेंक देना चाहिए और अगर  कोई चीज पश्चिम से आ रही है तो उसे तुरंत आत्मसात  कर लेना चाहिए। वाह ! जिस प्रखरता  से आज ये कुछ मौकापरस्त  दीनानाथ जी की किताब के खिलाफ बोल रहे है,  मैं समझता हूँ कि  इन  मानसिक तौर पर दिवालिये लोगों को अगर ज़रा भी  अपनी सांस्कृतिक विरासत के  प्रति  लगाव और सम्मान होता तो यही  प्रखर विरोधी स्वर तब सुनाई देने चाहिए थे, यह प्रचंड विरोध उनका तब सामने आनी चाहिए था जब   वेंडी डोनिजर ने अपनी उस बकवास किताब में लक्ष्मण...

दिनचर्या

Image
जिंदगी के लम्हें,  छलकते हुए बेबस बीते हैं,  फिर भी अनुस्मरण भाण्डे,  जस के तस रीते हैं।     हमको भी नहीं मालूम,  गुजरा है वक्त किस तरह, मलाल दस्तूर बन गया ,  गश खाते है और कश पीते हैं।।    

चुनावी महाकुम्भ का आरती विसर्जन और …।

Image
और आखिरकार खत्म हो ही गया, चुनाव का एक और महाकुम्भ। हमेशा की भांति इस बार भी  लोकतंत्र के इस वैतरणी संगम पर बहुत से संतों और पापियों ने मोक्ष प्राप्ति की आस और अपने तमाम पापों को धोने की मंशा से  डुबकी लगाईं। यह  बात और है कि वैभव की चकाचौंध मे अंधे हुए अनेकानेक श्रद्धालूओं  ने  प्रयास तो अपने तमाम पापों को धोने का किया था, मगर इस शुद्धिकरण क़ी हड़बड़ाहट मे मेला-मार्ग  से गुजरते वक्त वो कितने और पाप अपने खाते मे हस्तांतरित कर गये, खुद भी नहीं जानते। आस्था ही जब अपने मूल से भटक जाये तो पथिक का राह भटकना तो स्वाभाविक ही है।   आजादी के बाद से ही  हालांकि समय-समय पर इस देवास्थल  के पुजारियों की करतुतों और कारगुजारियों से लोकतंत्र का यह पवित्र धाम कलुषित होता रहा है, किन्तु जितना पिछले एक दशक मे  देखने को मिला, मै समझता हूँ कि शायद ही इतना कभी पहले हुआ हो। गत दस वर्षों का यह कालखण्ड स्वतन्त्र भारत के इतिहास मे एक ऐसा दुरास्वप्...

ये मेरा शहर !

Image
खुद के दुःख में उतने नहीं डूबे नजर आते हैं लोग, दूसरों के सुख से जितने, ऊबे नजर आते हैं लोग। हर गली-मुहल्ले की यूं बदली  होती है आबहवा, इक ही कूचे में कई-कई, सूबे नजर आते हैं लोग। सब सूना-सूना सा लगे है इस भीड़ भरे शहर में, कुदरत के बनाये हुए, अजूबे  नजर आते हैं लोग।  कोई है दल-दल में दलता, कोई दलता मूंग छाती,  कहीं पाक,कहीं नापाक, मंसूबे नजर आते है लोग। बनने को तो यहां आते है सब,चौबे जी से छब्बे जी,  किन्तु बने सभी 'परचेत', दूबे नजर आते है लोग।  

कार्टून कुछ बोलता है- ऑफ़ सीजन डिस्काउंड सेल !

Image

एक और गणतंत्रदिवस और आशाओं-निराशाओं की आंखमिचोली !

