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Sunday, April 14, 2013

लघु कथा:-'पराधीन सपनेहु सुख नाही।'



         
स्कूटर और उनकी पत्नी स्कूटी शहर के उत्तरी हिस्से में सरकारी आवास संस्था  द्वारा निम्न आय वर्ग के लोगो के लिए ख़ासतौर पर निर्मित और बसाई गई एक कालोनी में पिछले एक दशक से रहते थे। उनकी कालोनी के ज्यादातर निवासी दिनभर दौड़-भागकर इधर से उधर बोझा ढ़ोने का काम करके अपनी रोजी चलाते थे। स्कूटर दम्पति समेत कालोनी के तमाम वाशिंदे यूं तो बहुत सुखी नहीं थे,  किन्तु फिर भी दो जून को  भरपेट मिल जाता था , बस यूं समझिये कि उसी में सुखी रहने की भरपूर कोशिश करते रहते थे।

लेकिन पिछले एक साल से , जबसे उनके पड़ोस में उनके एक नए पड़ोसी, बाइक मियाँ और उनकी पत्नी लूना आकर रहने लगे थे,  स्कूटर जी थोड़ा परेशान चल रहे थे। और उनकी परेशानी का सबब बने थे, खुद  उनके ये नए छरहरे बदन, सुडौल कद-काठी एवं खुशमिजाज, दिल-फेंक बाइक मियाँ। जीवन  की अधेड़ दहलीज पर पहुँच चुके तोंदू स्कूटर मियाँ को न जाने क्यों ऐसा लगता था कि उम्र में उनसे काफी छोटी और कमसिन उनकी बीवी स्कूटी को उनका यह नया आशिक मिजाज पड़ोसी,  बाइक मिंया गली में और सड़क पर आते-जाते लाइन मारता रहता  है। एक बार सोचा  कि  इनकी बीवी से जाकर शिकायत करूँ किन्तु फिर यह सोचकर रुक गए कि उन्हें लगता था कि  चूंकि लूना गरीब मोपेड खानदान से बिलोंग करती थी इसलिए शायद बाइक से दबी रहती थी, उसकी  बाइक पर खास नहीं चलती होगी।    

स्कूटर जी  इन बाइक मिंया की वजह से अक्सर टेंशन में ही रहने लगे थे। चैत मास  के अंतिम पखवाड़े की एक  भरी दोपहर, अपने घर के बाहर गली में पहले से खडी श्रीमती स्कूटी के बगल में कहीं से आकार स्कूटर जी भी खड़े हो गए थे और इससे पहले कि वे अपनी श्रीमती से कुछ कहते, श्रीमती जी ने ही व्यंग्य-बाण छोड़ते हुए पूछा " मेरे तोंदू जानेमन, कहाँ से आ रहे हो हांपते हुए ?" स्कूटर जी भी उसी व्यंगात्मक अंदाज में बोले,"हां, जानेबहार, अब उम्र हो गई है हमारे हांफने की, क्या करें, सब वक्त का तकाजा है। हाँ, तुम तो अभी जवान हो, खूब दौड़ो, फुदको , ये वक्त तुम्हारा है।" श्रीमती  स्कूटी तुरंत भांप गई कि  उनके शायर पतिदेव महाराज सेंटिमेंटल  हुए जा रहे है, अत: उसने झट से बात को घुमाते हुए स्कूटर जी से एक शेर सुनाने की फरमाइश कर डाली। स्कूटर महाराज भला कहाँ बीवी की फरमाइश को अनसुना करते, अत: उन्होंने भी तुरंत एक शेर उसकी खिदमत में हाजिर कर दिया;          

महलों के मालिक हो गए हैं लफंगे, चरस,गांजा,जाम बेचकर,
मिलता नहीं भरपेट कुलीन को,  मेहनत अपना काम बेचकर।
दर-दर भटक रहा आज, हृदय विदीर्ण आमआदमी इस देश में, 
किंतु खूब ऐश कर रहे हैं गांधी, शठ- कुटिल तेरा नाम बेचकर।।  

काफी देर तक इरशाद-इरशाद और वाह-वाह कर चुकने के बाद स्कूटी ने शहर में बढ़ती अव्यवस्था और अराजकता का एक नया राग छेड़ दिया। स्कूटर महाराज जी को तो बस कोई टोपिक चहिए होता है अपनी भड़ांस निकालने को, अत: फिर शुरू हो गए; अरे, भाग्यवान, ज्यादा दूर क्यों जाती हो, अपने इस मोहल्ले में ही देख लो न। अगर कहीं से एक चार पहिये वाला अथवा वाली आकर खडी  हो जाए, तो दुपहियों का गली में आना-जाना दूभर हो जाता है।......... तो तुम क्या सोचते हो  कि  सरकार निम्न आय वर्ग वालों की कलोनी में भी तीस फुट चौड़ी गली छोडती? स्कूटी ने टोकते हुए पूछा।....... हाँ, क्यों नहीं, अगर प्लानिंग में समझदार लोग बैठे हों तो वो सौ साल आगे तक की सोचकर प्लान बनाते है, और तुम तो जानती ही हो कि आजकल तो एक झुग्गी वाला भी कार रखता है। ज़रा अंग्रेजों के जमाने में झांककर देखो तो मालूम पडेगा कि वे जो भी प्लान बनाया करते थे , सौ-दो सौ साल आगे की बात सोचकर बनाते थे। और एक ये आज के प्लानर है, साल भर में ही इनकी प्लानिंग की हवा निकल जाती है। अब सारे ही रिजर्व कोटे और डोनेशन देकर बने प्लानर भर्ती करोगे तो यही सब होगा न । अब पिछले साल का ही वाकया देख लो, अपने मोहल्ले के बुजुर्ग एलएम्एल जी की धर्मपत्नी वेस्पा के सिरदर्द हुआ था और वे डोनेशन से बने डाक्टर झोलाछाप के पास गई तो उसने उनके सिर  पर ही इंजेक्शन घोप दिया था। 

स्कूटर दम्पति के बीच घर के बाहर गली में जिस जगह पर यह गुफ्तगू चल रही थी, वहाँ वे आपस में थोड़ा फासला बनाकर खड़े थे, यानि कि  मिंया-बीवी आपस में एक दूसरे से सटकर खड़े  नहीं थे, उनके बीच में काफी फासला था।  और  स्कूटर जी के बोलने का क्रम तब अचानक टूट गया जब कहीं से आकर उनका पड़ोसी बाइक उनके ठीक बीच में खडा हो गया था, मानो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में हो। पहले से ही उनसे जले-भुने बैठे स्कूटर महाराज जी यह देख अपना आपा खो गए और उन्हें अपशब्द कहने लगे।  

बाइक मिंया में एक और खासियत उस वक्त नजर आयी जब स्कूटर जी की तरह उन्होंने अपना संतुलन नहीं खोया और अपशब्द  सुनने के बाद भी शांत स्वर में मुस्कुराते हुए स्कूटर महाराज जी को समझाने लगे कि देखो स्कूटर मियाँ, आप हमारे से सीनियर हैं, इसलिए हम आपका सम्मान करते है। मुझे लगता है कि आप किसी गलतफहमी का शिकार हो गए है। आप कृपया मेरी दो बातों पर गौर फरमाइयेगा; पहली तो यह कि इस दुनिया में तमाम चीजे सिर्फ अपनी मर्जी के मालिक नही होते। हर कोई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर किसी दूसरे  के द्वारा ही गवर्न (संचालित) होते हैं। अब अपने बुजुर्ग मुखिया माननीय मौन सिंह को ही देख लीजिये, कौन सी पावर नहीं है उनके हाथ में आज, किन्तु उनकी बेचारगी देखिये, रिमोट किसी और के हाथ में है। इसलिए आपका यह सोचना कि  मैं खुद आकर आप पति-पत्नी के बीच में खडा हो गया, सरासर गलत है। दूसरी बात, आप मुझे एक समझदार गृहस्थ लगते है, इसलिए कह रहा हूँ कि घर के अन्दर आपका दाम्पत्य जीवन कैसा है इससे किसी को कुछ सरोकार नहीं, किन्तु जब घर से बाहर गली अथवा सड़क पर हो तो दूसरों की नजरों में अपने सांसारिक संबंधों  में इतना फासला मत रखिये कि पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे को खड़े होने की जगह मिल जाए।                                

अचानक स्कूटर जी के पिछवाड़े पर किसी के पैर के तलवों का एक जोर का झटका सा पड़ा  और स्कूटर जी फट-फट की आवाज करते हुए जाग गए। अरे, तो क्या मैं यह एक सपना देख रहा था? आँखे मलते हुए स्कूटर जी सोचने लगे, किन्तु वे सपने में बाइक मिंया के मुह से समझदारी की बातें सुनकर,मन ही मन उनकी वाकपटुता के कायल हो गए थे। पल भर बाद जब स्कूटर महाराज जी अपनी गली से बाहर निकल रहे थे तो बाइक मिंया को उन्होंने उसी स्थान पर खड़े पाया जहां वे अक्सर खड़े हुआ करते है। कभी जो बाइक मियाँ उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते थे, आज  स्कूटर जी ने एक मुस्कराहट भरी नजर बाइक मिंया की तरफ बिखेरी थी  और जाते-जाते उन्हें टाय (बाय) कहना नहीं भूले। बाइक मियाँ, स्कूटर महाराज के व्यवहार में इस अचानक आए बदलाब से हैरान थे।          

Tuesday, March 19, 2013

कहानी - भाग्य अपने हिस्से का !




"सॉरी, गोंट टु गो, आई वेस्टेड सो मच आफ योर टाइम।" हल्की सी कराह खुद में समेटे ये भारी-भरकम स्वर जब कानो में पड़े तब जाकर यह अहसास हुआ कि साथ में कोई अजनबी बैठे हैं। मोटी, घनी और घुमावदार सफ़ेद मूछों से सुसज्जित उस रौबीले चेहरे पर एक नजर डालने के उपरान्त मैं कहना चाहता था, "प्लीज स्टे अ लिटिल लौंगर" किन्तु न जाने क्या सोचकर मैंने खुद को रोक लिया था। 


डग धीरे-धीरे एक ख़ास दिशा में बढ़ाते, उम्र के तकरीबन सत्तर वसंत पार कर चुके उन रिटायर्ड ब्रिगेडियर साहब को मैं और मेरा परिवार खामोश अंदाज में तब तक निहारता रहा, जब तक वे सज्जन टिप्पन टॉप के ठीक सामने, विपरीत दिशा में पार्क अपनी हरे रंग की जोंगा जीप में नहीं बैठ गए थे।  और फिर उसे मोड़कर हमारे सामने की सड़क से, अंग्रेजों के जमाने के उस गिरजाघर के लॉन में खेल रहे मेरे दोनों बच्चों की तरफ खिड़की से हाथ हिलाते हुए वहाँ से निकल नहीं गए थे। मैं और  मेरी धर्म-पत्नी यह देखकर  हैरान थे कि ड्राइविंग सीट पर बैठे उन ब्रिगेडियर साहब के बगल की सीट पर एक अधेड उम्र संभ्रांत महिला भी बैठी थी। 


उस वक्त में हमारे पास एक ११०० सीसी की प्रीमियर पद्मिनी की फिएट कार हुआ करती है। बड़े गर्व से उसकी सवारी करते हुए मैं, सपरिवार घूमने जब कहीं निकलता था तो उसकी डिक्की में एक दरी, एक या दो फोल्डिंग कुर्सी, एक छोटा सा चुल्हायुक्त गैस सिलेंडर,चाय बनाने के बर्तन और चाय का सामान ले जाना नहीं भूलता था। लम्बे सफ़र पर वह इसलिए भी हम जरूरी समझते थे, चूंकि बच्चे छोटे थे,और जहां जरुरत महसूस हुई सड़क किनारे गाडी पार्क कर दूध गर्म कर उन्हें पिलाने में भी सहूलियत रहती थी। इस बार भी हम दिल्ली से पूरे चार दिन का प्रोग्राम लेकर पूरे बोरिया-बिस्तर समेत लैंसडाउन भ्रमण को निकले थे। लैंसडाउन से मुझे इसलिए भी एक विशेष लगाव है कि मेरी शुरुआती शिक्षा यहीं के सेंट्रल स्कूल से हुई थी। बचपन में मैं करीब पांच साल यहाँ रहा था। 


