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Showing posts from March, 2009

हाँ, इनकी जय हो !

इन्होने ऊँच-नीच के अहसास को, पिछले बासठ सालो से, हर हिन्दुस्तानी के दिल में आरक्षण से जगाये रखा, इसलिए इनकी जय हो ! इन्होने जाति-धर्म, क्षेत्र के हास को पिछले बासठ सालो से, छद्म-निरपेक्षता के अंगारों पर, समाज में सुलगाये रखा, इसलिए इनकी जय हो ! इन्होने गरीबी के उपहास को पिछले बासठ सालो से, अमीरो की जुबान में , तरतीब से सजाये रखा, इसलिए इनकी जय हो ! इन्होने गुलामी के दास को पिछले बासठ सालो से, हर छोटे-बड़े नेता के घर में दामाद बनाके बिठाये रखा, इसलिए इनकी जय हो ! इन्होने अपने  भोग-विलास को पिछले बासठ सालो से, चंदे और दलाली की विसात पर बार और कोठो में पनपाये रखा, इसलिए इनकी जय हो !

आखिरी रात !

बदचलन थी, कलमुही पता नहीं किसका पाप अपने साथ लिए फिर रही थी। माँ-बाप ने उस बेचारे शरीफ लड़के के मत्थे मड दी, अब वह ऐसा नहीं करता तो और क्या करता? इसीलिए तो बड़े बुजुर्ग कह गए कि लड़कियों को ज्यादा छूट मत दो। गाँव-मोहल्ले के स्कूल में प्राईमरी और ज्यादा-से ज्यादा आठवी-दसवी तक पढ़-लिख कर दो-चार अक्षर वांचने सीख जाए, बस। ज्यादा पढ़-लिखकर कौन सा उसे प्रधानमन्त्री की गद्दी सँभालने जाना है। बड़ी क्लास में जाकर यही सब करती फिरती है। परिवार की तो नाक कटाई ही, साथ में गाँव और इलाके का नाम भी मिटटी में मिला दिया। इलाके का जो भी छोटा बड़ा वाशिंदा, उस घटना के बारे में सुनता, बस यही चर्चा शुरु कर देता था । यहाँ तक कि वहाँ की औरतो के मुख से भी यही बोल फूट रहे थे। और तो और, अगले ही दिन स्थानीय अखबार भी इसी खबर से पटे पड़े थे, कि शवो की पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट और पुलिस के शक को आधार बनाकर, कि प्रमोद ने तब सब कुछ जानने के बाद जहर खा दिया होगा, और फिर यह सब देखकर बीना के पास भी फांसी लगाने के सिवा कोई चारा न रहा होगा...... ! ऐसी ही तरह-तरह की कहानिया अखबारों ने अपने तरीके से गढी थी, और जिनका निचोड़ भी यह निकलत...

विकाश और सोना!

हालांकि इस आधुनिक विज्ञान के युग में इस तरह की बाते हमें सरासर दकियानूसी और हमारे मात्र पुराने ख्यालातों को उजागर करने वाली लगती है, मगर किसी घटना से सम्बंधित कुछ ऐसे तथ्य भी कभी-कभार हमारे समक्ष आ जाते है जो हमें ऐसी किसी सरसरी तौर पर फालतू सी लगने वाली बात पर भी गौर करने को मजबूर कर देती है। ऐसी ही एक कहानी सुदूर उत्तराँचल के पहाडो में हुई एक सड़क दुर्घटना से सम्बंधित है। यह भी हो सकता है कि इस कहानी में भी अनेको पेंच हो, मसलन विकाश अपनी नवविवाहिता से संतुष्ट न रहा हो और उससे छुटकारा पाने के लिए उसने यह नाटक रचा हो और फिर उसके बाद लोगो को झांसा देकर वहां से सदा के लिए चला गया हो। लेकिन कुछ बाते ऐसी जरूर है, जो एक पल के लिए इंसान को सोचने पर मजबूर करती है। उस घटना को घटे करीब अठारह साल बीत चुके है, और उस इलाके के उन कुछ लोगो के लिए आज भी यह एक खौफनाक दु:स्वप्न जैसा है, जो उस घटना के चश्मदीद गवाह थे। वे आज भी उस जगह की ओर, भरी दोपहर में भी अकेले जाने में कतराते है, जहां पर यह घटना घटी थी। इस वाकिये से जुड़ा हर इंसान, बस एक ही तर्क आज भी देता है कि आखिर विकाश गया तो गया कहाँ? जबकि उ...

लच्छी !

