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Showing posts from 2012

नूतन वर्ष की वधाईयां !

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सच कहूं  तो  इस बार इस नववर्ष  की बेला पर मन में कोई ख़ास उत्साह नहीं है, फिर भी जीवन रूपी कारवां  उम्मीदों के सहारे ही आगे बढ़ता है  इसलिए आप सभी को नूतन वर्ष की बहुत-बहुत वधाईयां !  आइये इस नए   साल को हम  "समाज की दरिंदगी को दण्डित करने का वर्ष "     के रूप में मनाये।  

कार्टून कुछ बोलता है- मिर्च पाउडर स्प्रे !

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नए साल में फिर से करेंगे मिलकर नए घोटाले----- हम भारत वाले----हम भारत वाले-------!

साल ख़त्म होने को आया, दुनिया बहुत बोल चुकी। यूं समझिये कि साल भर बोलती रही इसलिए अब मैं क्या बोलू, और सिर्फ मेरे बोलने भर से होगा भी क्या ? वैसे भी मुहंफट हूँ।  कुछ ऐसा-वैसा बोल गया जो चाचा कुदाल-सब्बल अथवा अंग्रेजन माई की शान में गुस्ताखी हो तो खामखा इस बुढापे में काला पानी की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। मजाक नहीं कर रहा, जो कुछ दृष्ठि-गौचर  इस पूरे साल के दरमियाँ हुआ उससे तो यही आभास मिलता है कि एक अघोषित तानाशाही में जी रहे है। जैसा तीसरा चश्मदीद तैयार हुआ चौथा भी  हो जाएगा। बहुत ज्यादा मुश्किल काम थोड़े ही है, कम से कम हमारे इस महान लोकतांत्रिक देश में तो। खैर, छोडिये, जब सब कुछ भगवान् भरोसे छोड़ ही दिया गया है तो अरदास, कीर्तन-भजन, कब्बाली और कैंडल मार्च में ही भलाई है। वैसे आपको बताता चलू कि अभी कल-परसों मैंने जब कहीं पर पढ़ा था कि हालिया बलात्कार की जांच के सम्बन्ध में जो आयोग बैठाया गया है उसने इ-मेल के जरिये जनता के सुझाव मांगे है। इस कबाड़ी माइंड में भी एक तथाकथित धाँसू आइडिया आया ...

अपनी शान कहते थे तुझे !

आन,बान,शान,  आह बिखरी, दरिंदगी अब हर राह बिखरी।  नजर दौड़ाता हूँ जिधर भी ,    अस्मत और कराह बिखरी।  चेहरे है सभी कुम्हलाये हुए,  व्यथा-वेदना अथाह बिखरी।       लुंठक लूट रहे है वाह वाही,  चाटुकारों की सराह बिखरी। पैरोकारी के साम्राज्य पथ पर ,    शठ-कुटिलों की डाह बिखरी।

अरे वो अधर्मी !

अरे वो अधर्मी,  बड़ी ही अजब है तेरी ये बेशर्मी,  कड़क सर्दी में भी  ताप रहा देश, बलात्कार एवं  भ्रष्टाचार की गर्मी।   अरे वो अधर्मी ! ऐसा चल रहा है  सुशासन तेरा,  सदय पे जुल्म,  शठ पे नरमी, डरा-डरा सा है हर  वतन-परस्त,      जेड-प्लस तले  घूम रहे कुकर्मी।   अरे वो अधर्मी !!

कार्टून कुछ बोलता है-डूम्स-डे

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कार्टून कुछ बोलता है- ओल्ड हैबिट्स डाई हार्ड !

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दीन हम, दयनीय हमारी प्राथमिकताएं !