सुनशान पड़े गिरजाघर के गेट के ठीक सामने गाडी पार्क कर मैं, अपनी पत्नी और बच्चों को बांज, देवदार और काफल के पेड़ों से घिरी पहाड़ की चोटी के ठीक ऊपर खड़े उस बड़े से पत्थर पर ले गया था, जिसे टिप्पन-टॉप के नाम से जाना जाता है। हालाँकि पत्थर के ठीक ऊपर से नीचे झाँकने पर शरीर में एक स्वाभाविक सिहरन सी दौड़ जाती है, किन्तु  साफ मौसम में उस  स्थान से आगे की ओर का दृश्य  बहुत ही मनमोहक और आँखों को शुकून पहुंचाने वाला होता है। हरे-भरे पहाड़ और सुदूर उस तरफ तिब्बत तक फैला धवल चादर ओढ़े गढ़वाल हिमालय का विहंगम दृश्य, सफ़ेद बर्फ से आछांदित पहाड़ियों पर जब उगते और डूबते सूर्य की किरणे पड़ती है , तो वह दृश्य देखते ही बनता है। 


उस समय बच्चे न सिर्फ छोटे थे अपितु शरारती भी बहुत थे, खासकर तब तीन साल की बेटी। अत: थोड़ी देर टिप्पन-टॉप से हिमालय को टकटकी लगाकर देखने के उपरान्त हम उस समीप के  गिरजाघर के आँगन में आ गए थे, जो अक्सर वीरान ही पडा रहता है। छोटे बच्चे साथ में होने की वजह से भी एक तो वह जगह थोड़ी सुरक्षित थी, साथ ही वहाँ से भी हिमालय की झलक हमें खूब  मिल रही थी। कुर्सी और दरी आँगन में बिछाकर मेरी पत्नी ने चाय और दूध गर्म करने की तैयारी शुरू ही की थी, मैं डिक्की से सामान निकाल-निकाल कर उसके समीप रखे जा रहा था कि तभी बच्चों से बतियाते हुए सामने के छोर से  वह सज्जन हमारे समीप आ गए थे। 'हाय-हैलो' के उपरान्त मैंने शिष्टता से एक फोल्डिंग कुर्सी उनकी तरफ सरका दी और उन्हें बैठने का आग्रह  करते हुए खुद दरी में बैठ गया था। पत्नी ने गर्मा-गर्म चाय बनाकर जब दो प्यालिया हमें परोसी तो वे हमारे इस आइडिये की दाद देते हुए मुस्कुराते हुए बोले कि चलो आपसे सीखने को एक बढ़िया चीज मिली आज  कि  कहीं घूमने निकलो तो ये सामान भी साथ लेकर चलना जरूरी है, खासकर पहाडी इलाकों की यात्रा में तो। मैंने भी मुस्कुराकर उनकी बात का समर्थन किया और फिर चाय की चुसकिया लेते हुए आपसी परिचय से शुरू हुई बात उस वक्त की दिल्ली की सल्तनत पर आ पहुँची थी।  

उनकी गाडी के वहाँ से निकल जाने के बाद मैं और मेरी धर्म-पत्नी मन  में पैदा हुए एक ख़ास किस्म के अपराध-बोध से गर्सित होकर एक दूसरे को घूर रहे थे कि मेरी पत्नी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा " यार कम से कम तुम तो मुझे बता देते कि उन अंकल जी के साथ में एक आंटी भी है, एक कप चाय………. बेचारी वहाँ अकेली जीप में बैठी …।"  "यार भाई, मैंने भी नहीं नोटिस किया था, मैंने भी अभी देखा उस आंटी को फ्रंट सीट पर बैठे हुए, मैं तो उलटे तुम्हे डपटने वाला था कि अगर तुमने उस आंटी को देख लिया था तो ज़रा उन्हें भी पूछ लेती" खैर छोड़ो, उस बुड्ढे  ने भी तो नहीं बताया इतनी देर तक कि उनके साथ कोई और भी है……  मैंने कुढ़ते-झुंझलाते अपनी खीज बाहर निकालते हुए पत्नी से कहा। उसके बाद कुछ देर तक हम लोग उन ब्रिगेडियर साहब पर ही बातें करते रहे थे।                        


अभी हमारे पास दो दिन का समय बाकी था। अत: अगली सुबह, लैंसडाउन रोडवेज बस अड्डे के समीप जिस छोटे से होटल में हम लोग ठहरे हुए थे, दिन-भर बाहर  ही गुजारने की मंशा से उस होटल के कर्मचारी से कहकर मेरी पत्नी ने दस आलू के पराठे और दही पैक करवा लिया था, ताकि दिन में लंच पर भी गैस स्टोव पर पराठे गरम कर उन्ही से दिन का जुगाड़ भी हो जाए। सूरज उगते ही हम पुन: टिप्पन-टॉप पर उसी स्थान पर पहुँच गए थे। यह देख हमारे उत्साह मिश्रित आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उन रिटायर्ड ब्रिगेडियर साहब की जोंगा गाडी कल वाले निर्धारित स्थान पर ही पार्क थी और वह वृद्ध जोड़ा टिप्पन- टॉप पर बने सीमेंट-कंक्रीट के ढाँचे पर पीठ टिकाये एक टक हिमालय को ही निहारे जा रहा था।

गाडी से उतरकर मैंने अपनी  ३ साल की  बिटिया जोकि अभी सो ही रही थी को गोदी पर उठाया और धर्मपत्नी ने सात वर्षीय हमारे बेटे  का हाथ पकड़ा और हम भी उस संकरी पगडंडी पर आहिस्ता-आहिस्ता टिप्पन-टॉप की तरफ बढ़ने लगे।  समीप पहुचे ही थे कि ब्रिगडियर साहब की नजर हम पर पडी और वे अपना दांया हाथ हिलाते हुए मोटी आवाज में गरजे " हेलो " !  हम दोनों ने भी हाथ जोड़कर उन दोनों का अभिवादन किया, और ब्रिगेडियर साहब फूर्ती से उठकर झट से हमारे बेटे का हाथ पकड़कर उसे उस सीमेंट कंक्रीट के बने आसन पर ले गए, जहां वे लोग बैठे हुए थे। हम लोग भी समीप जाकर खड़े हुए तो ब्रिगेडियर साहब  ने उस अधेड़ उम्र आंटी की तरफ हाथ का इशारा करते हुए कहा "माय वाइफ़, प्रतिभा राणा !" हम दोनों ने एक बार पुन: हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया, और मेरी पत्नी उनकी बगल पर जाकर बैठ गई। मैं बेटी को गोदी में पकड़ा खडा  था, ब्रिगेडियर साहब को शायद मेरी बेटी का अभी तक सोते  अच्छा  लग रहा था अत: वे खड़े हुए और हथेली से मेरी बेटी के गाल थपथपाते हुए बोले " बेक अप बेबी, कमॉन वेक अप ". उनकी भारी-भरकम आवाज सुन अब वह भी जाग गई थी।                 


काफी देर तक हम लोग यूं ही बातो में मशगूल रहे, फिर ब्रिगेडियर साहब ने अपनी धर्म-पत्नी की तरफ इशारा करते हुए प्रश्नवाचक मुद्रा में  कहा" चले "?  बिना उनकी पत्नी का जबाब सुने मैंने ब्रिगेडियर साहब से सवाल किया "आर यू इन अ हरी" ? 

वे फक्कड़ से अंदाज में मुस्कुराते हुए बोले " नहीं साहब, अपने पास तो टाइम ही टाइम है…लौटेंगे भी तो शाम को यहाँ से कोटद्वार के लिए निकलेंगे, मैं तो इनको नाश्ते के लिए आर्मी के ऑफिसर मेस चलने की बात कर रहा था….आप भी चलो हमारे साथ…।बस यहीं पर करीब एक किलोमीटर आगे जहां पर यहाँ का जो एक अकेला सिनेमाघर है, उसी के पास में ही है। उनकी बात सुनकर मैंने अभी सिर्फ इतना ही कहा था कि या आई एम् वेल ऐक्विंटेड विद आळ द प्लेसेस हेयर कि तभी मेरी धर्म-पत्नी ने साथ लाये दही-पराँठों की कहानी मेसेज राणा से छेड़ दे थी। ब्रिगेडियर राणा भी झट से सहमत होते हुए बोले " अगर आपको कोई दिक्कत नहीं है तो यह तो हमारा सौभाग्य होगा बेटे कि तुम्हारे हाथ की बनी स्वादिष्ट चाय का भी मैं एक बार फिर से लुत्फ़ उठा सकूं।    

फिर हम सभी लोग वहां से झटपट गिरजाघर के आँगन में उसी जगह पर आ पहुंचे जहां पर बीता दिन गुजारा था। गाडी की डिक्की से फ़टाफ़ट सामान बाहर निकाल कर हम गिरजाघर के आँगन में सजाने लगे। दोनों बच्चे खेलने में मशगूल हो गए थे। चूँकि वह सड़क उधर से केन्द्रीय विद्यालय को जाती है और साथ ही कैंट एरिया होने की वजह से आगे आर्मी के वाहनों की वर्क-शॉप भी है, अत: उस सड़क पर यदा-कदा आर्मी के वन-टन, थ्री-टन गुजर जाते है, अत: मेसेज राणा बार-बार मेरे सात वर्षीय बेटे को  देती थी " बब्बू, काक्की का ध्यान रखो बेटे, वो सड़क पे न चली जाए, आप उसके बड़े भैया हो……. "

                                      
गरमागरम चाय, दही-पराठों का लुफ्त उठाते हुए मेरी पत्नी ने एक अलग राग छेड़ते हुए ब्रिगेडियर साहब से सवाल किया " अंकल आप कुमाऊँ के हैं और आंटी हरियाणा की…….  आपने यह नहीं बताया कि आप दोनों की पहली मुलाक़ात कहाँ हुई थी ? ब्रिगेडियर साहब ने एक ठहाका लगाया, और बोले " बेटे हमारा भी अपनी जवानी के दिनों में ऐसे ही एक एक्सीडेंट हो गया था। तब मेरी नई-नई पोस्टिंग अम्बाला कैंट में थी। एक दिन सुबह करीब साढ़े नौ, दस बजे बीपीटी से लौटते हुए मैं बहुत थका-  प्यासा इनके गाँव की सड़क, जोकि एक छोटा हाईवे था, पर चला जा रहा था कि सड़क किनारे मुझे एक ढाबानुमा दूकान दिखी, काउंटर पर चुनर ओढ़े एक लडकी बैठी थी।  मैंने कहाँ, बहुत प्यास लगी है थोड़ा पानी मिलेगा? अनादर से  एक खनकती हुई आवाज आई, चुल्लू आगे करो। मेरी कुछ समझ में नहीं आया क्योंकि मुझे मालूम नहीं था कि चुल्लू क्या होता है अत: मैं उस लडकी के चेहरे पर देखने लगा। फिर एक खिलखिलाहट मेरे कानो से गुजरी और उस लडकी ने अपनी दोनों हथेलियाँ आपस में जोड़कर अपने मुहँ पर लगाईं और बोली,  अरे बुददू ऐसा करो और बस हम उसी वक्त दिल दे बैठे। 

उनकी बात सुन हम तीनो की नजरें मिसेज राणा पर ही टिकी थी और हमें महसूस हो रहा था कि वे कुछ-कुछ लजाते हुए मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। उन लोगो से इतनी सी मुलाक़ात में हमें कहीं ऐसा नहीं महसूस हो रहा था कि ये लोग कोई अजनबी है। और फिर मेरी पत्नी ने मानो उस वृद्ध जोड़े की दुखती रग छेड़ दी थी। उसने पूछा, आंटी, आपके बच्चे…….! मैंने नोट किया कि ब्रिगेडियर साहब बात घुमाना चाहते थे किन्तु मेरी बीबी कहाँ मानने वाले थी। उसने अब अपने सवाल का गोला  ब्रिगेडियर साहब पर ही दागा, अंकल, आपके बच्चे…….! 

