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Showing posts from 2016

नूतन वर्ष की मंगलमय कामना !

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आप सभी को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं !

कार्टून कुछ बोलता है ; नाम बड़े और दर्शन छोटे !

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कशमकश !

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दिन-दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं, इस पार भी, उस पार भी, सब 'फेंकू' की सर्जिकळ स्ट्राइक के मारे हैं, इस पार भी, उस पार भी। तंग-ए-हाल, छटपटा रहे आज हर तरफ, जीव चोडे जबडों और मोटी चमडी वाले, क्रेडिटकार्ड से घर चलाना पड रहा, और   भरी तिजोरियों में लगे हैं मकड़ी के जाले।   खारे जल में घड़ियाली आंसू बहाने को  जहाँ -तहाँ ,मगरमच्छ भी बहुत सारे हैं, इस पार भी, उस पार भी, दिन-दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं, इस पार भी, उस पार भी।   थूक दिया करते थे जो कलतक इधर-उधर, पांच सौ - हजार रूपये का पान चबाकर, आज वो घंटों लाइन मे लगकर एटीएम  की,  खुश हो रहे हैं , पांच सौ- दो हजार पाकर।  इनकी घूल-धुलसित शक्ळें बता रही है    कि दुनिया में इनके जैसे भी वक्त के मारे हैं, इस पार भी, उस पार भी, दिन दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं, इस पार भी, उस पार भी। दुनिया तो दाल में काला ढूढ़ रही, मगर,  इनकी तो पूरी की पूरी दाल ही काली है, किसे पता था कि वक्त ऐ...

लघु व्यंग्य : हर पति के दिन फिरते हैं।

८ नवम्बर, 2016 की देर शाम को जब थका हारा  दिल्ली के दमघोटू यातायात से जूझता हुआ दफ्तर से घर पंहुचा तो बैठक मे मेज पर तुडे-मुडे ५०० और १००० रुपये के नोटों का अम्बार देख  एक पल को चौंक सा गया। लगा कि दुनियां का सबसे ईमानदार कहा जाने वाला तबका यानि आयकर विभाग के हरीशचन्दों की मंडली आज मेरे घर मे भी आ धमकी है, कि तभी किचन से हाथ मे पानी का गिलास लेकर धर्मपत्नी कुछ बडबडाती हुई मेरी ओर बढी। मैने अंदर से अशान्त होते हुए भी शान्त स्वर मे पूछा, क्या माजरा है ये सब, भाग् यवान ? मेरा इतना पूछना था कि यूं लगा मानों टिहरी डैम के कर्मचारियों ने डैम के सारे कपाट खोल दिये हों और डैम का सारा रूका पानी अपने पूरे बेग से देवप्रयाग की तरफ निकल पडा हो। बोली, अरे,  ये तो सचमुच का फेंकू निकला यार। कहता था, स्विस बैंक से ब्लैकमनी लाऊगा और १५-१५ ,लाख दूंगा सबको । कुछ देना लेना तो दूर, मैने तुम्हारी जेब से टपा-टपाके जो १०-१५ हजार रुपये  बटोर कर रखे थे, उन पर भी कम्वक्त ने आज सर्जिकल स्ट्राइक कर दी। मैं अभी भी दुविधा मे था, अत: मैने अपने धैर्य के बचे खुचे भन्डार...

हमने जो सोशल मीडिया पर छितराया

पैदाइशी गूंगों को भी भरी महफ़िल में मुह खोलते देखा है,   गम से भरे गिलासों में ख़ुशी को इंच-इंच तोलते देखा है, कौन कहता है कि हरतरफ सिर्फ झूठ का ही बोलबाला है,  हमने मयकदे में बैठे हुए हर शख्स को सच बोलते देखा है।  फुटपाथ पर सोया हुआ एक मजदूर  अचानक हड़बड़ाते हुए जागा, पास से गुजरते हुए मैंने  जब पूछा कि क्या हुआ ? मुस्कुराता हुआ बोला,  कुछ नहीं साहब, हम जैसे कमबख्त लोग  सपने भी तो उन महलों के देखते है,  जहां अमीरों को नींद नहीं आती।     हर मर्ज का इलाज न रखना,  असूल है दवाखाने का,  क्योंकि उसे भी ख्याल रहता है  'भ्रातृश्री' मयखाने का। शुभचिंतक जब ये समझा रहे थे कि बेटा, सब्र का फल मीठा होता है, तभी, जो खुशनुमा वक्त अपने साथ था, वो भी चुपके से निकल गया।   

शुभ दीपावली !