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जीवन-जगत को देखने, परखने और भोगने का इंसान का दृष्टिकोण, व्यवस्था के प्रति उसका रुख, जीवन में सफलताएँ हासिल करने हेतु प्राथमिकताओं का चयन और उन पर उचित समय में क्रियानवन, न सिर्फ उस इंसान बल्कि जिस समाज और देश में वह रहता है, उसका भी भविष्य निर्धारित करता है। आज जो कुछ हमारे आस-पास घटित हो रहा है,सभ्यता, तरक्की और विकास के नाम पर जो कुछ हम कर रहे है, उनको देखकर लगता है कि न सिर्फ नीयत ही हमारी डोल गई है अपितु, अपनी प्राथमिकताये तय करते वक्त हमसे जाने-अनजाने कहीं बहुत बड़ी गड़बड़ भी हो गई है।   और इन गड़बड़ियों की एक मुख्य वजह यह भी है कि हम लोग संकीर्ण स्वार्थों में इस कदर डूब गए है कि दीर्घकाल में उसका हम पर, हमारे समाज पर और हमारे देश पर क्या असर पड़ने वाला है, उसकी हम लेशमात्र भी चिंता नहीं करते। हाँ, परम्परानुसार दिखावे के लिए अर्थी को कन्धा देते वक्त दो-चार घडियाली आंसू बहाना हम हरगिज नहीं भूलते। किसी भी प्राथमिकता के प्रति प्रतिबद्धता, सम्बद्धता और आबद्धता तो हमारे लिए मानो दूर की कौड़ी बनकर रह गई है। उत्थान की बात जब हमारे जहन में आती है तो हमें यह नही भूलना चाहिए क...

मर्जी के मालिक कारिंदे है।

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आबरू बचाते  कुछ मर गये, कुछ जिंदे है, दरख़्त की शाख पर  बैठे, डरे-डरे परिंदे है । खौफजदा है सभी यहां,निवासी  शहर के ,  क्योंकि  बेख़ौफ़    घूमते  फिर रहे  दरिंदे है।     इस कदर फैला है  दहशत का ये आलम,,      दरवान सोये है, और सरपरस्त  उनींदे है। शर्म से सर हिन्द का,झुक रहा बार-बार, बेशर्म बने बैठे सब सरकारी  नुमाइन्दे है।       फरियाद  करें भी तो करें  किससे 'परचेत',   मर्जी  के मालिक, हो गए सब  कारिंदे है।        

मूर्खता और लालच !

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गत सप्ताह एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने हेतु उत्तराखंड की यात्रा पर था । वहाँ एक  परिचित के मुख से सुनी एक पुरानी आंचलिक कहानी को यहाँ लिपिबद्ध कर रहा हूँ। संभव है कि कुछ लोग इस कहानी से पहले से वाकिफ हो फिर भी   उम्मीद करता हूँ कि कुछ पाठकगण, खासकर बच्चों को पसंद आयेगी । एक गाँव में एक निर्धन मगर बहुत ही चालाक किस्म का किसान रहता था । घर की परिस्थितियों के अनुरूप किसान की पत्नी खान-पान में भी मितव्ययता बरतने का भरसक प्रयास करती थी, लेकिन किसान को यह पसंद न था । फलस्वरूप उसने अपनी पत्नी से कहा कि आइन्दा वह जब भी भोजन पकाए  तो दो आदमियों का खाना अतिरिक्त बनाया करे, भले ही उस अतिरिक्त भोजन को उन्हें दू सरे वक्त में ही क्यों न खाना पड़े ।  एक दिन किसान लकड़ी लेने जंगल गया तो उसे वहाँ दो खरगोश के बच्चे मिल गए । वह उन्हें घर ले आया और उनका पालन-पोषण करने लगा । एक दिन वह अपने बैलों संग हल जोतने के लिए खेतों में गया था तो वह एक खरगोश भी साथ ले गया था । हल लगाते वक्त उसने उस खरगोश को हल के ठीक पीछे रस्सी से बांध दिया ।  ...

कार्टून कुछ बोलता है- बन दुख नाथ कहे बहुतेरे !

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कार्टून कुछ बोलता है- राज को राज रहने दो !

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सिराज-उद- दौलाह और मीर कासिम की इस हार के मायने? -एक तुलनात्मक लेखा-जोखा !