मैं नोट कर रहा था कि आंटी ( मिसेज राणा ) की सुर्ख आँखे नम होती जा रही थी। इससे पहले कि ब्रिगेडियर साहब कुछ कहते, भारी आवाज में आंटी ने कहना शुरू किया " एक ही बेटा था, करीब चौदह साल का हो गया था, ऊपर वाला हमसे छीनकर ……."  यह सुनकर हम दोनों पति-पत्नी के मुहं से एक साथ निकला "ओह, आई अम सॉरी…….!" जहां एक और मन ही मन मैं अपनी धर्म-पत्नी को बेवजह उनके जख्म कुरेंदने के लिए कोस रहा था, वहीं मैंने महसूस किया कि वह आंटी अपने मन के संताप  को बाहर निकालने के लिए भी व्याकुल थी, इसलिए उसके बाद मैंने खुद को कोई प्रतिक्रिया देने से रोक लिया था। 

उस ठन्डे प्रदेश में गुनगुनी धुप खिली हुई थी, ब्रिगेडियर साहब भी नजरें  झुकाए खामोश बैठे थे। आंटी ने दर्द भरी आवाज में आगे बोलना शुरू किया " इनकी पोस्टिंग उस वक्त गुरुदासपुर के तिब्डी कैंट में थी। कुछ दिनों से अक्सर सुबह उठकर ये मुझसे कहा करते थे कि आजकल मुझे रात को बुरे-बुरे सपने आ रहे है। फिर एक दिन इन्होने कहा कि इस आने वाले वीकेंड पर ऑफिसर्स और जेसिओज की फेमलियाँ पाकिस्तान बोर्डर पर घूमने जा रही है, अत: तुम भी तैयार रहना। यहाँ से ख़ास दूर नहीं है, तुम्हे वह स्थान भी दिखाऊंगा जहाँ १९ ६५  की लड़ाई में मैं घायल हुआ था। और फिर शनिवार के दिन हम और बाकी  फ़ौजी लोग सिविल ड्रेस में पाकिस्तान बोर्डर की तरफ घूमने निकल पड़े। हमारा बेटा यह सोचकर उत्तेजित था कि आज वह पाकिस्तान बोर्डर को करीब से देखेगा। 

वहाँ पहुंचकर इन लोगो ने  दूरबीन की मदद से पाकिस्तानी पोस्टों और उनके सुरक्षाकर्मियों को हमें दिखाया। हमने वे स्थान भी देखे जहां  पैंसठ और इकत्तर की लड़ाई में गिरे बमों से जमीन पर बड़े-बड़े गड्ढे अभी भी विद्यमान थे। काफी देर घूमने के बाद हम लोग वहाँ मौजूद एक पेड़ की छाँव में सुस्ताने बैठ गए। ये दोनों-बाप-बेटे आपस में मजाक करते हुए पाकिस्तानी फौजियों पर जोक्स सुना रहे थे। हमारा बेटा पेड़ के तने पर पाकिस्तान के बोर्डर की तरफ मुह करके बैठा था, और हम दोनों उसकी तरफ मुह किये बैठे थे। अपने साथ ले जाये हुए बिस्किट और कुरकुरे खाते हुए कुछ देर हम मौज-मस्ती करते रहे। दोनों बाप-बेटों के बीच चुटकले सुनाने का दौर जारी था, और हमारे बेटे ने जब एक जोक्स सुनाया तो आदतन इन्हें जब कोई बात बहुत बढ़िया लगती तो ये हँसते हुए इनके समीप बैठे व्यक्ति के पीठ अथवा जाँघ पर अपने हाथ से थाप मारते थे। उस वक्त भी बेटे का सुनाया चुटकला सुनकर जब हम दोनों हँसे तो ये मेरी पीठ पर थाप मारने को मेरी तरफ झुके  और जैसे ही इनका झुकना हुआ पाकिस्तान की तरफ से एक गोली आयी, जो अगर ये मेरी तरफ  उस वक्त मेरी पीठ पर थाप मारने न झुकते तो इनकी पीठ पर लगती किन्तु, चूँकि ये बाई तरफ झुक गए थे, अत: वह गोली सीधे हमारे बेटे के सीने को चीरते हुए निकल गई …।  

राणा आंटी की बूढ़ी आँखे बुरी तरह डब-डबा आई थी। घुटी सी आवाज में फिर उन्होंने कहा, मेरा नसीब देखिये, एक ही गोली के निशाने पर एक तरफ अपना पति था और दूसरी तरफ अपना बेटा !                                                                



              




Saturday, March 16, 2013

लघु कथा- आदत हाथ फैलाने की !




दो-तीन दिन पहले मैंने यह लघु-कथा अपने आचलिक भाषा के ब्लॉग पर गढ़वाली में लिखी थी, आज उसका हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ; 

एक ब्राह्मण पुजारी के तौर पर अपना सांसारिक जीवन शुरू करने वाले उसके वृद्ध पिताजी  इलाके भर में एक दिव्य-महात्मा के तौर पर प्रसिद्द हो गए थे। इलाके के लोग यहाँ तक मानते थे कि अगर  वे किसी को  कोई वरदान अथवा शाप दे दें तो वह शत-प्रतिशत सच निकलता था। मगर एक वो कहावत "चिराग तले अन्धेरा" भी उन पर बखूबी चरितार्थ होती थी, और उसकी वजह थी, पंडित जी का अपना इकलौता लड़का, निकम्मा, निठल्ला और आलसी।  बचपन से ही पता नहीं यह कैसी आदत उसने पकड़ ली थी कि चाहे कोई दोस्त हो, मास्टर जी हों, अथवा कोई रिश्तेदार हों, जहां मौक़ा मिला, उनके आगे पैसों के लिए हाथ फैला देता था। 

पंडित जी उसकी इस आदत से बड़े दुखी थे। किन्तु उसकी इस आदत के लिए कुछ हद तक वे खुद भी जिम्मेदार थे क्योंकि पंडित जी अपने आदर्शों के भी पक्के थे। सिद्धता का गुण खुद में विद्यमान होने के बावजूद भी वे सिर्फ मेहनत  की ही कमाई में विश्वाश रखने वाले इंसान थे, और किसी भी फास्ट-मनी (तीव्र अर्जित धन) के सख्त खिलाफ थे। और इसलिए उनके घर की माली हालत खस्ता ही रहती थी।

बुढापे में पंडित जी को कई तरह की बीमारियों ने भी घेर लिया था, और फिर उनका स्वर्ग सिधारने का वक्त निकट आ गया।  मौक़ा ताड़कर उनका निकम्मा बेटा पंडित जी के पैर पकड़कर उनसे विनती करने लगा कि आप मेरे पिता-श्री है, मैं आपका बेटा हूँ। आपको तो हमारे घर की माली हालत के बारे में पूरी जानकारी है। दुनियाभर में आपकी हाम है कि आप एक सिद्ध महात्मा हो, जिसको भी कोई वरदान दे देते हो, वह सच निकलता है। अत:  मुझ पर भी कृपा करें और मुझे भी एक वरदान दें। 

वृद्ध पंडित जी ने खिन्न मन और रुंधे हुए गले से कहा" वैसे तो मैं तुझे भी अवश्य वरदान देता पुत्र, किन्तु मैं तेरी इस मांगने की आदत से नाखुश हूँ। हाँ, अगर तू मुझे यह वचन दे कि आगे से किसी भी इंसान के आगे हाथ नहीं फैलाएगा तो मैं भी तुझे एक वरदान दूंगा, किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना कि मैं धन-दौलत पाने से सम्बंधित वरदान किसी को भी नही देता।  

अब वह सोच में पड गया कि बुड्ढ़े ने उसे ये कैसी दुविधा में डाल दिया ? मुझसे मेरी माँगने की आदत भी छुड़वाना चाहता है और धन-दौलत का वरदान भी नहीं देगा। वह कुछ देर गहरी सोच में पडा रहा, फिर अचानक एक जबरदस्त आइडिया उसके खुरापाती दिमाग में आया और वह उछल पडा। मृत्यु-शैय्या पर लेटे अपने बाप के पैरों को दबाते हुए उसने झट से कहा कि पिताजी, मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं आइन्दा किसी भी इंसान के आगे कुछ भी मांगने के लिए हाथ नहीं फैलाऊंगा, किन्तु आप भी मुझे यह वरदान दो की इंसानों के अलावा जिस किसी के भी आगे मैं हाथ फैलाऊँ, उसके पास जो भी हो वो वह मुझे दे दे।

अंतिम साँसे गिन रहे पंडित जी  ने अपने दिमाग पर जोर डालते हुए सोचा  कि  इंसानों के अलावा भला यह और किससे क्या मांग सकता है ?  पेड़ पौधों, पत्थरों से मांगेगा तो वो भला इसे क्या देंगे और अगर गाय-भैंसों के आगे हाथ फैलाएगा तो वो तो इसे गोबर ही दे सकते है। अत: बूढ़े पंडित जी ने अपना हाथ उठाकर कहा तथास्तु और तत्पश्चात स्वर्ग सिधार गए। 
अब वरदान पाकर उनके उस निकम्मे बेटे ने झटपट अपने गाँव से शहर को पलायन का  निर्णय लिया और शहर आ गया। आदतन शहर आकर भी उसने काम तो कोई भी नहीं किया, किन्तु आजकल वह शहर के पौश इलाके में एक आलीशान बंगले में रहता है, घर के आगे दो-दो मर्सिडीज खडी रहती हैं। करता वह सिर्फ  इतना सा है कि तमाम शहरों में  बैंकों के एटीएम के पास जाकर  उनके आगे हाथ फैला देता है, बस !        

Monday, December 17, 2012

मूर्खता और लालच !


गत सप्ताह एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने हेतु उत्तराखंड की यात्रा पर था। वहाँ एक परिचित के मुख से सुनी एक पुरानी आंचलिक कहानी को यहाँ लिपिबद्ध कर रहा हूँ। संभव है कि कुछ लोग इस कहानी से पहले से वाकिफ हो फिर भी  उम्मीद करता हूँ कि कुछ पाठकगण, खासकर बच्चों को पसंद आयेगी


एक गाँव में एक निर्धन मगर बहुत ही चालाक किस्म का किसान रहता था। घर की परिस्थितियों के अनुरूप किसान की पत्नी खान-पान में भी मितव्ययता बरतने का भरसक प्रयास करती थी, लेकिन किसान को यह पसंद न था। फलस्वरूप उसने अपनी पत्नी से कहा कि आइन्दा वह जब भी भोजन पकाए  तो दो आदमियों का खाना अतिरिक्त बनाया करे, भले ही उस अतिरिक्त भोजन को उन्हें दूसरे वक्त में ही क्यों न खाना पड़े। 

एक दिन किसान लकड़ी लेने जंगल गया तो उसे वहाँ दो खरगोश के बच्चे मिल गए। वह उन्हें घर ले आया और उनका पालन-पोषण करने लगा। एक दिन वह अपने बैलों संग हल जोतने के लिए खेतों में गया था तो वह एक खरगोश भी साथ ले गया था। हल लगाते वक्त उसने उस खरगोश को हल के ठीक पीछे रस्सी से बांध दिया  बैल हल को खीचते तो आगे-आगे हल चलता और उसके ठीक पीछे-पीछे वह खरगोश चलता  

जब हल जोतने का यह क्रम चल ही रहा था, तभी कहीं से बैलों के दो व्यापारी वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने किसान से पुछा कि क्या उसके  बैल बिकाऊ हैं? किसान से सकारात्मक जबाब मिलने पर वे मोल-भाव करने लगे, तभी एक व्यापारी पूछ बैठा कि उसने उस खरगोश को हल से इस तरह क्यों बाँध रखा है? किसान स्वाभाव से ही बहुत चालक किस्म का था, उसने उस व्यापारी की उत्सुकता को भांप लिया और कहने लगा कि यह खरगोश तो उसकी जान है, बहुत ही आज्ञाकारी किस्म का है, वह इसको जो भी काम  बताता है, वह उसे तत्परता से करता है,  दूसरी तरफ वह उसके और उसकी बीवी के बीच संदेशवाहक का काम भी करता है। 

किसान की बातें सुनकर दोनों व्यापारी काफी चकित हुए। बैलों के मोलभाव की बात आई तो किसान ने कहा कि इतनी जल्दी भी क्या है भाई!  दोपहर के भोजन का समय हो रहा है, इसलिए घर चलकर भोजन कर, तदुपरांत  आराम से बैठकर मोलभाव करते है। दोनों व्यापारी किसान की बात मान गए। किसान ने झट से उस खरगोश को हल पर बंधी रस्सी से खोला और उसे गोद में उठाकर उसके कानो में बोला; "जा मेरे लाडले, घर जा, मालकिन को बोलना कि दो मेहमानों के लिए भी भोजन पका के रखना, हम बस थोड़ी देर में पहुँच रहे है।" यह कहकर उसने खरगोश को छोड़ दिया। छूटते ही खरगोश सरपट भागकर झाड़ियों में कही विलुप्त हो गया। व्यापारी कौतुहल भरी  निगाहों से यह सब देख रहे थे। 

थोड़ी देर बाद वे लोग जब किसान के घर पहुंचे तो व्यापारी यह देखकर चकित रह गए कि खरगोश किसान के घर में खूंटे से बंधा था। किसान की पत्नी ने खाना भी  दो आदमियों का अतिरिक्त पकाया हुआ था। व्यापारी यह सब देख यही समझ बैठे कि यह सब उस खरगोश की ही करामात है, जबकि हकीकत यह थी कि किसान की बीवी ने खाना तो किसान के निर्देशानुसार पहले से ही अतिरिक्त पका के रखा था और जिस खरगोश को किसान ने खेत से छोड़ा था वो तो कहीं जंगल  में भाग गया था, घर में बंधा खरगोश दूसरा वाला था। दोनों ही व्यापारी उस खरगोश पर फ़िदा थे, अत: दोनों ने किसान से कहा कि इस बारी बैल रहने दे, और ये बता की खरगोश को कितने में बेचेगा। चालाक किसान तो इसी मौके की तलाश में था, अत: उसने झट से कहा  कि वैसे तो मैं  खरगोश को बेचना नहीं चाहता था किन्तु चूंकि आप मेरे मेहमान है अत: मैं आपकी बात को भी नहीं टाल सकता और वैसे कीमत तो इसकी 25000 रुपये है, किन्तु तुम 20000 रूपये ही देकर ले जा सकते हो।    

व्यापारियों ने किसान को खुशी-खुशी 20000 रूपये चुकता किये और खरगोश लेकर चल पड़े।  जब वे अपने गाँव के समीप पहुंचे तो उन्होंने भी उस खरगोश के कानो में कहा की जाओ मालकिन से कहना कि हम बस थोड़ी देर में पहुँच ही रहे है, वह दो आदमियों का खाना तैयार रखे। यह कहकर जैसे ही उन्होंने खरगोश को आजाद किया, खरगोश सरपट भागकर कही अदृश्य हो गया। वे दोनों व्यापारी जब घर पहुंचे तो देखा की न तो वहां कोई खरगोश था और न ही घर की मालकिन ने उनके लिए खाना तैयार करके रखा था। व्यापारी ने अपनी पत्नी से पूछा कि क्या वहां कोई खरगोश नहीं आया था ? उसकी पत्नी ने तुरंत  प्रतिसवाल  किया कि आप किस खरगोश की बात कर रहे है? 