Image
65 वें गणतन्त्र की  सभी देश वासियों  को हार्दिक शुभकामनाएं !  इस नूतनवर्ष  के प्रारम्भिक मास के उत्तरार्द्ध में हर वर्ष  की भांति, आइये इस वर्ष के लिए भी हम सभी मिलकर पुनः एक सुखमय और समृद्ध भारत का सपना सजोए, उसकी कामना करें । आज महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से देश का जन - जन किस कदर त्रस्त  है इसका अहसास सिर्फ  इसी बात से हो जाता है कि जनता को जिधर भी  इससे मुक्ति के लिए एक आशा की किरण नजर आती है वह वहीं उसे लपकने पहुँच जा ती  है।   वो बात और है कि  उसे हर तरफ निराशा ही हाथ नजर आती है।   तमाम देश और खासकर दिल्लीवासियों को भी एक ऐसी ही सुनहरी किरण नजर आई थी, किन्तु उसे लपकने के बाद दिल्लीवासियों को भी एक बड़ी निराशा के साथ शेक्सपियर याद आ गया।  उन्हें भी यही सबक मिला कि हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।  उम्मीदें सभी लगाए बैठे थे किन्तु  पिछले दिनों जो कुछ अपने आस-पास नजर आया उससे यही अहसास हुआ कि अगर चोरों के हाथ में सत...

सदी का सबसे छोटा ठट्ठा - 'आम-आदमी' !

Image
छवि गूगल से साभार ! अमूमन जब किसी चीज को उपहास, परिहास अथवा मजाक के नजरिये से देखा जाता है तो अक्सर कहा जाता है कि अमूक चीज उस ख़ास वक्त, साल अथवा सदी का सबसे बड़ा जोक  बन गया है।  लेकिन यहाँ बात इसके उलट है और मुझे ऐसा लगता है कि शायद ही इस सदी में कोई इससे भी छोटा जोक बन पाये और वह जोक है 'आम-आदमी'। वर्णमाला के मात्र पांच अक्षरों अथवा सिर्फ दो शब्दों का ठट्ठा (जोक )। आम के साथ इसे वक्त का क्रूर उपहास कहिये अथवा आम का दुर्भाग्य समझिये कि जिस आम का नाम आते ही मुंह में रस आ जाता था, आज निचले दर्जे के आदमी की महत्वाकांक्षा की वजह से उसी आम का नाम सुनते ही लोगो के मुंह में गाली आ जाती है।  उस वक्त दिमाग में एक ही ख्याल दौड़ता है कि अगर कमवख्त कच्चा मिले तो अचार ड़ाल दें और अगर पका मिले तो चूसकर फेंक दे। आदमी भी बखूबी जानता है कि ये आम महाशय भी कोई हलके में लेने वाली चीज नही है।  बड़े किस्म का आम तो फिर भी थोड़ा परिपक्व और गम्भीर होता है किन्तु ये जो छोटे कद का आम है, ये है बड़ी ही कुxx  चीज।   ठीक से नहीं सम्हाला तो कब कमवख्त फिसलकर रस और गुठली समेत सड़...

'रहें ना रहें हम महका करेंगे' ........... … श्रद्धांजली ।

Image
नैन-पलकों से उतरकर, गालों पे लुडकता नीर रोया, वो जब जुदा हमसे हुए तो, यह ह्रदय तज धीर रोया। मालूम होता तो पूछ लेते, यूं रूठकर जाने का सबब, बेरुखी पर उस बेवफा की,दिल से टपकता पीर रोया। तिमिर संग घनों की सेज पर,ओढ़ ली चादर चाँद ने, चित पुलकितमय मनोहारी, मंद बहता समीर रोया। देखकर खामोश थे सब, कुसुम , तिनके, पात, डाली,  खग वृक्ष मुंडेर, ढोर चौखट, चिखुर तोरण तीर रोया। अनुराग बुनते ही हो क्यों, 'परचेत' अपने  इर्द-गिर्द, विप्रलंभ अन्त्य साँझ पर वो,  देह लिपटा चीर रोया।    

कार्टून कुछ बोलता है -मौसेरा कथापुराण !

Image