क्या सचमुच अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के बैनर तले प्लासी और बक्सर का युद्ध एक बार पुन: जीत लिया है?सवाल कुछ लोगो के लिए मामूली सा, कुछ के लिए गंभीर और कुछ के लिए हास्यास्पद भी हो सकता है, किन्तु अठारह्वीं सदी (सन 1754-1764)और इक्कीसवी सदी( सन 2004-2014)  के इन दो महत्वपूर्ण युद्धों के बीच मुझे तो अनेक समानताएं नजर आ रही है। मसलन, बंगाल के नवाब अलीवर्दी खान की विधवा घसीटी बेगम और लॉर्ड क्लाईव की बढ़ती महत्वकांक्षाएं तब भी भारतीय उप-महांद्वीप  के विनाश का कारण बनी थी और शायद अब भी (??!!)  जयचंदों की मदद के सहारे तब भी बहुत से मीर जफ़र मुर्सीदाबाद की कुर्सी पर नजरें गडाए बैठे थे और आज भी बहुत हैं। राजा नाबा किशन देव जो कि ईस्ट इंडिया कम्पनी को फाइनेंस करते थे,  तब भी बहुत थे और आज भी बहुत हैं।1764 में जब बक्सर के युद्ध में मीर कासिम साह आलम  और सुजाउद दौलाह के सहयोग से अंग्रेजो को हारने की कोशिश में था तो अंग्रेजो को अवध और मद्रास से भितरघातियों का तब भी जमकर सहयोग...

चित्र-विचार !

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आज आपसे अनुरोध करूंगा कि  इस तनिक  संशोधित  चित्र पर नजर डालिए  और विचारिये ! छवि एक्सप्रेस ट्रिब्यून से साभार !

कार्टून कुछ बोलता है- प्रलय के आसार !

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कौड़ियों के मोल जान- मेरा भारत महान !

अपना देश जब आजादी लेने के लिए छट -पटा रहा था तो उस वक्त के अंग्रेज उन स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेताओं से सवाल करते थे कि आप आजादी लेकर क्या करोगे?  तो हमारे उन सैनानियों का एक ही जबाब होता था कि हम समानता के आधार पर एक व्यवस्थित समाज की स्थापना करेंगे, इस देश में राम राज्य लायेंगे, जहां हर नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के साथ सम्मान से जी सकेगा। आज इस तथाकथित आजादी को हासिल किये हमको 65 साल हो गए मगर जमीनी हकीकत क्या है, यह कल की उस घटना से जाहिर हो जाता है जिसमे दिल्ली के एक  ट्रॉमा सेंटर में ऑक्सीजन सप्लाई बंद होने से 4 मरीज जिन्दगी से हाथ धो बैठे। सच में, कितनी सस्ती है यहाँ एक जान की कीमत ! नॉर्वे  जैसे देश भी इसी दुनिया में है जो सिर्फ शक के आधार पर ही चाइल्ड अब्यूज के तहत माता-पिता को 18 महीने के कैद दे देते है, और एक हम हैं कि 4 जिन्दगी लापरवाही का शिकार होकर मौत के मुह में चली गई और हम इसे एक मामूली घटना समझकर ऍफ़डीआई के ही गणित में उलझे है।अब हमारे कुछ भ्रष्ट आला अधिकारी और ...

कार्टून कुछ बोलता है- पैरेंट्स व्यथा !

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खता मेरी ही थी, जो मैं तुमसे दिल लगा बैठा।

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तेरी चौखट पे न होता, आज इस तरह ठगा बैठा, खता अपनी ही थी कि जो तुमसे दिल लगा बैठा। पूछके देखो ज़रा उससे ,क्या होती है नींद चैन की, जो वाट जोहता किसी की, रहे रातों को जगा बैठा। ऐ नादां, हमने तेरे लिए क्या-क्या न ठुकरा दिया, जो थे  कुछ सगे उनको भी, खुद से दूर भगा बैठा। आज हमदर्दी का तुम्हारी, है यह आलम कि मैं , हूँ बेगानॉ की महफ़िल में, इक अकेला सगा बैठा। योवन की दहलीज पर, गर यूं न बहकते कदम, अपने को ही क्यों होता 'परचेत', देकर दगा बैठा।

नहीं मालूम, कौन सही है, कौन गलत !