व्यापारियों को समझते देर न लगी कि उनके साथ धोखा हुआ है। वे उलटे पाँव किसान के गाँव पहुंचे और दोनों ही किसान पर बिगड़ने लगे कि उसने उनके साथ छल किया है। चालाक किसान ने उन्हें शांत कराया और पूछा कि खरगोश को आदेश देने से पहले क्या उन्होंने उसे अपना घर दिखाया था? दोनों व्यापारी सकपकाने लगे और एक स्वर में बोले कि उन्होंने खरगोश को अपना घर तो नहीं बताया था। अब बारी चालक किसान के बिगड़ने की थी, वह विलाप करने का नाटक करते हुए बोला अरे मूर्खों ! तुमने यह क्या कर दिया, मेरे लाडले खरगोश को  बिना अपना घर दिखाए ही आदेश देकर छोड़ दिया, बेचारा पता नहीं उस अन जान जगह पर कहाँ जंगलों में इधर-उधर भटक रहा होगा। अरे, तुमने ये क्या कर दिया? दोनों ही व्यापारियों को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे किसी अपराधी की तरह ग्लानी सी महसूस करने लगे।     

किसान उन्हें सांत्वना देते हुए अपने घर के अन्दर ले गया और चूंकि सर्दियों का मौसम था इसलिए उसने अपनी पत्नी को उनके लिए चाय बनाने को कहा। जिस कमरे में किसान ने उन्हें बिठाया था उसके दरवाजे और खिड़की के बीच में बाहर की तरफ से  किसान ने एक बकरा भी बाँध रखा था। बकरा लेटा  हुआ, अपने दोनों जबड़ो को हिलाता हुआ जुगाली कर रहा था। चाय पीते-पीते व्यापारियों ने एक साथ किसान से पूछा कि भई, तुम्हारा यह कमरा काफी गरम है, क्या बात है? किसान झट से बकरे की तरफ इशारा करते हुए बोला; सब अपने इस एयरकंडीशन की वजह से है। व्यापारियों ने आँखें फाड़ते हुए उसके तरफ देखकर  प्रश्नवाचक स्वर में  कहा, एयरकंडीशन ????  किसान बोला, हाँ भाई, सही सूना आपने! यही तो मेरा एयरकंडीशन है, बाहर से जितनी भी ठंडी हवा आती है उसे , यह खा जाता है, (जुगाली करते बकरे के मुह की तरफ उंगली से इशारा करते हुए ) देखो, अभी भी खा रहा है। जबकि उन व्यापारियों के गर्मी महसूस करने की वजह यह थी कि एक तो वे गरम-गरम चाय पी रहे थे और दूसरा, कमरे की जिस दीवार से सटकर वे बैठे थे, उसके ठीक पिछ्ले भाग में दीवार से सटा किसान की रसोई का चूल्हा था, जो उसवक्त जल रहा था, इसलिए कमरे में गर्मी थी। 

किसान की बात सुनकर दोनों व्यापारी आपस में फुसफुसाने लगे कि हमारे गाँव में तो यहाँ से भी ज्यादा ठण्ड है, क्यों न इसे ही खरीद ले। उन्होंने किसान से बकरे का भाव पूछा तो किसान ने वही रटा-रटाया जबाब दिया,कि  वैसे तो 25000/- रुपये है किन्तु तुम्हे मैं 20000 रूपये में दे दूंगा। अब दोनों व्यापारी उस बकरे को अपने गाँव ले आये और कमरे के बाहर बाँध दिया। रात को कड़ाके की सर्दी पडी और सुबह तक बकरा ठण्ड के मारे स्वर्ग सिधार चुका था। अगले दिन दोनों व्यापारी भागते-भागते किसान के गाँव पहुंचे तो किसान की पत्नी ने बताया कि वह तो जंगल गए है इस वक्त।  दोनों ही व्यापारी वक्त जाया नही करना चाहते थे, अत: वे भी किसान को पकड़ने  जंगल की और चल पड़े। इस बीच किसान जब अकेला जगल में जा रहा था तो उसके पीछे रास्ते में एक भालू पड गया। किसान उससे बचने के लिए एक पेड़ के पीछे छुपा तो भालू  ने मय पेड़  उसे पकड़ने की कोशिश की। किसान न सिर्फ चालाक बल्कि बहादुर किस्म का भी था। उसने झट से भालू के दोनों हाथ पकड़ लिए और उसे वहीं रस्सी से लपेटकर पेड़ से बांध दिया। उसके बाद किसान ने भालू के पिछवाड़े पर एक जोर की लात मारी तो भालू ने मल त्याग दिया। 

इस बीच किसान की नजर जंगल में उसी की तरफ आते दोनों व्यापारियों पर पडी तो उसे मामला भांपते देर न लगी। उसने फ़टाफ़ट अपनी जेब से कुछ रूपये निकाले और उन्हें भालू द्वारा विसर्जित मल में अच्छी तरह लोट-पोट कर दिया। ज्यों ही व्यापारी  एकदम उसके नजदीक पहुंचे तो किसान  एक-एक कर भालू के मल में लिपटे नोटों को निकाल-निकालकर साफ़ करने लगा और उन्हें सुखाने लगा। व्यापारियों ने उत्सुकताबश तुरंत पूछा कि किसान तुम ये क्या कर रहे हो? चालाक किसान बोला, मत पूछो भाई कि मैं क्या कर रहा हूँ। यही भालू तो मेरी रोजी का साधन है..............क्योंकि यह मल के साथ-साथ अपने पेट से नोट भी त्यागता है, जिन्हें साफ कर मैं अपनी रोजी-रोटी चलाता हूँ। दोनों ही व्यापारी एक साथ उछल पड़े, और बोले, अरे यह तो बड़ा ही अजूबा है, पहली बार ऐसा देखा और सूना है। वे किसान से बकरे के बदले दिए गए पैसे वापस मांगना भी भूल गए और बोले, तुम इस भालू को कितने में बेचोगे ? 

किसान ने एक बार फिर वही रटा-रटाया जबाब दिया कि वैसे तो इसकी कीमत 25000 रूपये है किन्तु तुम्हारे लिए मात्र 20000/- रूपये। लेकिन इस बारी किसान ने एक शर्त यह रखी कि चुकी वह भालू उसको जी-जान से प्यार करता है और उससे अलग नहीं होगा, इसलिए वे लोग उस भालू को उसके वहां से चले जाने के दो घंटे बाद ही खोलें। लालची व्यापारी किसान की हर बात मानने को तैयार थे, अत: किसान को भालू की कीमत देकर उन्होंने विदा कर दिया और जब उसके कहे अनुसार दो घंटे बाद उन्होंने भालू को खोला तो क्रोधित भालू  उनपर झपटा और पलभर में दोनों व्यापारियों को  उसने मार डाला।     

इतिश्री !                                                                                                                       

Thursday, November 15, 2012

हतभाग्य सुश्री 2जी !


कई सालों के बाद अब 2जी स्पेक्ट्रम की हालिया  दोबारा आयोजित नीलामी  निम्नलिखित कहानी के अनुरूप है:
एक सुंदर लड़की थी  जिसने अपने माता पिता को खो दिया था।  उसके बाद वह अपने एक अभिभावक के साथ रहने लगी थी। जल्दी ही  वह लड़की शादी के योग्य हुई तो उसके भ्रष्ट संरक्षक ने उसके लिए एक उपयुक्त वर ढूढने  के बजाय उसे एक बूढ़े अमीर आदमी के हाथों बेच दिया,यानि कि  पैसे लेकर उसकी शादी उस बूढ़े अमीर के साथ कर दी।  हर किसी ने उसके इस कदम की यह कहते हुए कटु आलोचना की कि उसे उस लड़की के लिए एक उपयुक्त वर की तलाश करनी चाहिए थी क्योंकि वह लड़की ख़ूबसूरत थी, उससे शादी के लिए एक से बढ़कर एक अच्छे मैच, कई सुन्दर युवा स्नातक वर प्रस्ताव लेकर आगे आ रहे थे। वह भ्रष्ट अभिभावक कई वर्षों तक जब यह आलोचना सहन करने में असमर्थ रहा और जब लड़की प्रौढ  हो गई तो उसने लड़की से  उसके वर्तमान बूढ़े पति को तलाक देने को कहा और उसके लिए नया लड़का ढूढने का वादा किया।  लड़की के लिए फिर से नए वर  की खोज शुरू हुई,  लेकिन इस बार कोई भी युवा उससे शादी के लिए प्रस्ताव लेकर आगे नहीं आया, केवल अधेड़-बूढ़े पुरुष एक दूसरी पत्नी के रूप में ही उससे शादी करने का प्रस्ताव लेकर आये थे।  अब  वह अभिभावक महाशय खुश होकर अपने छत पर चढ़कर चिल्लाया कि देखो, मैं  अपने पहले के निर्णय में सही था, और केवल एक बूढा आदमी ही इस लड़की के लिए उपयुक्त था।  "

(नोट: उपरोक्त कथा  एक अंगरेजी साईट पर  एक सज्जन द्वारा दिए गए निम्नाकित   कमेन्ट का  हिन्दी रूपांतरण मात्र है )
"Conducting auction to 2G now after many years is analogous to the following story: A beautiful girl who lost her parents was living with a guardian. When the girl became ready for marriage, the corrupt guardian, instead of finding a suitable match, made her to marry an old rich man, after getting money from the rich man. Everyone criticised the move and opined that the guardian should have found a better match for the girl as many eligible young bachelors would have come forward to propose to marry her as she was beautiful. The guardian, unable to bear the criticism, after many years, when the girl became old, asked the girl to divorce the current husband, and searched for new alliance for the girl. This time, the young bachelors who came forward to propose to marry her did not come again. Only old men proposed to marry her as a second wife. Now the guardian shouted from the rooftop that his earlier decision was correct and only an old man was suitable to the girl."

Thursday, February 23, 2012

लघु कथा- चिराग तले...


इशु, बेटा गुप्ता जी की दूकान से बड़े वाले चार ड्राइंग पेपर और ले आ..........प्लीज! अपनी दस बर्षीय बेटी इशा को आवाज लगाते हुए रमेश बोला। आज छुट्टी का दिन था और रमेश सुबह-सबेरे ही उठकर भोजन कक्ष में मौजूद खाने की बड़ी मेज पर चार-पांच सफ़ेद आर्ट पेपरों और इशा के स्कूल-बस्ते से चित्रकला का सामान निकालकर अपने सपनो के घर का नक्शा बनाने में मशगूल था। अपने ही कल्पना जगत में खोया वह यह सज्ञान लेना भी भूल गया कि सबिता ने उसे उसी टेबल पर नाश्ता भी परोसा था और उसे वह कब का चट कर गया था। उसकी यह तंद्रा तब टूटी जब करीब ग्यारह बजे सबिता उसके लिए दूसरी बार चाय बनाकर लाई और रमेश ने सबिता से सवाल किया कि आज नाश्ता खिलाने का मूड नहीं है क्या, तो तब सबिता बोली, पागल हो गए हो क्या, तुमने साढ़े आठ बजे के करीब जो खाया था वो क्या नाश्ता नहीं था?