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Because.....

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नो इंट्री

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जाने कहाँ खो गया !

वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।    नन्हें हाथों को चारपाई के पायों पर मारकर बजाया करता था जिन्हें शौक से , चांदी की वो एक जोड़ी धागुली, मेरे नामकरण पर, जो दे गए थे, मेरे नाना मुझको। वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।। बड़े चाव से खाता था, जिसपर, छांछ और झंगोरे का वो स्वादिष्ट पहाड़ी व्यंजन, 'छंछेड़ी' नाम था जिसका,         कांस की वह रकाबी, बचपन में जिसपर दादी माँ परोसती थी खाना मुझको।  वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।। यूं तो खोई हुई चीज के इसकदर, अनुरागी हम हरगिज न रहे,  जिंदगी में उतार-चढ़ाव के मौसम, बहुत आये और गए, मगर, वो अपने पहाड़ी गाँव का मौसम, सांझ ढलते, आहिस्ता -आहिस्ता डूबता सूरज, घाटी से आगे खिसकता विशालकाय पहाड़ों का प्रतिविम्ब,   जो बेइंतहां  भाता था सुहाना मुझको। वक्त के थपेड़ों संग, न जाने कहाँ खो गया, बचपन में मिला था जो खजाना मुझ...

यत्र-तत्र बिखरे मोती

अमानत में खयानत की पगार पाकर खुश है जहां सिरफिरा,  यूं कि बदस्तूर जिंदगी का बस यही मजा,बाकी सब किरकिरा,  ज़रा पता तो करो यारों, ये बंदे कश्मीरी सब खैरियत से तो हैं, बड़े दिनों से घर-आँगन हमारे, कोई पत्थर नहीं आकर गिरा। कुछ उदास-उदास सा नजर आया इसबार,  मेरे मोहल्ले की गली मे भरा बारिश का पानी, यूं कि  मां-बापों ने मोबाइल  थमा दिये हैं कागज की नाव बनाने वाले नौनिहालों के हाथों मे । ये नींद भी कमबख्त, माशुका सी बन गई है , बुलाते रहो, मगर बेवफा रातभर नहीं आती। जो 'AAPकी' नीयत साफ होती, तो साथ आपके जनता, अपने आप होती, न ही लुच्चे खुद को आमआदमी कहते, और न ही लफंगौं की मनमानी खाप होती। खूंटा कहीं कोई उखडा हुआ पाता हूं, अपने दिल के दरीचे मे जब कभी, समझ जाता हूं, आजाद हो गया तेरा कोई ख्याल, जो मैने बांधे रखा था। निमन्त्रण दे रहा हूं उनको,  जिन्हें गुरूर है अपनी बेशुमार दौलत पर, कभी वक्त निकाल, मेरे साथ चलना, बादशाहौं का कब्रिस्तान दिखा लाऊगा ।

समाजपट

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आजकल यदा-कदा  छिटपुट  दो चार लाइने शोसल मीडिया पर ही पोस्ट कर संतुष्ट हो जाते है।  अपनी उन कुछ काव्यपंक्तियों , शेरो इत्यादि  को यहाँ  ब्लॉग पर बटोर रहा हूँ ;    उपस्थित मित्रगण हमारी बेसब्री और झुँझलाहट का मजा लिए जा रहे थे, हमारी नजर उनके अंदाज पर थी और वो हमें नजरंदाज किये जा रहे थे। चिकनी चुपडी बातें कर, मैने भी बिठाया अपनी भोली सी बीवी को सर, 'इन्टरनेशनल वीमन डे' पर । अंतराष्टीय महिला दिवस पर समर्पित:- अगर आपके घर के अगले गेट के बाहर से बीवी चिल्ला रही हो और पिछले गेट के बाहर से आपका कुक्ता भौंक रहा हो तो ग्यानी लोग कह गये कि पिछला गेट खोलो, क्यौंकि कुत्ता अन्दर आ जाने के बाद चुप हो जायेगा । अग्रिम छमा :-) कलयुग मे यही हस्र होना था, काठ के उल्लुऔं का, कुछ हमारी ही मूर्खता थी, कुछ जमाना बना गया । पानी फ्री मे पी गये जमुना का, डालके दिल्ली के घडे मे कंकर, और जीने की कला भी सिखा गए, श्री-श्री रवि शंकर । कुछ लुच्चे, लफ्गौं की छीना-झपटी मे जब एक "पहाडी घोडा" अपनी टांग गंवा बैठा, तभी जा के ये अहस...