कल  जब निम्नांकित खबर पर नजर गई तो  मेरे अंतर्मन से जो शब्द रूपी पुष्प छूटे वे ये थे कि इन फिरंगियों ने अपनी औलादे तो बिगडैल और निकम्मी बना ही डाली है, अब ये भारतियों  के पीछे पड़ गए है कि अगर इनके बच्चे अनुशासित निकले तो आगे चलकर ये हमारे बच्चों पर राज करेंगे, इसलिए इनके बच्चों को भी बिगाड़ो ;    ओस्लो: नॉर्वे में बाल शोषण के कथित मामले के तहत गिरफ्तार भारतीय दंपति पर उनके बच्चे के साथ ‘निरंतर बुरा बर्ताव’ करने का आरोप लगाया गया है. इसके लिए अभियोजन पक्ष ने माता-पिता के लिए कम से कम 15 महीने की कैद की मांग की है. आंध्रप्रदेश के चंद्रशेखर वल्लभानेणि एक सॉफ्टवेयर पेशेवर हैं और उनकी पत्नी अनुपमा भारतीय दूतावास में एक अधिकारी हैं. इन दोनों को ही ओस्लो की पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। इनका कुसूर यह था की इनके 7 साल के बच्चे ने अपने स्कूल की बस में पैंट में ही पेशाब कर दिया था, जिसकी जानकारी उसके पिता को की गई तो बच्चे के पिता ने उसे धमकाया कि अगर उसने ऐसा दोबारा किया तो वह उसे भारत वापस भेज देंगे। मगर, वक्त का जबाब देखि...

कार्टून कुछ बोलता है- अहम् बैठक

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कार्टून कुछ बोलता है -उज्जैन का खोता मेला

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नयनों का क्या भरोसा, कब नूर छोड़ देंगे।

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तनिक तुम अगर अपना गुरुर छोड़ देंगे, हम ये गंवारू समझ और शऊर छोड़ देंगे।  न सिर्फ तुम्हारी नापसंद,बल्कि जहां सारा,  इक इशारे पे तुम्हारे, हम हुजूर छोड़ देंगे।  तृष्णा न बची बाकी,क्या सखी,क्या साकी,  संग-कुसंगती का हम, हर सुरूर छोड़ देंगे।  सर पे  रखके  हाथ , न खिलाया करो कसमे,  मद्यपान न सही धुम्रपान जुरूर छोड़ देंगे।  बसाना ही है 'परचेत', तो दिल में बसाओ,  नयनों का क्या भरोसा, कब नूर छोड़ देंगे। छवि गुगुल से साभार  !

गली से इठला के निकलती है,चांदनी भी अब तो

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देखके लट-घटा माथे पे उनके,मनमोर हो गए है,  अफ़साने मुहब्बत के इत्तफ़ाक़, घनघोर हो गए है। कलतक खाली मकां  सा लगता था ये  दिल  मुआ,  हुश्नो-आशिकी के  इसपे , अब कई फ्लोर हो गए है।  गली से  इठला के गुजरती है, चांदनी भी अब तो,  वो क्या कि चंदा के दीवाने, कई चकोर हो गए है।   वो क्या जाने देखने की कला, टकटकी लगाकर,   खुद की  जिन्दगी से दिलजले  जो, बोर  हो गए है।     राह चलते तनिक उनसे, कभी नजर क्या चुराई,   नजरों में ही उनकी 'परचेत',अपुन चोर हो गए है।  

कार्टून कुछ बोलता है- मर्ज की दवा !

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ओ रे कसाब !

गर किया होता तूने  एक ठों काम नायाब, फिर चुकाना क्यों पड़ता  इसतरह तुझे  अपने कर्मों का हिसाब ! ओ रे कसाब  !! नरसंहार का  एक अकेला  तू ही नहीं  गुनहगार , क्योंकि इन बीहडो में   हर रोज होता है, हजारों निर्दोषों का शिकार! अद्भुत और फरेब भरी  यहाँ की रीति से,  कुछ बन्दूक से  तो  कुछ कूट नीति से,  फिर भी कोई माँगता नहीं  उनकी इस  कुटिलता  का हिसाब, मगर तुम  फंस गए जनाब ! ओ रे कसाब  !! तू  छला गया,  इसलिए दुनिया छोड़  चला गया, मगर ये कुटिल, अपनी कुटिलता के   तीर और कमान से,   गुलछर्रे उड़ा रहे यहाँ  आम  खर्च पर  शान से, पहनकर चेहरे पर ,  शराफत का नकाब, मगर तुमने  वो  क्यों नहीं पहना जनाब ?  ओ रे कसाब  !!