यूं तो जब से प्लॉट की रजिस्ट्री घर में आई थी, सबिता भी सोते-जागते अपने मानस पटल पर कई स्वप्न-महल खड़े कर चुकी थी। घर के कामों से फुर्सत मिलते ही आलमारी के लॉकर में रखी रजिस्ट्री को वह भी मेज पर फैलाकर उस रजिस्ट्री संग लगे प्लाट के मानचित्र को उल्टा-पुल्टाकर, भिन्न-भिन्न कोणों से देखने की कोशिश करती। यही हाल आज रमेश का भी था, अपनी जिज्ञासाओं और परिकल्पनाओं की ऊँची उडान उड़ते हुए वह भी इस कोशिश में जुटा था कि कैसे अपने उस प्लॉट की सीमित जगह में वह उस हर ख्वाइश को स्थापित कर पाए, जिसके उसने सालों से सपने बुन रखे थे। बगल के कमरे में इशा, मोहल्ले के अपने दोस्तों संग खेलते हुए अपने पापा की बात को अनसुना कर गई थी, अत: रमेश ने थोड़ा खीजते हुए पुन:आवाज लगाईं....बेटा इशु, यार आप मेरी बात सुनकर अनसुना कर जाती हो.... पांच मिनट तो लगेंगे..... ले आओं न प्लीज! इशा दोस्तों से निपटकर बैठक में आई और कहने लगी..... यार पापा, सुबह-सबेरे भी तो आपने इतने सारे ड्राइंग पेपर मुझसे मंगवाए थे, वे कहाँ गए ? ड्राइंग बनाते-बनाते सब खराब हो गए, रमेश ने जबाब दिया। ओ माई गोंड, उत्ते सारे पेपर......इशा बोली । फिर अपनी कोमल हथेली को अपने माथे पर मारते हुए बोली.... यार पापा, मम्मी ठीक कहती है... आप सच में बुद्धू हो। आप अपने लैपटॉप में फोटो-शॉप अथवा पेंट में जाकर क्यों नहीं मैप बना लेते हो..... फालतू में ड्राइंग पेपर खराब कर रहे हो। उसमे मुझे लाइनिग ठीक से खींचनी नहीं आती, रमेश बोला। अरे बाबा, आपको लाइनिंग खीचने की जरुरत क्या है..... गूगल सर्च में जाकर किसी मकान का नक्शा ढूंढो और उसे वहाँ कॉपी-पेस्ट करके उसमे अपने मुताविक काट-छाँट कर लो...बस।


बेटी की कही बात अब रमेश की समझ में आ गई थी, साथ ही साथ वह इशा की समझ की भी मन ही मन सराहना भी कर रहा था और सोच रहा था कि हम कहाँ रह गए, ये आजकल की नई पीढी वाकई हमसे कितने आगे है। रमेश को तो मानो घर का मानचित्र बनाने का भूत सा सवार हो गया था, अत: दोपहर का भोजन करने के उपरान्त एक बार फिर से वह लैपटॉप पर बैठ गया था। मन मुताविक उसने एक खाका भी तैयार कर लिया था, तभी इलाके में ही रहने वाले उसके एक परिचित घर में आ धमके।उन्होंने जब उसका हालचाल पूछा और पूछा कि कंप्यूटर पर क्या कर रहे थे, तो उससे रहा न गया और उन्हें अपना बनाया हुआ घर का मानचित्र लैपटॉप की स्क्रीन पर ही उन्हें दिखाने और उसकी बारीकियों से उन्हें अवगत कराने में जुट गया। इस बीच सबिता भी किचन से चाय-पानी ले आई थी, उसे मेज पर रखते हुए वह उनकी तरह मुखातिब होते हुए बोली; भाई साहब, ये तो ऐसी चीजे मानते नहीं और न हीं इन्हें उस चीज का ज्ञान ही है, किन्तु आपको तो मालूम ही होगा वास्तु के बारे में, थोड़ा इन्हें भी बताइये न।


आगंतुक बोले, भाभी जी ! सच कहूँ तो वास्तु के बारे में ख़ास जानकारी तो मुझे भी नहीं है किन्तु मैं देसाई भाई को जानता हूँ जो संरचना अभियांत्रिकी और वास्तु शिल्प के अच्छे ज्ञाता और सरकारी मान्यताप्राप्त मानचित्र प्रमाण कर्ता और सलाहकार है, फीस भी ठीक-ठाक ही लेते है, वे आपको आपके घर का एक शानदार और वास्तु से परिपूर्ण नक्शा बनाकर दे देंगे, आप चाहो तो आप लोंगो को मैं उनसे उनके दफ्तर में मिला सकता हूँ। हालांकि रमेश वास्तु को ख़ास तबज्जो नहीं देता था, किन्तु सबिता टीवी पर वास्तु से सम्बंधित कार्यकर्म देख-देखकर उसे काफी अहमियत देने लगी थी, अत : उसने जिद कर दी कि जब हमें नक्शा पास करवाना ही है तो क्यों न किसी ऐसे सलाहकार की मदद ली जाए जो नक्शा भी प्रमाणित करके दे और वास्तु के गुण भी उसमे सम्मिलित करके दे।


कुछ रोज उपरान्त एक दिन रमेश, पत्नी सबिता और बेटी इशा को साथ लेकर उन देसाई भाई के दफ्तर पहुँच गए थे। उनके दफ्तर के बाहर देसाई एंड कंसल्टेंट का एक बड़ा सा बोर्ड लगा था। आपसी परिचय के दौरान ही रमेश को पता चला कि इन सज्जन का नाम इफ्तिकार मोहम्मद भाई देसाई है, और जो गुजरात के मूल निवासी है। अपने उस परिचित का हवाला देकर जिन्होंने पिछले रविवार को इन देसाई भाई के बारे में रमेश को जानकारी दी थी, रमेश ने अपने प्लॉट की रजिस्ट्री और मानचित्र उनके समक्ष रखे और उनसे वास्तु परिपूर्ण अपने घर का नक्शा बनाने का आग्रह किया।


देसाई भाई ने अपने मेज की दराज से कुछ नक़्शे निकाले और उनके समक्ष मेज पर फैलाकर उन्हें वास्तु की जानकारियों और बारीकियों से अवगत कराने लगे। वे बोले, रमेश जी, वास्तु कोई अंध-विश्वास नहीं है, यह एक विज्ञान है, जो ये बताता है कि हम अपने घर में अथवा दफ्तर में किंचित छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर अधिक से अधिक सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण कर सकते है, और एक पढ़े-लिखे इंसान से हमेशा ऐसी समझदारी की अपेक्षा भी की जाती है कि वह अपने -अच्छे-बुरे को समझे और अच्छाइयों का अनुशरण करे,वरना तो...... अब देखिये कि चूंकि आपका प्लाट दक्षिण-पूरब मुखी है, इसलिए आपको चाहिए कि आप अपने कीचन का स्थान दक्षिण-पूरब वाले कोने पर रखे..... मुख्य शयन कक्ष दक्षिण पश्चिम में और मंदिर को उत्तर-पूरब में रखे। मंदिर को इस ढंग से स्थापित किया जाना चाहिए कि जब आप प्रभू-स्मरण और पूजा-पाठ को बैठे तो आपका मुख हमेशा पूरब की तरफ होना चाहिए........ईश वंदना का यही सर्वोत्तम तरीका माना जाता है, और इससे मन को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।


रमेश और उसका परिवार, खासकर बेटी इशा बड़े ध्यान से देसाई भाई की बातों को सुन रहे थे। रमेश तो इस बात से देसाई भाई का मन ही मन कायल हो गया था कि एक भिन्न मजहब के होते हुए भी उन्हें हमारे धर्म से सम्बंधित कितना ज्ञान है। बातों-बातों में दोपहर होने को आई थी, इससे पहले कि रमेश, देसाई भाई से यह पूछता कि नक्शा तैयार होने में और कितना समय लगेगा, देसाई भाई खुद ही बोल पड़े; रमेश जी,अभी नक्शा तैयार होने में एक-डेड घंटा लग जाएगा, दोपहर के भोजन का समय हो गया है , बिटिया को भूख लग रही होगी, उसे बाहर मार्केट से कुछ खिला-पिला लाइए । रमेश बोला, ठीक है सर जी, आप भी चलिए..... देसाई भाई बोले, नहीं.. नहीं, आप जाइये मुझे अभी दिन की नमाज भी अता करनी है....!

बाजार से भोजन कर रमेश और उसका परिवार जब पुन; देसाई भाई के दफ्तर में पहुंचे तो देखा कि देसाई भाई एक चटाई बिछाकर पश्चिम की तरफ मुख करके नमाज अता कर रहे थे। चुलबुली इशा कहाँ चुप रहने वाली थी, झट से बोल पडी, पापा, ये अंकल हमें तो समझा रहे थे कि पूजा करते वक्त इंसान का मुख पूरब की तरफ होना चाइये... और खुद पश्चिम ... इससे पहले कि इशा कुछ और कहती सबिता ने इशा को बड़ी-बड़ी आँखें दिखाकर झठ से अपने हाथ से उसका मुह बंद कर दिया........................!

Thursday, January 19, 2012

स्टेनोग्राफर बनाम....

एक आपात बुलावा आ जाने की वजह से ह्रदय रोग विशेषज्ञ और बाईपास सर्जन डाक्टर जैन एवं उनके असिस्टेंट डाक्टर त्रिवेदी सर्जरी के लिए ऑपरेशन टेबिल पर रखे मरीज से सम्बंधित   कुछ हिदायते, जेनी और जूली को देकर और उसे उनकी देख-रेख में छोड़कर तुरंत बगल वाले ऑपरेशन थियेटर में चले गए थे। इधर टेबिल पर बेहोश पड़े मरीज के सर्जरी के लिए फाड़े गए सीने के उसपार गाढा बैंगनी रंग लिए तह की सी मुद्रा में पड़े दिख रहे दिल में जब भी कोई हल्की सी कम्पन होती तो उसे गौर से देख रही जेनी, उसके बगल में खड़ी जूली की तरफ सिर घुमाकर हल्का सा मुस्कुरा भर देती थी। फिर कभी वह टेबिल पर रखी कास्त्रोविएजो कैंची को हाथ में लेकर उससे मरीज के दिल की उन तहों तो टटोलने लगती और फिर रुआंसी सी शक्ल बनाकर जूली से कहती कि माँ कहती थी कि मेरे लिए प्यार को इस निर्मम, कुकर्मी इंसान ने अपने दिल में छुपाकर रखा है, मैंने तो इसके दिल को सारा टटोल लिया, मुझे तो कहीं भी नजर नहीं आया। जूली ने मास्क से आधे ढके अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए चुटकी लेकर कहा; अरी, तू तो उसके दिल की सिर्फ बाहर की तहें ही टटोल रही है, क्या पता उसने तेरे लिए प्यार को दिल की उस गठरी के अन्दर छुपा रखा हो।

उसका इतना कहना था कि क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में अन्दर ही अन्दर जल रही जेनी ने अपना दस्तानेयुक्त दांया हाथ मरीज के दो-फाड़ हुए पड़े सीने के अन्दर घुसेड दिया और उसके दिल की दोनों तहों को हथेली में लेकर जोर से उसे पिचका दिया। जूली को जेनी से ऐंसे व्यवहार के कदापि भी अपेक्षा न थी, उसने चीखते हुए और यह कहते हुए कि साली तू पागल हो गई है क्या, बांये हाथ से एक जोर का चांटा उसकी गर्दन पर कसा। जेनी ने हौले से अपना हाथ मरीज के सीने से ऊपर उठाया और आंसुओं के समंदर में तैरती अपनी आँखों की कातर नज़रों से जूली को निहारा, मुंह से उसके एक भी शब्द नहीं फूटा। जूली भयभीत नजरों से मरीज के दिल को देख रही थी, जो दबाव पड़ने से सिकुड़ सा गया था और धमनियों से उसके काला गाढा खून निकल आया था। तभी सामने से थियेटर का दरवाजा खुला और डाक्टर जैन और उनके सहायक डाक्टर अन्दर  प्रविष्ट हुए। जेनी और जूली को तो जैंसे सांप सूंघ गया था, जूली थर-थर कांप रही थी।

