टूटा भ्रम !
बात करीब १८-२० साल पुरानी है। तब मैं और मेरा हिमांचली दोस्त सत्येन्द्र लाजपत नगर रेलवे कालोनी में रेलवे फाटक के समीप फ्लैट किराए पर लेकर रहा करते थे। हम दोनों एक ही लिमिटेड कंपनी में एक्जीक्यूटिव थे। उस समय मैं अविवाहित था, जबकि मेरे दोस्त सत्येन्द्र की करीब तीन महीने पहले ही शादी हुई थी। जब सत्येन्द्र की शादी हुई थी तो हम उसके गाँव में, जोकि मनाली वाले रूट पर मंडी के समीप एक पहाडी घाटी में स्थित है, पूरे एक हफ्ता रुके थे । सत्येन्द्र के पिता तब हिमांचल में प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ट अधिकारी थे, अतः गाँव में उनका अच्छा खासा रुतवा था। अब उसकी शादी के तीन महीने बाद ही उसकी बहन की भी शादी थी। अतः हम लोग यानि मैं, सत्येन्द्र और उसकी पत्नी पूर्व-निर्धारित प्लान के मुताविक पांच दिन पहले ही दिल्ली से निकल पड़े थे। सत्येन्द्र को अपनी शादी में इस बात का मलाल था कि व्यस्तता के कारण वह मुझे मनाली घुमाकर नहीं लाया था। उसके पास उस समय मारुती ८०० कार थी, अतः हमने पहले सीधे मनाली का ही रुख किया था, ताकि शादी के बाद थकान की वजह से फिर मनाली जाने से ना चूके। सुबह तड्के चार बजे हम दिल्ली से निकले और आ...