मेवाराम और उसका परिवार उस गाँव में उसकी पिछली तीन पुश्तो से रहते चले आ रहे थे। मूलतः वे लोग पहाडो में बसने वाली भोटिया जाति से सम्बद्ध थे। परिवार में वह, उसकी बीबी और चार बच्चे। जिंदगी गरीबी से जूझती मगर सीमित आवश्यकतावो की वजह से ठीक-ठाक ही गुजरती जाती थी, कहने को ज्यादा उतार-चड़ाव नही थे, बस एक शांत और सीमित कही जाने वाली ज़िन्दगी थी। चार बच्चो में लच्छी सबसे बड़ी थी और जवानी की सतरहवी देहलीज में प्रवेश कर चुकी थी। वह गाँव के ही सरकारी स्कूल से आठवी तक पढ़ी थी। उसी गाँव के प्रधान का बेटा शेर सिंह, जिसे शेरू के नाम से पुकारा जाता था, गाँव छुट्टी आया हुआ था। लोग कहते थे कि वह गाँव से सैकडो मील दूर, एक बड़े शहर में किसी बड़े सरकारी अफसर के घर पर नौकर था। क्योंकि वह काफ़ी सालो से बड़े साहब के पास काम कर रहा था, इसलिए उनके परिवार से काफ़ी घुलामिला था, और बड़े साहब और उसका परिवार उस पर काफ़ी भरोंषा करते थे। मगर इधर जब भी वह गाँव छुट्टी आता,लोगो को शेरू का एक दूसरा ही चेहरा नजर आता था। लोग उसे प्रधान की आवारा और बदचलन औलाद कहकर संबोधित करते। शेरू की नज़र एक दिन जब लच्छी पर पड़ी,तो उसका दिल ...

फिरंगी शांता !

पहली बार वह फ्रैंकफर्ट होते हुए मिआमी जा रहा था, अन्यथा उसने अपनी पिछली ३-४ ट्रिप वाया हीथ्रो ( लंदन) होते हुए ही तय की थी । दिल्ली से हीथ्रो अथवा फ्रंकफुर्ट का करीब ८- ८.३० घंटे का सफर उतना कष्टदायी और उबाऊ नही लगता, जितना की वहाँ से मिआमी तक का ९- ९.३० घंटे का लगता है। इसका एक कारण यह भी है कि आदमी जब शुरुआती उड़ान पकड़ता है तो वह मानसिक और शारीरिक रूप से तरोताज़ा होता है। इसलिए यह सब आसानी से झेल लेता है, मगर ज्यों-ज्यों वह बीच में ४-५ घंटे के स्टॉप ओवर के बाद आगे बढ़ता है, उसकी शारीरिक क्षमताये जबाब देने लगती हैं। यही वज़ह है कि लोग इतनी लम्बी हवाई उड़ान के बाद कुछ दिनों तक जेट-लेग का शिकार होते हैं। लुफ्थांसा के विमान में बैठे-बैठे, वह अब तक विस्की के दो पैग ले चुका था, मगर आँखे थी कि झपकने का नाम ही नही ले रही थी। वह अपने अतीत को खंगालने लगा। उसका अतीत उसके सामने एक चल-चित्र की तरह परत दर परत खुलता चला गया। राकेश २४ साल का था, जब उसने अपने पूरब को छोड़, सुदूर पश्चिम के एक विकसित राष्ट्र की और, या यूँ कहे कि दुनिया के एक सबसे विकशित राष्ट्र की और रुख किया था। जिंदगी की जद्दो-जहद म...

नरेश अंकल

बात लगभग एक साल पुरानी है, ग्रिष्मावकास के बाद फिर से स्कूल खुल गए थे। चिल्ड्रन बसे सुबह-सबेरे फिर से सडको पर दौड़ने लगी थी। रुपाली की स्कूल की मिनी बस जो सिर्फ़ छोटे बच्चो को लाने ले जाने के लिए थी, धीरे-धीरे बच्चो से भरने लगी थी। नन्ही रुपाली बस के पायदान के ठीक सामने, आगे वाली सीट पर बैठी थी। वह अपने नन्हे दिमाग में तरह-तरह के खयालो को ला रही थी। साथ ही बार-बार ड्राईवर की सीट की ओर भी देखे जा रही थी। आज ड्राइविंग सीट पर जो अंकल बैठे थे, वह भी नरेश अंकल की ही तरह की कद काठी और उम्र के थे। ग्रिष्मावकास के पहले की तरह कोई भी बच्चा आज बोनट के ऊपर नही बैठा था और न ही कोई गाना गा रहा था, सारे बच्चे खामोश अंदाज़ में सहमे से बैठे थे। एक-दो बच्चे, जिन्होंने पहली बार स्कूल का रुख किया था, सीट पर बैठे- बैठे रो भी रहे थे। सुबह-सबेरे चूँकि सडको पर यातायात बहुत ज्यादा नही होता अतः चिल्ड्रेन बस अपने गंतव्य की ओर सरपट भागे जा रही थी। रुपाली ने अपना सिर खिड़की के शीशे से टिकाया और ध्यान मग्न हो गई। दो माह पूर्व गर्मियों की छुट्टिया शुरु होने के ठीक एक दिन पहले की वह दर्दनाक घटना उसके जेहन में ...