अगले दिन सुबह करीब ग्यारह बजे बाईपास सर्जन डाक्टर जैन मरीज से बातों में मशगूल थे और उसे ह्रदय से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ और सावधानियां बता रहे थे, कि तभी एक ट्रे लेकर जेनी उधर से गुजरी और  डाक्टर जैन ने उसे कड़कती स्वर-ध्वनी में आवाज दी, सिस्टर...... ! जेनी डरी-डरी सी डाक्टर जैन के समीप पहुँची तो सामने बिस्तर पर लेटा मरीज सकपका कर उठने की कोशिश करने लगा। डाक्टर ने उसे रिलैक्स होकर आराम से लेटे रहने की हिदायत दी और फिर चेहरे पर व्यंगात्मक मुस्कान लाकर जेनी को घूरते हुए बोले ;इनसे मिलिए  ये सिस्टर जेनी है , और इन्ही के करामाती इलाज से आप बिना बाईपास सर्जरी के ही ठीक हो गए है, और जहां तक मैं समझता हूँ आपके दिल की धमनियों में अब शायद ही दुबारा कोई रुकावट पैदा हो, क्योंकि धमनियों में जमा हुआ सारा रक्त का थक्का पूरी तरह से साफ़ होकर बाहर निकल चुका है, मेरे लिए यह घटना वाकई किसी  चमत्कार जैसा है, और आपको सिस्टर जेनी का इसके लिए शुक्रिया भी अदा करना चाहिए। मरीज ने एक हल्की मुस्कान चेहरे पर लाते हुए जेनी को निहार उसकी तरफ अपने दोनों हाथ जोड़ दिए थे। जेनी, डाक्टर जैन को 'मैं जाऊ सर' कहकर तेज कदमो से उस वार्ड से बाहर निकल गई थी। आठ साल पुराना मंजर, जब बड़ी बेआबरू होकर वह सुप्रियो के घर से निकली थी, इसवक्त उसकी आँखों के सामने किसी चलचित्र की भांति चल रहा था................................।

विज्ञापन का एक छोटा सा प्रारूप सुप्रियो ने ज्यों ही केबिन में अपनी मेज के ठीक सामने बैठे अपने कार्मिक प्रबंधक श्री गुप्ता को सौंपा तो वह उस पर नजर डालते ही एकदम सकपका कर बोल पडा.... सर, ये क्या, हमारी कंपनी में हिन्दी स्टेनोग्राफर की क्या जरुरत ? आपको तो एक कंप्यूटर ऑपरेटर की जरुरत थी, और आप विज्ञापन हिंदी आशुलिपिक का निकाल रहे है ? हिन्दी में तो हमारे ऑफिस में कोई काम.... सुप्रियो ने शांत स्वर में उसकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा; गुप्ताजी आप सवाल बहुत ज्यादा करते है, मुझे किस चीज की ज्यादा जरुरत है, इसका ध्यान मुझे आपसे बेहतर है, इस कम्पनी का वाइसप्रेसिडेंट-संचालन मैं हूँ, ना कि आप।..... आप जाइये और ऐड निकलवाइए......प्लीज !

भर्ती की निश्चित प्रक्रिया पूरी होने के बाद आकांक्षा बनर्जी उर्फ़ जेनी (वह खुद को इसी नाम से पुकारना ज्यादा पसंद करती थी) को सुप्रियो के चयनानुसार इस पद के लिए चयनित कर लिया गया था। हालांकि जेनी किसी कोर्ट-कचहरी की आशुलिपिक बनने की ख्वाइशे ज्यादा दिल में संजोये थी, किन्तु उपयुक्त अवसर न मिल पाने की वजह से उसने यह नौकरी सहर्ष स्वीकार कर ली थी। इसकी एक वजह और भी थी कि यह जगह उसके घर से मात्र कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर थी, साथ ही वहाँ तक आवागमन के साधनों की भी कोई कमी नहीं थी। शीघ्र ही जेनी ने अपनी कुशलता के बल पर न सिर्फ सुप्रियो के दफ्तर का एक टंकक और वैयक्तिक सचिव का पूरा काम संभाल लिया था, अपितु खाली समय में वह उसके लिए निजी हिन्दी आशुलिपिक और टंकक का काम भी कुशलता पूर्वक करने लगी थी, और कहना गलत न होगा कि उसने अपनी इसी खासियत से सुप्रियो का मन भी जीत लिया था।

एकतीस वर्षीय सुप्रियो एक साहित्यिक, सह्रदय किन्तु अल्पभाषी, अंतर्मुखी नौजवान था। दफ्तर में जेनी के आ जाने से मानो उसे कई मानसिक बोझों से मुक्ति मिल गई थी, साथ ही उसने मन ही मन एक निश्चय भी कर लिया था। समय बीता और जैसा कि अमूमन पत्र-पत्रिकाओं में पढने को अक्सर मिलता रहता है.... एक वह वक्त भी आ ही गया जब सुप्रियो और जेनी प्रणय-बंधन में बंधकर एक दूसरे के हो गए। शादी के दो महीने तक तो सबकुछ सामान्य ही चला, मगर फिर जल्दी ही किसी फ़िल्मी अंदाज में रिश्तों के मध्य खटास पैदा होने लगी। सुप्रियों अति तो नहीं कहेंगे मगर हाँ, एक निश्चित मात्र में नियमित शराब का आदी था और रात को भी जबतब नशे में जेनी से हिंदी की आशुलिपि करवाता रहता था। जेनी को भी जल्दी ही यह महसूस होने लगा था कि सुप्रियो को एक जीवन साथी की कम और एक आशुलिपिक की जरुरत ज्यादा थी, और सुप्रियो का साहित्य-प्रेम उनके निजी जीवन में अनावश्यक दखल दे रहा है। और इसी कशमकश के बीच एक वह दिन भी आ ही गया जब वह रूठकर अपनी माँ के पास अपने मायके चली गई।

जेनी के मायके में सिर्फ उसकी माँ और छोटी बहन अभिलाषा थी, पिता का स्वर्गवास बहुत पहले ही हो गया था। चूँकि उसके पिता जल निगम में कार्यरत थे, और उनकी ड्यूटी के दौरान ही आकस्मिक मृत्यु हुई थी, अत: मृत्यु पश्चात जेनी की माँ को उसके पिता के स्थान पर निगम में ही नौकरी मिल गई थी। फलस्वरूप जेनी और उसकी बहन के लालन-पालन में माँ को ख़ास दिक्कतों का सामना नहीं करना पडा था। जेनी के इस तरह अचानक मायके आ जाने से माँ के माथे पर बल पड़ गए थे, चिंतित माँ ने उसकी कुशलक्षेम पूछी तो वह फफककर माँ के सीने से जा लगी। जिस माँ ने परिपक्व बसंत की फागुनी बयार देखने से पहले ही पतझड़ को गले लगा लिया था और अपनी तमाम उम्र, अपनी दोनों बेटियों के सुखद भविष्य के लिए समर्पित कर दी थी, उसका मन इसवक्त दुविधा और उलझन की दो नावों पर सवार था। एक तरफ वह सोच रही थी कि शायद इसे मेरी और अपनी बहन की याद सता रही होगी, इसलिए यह इसतरह यहाँ चली आई , दूसरी तरफ मन के किसी कोने में यह आशंका भी उठ रही थी कि कहीं इसके और सुप्रियो के बीच में कोई खटपट तो.....! ढाढस बंधाने और कुछ पल बीतने के बाद उसकी माँ ने जेनी के सिर पर हाथ फेरते हुए उससे सुप्रियो का हालचाल पूछा तो जेनी की आँखे एकबार पुन: छलछला आई। सुबकते हुए अपना सिर माँ के सीने पर टिकाते हुए वह बोली, मम्मी, मैंने गलत साथी चुन लिया, वह मुझसे नहीं मेरी आशुलिपि से प्रेम करता है, उसका मेरे प्रति ज़रा भी लगाव नहीं है। स्थिति को समझते हुए उसकी माँ ने एक बार फिर से उसके सिर पर हाथ फेरा, और कहा कि तू तो पगली है, सुप्रियो एक समझदार लड़का है, प्यार कोई दिखाने की वस्तु थोड़े ही है, जो वो तुझे दिखाता फिरे। तेरे लिए उसका प्यार उसके दिल में छुपा हुआ है, जा अभी तू अपने कमरे में आराम कर, हम फिर बाद में बात करेंगे।

अगली सुबह उसकी माँ ने पहले सुप्रियो को फोन किया और उसे अपने यहाँ दिन के भोजन पर आमंत्रित किया और फिर बहुत देर तक जेनी को समझाती रही, अपने घर की परिस्थितियाँ उसे याद दिलाई और कहा कि बेटी, नए घर, नई जगह पर सामंजस्य बिठाने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है, तुझे इतनी जल्दी इन निष्कर्षों पर नहीं पहुंचना चाहिए। देख लेना सुप्रियो के दिल में तेरे लिए बहुत प्यार छुपा है, मैंने अभी उससे फोन पर बात भी की थी और उसे लंच पर बुलाया है,.... तू फ़िक्र मत कर सब ठीक हो जाएगा। दोपहर में ठीक वक्त पर सुप्रियो अपनी ससुराल पहुँच गया था, माँ की दिलाशाओं और सुप्रियो की बातों में आकर जेनी एक बार पुन: उसके साथ हो ली थी। किन्तु लाख कोशिशों के बाद भी उनके गृहस्थ की गाडी ठीक से पटरी पर आने को तैयार न थी, सांझ ढलते ही सुप्रियो रोज की भांति अपनी औकात पर आ जाता था। आखिरकार वह दिन भी आ ही गया, जिसकी जेनी को आशंका थी। सुप्रियो ने आज कुछ ज्यादा ही पी ली थी, और जब थोड़ी देर की तू-तू..मैं..मैं के बाद जेनी ने यह कहा कि तुम्हे मैं नहीं, मेरी आशुलिपि चाहिए तो सुप्रियो भड़क गया और वह सब कह गया जिसकी जेनी ने सपने में भी आश नहीं की थी। उसने कहा, तुम इसे आज के बाद मेरी मूक गर्जन समझ लो या फिर गगनभेदी चुप्पी, लेकिन अगर तुम्हे मेरे साथ रहना है तो मेरी शर्तों पर चलना होगा,अन्यथा ...... !

सुप्रियो के शब्द मानो जेनी पर बिजली गिरा रहे थे, उसने झटपट अपना सामान समेटा और सुप्रियो को हमेशा के लिए विदा कहकर अपने मायके चली आई थी। स्टेनोग्राफी से उसे अब नफरत सी हो गई थी. अत: अपनी माँ की सलाह पर उसने नर्स का कोर्स ज्वाइन कर लिया था। साथ ही वह अब सुप्रियो संग बिठाये पलो को एक दु:स्वप्न मानकर उसे हमेशा के लिए भुला देना चाहती थी। समय पंख लगाकर उड़ता चला गया। इसबीच नर्स की ट्रेनिंग पूरी कर उसने दूसरे शहर के ह्रदय रोग से सम्बंधित एक बड़े हॉस्पीटल में नौकरी ज्वाइन कर ली थी। उसकी छोटी बहन अभिलाषा की भी शादी हो चुकी थी, और उसकी माँ भी नौकरी से सेवानिवृत हो गई थी,इसलिए वह अपनी माँ को भी अपने साथ ही ले आई थी।

करते-करते यूँ ही कुछ साल और गुजर गए। नर्स के पेशे में आने के बाद जेनी को अपनी घनिष्ठ मित्र के रूप में एक अन्य नर्स केरल की जूली भी मिल गई थी, जिससे वह अपना सारा दुखदर्द और खुशियाँ बांटती थी। जेनी की रोजमर्रा की जिन्दगी अब एंजियोग्राम,एंजियोग्राफी,एंजियोप्लास्टी,हार्ट अटैक, स्टेंटिंग प्रोसेस एवं बाई पास सर्जरी जैसे शब्दों पर आकर सिमट गई थी, कि तभी एक दिन एक ख़ास मरीज ने उनके अस्पताल में दस्तक दी.....।

मंगलवार का दिन, जेनी की अस्पताल की नौकरी का साप्ताहिक छुट्टी का दिन.....जूली भी जेनी के संग उसी घर में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती थी। जेनी कुछ दिनों से उदास सी चल रही थी, अत: उसकी माँ इस बाबत उससे और जूली से सुबह से तीन बार पूछ चुकी थी कि उसका चेहरा इतना मुरझाया क्यों है? मगर उसे न तो संतोषप्रद जबाब न जूली से मिला था और न ही जेनी से। फिर माँ ने उसे मूली के परांठो का नाश्ता खिलाकर यह प्रस्ताव उसके समक्ष रख ही रही थी कि क्यों न आज हम सभी अभिलाषा के घर चलें, बहुत दिनों से मुलाकात नहीं हुई और साथ ही जेनी का मूड भी कुछ सुधर जाएगा...कि तभी एक लम्बी होंडा एकोर्ड घर के बाहर रुकी। ड्राइवर ने तेजी से अपनी सीट से उतरकर कार के पीछे से घूमकर आकर बांई तरफ का पिछली सीट का दरवाजा खोला। सुप्रियो आहिस्ता-अहिस्ता गाडी की सीट से नीचे उतरा और घर के दरवाजे से कमरे की तरफ बढ़कर जेनी की माँ से मुखातिव हुआ। उसने सलीके से माँ के पैर छुए और फिर सीधा खडा होकर उसने दोनों हाथ जोड़ लिए। जेनी की माँ ने चेहरे पर बिना कोई भाव प्रकट किये उसे सामने पड़े सोफे पर बैठने का इशारा किया।

मगर सुप्रियो सोफे पर बैठने के बजाये माँ के चरणों में गिर पडा और गिडगिडाने लगा; आप और जेनी मुझे माफ़ कर दो माँ, बस, मुझे मेरा प्रायाश्चित करने का सिर्फ और सिर्फ एक मौक़ा और दे दो। मैं जेनी की हर ख्वाइश पूरी करने का भरसक प्रयत्न करूंगा, जेनी की खुशियों के लिए मैं नशा क्या हर व्यसन छोड़.... ! जेनी सुप्रियो संग जाने के लिए तैयार हो रही थी और जूली उसे कुहनी मारकर कनखियों से निहारते हुए चिढाने की कोशिश करते हुए कह रही थी... देखा तूने, आखिरकार माँ का बोला हुआ ही सच निकला न कि उसने तेरे लिए प्यार अपने दिल में छुपाकर  रखा है ...................अब उसे दुबारा पिचकाकर बाहर निकालने की कोशिश मत करना ।

इतश्री !











