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Showing posts from April, 2009

टूटा भ्रम !

बात करीब १८-२० साल पुरानी है। तब मैं और मेरा हिमांचली दोस्त सत्येन्द्र लाजपत नगर रेलवे कालोनी में रेलवे फाटक के समीप फ्लैट किराए पर लेकर रहा करते थे। हम दोनों एक ही लिमिटेड कंपनी में एक्जीक्यूटिव थे। उस समय मैं अविवाहित था, जबकि मेरे दोस्त सत्येन्द्र की करीब तीन महीने पहले ही शादी हुई थी। जब सत्येन्द्र की शादी हुई थी तो हम उसके गाँव में, जोकि मनाली वाले रूट पर मंडी के समीप एक पहाडी घाटी में स्थित है, पूरे एक हफ्ता रुके थे । सत्येन्द्र के पिता तब हिमांचल में प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ट अधिकारी थे, अतः गाँव में उनका अच्छा खासा रुतवा था। अब उसकी शादी के तीन महीने बाद ही उसकी बहन की भी शादी थी। अतः हम लोग यानि मैं, सत्येन्द्र और उसकी पत्नी पूर्व-निर्धारित प्लान के मुताविक पांच दिन पहले ही दिल्ली से निकल पड़े थे। सत्येन्द्र को अपनी शादी में इस बात का मलाल था कि व्यस्तता के कारण वह मुझे मनाली घुमाकर नहीं लाया था। उसके पास उस समय मारुती ८०० कार थी, अतः हमने पहले सीधे मनाली का ही रुख किया था, ताकि शादी के बाद थकान की वजह से फिर मनाली जाने से ना चूके। सुबह तड्के चार बजे हम दिल्ली से निकले और आ...

निशानदेह सपना !

सावन अपने प्रचन्ड पर था, और उस साल देश के उत्तरी भागों मे सामान्य से कहीं अधिक बारिश हो रही थी । आज की तरह, तब संचार के बहुत अधिक साधन उप्लब्ध न थे, खासकर उत्तरांचल के पहाडो मे । मै अपने को अन्य गांव वालो से इसलिय अधिक भाग्यशाली समझता था, क्योंकि अपने घर मे तब एक तीन बैन्ड का रेडियो होता था, जिसका कि उस जमाने मे हर साल, पास के पोस्ट आफिस मे सालाना लाइसेन्स फ़ीस जमा करवानी पड्ती थी । रेडियो पर रोज सुबह-शाम समाचारों मे यह जानकारी मिलती रहती थी कि बारिश के कारण आयी बाढ ने कहां क्या तवाही मचाई है । बात सन १९७८-७९ की है । मै तब गांव के पास के ही एक उच्चत्तर माध्यमिक स्कूल मे दसवीं का छात्र था । उस रात बादलों की गडगडाहट और बिजली की कड्कन रह-रहकर दिल को यह अह्सास दिला जाती थी कि यहां सब कुछ भगवान भरोसे है, और अगली सुबह का सूरज देख भी पायेगें या नही । रुक-रुक कर पहाडी चट्टानों के टूटकर गिरने की आवाजे दिल को दहला देती थी । एक-एक पल मानो जैसे भारी पड रहा था और मै अपने दादाजी-दादीजी संग एक कमरे मे बैठा, पिताजी की उसी साल सीएसडी कैन्टीन से खरीदकर मुझे दी गयी एचएमटी की घडी को लालटेन के स...

तू सच क्यों बोलता है ?

छल-कपट है जिस जग में, अंहकार भरा है रग-रग में, उस जगत के हर पहलू को  एक ही मापक्रम क्यों तोलता है ? झूठ-फरेब की दुनिया में  'परचेत',  तू सच क्यों बोलता है ? पग-पग  हैं मिथ्या धोखे, बंद पड़ चुके सत्य झरोखे, हर इंसान को फिर भला तू एक ही भाव क्यों मोलता है ? झूठ-फरेब की दुनिया में  'परचेत',  तू सच क्यों बोलता है ? निष्कलंक बन गई है दीनता, चहु दिश फैली मूल्यहीनता, धूमिल पड़े इस दर्पण में तू सच्चाई क्यों टटोलता है ? झूठ-फरेब की दुनिया में  'परचेत',  तू सच क्यों बोलता है ? सब जी रहे यहाँ भरम में, तजकर  विश्रंभ  धरम-करम में, इस कलयुग में कटु सत्य को  सरे-आम क्यों बोलता है ? झूठ-फरेब की दुनिया में  'परचेत',  तू सच क्यों बोलता है ?