परिणीत सफर, रजत मुकाम

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सुभग, सौम्य  मेहरबाँ  रब था,   चरम पे अपने यौवन जब था।  जब होता मन चपल-चलवित,  पुलकित होता हर इक लब था,  जब बह जाते कभी जज्बातों में,  अश्रु  बूँदों से भर जाता टब  था।  चरम पे अपने यौवन जब था।       प्रफुल्लित, उल्लसित आह्लादित, गिला न शिकवा, सब प्रसन्नचित, पथ,सेज न पुष्पित, कंटमय थे,  किंतु विश्रंभ सरोवर लबालब था। चरम पे अपने यौवन जब था।। नित मंजुल पहल दिन की होती,  निशा ताक तुम्हें, चैन से सोती, हुनर समेट लाता छितरे को भी,  अनुग्रह,उत्सर्ग,अनुराग सब था। चरम पे अपने यौवन जब था।                                                                 दाम्पत्य सफ़र स्वरोत्कर्ष सैर, मुमकि...

अनलमय देव-भूमि

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धन्य-कलयुग

है अनुयुग समक्ष, सकल संतापी, त्रस्त सदाशय, जीवन आपाधापी,   बेदर्द जहां, है अस्तित्व नाकाफी,   मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।    दिन आभामय बीते, रात अँधेरी, लक्ष्य है जिनका, सिर्फ हेराफेरी,  कर्म कलुषित, भुज माला जापी,  मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।   कृत्य फरेब, कृत्रिम ही दमको, पातक चरित्र, सिखाता हमको ,    अपचार की राह है, उसने नापी, मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।       धूर्त वसूले, हर बात पे अड़कर, शरीफ़ न पाये, कुछ भी लड़कर , व्यतिरेक की आंच, उसने तापी,   मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।  

मेरे लिए तुम....

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मय-साकी-रिन्द-मयखाने में, आधी भी तुम, पूरी भी हो,   हो ऐसी तुम सुरा खुमारी, 'मधु' मुस्कान सुरूरी भी हो।  मंथर गति से हलक उतरती, नरम स्वभाव, गुरूरी भी हो.      आब-ए-तल्ख़ होती है हाला, तुम मद्य सरस अंगूरी भी हो।     जोश नजर शबाब दमकता,   देह-निखर, धतूरी भी हो,    खान हो जैसे हीरे की तुम,  सिर्फ नूर नहीं, कोहिनूरी भी हो।     था जीवन नीरस तब तुम आई ,  नहीं मांग निरा, जरूरी भी हो,      अकेली केंद्र बिंदु ही नहीं हो, तुम मेरे घर की धूरी भी हो।  

तजुर्बा

    बेशक, तब जा के आया, यह ख़याल हमको, जब दिल मायूस पूछ बैठा, ये सवाल हमको। हैं कौन सी आखिर,  हम  वो काबिल चीज़ ऐसी, करता ही गया ज़माना, जो इस्तेमाल हमको। लाये तो हम थे किनारे,कश्ती को आँधियों से , किन्तु सेहरा सिर उनके चढ़ा, बबाल हमको। ऐ जिंदगी, तूने हमें यूं सिखाया,जीने का हुनर, 'उदीयमान'* मिला उनको, और ढाल* हमको। शिद्दत से निभाते रहे हम, किरदार जिंदगी का, रंगमंच पर मुसन्न* चढ़ा गए, नक्काल हमको। जाल में जालिम जमाने के, फंसते ही चले गए, धोखे भी मिले 'परचेत', क्या बेमिसाल हमको। उदीयमान = प्रगति  ढाल - ढलान  मुसंन = जबरदस्ती     