 
























Sunday, February 27, 2011

शारदा !

कृष्णा बाथरूम से नहाकर ज्यों ही बाहर अपने कमरे में पहुंचा और उसने तौलिये से अपने गीले बालों को हौले-हौले रगड़ना शुरू किया, तभी किचन से स्वाति ने भी कमरे में प्रवेश किया और बोली; सुनो जी, आज गणतंत्र दिवस की छुट्टी है, मार्केट बंद रहेगा। तुम भी फ्री हो, क्यों न आज हम लोग माँ को मिलने चलें, हमारी शादी के बाद जबसे बेचारी जेल गई है, हम लोग एक बार भी उनकी कुशल-क्षेम पूछने नहीं गए। एक बार राहुल को तो उनसे मिला देते, वह भी दो-ढाई साल का हो गया है, उसने भी अभी तक अपनी दादी को नहीं देखा।

स्वाति की इस बात पर एक बार तो कृष्णा भड़क ही गया, और स्वाति की तरफ देखते हुए गुस्सैल अंदाज में बोला, यार मैं तुम्हे कितनी बार बता चुका कि मुझे नहीं मिलना किसी माँ-वां से, मेरी माँ पांच साल पहले मर चुकी, अब मेरी कोई माँ-वां नहीं है। कृष्णा की बात सुनकर, थोड़ा रूककर स्वाति ने अपने दोनों हाथों से उसका बाजू पकड़ते हुए उसे पुचकारते हुए बोली "यार, वो तुम्हारी माँ है, तुम कैसे निष्ठुर बेटे हो। एक बार भी यह नहीं सोचते कि बिना उनकी बात सुने ही हमलोगो ने उनसे इसतरह किनारा कर लिया, कोई तो बात रही होगी जो तुम्हारी माँ ने इतना कठोर कदम उठाया। इतनी तो उनके लिए नफ़रत मेरे दिल में भी नहीं है, जो उनकी बहु हूँ, और जिसने अपने पिता को …......."

स्वाति ने अपनी बात अधूरी ही छोड़ दी, उसके मोटे-मोटे नयन छलछला आये थे। यह देख कृष्णा नरम पड़ते हुए, अपनी हथेली से उसके गालो पर लुडक आये आंसूओं को फोंछ्ते हुए बोला, अच्छा बाबा,ब्लैकमेल करना तो कोई तुमसे सीखे। चलो ठीक है, अगर माँ से मिलने की तुम्हारी इतनी ही हार्दिक इच्छा है तो फटाफट नाश्ता तैयार करो, राहुल को जगाकर उसे भी तैयार कर लो, फिर चलेंगे। कृष्णा पर अपनी बात का असर होता देख स्वाति का चेहरा एक बार फिर से खिल उठा। अपने गालो को अपने दोनों हाथों से साफ़ करते हुए उसने उछलकर अपने से तकरीबन एक फुट लम्बे कृष्णा की गर्दन में अपने दोनों हाथ फंसाकर उसकी गर्दन नीचे खींचते हुए उसे थैंक्यू कहकर उसका माथा चूम लिया। उसके बाद वह वापस किचन में चली गई।

लेकिन भाग्य को तो शायद कुछ और ही मंजूर था। और कभी-कभार यह देखा भी गया है कि जिस बात का अचानक ही जुबां पर कभी कोई जिक्र आ जाए, उसके पीछे उससे सम्बंधित कोई अदृश्य घटनाक्रम या तो पहले ही घटित हो चुका होता है, या फिर घटित होने वाला होता है। कृष्णा के लिए किचन में चाय तैयार करते हुए इधर स्वाति इतने सालों बाद पहली बार अपनी सासू माँ से जेल में मिलने जाने के ख्वाब सजाते हुए अपने मानस पटल पर उस वक्त के भिन्न-भिन्न काल्पनिक परिदृश्य, जब वह अपनी सासू माँ से जेल में मिल रही होगी, किसी चित्रपट की तरह परत दर परत आगे बढ़ा रही थी, और उधर बाहर मेन गेट पर एक खाकी वर्दीधारी जोर-जोर से गेट का ऊपरी कुंडा खटखटा रहा था।

आवाज सुनकर स्वाति जब किचन से निकलकर घर के मुख्य द्वार पर पहुची, उसने देखा कि कृष्णा पहले ही आँगन के बाहर मेन गेट पर पहुँच चुका था, और उस खाकी वर्दीधारी से कुछ बातें कर रहा था। कुछ देर बातें करने के बाद जब वह खाकी वर्दीधारी वहाँ से चला गया तो कृष्णा भी घर के मुख्य द्वार की तरफ मुडा। भारी डग भरते हुए जब वह स्वाति के पास पहुंचा तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। बिना एक पल का भी इन्तजार किये स्वाति ने आशंकित और कंपकपाती आवाज में पूछा; क्या हुआ, कौन था वो वर्दीधारी? कृष्णा ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया और स्वाति को अन्दर चलने का हाथ से इशारा भर किया। ड्राइंग रूम में पहुंचकर दोनों साथ-साथ सोफे पर बैठ गए। जबाब सुनने को आतुर स्वाति ने फिर से वही सवाल दुहराया। कृष्णा ने सुबकते हुए अपना सर बगल में चिपककर बैठी स्वाति के सर पर रखते हुए कहा; जेल से था, मुझे तुरंत आने को कहा है....माँ ने कल रात को अपनी हाथ की नशे काटकर आत्महत्या कर ली। कृष्णा की यह बात सुनकर स्वाति हतप्रभ रह गई, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक पलटी इस तकदीर की बाजी पर वह खुद रोये या फिर कृष्णा को ढाढस बंधाये।

कुछ पल यों ही बेसुध बैठा रहने के बाद कृष्णा उठा और स्वाति को राहुल के पास घर पर ही ठहरने की सलाह देते हुए जिला जेल जाने की तैयारी करने लगा। वहाँ पहुँचने पर वह सीधे जेलर के दफ्तर में घुसा। जेलर जोशी मानो उसी का इन्तजार कर रहे थे, उसे अपने सामने की कुर्सी पर बिठाते हुए जेलर ने कृष्णा से अपनी संवेदना व्यक्त की और उसे उसकी माँ का वह पत्र सौंपा जिसे वह पिछली शाम को ही जेल के एक कर्मचारी को यह कहकर सौंप गई थी कि इसमें उसने अपने बेटे-बहु के लिए अपनी कुशल-क्षेम और पोते के लिए आशीर्वाद भेजा है, और इसे वह तुम लोगो तक पहुंचा दे। आज सुबह तडके जब हमें इस घटना की जानकारी मिली, तब उस कर्मचारी ने यह पत्र मुझे दिया। लाश अभी पोस्टमार्टम के लिए गई हुई है, तुम्हे कुछ देर इन्तजार करना होगा।

माँ का दाह-संस्कार संपन्न करने के उपरान्त रात को कृष्णा ने बड़े ही सलीखे से एक बंद लिफ़ाफ़े में रखा, माँ का वह ख़त खोला जो जेलर ने उसे सौंपा था। चिट्ठी क्या थी बस एक तरह से २५ जनवरी २०११ का अपने हाथों का लिखा माँ का आत्म-कथ्य था। लिखा था;
बेटा,
मैं बहुत थक गई हूँ, विश्राम लेना चाहती हूँ, प्रभु के दर्शन की इच्छा ने मेरी भूख, प्यास और नींद भी छीन ली है। मैंने अपनी आत्मा के अन्दर बहुत से सवाल समेटकर रखे है, उस पार अगर सचमुच कोई अनंत परमेश्वर है, और मेरा सामना वहाँ उनसे होता है , तो इन अपनी सवालों की पोटली को उनके समक्ष खोलूँगी जरूर। आशा करती हूँ कि मेरे इस पत्र को पढने के बाद तुम और स्वाति मुझे माफ़ कर दोगे।

लोग कहते है कि सब कुछ यहाँ भाग्य पर निर्भर होता है, लेकिन मैं जब पलटकर देखती हूँ तो न जाने क्यों मुझे लगता है कि तमाम उम्र अपने भाग्य के दिन तो मैंने खुद ही तय किये, और आज फिर से आख़िरी बार भी वही दोहरा रही हूँ। इंसान क्या सोचता है और क्या हो जाता है। जानती हूँ कि जो कदम मैं उठाने जा रही हूँ, सामान्य परिथितियों में कोई भी विवेकशील पढ़ा-लिखा इंसान उसे पसंद नहीं करता, मगर कभी-कभी जीवन में वो मोड़ भी आ जाते है, जब क्या अच्छा है और क्या बुरा, जानते हुए भी इंसान खुद को मन के प्रवाह में बहने से नहीं रोक पाता।

बचपन में तुझे हमेशा यह शिकायत रहती थी कि इलाके के अन्य बच्चों की तरह हम लोग भी तुझे तेरे दादा-दादी, नाना-नानी से क्यों नहीं मिलवाने ले जाते। आज तेरी उस शिकायत पर अमल न करने की वजह भी मैं यहाँ बताये देती हूँ। साथ ही स्वाति की वह शिकायत भी दूर करूंगी कि मैंने क्यों उसके पापा की ह्त्या की थी। हाँ, मेरे नन्हे पोते की भी जरुर मुझसे यह शिकायत होगी कि मैं उसे क्यों नहीं मिली, तो उसकी मैं इसबात के लिए जन्म-जन्मों तक गुनाहगार रहूंगी कि मैं उसकी शिकायत नहीं दूर कर पाई।

बेटा, तेरे नाना यानी मेरे पापा गरीब तबके के लोग थे, और मोदीनगर में एक टैक्सी ड्राइवर थे। वे मुख्यत: सूगर मिल के अधिकारियों को लाने ले जाने का काम करते थे। हम लोग मोदीनगर में एक छोटे से मकान में रहते थे, जो मोदी भवन के ठीक सामने लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास में था। चार भाईबहनो में मैं सबसे बड़ी थी, और मेरे पापा मुझे बहुत लाड देते थे। वे मुझे पढ़ा-लिखाकर एक सशक्त लडकी बनाना चाहते थे, अत: घर की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी उन्होंने मुझे ग्रेजुएशन करवाया। खाली समय में वे मुझे टैक्सी चलाना भी सिखाते थे, उस जमाने में मुख्यतया दो तरह की ही गाड़ियां लोगो के पास थी, एक फिएट और दूसरी एम्बेसडर। मैं अपने कॉलेज की कबड्डी की एक कुशल खिलाड़ी भी थी।

फाइनल इयर के दौरान एक बार अंतर्राज्य खेल प्रतिस्पर्धा के लिए मैं और मेरी टीम के अन्य सदस्य महीने भर के कैम्प में दिल्ली गए हुए थे। जालिम दुनिया के फरेबों से बेखबर मैं पूरी लग्न से अपने खेल की प्रेक्टिस में जुटी थी कि वहीं एक सुन्दर, हट्टा-कट्ठा नौजवान मेरे इर्दगिर्द मंडराने लगा। मेरे खेल की तारीफ़ के बहाने वह मेरे करीब आया और बड़े ही शालीन ढंग से उसने अपना परिचय कीर्तिनगर, दिल्ली निवासी मनोज गुप्ता के रूप में दिया। अब वह हर रोज ही हमारे कैम्प के आस-पास मंडराने लगा था। एक दिन फिर वह हमारी खेल टीचर से मीठी-मीठी बाते कर मेरा पता भी पूछ बैठा। उसने मुझे बताया कि वह ब्रिटेन में नौकरी करता है, और अगले सप्ताह वह वापस ब्रिटेन चला जाएगा। फिर एक दिन वह थोड़ी देर के लिए आया और झट से यह कहकर चला गया कि वह सिर्फ मुझे बाय कहने आया था क्योंकि उसके पास अब समय कम है, उसे वापसी की तैयारी करनी है, और साथ ही यह भी बता गया कि उसके पिता जोकि एक जाने-माने व्यापारी है, मेरे पिता से मिलने मोदीनगर आयेंगे।