किस्मत का आतंक !

अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग जन्मजात भाग्यशाली होते है, विपरीत परिस्थितियों में भी भाग्य हर मोड़ पर उनका साथ देता है, ठीक इसके विपरीत कुछ अभागे लोग ऐंसे भी होते है जिनका बदकिस्मती जिंदगी भर साथ नही छोड़ती। कमला की कहानी भी कुछ इससे भिन्न नही है। बचपन में ही माँ का साया सर से उठ गया था। सौतेली माँ के भेदभावपूर्ण व्यवहार के तले जैसे-तैसे बचपन गुजरा, जवानी की देहलीज़ पर पहुची, और फिर वह दिन भी आया जब वह डोली में बैठ पति के घर चली आई। ससुराल में भी परिवार में कहने को सिर्फ़ जेठ - जेठानी और उनके दो बच्चे थे, सास-ससुर का निधन बहुत पहले ही हो चुका था। प्रमोद, कमला का पति अन्ख्लेश्वर, गुजरात में एक प्राइवेट केमिकल फैक्ट्री में सुपरवाईजर के पद पर कार्यरत था। शादी के हफ्ते भर बाद प्रमोद कमला को गाँव में भैया-भाभी के पास छोड़ वापस नौकरी पर अन्ख्लेश्वर लौट आया था। अभी कमला के हाथो की मेहँदी ठीक से सूख भी नही पाई थी कि जेठानी ने भी जुल्म ढाने शुरू कर दिए। जैसे-तैसे दिन गुजरने लगे। आज के दौर में, जबकि देश में मोबाइल क्रांति और फ़ोन क्रांति का बोलबाला हो, वही सुदूर पहाडी गाँव में रहने वाली एक...

अधूरी कहानी और पूरा सच !

सुबह के करीब सवा सात- साढे सात का वक़्त रहा होगा। धस्माना साब की कोठी के आस-पड़ोस के लोग भी रुपाली के उस धीमे, मगर करुणामयी रुंधन को सुनकर उनकी कोठी के गेट के पास इकट्टा हो गए थे। सभी के जेहन में एक ही सवाल था कि क्या हुआ, रुपाली क्यों रो रही है? घर के सभी सदस्य भी मकान की ऊपरी मंजिल, जिस पर रुपाली अपने बेटे के साथ रहती थी, दौड़ पड़े थे। उन्होंने देखा कि वहाँ प्रथम मंजिल पर बने दो कमरों में से एक, जिसे रुपाली ने ड्रोविंग रूम बना रखा था, उस कमरे में टीवी चल रहा था और दूरदर्शन के चेंनल पर समाचार चल रहे थे। रुपाली घुटनों के बल बैठी, अपने नौ वर्षीय पुत्र राहुल को सीने से लगाये रोये जा रही थी। रुपाली की छोटी भाभी ने राहुल को रुपाली से अलग करते हुए पूछा, रुपाली क्या हुआ ? बड़ी भाभी भी बोली, क्या हुआ, कुछ कहती क्यो नही? रुपाली बिना कोई जबाब दिए ,बस आंसुओ से भरी आँखों से टुकुर-टुकुर वहा मौजूद लोगो को देखती रही थी। धस्माना साब भी कमरे के एक कोने में अलग से खड़े होकर, यह सब देख रहे थे कि ठीक उसी वक्त टीवी पर न्यूज़ रीडर ने कहा " अंत में मुख्य समाचार एक बार फिर:- देश भर में कारगिल विजय ...

कविता- आया फिर से चुनाव है !

गाँव-गाँव, शहर-शहर, कूचा- कूचा और गली-गली, लुच्चे -लफंगे,चोर-उचक्के, छोटे बड़े सभी बाहुबली! अपनी-अपनी मुछो पर यहाँ हर कोई, दे रहा ताव है, क्योंकि  इस देश में यारो, आ गया फिर से चुनाव है ! चुनाव के मौसम में  सियासतदान  हो रहे विनम्र हैं, हर कुटी- द्वारे, सूखे पिंड खजूर लिए झुकता तम्र है! अपने किये पापो को धोने, गंगा में लगा रहे हैं गोते, शेर की खाल पहनकर , गलियों में घूम रहे हैं खोते! मुख में इनके फिर सत्यवचन, माथे पर चन्दन है, नए-पुराने इनके फिर, बन-बिगड़ रहे गठबंधन है! इधर लोकतंत्र के महाकुम्भ का, गूंज रहा शंखनाद है उधर चारो तरफ हमारे, फल-फूल रहा आतंकवाद है! नापुंसको ने भी खूब उड़ाया,  लोकतंत्र का मखौल है, इनकी शक्ले देख कर जनता का, खून रहा खौल है! महंगाई और बेरोजगारी का दिलो पर ताजा घाव है, लोकतंत्र के महापर्व का अब फिर से आया चुनाव है !