बस यूं ही

जहां आज भी ज़िंदा हैं गुरुकुल, उसे अवध की सरजमीं कहते है, जोखिम उठा, मेहनत से कमाकर जो खाए उसे उद्यमी कहते हैं, किन्तु बदलती इस सभ्यता के दौर का एक सच यह भी है कि   जो गद्दार व मुफ्तखोर है वो आजकल अपने को 'कमी' कहते हैं। बागों के बंदोबस्ती दरख़्त हमारे भी सारे फलदार होते, लॉकर, बोरिया-बिस्तरों में भरे हमने भी  कलदार होते, फिर तेरी ये हेकड़ी  कौन सहन करता, ऐ टुच्ची नौकरी,    जो  कहीं  हम भी सियासी तहसील के तहसीलदार होते।   

कार्टून कुछ नही बोलता !

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यह देश कब जागृत और परिपक्व होगा ?

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अभी हाल ही में एक अखबार की आरटीआई के उत्तर में रिजर्वबैंक  के जबाब से यह  खुलासा हुआ था कि सरकारी क्षेत्र के  बैंकों ने पिछले ३ सालों में १.१४ लाख करोड़ की डुबन्तु ऋण ( Bad Debts) की रकम बट्टे खाते में डाली है। इसे लुप्त भार (Charge Off ) के नाम से भी जाना जाता है,  जिसका वार्षिक विवरण इस प्रकार है ; लोकसभा को दी गई जानकारी के हिसाब से सन २०१३ में बैंकों ने कुल २७२३१ करोड़ की ऎसी  रकम बट्टे खाते में डाली थी। इसी तरह २०१४ में ३४४०९ करोड़ और २०१५ में ५२५४५ करोड़ बट्टे खाते में डाली गई।  यहां यह जानना अत्यावश्यक है किसी भी  रकम अथवा ऋण को बट्टे खाते में डालने के लिए बैंको के  लिए कुछ नियम, कुछ प्रकियाएं हैं। और इन नियमों तथा परिक्रियाओं  के तहत किसी भी रकम अथवा ऋण को  गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (non-performing asset ) घोषित करने और उसके बाद उसे  bad debts मानकर बट्टे खाते में डालने में लगभग ३ साल लग जाते है।   यहां यह भी स्पष्ट  कर देना उचित रहेगा कि बैंकों द्वारा अपने इन अप्राप्य...

इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी - १

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इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी  - १  यह एक सर्वविदित सत्य है कि  तीन लम्बी गुलामियत का दंश झेल चुका इस मुल्क का वह प्राणी जो सुबह से शाम तक का  अपना वक्त सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के जुगाड़ में ही व्यतीत कर देता है, उसके दिल में जाति, धर्म और सम्प्रदाय से परे, एक ख़ास किस्म का मक्कार वर्ग, अपने द्वारा पैदा की गई  एक ख़ास किस्म की दहशत की पैठ बनाने में  हमेशा सक्षम रहा है।   इसी का नतीजा था कि पड़ोसी मुल्क  के कुछ दहशगर्द  बेख़ौफ़ एक नीली बत्ती लगी गाड़ी के माध्यम से पठानकोट के वायुसेना बेस में घुस गए और हमारे १०  वीर जवानो को अपने प्राणो की आहुति देनी पड़ी। अब सवाल यह उठता है कि आम जनता को बड़ी-बड़ी नसीहतें देने वाला यह वर्ग-ए-तहज़ीब-ए-वीआईपी, क्या खुद अपने लिए यह नियम बनाएगा कि आज  के बाद से हर वीआईपी वाहन को उसके मार्ग में पड़ने  वाले किसी भी सुरक्षा चेक-पोस्ट पर चेकिंग करवाना अनिवार्य होगा और  ऐसा न करने पर सुरक्षा चेक-पोस्ट पर तैनात सुरक्षा-कर्मी को उसके उल्लंघन कर्ता चालक को देखते ही गोली मारने क...