और फिर कुछ समय बाद एक दिन शाम को हमारे घर के आगे एक एम्बेसडर रुकी, एक ५८-६० साल का अधेड़ मेरे पिता के साथ हमारे घर के आया। उसने खुद को मनोज का पिता बताया और कहा कि वैसे तो बराबरी में आप लोग हमारे मुकाबले कहीं भी नहीं बैठते , लेकिन मेरा लड़का आपकी बेटी को पसंद करता है,क्योंकि उसे बोल्ड और निर्भीक लडकिया पसंद है, अत: बेटे की जिद के आगे मैं यह रिश्ता करने के लिए मजबूर हूँ। हमें आपसे दहेज़ में कुछ भी नहीं चाहिए, और न ही हम किसी गाजेबाजे के साथ आयेंगे, मेरा बेटा साधारण ढंग से शादी करने का पक्षधर है। लेकिन आप यह भली प्रकार से समझ ले कि शादी के बाद आपकी बेटी को तुरंत मेरे बेटे के साथ ब्रिटेन रहने के लिए जाना होगा। बेटी के लिए एक अच्छा घर मिलने की आश में मेरे पिता ने भी तुरंत हामी भर ली।

और फिर करीब तीन महीने बाद तयशुदा दिन पर दुल्हा मनोज गुप्ता दस-ग्यारह लोगो की एक बारात के साथ हमारे घर पर उतरा। घरवाले खुश थे कि उनकी बेटी एक बड़े घर में जा रही है। और जल्दी ही विदेश भी चली जायेगी। भोर पर डोली विदाई हुई और मैं दुल्हन बनकर दिल्ली आ पहुँची। घर न जाकर बारात सीधे एक होटल में गई। जहां न सिर्फ दिनभर बल्कि रात दस बजे तक पार्टी चलती रही। इस बीच मैं यह नोट कर रही थी कि मेरा दुल्हा कम और दुल्हे का पिता और मेरा तथाकथित ससुर, मेरे इर्द-गिर्द ज्यादा घूम रहा था। मेरे साथ विदा करने आया मेरा छोटा भाई और एक चचेरा भाई भी दिन में वापस मोदीनगर लौट चुके थे। फिर रात दस बजे तीन-चार कारों का काफिला कीर्तिनगर, मनोज के घर को चल पडा। घर पहुंचकर मैंने देखा कि घर पर कोई ख़ास चहल-पहल नहीं थी। मेरे अंतर्मन के चक्षु किसी संभावित खतरे से आशंकित थे। और फिर एक ३०-३५ साल की महिला मेरा हाथ पकड़कर ड्राइंग रूम से उस घर के बेसमेंट स्थित एक बड़े से कमरे में ले गयी और मुझे रिलेक्स होकर बैठने की सलाह देकर खुद कहीं चली गई।

कमरा सामान्य ढंग से सजाया गया था, मैं दुल्हन के लिबास में सिमटी बेड के एक कोने पर बैठ गयी। रात करीब साढ़े बारह बजे मैं यह देख हतप्रभ रह गई कि उस कमरे में नशे में धुत मनोज का बाप घुस आया था। मै कुछ समझ पाती इससे पहले ही उसने अन्दर से दरवाजा बंद कर लिया। उसके हाथ में कुछ चाबियों के गुच्छे थे, उसमे से एक चाबी का गुच्छा उसने सामने पडी मेज पर रख दिया, वह कार की चाबिया थी। मैं बेड से उतर फर्श पर खडी हो गई। मै मनोज-मनोज चिल्लाना चाह रही थी, मगर डर के मारे मेरे मुह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। उसने लडखडाते हुए मुझे शांत रहने को कहा और हाथ में पकडे दूसरे चाबी के गुच्छे से सामने दीवार पर लगी लकड़ी की आलमारी खोलने लगा। बड़ी मुश्किल से वह वह आलमारी खोल पाया और फिर आलमारी से ढेर सारे नोटों के बण्डल और गहने निकाल-निकालकर सामने पडी टेबल पर डालने लगा। फिर उसने आलमारी से एक शराब की बोतल और दो गिलास भी निकाले।

मै दरवाजे की तरफ भागी, मगर दरवाजे पर उसने ताली से अन्दर से लॉक लगा दिया था। वह उसी अवस्था में हँसते हुए मेरी तरह बढ़ा और मुझे बेड की तरफ खींच कर ले गया। मुझे बेड पर बैठने का इशारा करते हुए उसने उन नैटो के बंडलों की तरफ इशारा करते हुए अपनी अमीरी की डींगे हांकी और मुझे तरह-तरह के सब्ज-बाग़ दिखाए। फिर उसने जो सारी कहानी सुनाई तो उसे सुनकर मैं दंग रह गई। उसने बताया कि न तो मनोज गुप्ता उसका बेटा था और न शादी में आये मेहमान उसके कोई रिश्तेदार, सब किराए पर लिए गए आवारागर्द, चोर-मवाली थे। वह एक विधुर था और उसके एक बेटी थी, जिसकी शादी हो रखी थी। हवस के भूखे उस इंसान को एक जवां बीवी चाहिए थी,और पैंसे के बल पर उसने वह सारा नाटक रचा था।

सारी परिस्थिति को समझने और उसकी नशे की स्थित को भांपने के बाद मैंने भी मन ही मन एक फैसला कर लिया था और दिमाग से काम लेने की ठान ली थी। वह लडखडाता हुआ ज्यों ही बेड पर बैठा, मैंने लपककर सामने रखी शराब की बोतल उठाई और एक बड़ा सा पैग बना कर उसकी तरफ बढ़ा दिया। मेरे इस बदलाव पर वह खुश था उसने मुझे भी शराब पीने को कहा, लेकिन मैंने ना में सिर्फ सिर हिलाया। एक-एककर वह तीन बड़े पैग पी गया और वहीं बेड पर एक तरफ को लुडक गया। मैंने हौले से वह शराब की बोतल उसके सिर पर दे मारी। यह सुनिश्चित करने के बाद कि वह पूर्ण अचेतन स्थित में जा चुका है, मैंने सामने पडी चाबियों का गुच्छा उठाया और दरवाजे को खोलने की कोशिश करने लगी। शीघ्र ही दरवाजे की चाबी गुच्छे में से मुझे मिल गई। मैंने धीरे से दरवाजा खोला और बाहर बेसमेंट के हॉल का जायजा लिया, कही कोई आहट नहीं थी। मै फिर ऊपर सीढिया चढ़कर मुख्य दरवाजे तक पहुँची, दरवाजे पर भी अन्दर से लॉक लगा था, मैंने पास की खिड़की के शीशे से बाहर का जायजा लिया, बाहर गेट पर एक एम्बेसडर कार खडी थी। मै तुरंत ही फिर से बेसमेंट में गई और कमरे और आलमारी में रखे खजाने को वही रखे एक वैग में जल्दी-जल्दी समेट लिया और सामने टेबल पर पडी कार की और अन्य चाबियों का गुच्छा उठाकर गेट की तरफ लपकी।

दुर्भाग्यशाली पलों में मेरा यह तनिक सौभाग्य ही कहा जायेगा कि न सिर्फ़ मैं उस नरक से छूट्कर बाहर आ गई थी, अपितु कार की चाबियां भी मेरे पास मौजूद थी। मैंने तुरंत बैग को कार की पिछली सीट पर रखा और जल्दी से कार स्टार्ट कर उसे दिल्ली की तडके की शुनसान सड़कों पर दौडाने लगी। पिता का सिखाया ड्राविंग हुनर आज काम आ रहा था। करीब एक घंटे बाद मैं मोदीनगर के समीप थी, मगर मैंने घर न जाने का फैसला कर लिया था। मैंने कार हाइवे पर मेरठ की तरफ बढ़ा दी। और तडके ही विजय यानि तुम्हारे पिता के मेरठ स्थित निवास पर पहुँच गई। यह भी बता दूं कि विजय मोदीनगर में हमारे पड़ोसी थे और मुझसे शादी करना चाहते थे। वे अनाथ थे और अपने ननिहाल में पले-बढे थे। उनके मामा इस रिश्ते के खिलाफ थे, अत: उन्होंने उनकी शादी दूसरी जगह कर दी, लेकिन दूसरे प्रसव पर वह चल बसी, तेरी बड़ी बहन संध्या मेरी अपनी कोख से नहीं जन्मी वह उसी माँ की प्रथम संतान है।

वहाँ पहुँचकर मैंने सारी वस्तुस्थित विजय को बतायी और इस शर्त पर उनसे शादी करने को राजी हुई कि हम इस शहर को छोड़कर तुरंत कही दूर किसी जगह चले जायेंगे। विजय विधुर थे और उनके समक्ष नन्ही संध्या का भी सवाल था, अत: वे मेरी हर शर्त को मानने के लिए तैयार थे। और तब हमने तुरंत ही मेरठ से सिफ्ट होकर नैनीताल से बारह किलोमीटर दूर किल्बुरी के समीप बसने का फैसला किया। दिल्ली से उठाकर लाई गई धन-दौलत हमारे खूब काम आई और तुम्हारे पिता पर्वतीय क्षेत्रों में एक होटल चेन खोलने में सक्षम रहे थे। और उनकी मौत के बाद परिवार के लालन-पालन और तुम दोनो भाई-बहनो की शादि-ब्याह मे भी मुझे कोई दिक्कत नही हुई।

लेकिन मेरी किस्मत यंही तक मुझसे इंतकाम लेने से संतुष्ट नहीं थी। इस ऊँचे-नीचे जीवन सफ़र में चलते-चलते मैं उस मनोज गुप्ता की शक्ल सूरत भी भूल गई थी, जिसने मेरी जिन्दगी के साथ ऐसा खिलवाड़ किया था। किन्तु, फिर जिन्दगी ने एक और करवट ली और तुम अपनी जवानी में जिस लडकी के प्यार में फंसे, और जिसे तुमने अपनी जीवन संगनी बनाया, वह जब दुल्हन बनके हमारे घर आई तो अतीत का वह दैत्य भी पीछे-पीछे हमारे घर चला आया। तुम लोग हनीमून के लिए गए थे और मैं घर पर अकेली थी। वह दैत्य, जो अपने कुकृत्यों के बल पर अब एक विधायक था, न सिर्फ मेरे साथ लिए गए सात फेरों की दुहाई देकर उम्र के इस मोड़ पर भी मेरा जिस्म पाने की फिराक में था, अपितु अपनी विधायकी की धौंस देकर मुझे ब्लेकमेल भी करना चाहता था। मैंने गंडासे से उसका क़त्ल कर डाला और यह सोचकर कि अगर मैंने खुद अपना जुर्म नहीं कबूला तो पोलिस तुम लोगो को परेशान करेगी, सीधे थाने जाकर आत्मसमर्पण कर दिया।

जो बात मैं तुम्हे आज बता रही हूँ वह तब भी तुम्हे बता सकती थी। लेकिन इस डर से कि कहीं तुम इसका दोष स्वाति पर भी मढने लगो, मैं खामोश रही और सच कहूँ तो जो कदम अब उठा रही हूँ , इसी वजह से तब नहीं उठाया था। अब मैं सुनिश्चित हूँ कि तुम ऐसी कोई नादानी नहीं करोगे जिससे तुम्हारे और स्वाति के रिश्तों में कोई दरार आये, क्योंकि स्वाति भी एक समझदार लडकी है। यहाँ जेल में सभी लोग बहुत अच्छे ढंग से मेरे साथ पेश आते थे और यहाँ तक कि तुम लोगो की कुशल क्षेम भी मुझ तक पहुंचाते थे। मुझे मेरा दादी बनने की खुशखबरी भी इन्ही लोगो ने मुझे दी थी। तुम्हे एक बार फिर से यह वचन देना होगा कि तुम उस मनोज गुप्ता के कुकृत्यों का कोई भी दोष उसकी बेटी को नहीं दोगे। मैं तुम्हारे सुखी-संपन्न पारिवारिक जीवन की एक बार फिर कामना करती हूँ !मेरे पोते को मेरा ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद देना।
तुम्हारी अभागन माँ ,
शारदा


नोट :कहानी के पात्र और स्थान सभी काल्पनिक है !

चुनोती

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